Thursday, 3 July 2025

जीएसटी की वसूली बढ़ी तो जनता को भी राहत मिलनी चाहिए

1 अप्रैल 2017 से लागू हुए जीएसटी को प्रारंभ में प्रायोगिक तौर पर लिया गया था। इसमें व्याप्त जटिलता को देखते हुए इसकी सफलता पर भी संदेह जताया गया । सरकार ने भी इसमें जिस तेजी से  बदलाव किये उससे विपक्ष के इस आरोप की पुष्टि हुई कि बिना समुचित तैयारी के इसे लागू कर दिया था। उद्योग - व्यापार जगत में भी इसे लेकर  भारी नाराजगी थी। इसका प्रत्यक्ष असर दिसंबर 2017 में हुए  गुजरात  चुनाव के परिणामों में देखने मिला जब भाजपा 2012 की तुलना में 16 सीटें गंवाकर 99 पर अटक गई और वह भी तब, जब आखिरी दौर में गृहमंत्री अमित शाह ने सूरत में डेरा जमाकर भाजपा की डूबती नैया बचाई। लेकिन धीरे - धीरे इसकी स्वीकार्यता बढ़ती गई और उद्योग - व्यापार जगत ने भी इसे अपना लिया। इसके लागू होने से राज्यों के स्तर पर करों की भिन्नता कुछ हद तक दूर हुई है। आंकड़ों में आकलन करें तो बीते 5 साल में जीएसटी वसूली दोगुनी हो चुकी है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25  में कुल GST संग्रह रु 22.08 लाख करोड़ रहा, जो 5 वर्ष पूर्व 11.37 लाख करोड़ था।  इस राशि में हर महीने वृद्धि होना एक तरफ तो देश में आर्थिक गतिविधियों के सुचारु रूप से संचालित होने का प्रतीक है वहीं दूसरी तरफ इस कर प्रणाली की सफलता का प्रमाण। इस व्यवस्था के 8 साल पूरे होने के मौके पर सरकार ने जून 2025 का जीएसटी वसूली का जो आंकड़ा जारी किया वह  1.85 लाख करोड़ रहा जो गत वर्ष से 6.2 फीसदी ज्यादा है। अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने में जीएसटी के योगदान को आर्थिक विशेषज्ञ स्वीकार करने लगे हैं। हर माह इसकी वसूली में वृद्धि इस बात का परिचायक है कि  करदाता भी अपना दायित्व ठीक से निर्वहन कर रहे हैं। हालांकि टैक्स चोरी करने वालों ने जीएसटी को भी नहीं छोड़ा किंतु  उनके काले धंधे जल्द पकड़ में आ जाते हैं। आठ साल बाद जीएसटी सरकार के राजस्व का प्रमुख स्रोत बन चुका है। इसकी वजह से विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के संचालन के बाद भी सरकार का खजाना खाली नहीं हुआ और विकास कार्य भी रोकने की नौबत नहीं आई। लेकिन इस सफलता के शोर के बावजूद कुछ वायदे और अपेक्षाएं अभी भी पूरी होनी बाकी हैं। मसलन जीएसटी लागू करते समय एक देश एक टैक्स जैसा आश्वासन मिला था जो पूरा नहीं हो सका क्योंकि राज्यों के अपने कारण हैं अलग - अलग दरें रखने के। विशेष रूप से पेट्रोल - डीजल जैसी दैनिक उपयोग की चीजों को जीएसटी के दायरे में लाने की कोई संभावना नहीं दिखती। केन्द्र जहाँ राज्यों में आम सहमति न होने का बहाना बनाते हैं वहीं राज्य केन्द्र पर आरोप मढ़ते हैं। इसी का परिणाम है कि उ.प्र  में पेट्रोल - डीजल म.प्र से 10 रु. लीटर सस्ता है। चिकित्सा बीमा प्रीमियम पर  18 फीसदी जीएसटी असंवेदनशीलता नहीं तो और क्या है?  जीएसटी की ढेर सारी दरें भी इसकी मूल भावना के विरुद्ध है। 5 और 12 फीसदी तक  तो फिर भी ठीक है किंतु उससे अधिक दरें अव्यवहारिक हैं। विलासिता से जुड़ी कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर अधिक करारोपण गलत नहीं है किंतु बाकी सभी पर अधिकतम 12 प्रतिशत जीएसटी ही लगना चाहिए। हालांकि गत दिवस आम जनता के उपयोग की तमाम चीजों को 12 से हटाकर  5 फीसदी के दायरे में लाये जाने का फैसला अगली जीएसटी काउंसिल बैठक में लिए जाने की संभावना समाचार माध्यमों से प्रचारित हुई किंतु 18 फीसदी की दर खत्म करने जैसी कोई बात सुनाई नहीं दे रही। इस दिशा में सोचने और करने का ये सही समय है। हमारे देश में आम जनता को चुनाव के पहले राहत देने का रिवाज है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले  केंद्रीय बजट में 12 लाख तक आयकर छूट दिये जाने का परिणाम भाजपा की जीत के तौर पर आया। निकट भविष्य में बिहार और  प. बंगाल, असम, त्रिपुरा, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होना है। बड़ी बात नहीं इनमें जीत हासिल करने के लिए जीएसटी में राहत की सौगात मिल जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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