Monday, 7 July 2025

दांव उल्टा पड़ते ही बचाव करने में जुटे उद्धव


मुंबई में राज ठाकरे  और उद्धव ठाकरे द्वारा प्राथमिक कक्षाओं में तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी की अनिवार्यता खत्म करने के फड़नवीस सरकार के निर्णय को अपनी विजय मानते हुए बीते सप्ताह एक मंच पर आकर जो शक्ति प्रदर्शन किया उसे एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के तौर पर देखा गया। भले ही  दोनों भाईयों ने अपने दलों के एकीकरण का कोई संकेत नहीं दिया किंतु मुंबई महानगरपालिका के आगामी चुनाव के मद्देनजर दोनों के गठबंधन का संकेत इससे अवश्य मिला। इस पुनर्मिलन पर इंडिया गठबंधन के शेष घटक तो शांत रहे किंतु  दक्षिण में बैठी द्रमुक को मुँह मांगी मुराद मिल गई जिसका प्रमाण तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के उस बयान से मिला जिसमें उन्होंने उद्धव ठाकरे को बधाई देते हुए इस बात पर हर्ष व्यक्त किया कि हिन्दी विरोधी लड़ाई अब तमिलनाडु से बाहर पहुँच गई है । इसके साथ ही स्टालिन ने हिन्दी विरोधी लड़ाई मिलकर लड़ने की पेशकश कर डाली। लेकिन इस बिन मांगे समर्थन से खुश होने के बजाय उद्धव ठाकरे गुट रक्षात्मक हो गया। पार्टी के प्रवक्ता संजय राउत ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी हिन्दी की विरोधी नहीं अपितु उसे लादे जाने के विरुद्ध है। स्टालिन द्वारा की गई पेशकश से कन्नी काटते हुए उन्होंने कहा कि द्रमुक के लोग हिन्दी बोलते ही नहीं  हैं जबकि हम लोग हिन्दी का प्रयोग बोलचाल में किये जाने के विरोधी नहीं हैं। इसके अलावा भी उन्होंने कई ऐसी बातें कीं जो विजय रैली में राज और उद्धव द्वारा कहीं गई बातों से अलग थीं। उल्लेखनीय है उस रैली में उद्धव यहाँ तक बोल गए थे कि यदि मराठी के लिए लड़ना गुंडागर्दी है तो हम गुंडे हैं। सही बात ये है कि राज और उद्धव को उस रैली के बाद जिस प्रकार के समर्थन की उम्मीद रही वह नजर नहीं आया। इंडिया गठबंधन के मुख्य घटक कांग्रेस के अलावा महाराष्ट्र के बड़े नेता शरद पवार ने भी ठाकरे बंधुओं की हिन्दी विरोधी मुहिम को पूरी तरह उपेक्षित कर दिया। अन्य राज्यों में बसे मराठीभाषियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। लेकिन स्टालिन के अप्रत्याशित समर्थन ने ठाकरे बंधुओं की चिंता बढ़ा दी क्योंकि शिवसेना का जन्म ही मुंबई में  दक्षिण भारतीयों के विरोध से हुआ था। हालांकि राज को तो इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उनका जनाधार काफी सिमट चुका है किंतु उद्धव के लिए चेन्नई से आई बधाई परेशान करने वाली रही। चूंकि विजय रैली में वे कुछ ज्यादा ही हाँक चुके थे इसलिए पीछे हटने की शर्मिंदगी से बचने अपने प्रवक्ता संजय राउत को आगे कर दिया जो मराठी अस्मिता के नाम पर दहाड़ने के बजाय मिमियाते नजर आये। असल में उद्धव को ये एहसास हो गया कि मराठी की रक्षा के लिए हुई रैली से यदि कोई लाभ होगा तो उसका बड़ा हिस्सा राज को मिलेगा क्योंकि मराठी को लेकर उनके तेवर सदैव उग्र रहे  हैं। सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा देने आये अन्य राज्यों के युवकों के साथ हिंसा भी उन्हीं के उकसावे पर होती थी। दूसरी ओर उद्धव ने गैर मराठीभाषियों को भी अपने साथ जोड़ने की नीति  बनाई जिसका लाभ भी मिलने लगा था। ऐसे में एक सीमा के बाद हिन्दी विरोध करने से गैर मराठी समर्थक छिटक सकते हैं। उससे भी बड़ी बात ये हुई कि राज व और उद्धव के मंच साझा करने से मुंबई के गैर मराठी भाषियों का ध्रुवीकरण होने की संभावना बढ़ गई। इससे मुंबई महानगरपालिका के आसन्न चुनावों में  उद्धव को अपना खेल खराब होने की आशंका सताने लगी। मराठी की आड़ में हिन्दी भाषियों के साथ किये गए अपमानजनक व्यवहार के बारे में मुंबई से ही सोशल मीडिया पर जो उग्र प्रतिक्रियाएं  प्रसारित हुईं उनसे भी वे चौकन्ने हुए। ये सब देखते हुए लगता है उद्धव द्वारा हिन्दी विरोध का जो दांव चला गया वह उल्टा पड़ गया इसीलिए उन्होंने श्री राउत को आगे करते हुए बचाव का रास्ता खोजा। लेकिन मराठी का समर्थन करने में गुंडा कहलाने तक के लिए तैयार उद्धव को जो नुकसान होना था उसकी भरपाई अब संभव नहीं है। उल्टे  हिन्दी के प्रति ज्यादा नरम होने का दिखावा करने से कट्टर मराठी समर्थक हाथ से खिसक जाने का खतरा पैदा हो गया है। ठाकरे बंधुओं को ये बात समझनी होगी कि यदि गैर मराठीभाषी मुंबई छोड़ दें तो माया नगरी अपनी रौनक खो बैठेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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