बई में आज बरसों पहले अलग हुए दो भाई एक मंच पर नजर आये। मराठी को बहाना बनाकर उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने बड़ी रैली की। रैली में शिवसेना के पुराने तेवर दिखाने का प्रयास हुआ। किसी पार्टी या संगठन का बैनर और झंडा नहीं लगने से ये कहना कठिन है कि उद्धव की खंडित शिवसेना और राज की मनसे का एकीकरण हो जाएगा क्योंकि बीते कुछ सालों में अनेक बार उनके साथ आने की अटकलें लगीं किंतु वे ज़मीन पर नहीं उतर सकीं। पिछले विधानसभा चुनाव में तो उद्धव के बेटे आदित्य के विरुद्ध राज ने अपने पुत्र को लड़ाया जो हार गया। ऐसे में दोनों भाई अचानक एक मंच पर आकर मराठी के सम्मान की बात करने लगे ये चौंकाने वाली बात है। खास तौर पर इसलिए क्योंकि राज के बारे में ये कयास काफी समय से लग रहे थे कि वे भीतर - भीतर भाजपा के साथ जुड़ने की तैयारी में हैं। उद्धव के कारण ही राज को शिवसेना छोड़नी पड़ी थी। वरना एक जमाना था जब अपनी ओजस्वी भाषण शैली में हिंदुत्व का पक्ष रखने के कारण उन्हें बाला साहेब का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाने लगा था। उस दौर में उद्धव वन्य छायांकन का अपना शौक पूरा करने में व्यस्त रहते थे। राज ने नाराज होकर शिवसेना ही नहीं छोड़ी अपितु बाला साहेब की छाया से बाहर निकलने के उद्देश्य से मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) का गठन किया किंतु तमाम कोशिशों के बावजूद वे शिवसेना के समानांतर खड़े नहीं हो सके। उद्धव भाजपा के साथ रहकर अच्छी स्थिति में थे किंतु मुख्यमंत्री बनने की चाहत ने उन्हें शरद पवार और कांग्रेस की गोद में बिठा दिया। हालांकि वह प्रयोग फुस्स साबित हुआ और उद्धव हिंदुत्व छोड़कर मुस्लिम समर्थक कांग्रेस और शरद पवार के जाल में फंस गये। लेकिन अब उनको ये लगने लगा कि वे कहीं के नहीं रहे। पार्टी भी हाथ से गई और पिता से विरासत में मिली पुण्याई भी। इंडिया गठबंधन के साथ भी उनकी पटरी नहीं बैठ रही। शरद पवार का सूर्य अस्त होने के कगार पर है। उधर कांग्रेस ने भी उद्धव को आँखें दिखाना शुरू कर दिया और मुंबई महानगरपालिका का चुनाव अकेले लड़ने का संकेत देकर उनकी नींद उड़ा दी। उल्लेखनीय है कई राज्यों से बड़े बजट वाली मुंबई महानगरपालिका शिवसेना और ठाकरे परिवार के लिए प्राणवायु जैसी है। उसका आगामी चुनाव उद्धव के लिए जीवन - मरण का सवाल है क्योंकि उसके बिना उनके लिए अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाये रखना असम्भव हो जाएगा। एकनाथ शिंदे को साथ लाकर भाजपा ने इस चुनाव के लिए कड़ी मोर्चेबंदी कर ली है। इस सबका ही परिणाम है कि सारे शिकवे - गिले भुलाकर उन्होंने राज से हाथ मिलाने में संकोच नहीं किया । ज्यादा पुरानी बात नहीं जब दोनों एक दूसरे को फूटी आँख से भी नहीं देखना चाहते थे। वैसे इस मिलन की जितनी जरूरत उद्धव को थी उतनी ही राज को भी जिनकी राजनीतिक पूंजी पूरी तरह खत्म हो चुकी है। आज मराठी का झंडा उठाकर उद्धव के साथ मंच साझा करते हुए राज ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को इस बात का श्रेय दिया कि दोनों भाईयों को एक करने का जो काम बाला साहेब नहीं कर पाए वह हिन्दी की शिक्षा को अनिवार्य बनाकर उन्होंने कर दिया। राज ने एक बार फिर महाराष्ट्र को सबसे ऊपर बताकर मुंबई को न छेड़ने की चुनौती भी दी। यद्यपि रैली में जुटी भीड़ से कोई निष्कर्ष निकालना बेमानी है क्योंकि आज की मुंबई अब मराठी को लेकर आंदोलित नहीं होगी। गैर मराठी भाषियों के साथ मारपीट की घटनाओं से ठाकरे बंधुओं की मुहिम पहले ही दागदार हो चुकी है। बेहतर होगा यदि राज और उद्धव अपने मन से ये गलतफहमी निकाल दें कि वे मराठी मानुष वाले बाला साहेब के हथियार के सहारे अपनी राजनीति चमका लेंगे क्योंकि उसमें जंग लग चुकी है। ये कहना गलत नहीं होगा कि ठाकरे बंधुओं के इस मूर्खता पूर्ण कदम से अन्य प्रांतों में रह रहे मराठी भाषियों पर संकट आ सकता है। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि मुंबई की चाल, चरित्र और चेहरा पूरी तरह बदल चुका है और वहाँ की राजनीति की लगाम गैर मराठी भाषियों के हाथ है। इसलिए मुंबई महानगरपालिका का चुनाव मराठी के नाम पर उत्पात मचाकर नहीं जीता जा सकता।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment