हालांकि जबसे इजराइल और हमास के बीच जंग शुरू हुई तभी से ईरान भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उससे जुड़ा हुआ था। ये कहना भी गलत नहीं है कि हमास नामक इस्लामिक उग्रपंथी संगठन का गाजा पर आधिपत्य ईरान की सहायता से ही हुआ और वही उसे पूरी तरह से संरक्षण देता आ रहा है। इजराइल पर हमास ने जो पहला हमला किया उसके पीछे भी ईरान का ही दिमाग बताया जाता है। हमास के तमाम बड़े नेता भी ईरान में रहते हुए ही इजराइल विरोधी गतिविधियां संचालित करते आये हैं जिनमें से कुछ को इजराइल ने अपनी अचूक मिसाइलों से मार गिराया। ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की किंतु इजराइल के सुरक्षा प्रबंध के सामने वह कमजोर साबित हुआ। लेकिन छिटपुट आक्रमण और प्रत्याक्रमण से आगे बढ़कर दो दिन पूर्व इजराइल ने ईरान पर जबरदस्त हमला बोलते हुए उसके रक्षा प्रतिष्ठानों के साथ ही परमाणु संयंत्रों को तो नुकसान पहुंचाया ही उसके अनेक सेनाध्यक्षों को भी मौत की नींद सुला दिया। जवाब में ईरान ने ड्रोन से जो हमला किया वह तो इजराइल के एयर डिफेंस ने नाकाम कर दिया किंतु कुछ मिसाइलें राजधानी तेल अबीब में गिरने ने जान - माल का नुकसान हुआ। दोनों तरफ से आरपार की लड़ाई के संकेत मिल रहे हैं। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को धमकी दे डाली कि यदि वह परमाणु निषेध संधि पर हस्ताक्षर नहीं करता तो बर्बाद होने तैयार रहे। जानकार सूत्रों का कहना है कि ईरान जल्द ही आण्विक परीक्षण करने वाला था। अमेरिका को इसकी भनक लगते ही उसने इजराइल के जरिये उसकी तैयारी पर पानी फेरने की रणनीति बनाई। इसमें कुछ भी छिपा नहीं है कि इजराइल जो कुछ भी करता है उसमें अमेरिका का संरक्षण और सहयोग रहता ही है। इजराइल सैन्य शक्ति और तकनीक के विकास में कितना भी आगे निकल जाए किंतु अमेरिका के वरद हस्त के बिना वह अरब मुल्कों से लड़ने में अक्षम है। कुछ दिन पहले तक जो ट्रम्प इजराइल और हमास के बीच युद्धविराम करवा रहे थे वे ही इजराइल द्वारा किये गए भीषण हमले को रोकने के बजाय ईरान को बर्बादी का भय दिखा रहे हैं। दरअसल इस हमले की तैयारी करने के लिए ही ट्रम्प ने सऊदी अरब और कतर आदि का दौरा किया था। गौरतलब है पश्चिम एशिया के अनेक बड़े देशों ने इजराइल से व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते न सिर्फ बनाये बल्कि मजबूत भी कर लिए। जिसकी वजह से ईरान और हमास दोनों अलग - थलग पड़ते गए। इसीलिए गाजा में जब इजराइल ने कहर बरपाया तब वहाँ से भागने वालों को पड़ोसी मिस्र ने शरण देने के बजाय अपनी सीमा बन्द कर ली। सीरिया के पतन के बाद अब ईरान ही बड़ा इस्लामिक देश है जो अभी तक अमेरिका के आगे झुकने राजी नहीं। उसकी मुख्य आय का स्रोत कच्चा तेल है किंतु अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते वह मनमाफिक बिक्री नहीं कर पाने के कारण आर्थिक नुकसान झेलता आया है। इसी वजह से भारत और उसके बीच का तेल खरीदी सौदा खटाई में पड़ गया। अरब मुल्कों में ईराक और लीबिया के बाद ईरान ही अकेला अमेरिका और इजराइल के विरोध में खड़ा रहा। हालांकि इजराइल के अनेक पड़ोसी उससे नफरत करते हैं किंतु उसकी आक्रामकता का सामना करने की हिम्मत किसी में नहीं है। ये भी सत्य है कि इस्लामिक कट्टरता के मामले में अब ईरान ही बड़ा मुल्क है। यूएई के बाद सऊदी अरब भी आधुनिकता की ओर कदम बढ़ा चुका है। ट्रम्प के हालिया दौरे का ही असर है कि इजराइल के जबरदस्त हमले के बाद भी बड़े मुस्लिम देश ईरान की सहायता करने के बजाय चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि ईरान पर हमला दरअसल हमास की श्वास नलिका अवरुद्ध करने का सोचा समझा दांव है जिसके जरिये अमेरिका पश्चिम एशिया में अपने बचे खुचे बड़े विरोधी को निपटवा रहा है वहीं इजराइल द्वारा गाजा पर कब्जे की योजना को मूर्तरूप देना चाह रहा है। स्मरणीय है शपथ लेते ही ट्रम्प ने गाजा का विकास करने की घोषणा की थी। ये लड़ाई लंबी चलेगी या बिना किसी निर्णय पर पहुंचे रुक जाएगी ये आज कहना कठिन है क्योंकि रूस के यूक्रेन के साथ अंतहीन युद्ध में फंस जाने से ईरान के पास किसी विश्वशक्ति का समर्थन नहीं बचा। रही बात चीन की तो वह भी दिखावा कितना भी करे किंतु अपने हाथ जलने से बचाएगा। हालांकि ईरान का अमेरिका के विरोध में खड़ा रहना चीन के दूरगामी हितों के लिए जरूरी है। यदि युद्ध लंबा चला और ईरान में कट्टरवादी इस्लामिक सत्ता का पराभव हुआ तो पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभुत्व का नया युग प्रारंभ होने के साथ ही विश्व राजनीति का संतुलन पूरी तरह वाशिंगटन के हाथ आ जाएगा जिसके अंतर्निहित खतरे भी हैं। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो उसे बहुत ही संभलकर इस मामले में अपनी नीति तय करनी होगी क्योंकि ईरान और इजराइल दोनों से हमारे अच्छे रिश्ते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment