Saturday, 12 July 2025

डोभाल की चुनौती एक तीर से दो निशाने

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल राजनीतिक व्यक्ति  नहीं हैं। एक शासकीय अधिकारी के तौर पर उन्होंने विभिन्न दायित्वों का निर्वहन अत्यंत कुशलता के साथ किया। पाकिस्तान में राॅ के एजेंट के तौर पर भी रहे। उत्तर पूर्वी  राज्यों में उग्रवादी संगठनों को शांति के रास्ते पर लाने में भी उनकी भूमिका सराहनीय रही। आम तौर पर वे बयानबाजी से दूर ही रहते हैं। जम्मू - कश्मीर से धारा 370 हटाने में उन्होंने जो जमीनी काम किया वह ऐतिहासिक कहा जाएगा। जब पूरी कश्मीर घाटी में जबरदस्त तनाव था तब वे लोगों के बीच घूमकर उस निर्णय के फायदों से  लोगों को अवगत कराने का साहसिक प्रयास कर रहे थे। बीते 10 वर्षों में भारतीय सुरक्षा तंत्र जिस तरह मजबूत हुआ उसमें बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। अनेक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशनों पर प्रधानमंत्री के साथ उनकी उपस्थिति काफी कुछ कह जाती है। यही वजह है कि चाहे बाह्य सुरक्षा हो या आंतरिक, श्री डोभाल उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े रहते हैं। इसलिए उनकी किसी भी बात में वजन होता है। गत दिवस उन्होंने चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान विदेशी मीडिया को चुनौती दी कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की किसी भी संरचना को हुए नुकसान का एक भी चित्र दिखाएं। साथ ही उन्होंने इस दावे को दोहराया कि भारत ने पाकिस्तान में जितने भी ठिकानों पर हमला किया उनमें से एक भी निशाना नहीं चूका। श्री डोभाल के अनुसार 7 मई की  रात मात्र 23 मिनिट में ही हमारी सेना  अपना काम पूरा कर चुकी थी। आई.आई.टी चेन्नई के दीक्षा समारोह में दिये गये भाषण में श्री डोभाल द्वारा कही गईं उक्त बातों से पाकिस्तान को मिर्ची लग गई। उसके एक सरकारी प्रवक्ता ने संघर्ष के महिमामंडन की आलोचना भी कर डाली। दरअसल सुरक्षा सलाहकार ने उन विदेशी समाचार माध्यमों को कटघरे में खड़ा किया जिन्होंने आपरेशन सिंदूर के दौरान  पाकिस्तान द्वारा भारत को नुकसान पहुंचाए जाने के दावों को बढ़ा - चढ़ाकर  प्रचारित किया। लेकिन दुख इस बात का है कि हमारे देश में ही विपक्ष के अनेक नेता और मोदी विरोध में लिप्त कतिपय यू ट्यूबर इस बात की रट लगाए रहे कि पाकिस्तान की जवाबी कारवाई में भारत को बहुत नुकसान हुआ। ऐसे समय जब सेना का मनोबल बढ़ाने की जरूरत थी तब ये वर्ग सरकार से ऐसे सवाल पूछने में लगा रहा जो न सिर्फ अनावश्यक अपितु आपत्तिजनक भी थे। विदेशी समाचार माध्यमों की पाकिस्तान समर्थक खबरों को सही मानकर सेना और सरकार दोनों को घेरने का प्रयास अभी भी चला आ रहा है। ये देखते हुए श्री डोभाल ने विदेशी समाचार माध्यमों को जो चुनौती दी है उसका निशाना भारत में ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बजाय पाकिस्तान के झूठे दावों को सही मानने वाले उन लोगों पर भी है जिनका काम देश का मनोबल तोड़कर अपना उल्लू सीधा करना मात्र रह गया है। उनसे ये अपेक्षा कोई नहीं करता कि वे सरकार के सभी कार्यों और फैसलों का समर्थन करें किंतु जब हमारी सेना ने दुश्मन की कमर तोड़कर रख दी तब बजाय उसके पराक्रम की प्रशंसा करने के  दुश्मन देश द्वारा हाँकी जा रही डीगों को सही मानकर अपनी सेना की वीरता को कमतर आंकना बेहद गैर जिम्मेदाराना है। सरकार ने ऐसे सवालों का जवाब न देकर ठीक किया क्योंकि सेना से जुड़े मामलों में सार्वजनिक चर्चा करना उचित नहीं होता। श्री डोभाल  ने विदेशी समाचार माध्यमों को चुनौती देने का जो साहस दिखाया उससे पाकिस्तान का भड़कना साबित करता है कि उनकी चुनौती में दम है। लेकिन अपने देश में बैठे उस तबके पर इसका कोई असर होगा ये कहना मुश्किल है क्योंकि जो लोग सेना से सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांग सकते हैं उनसे किसी परिपक्वता की उम्मीद करना व्यर्थ है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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