अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब खुद भी अपने बनाये जाल में फंसते नज़र आ रहे हैं। जिस ठसक के साथ उन्होंने अनाप - शनाप टैरिफ थोपे वह कम होने लगी है। कुछ देशों ने तो उनके सामने मत्था टेककर रहम की गुजारिश कर ली किंतु भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे मुल्कों ने टैरिफ रूपी आतंक का मुकाबला करने का साहस दिखाया। ट्रम्प को ये अपनी शान के खिलाफ लगा जो दुनिया को अपने इशारों पर नचाने की महत्वाकांक्षा पाल बैठे थे। दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से ही उन्होंने बचकानी हरकतें शुरू कर दीं। अवैध घुसपैठियों को निकालने की कारवाई तो खैर अपनी जगह ठीक थी किंतु रूस - यूक्रेन युद्ध को लेकर उनका रवैया बेहद गैर जिम्मेदाराना रहा। उसकी वजह से परंपरागत मित्र यूरोपीय देश भी उससे कटने लगे। अपने पड़ोसी कैनेडा पर वे अमेरिका में विलय जैसा अव्यवहारिक दबाव बनाने से भी बाज नहीं आये। इसी तरह विदेश व्यापार में घाटे के नाम पर कई गुना टैरिफ (आयात शुल्क) लगाकर एक तरह का आर्थिक आपातकाल पूरे विश्व पर थोप दिया। उन्हें चीन और भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भी ऐतराज है तो ब्रिस्क नामक संगठन से भी क्योंकि इसमें शामिल ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका , अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने के लिए यूरो की तरह की साझा मुद्रा प्रारम्भ करने की तैयारी में हैं। ट्रम्प कई मर्तबा ब्रिक्स को भंग करने की मांग करने के अलावा अन्य देशों पर भी वे अपनी मर्जी थोपने पर आमादा हैं। रूस से तो उनकी नाराजगी का औचित्य भी है हालाँकि उसके राष्ट्रपति पुतिन को अलास्का में बुलाकर उनसे बात भी उन्होंने की किंतु न तो यूक्रेन के साथ रूस ने लड़ाई बंद की और न ही किसी अन्य दबाव में आया। भारत और चीन से वे इस वजह से खफ़ा हैं क्योंकि वे रूस से कच्चे तेल के अलावा अस्त्र - शस्त्र भी खरीदते हैं जो ट्रम्प के अनुसार पुतिन को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक सहायता देने जैसा है। लेकिन ट्रम्प के दबाव को धता बताते हुए चीन और भारत दोनों ने रूस से खरीदी बंद नहीं की। भारत ने तो खरीदी और बढ़ाने का दुस्साहस कर दिया। इस सबसे भन्नाए ट्रम्प ने 25 और 50 फीसदी टैरिफ लगाकर डराना चाहा किंतु भारत और चीन दोनों ने उसका मुकाबला करने की ठान ली। चीन ने तो जवाबी कार्रवाई में अमेरिका पर बढ़ा हुआ टैरिफ लगाने के साथ ही रेयर अर्थ जैसे जरूरी पदार्थ का निर्यात रोक दिया। ट्रम्प ने कई बार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकात करनी चाही लेकिन दोनों टाल गए। मलेशिया में आयोजित आसियान सम्मेलन में ट्रम्प इसी हसरत से शामिल हुए ताकि श्री मोदी और जिनपिंग से रूबरू बात हो जाए किंतु वहाँ भी दोनों नहीं गए। हालांकि उसके बाद ट्रम्प और जिनपिंग का दक्षिण कोरिया में मिलना तय हुआ लेकिन वह मुलाकात भी बेहद सतही रही जिसमें जिनपिंग ने तो गहराई दिखाई जबकि ट्रम्प का उतावलापन सामने आ गया। हालांकि चीन पर बढ़े हुए टैरिफ को कुछ समय के लिए टाल दिया गया वहीं रेयर अर्थ के निर्यात पर लगी रोक भी चीन ने हटा ली। लेकिन जैसा ढिंढोरा ट्रम्प पीट रहे थे वैसा कुछ भी नहीं हो सका। इस मुलाकात के बाद लौटे ट्रम्प की मुख - मुद्रा से लगा कि वे दबाव बनाने में कामयाब नहीं रहे। ऐसा ही पुतिन से हुई उनकी मुलाकात के बाद देखने मिला था। ट्रम्प और श्री मोदी की मुलाकात अभी तक नहीं होने के पीछे भारत के यह नीति है कि जब तक अमेरिका के साथ व्यापार संधि संबंधी बातचीत किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती तब तक मुलाकात का औचित्य नहीं है। हालांकि ट्रम्प गाहे - बगाहे श्री मोदी की प्रशंसा करने से भी बाज नहीं आते जबकि श्री मोदी उनके बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ बोलने से जो परहेज करते हैं वह ट्रम्प को परेशान करने वाला है। सच तो ये है कि उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा तो मिट्टी में मिलाई ही , अमेरिका जैसी महाशक्ति के रौब - रुतबे को भी धरातल पर पहुंचा दिया। उन्हें लगता था कि टैरिफ रूपी आतंक फैलाकर वे सभी देशों को नत मस्तक करवा लेंगे किंतु उसमें उन्हें निराशा हाथ लगी और इसीलिये अब खुद ही बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलने लालायित हैं। जिनपिंग से उनकी बातचीत उसी का परिणाम थी जिसमें वे कुछ भी हासिल करने में विफल रहे क्योंकि उनके टैरिफ पर चीन का रेयर अर्थ भारी पड़ गया। भारत भी जिस तरह टैरिफ का प्रतिरोध कर रहा है उससे ट्रम्प दबाव में हैं। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को तबाह करने की आपाधापी में वे अपने ही देश को आर्थिक बदहाली की खाई में धकेल बैठे जहाँ सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन बाँटने तक के पैसे नहीं हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी