Friday, 31 October 2025

अपने साथ ही अमेरिका के रौब - रुतबे को भी धरातल पर ले आये ट्रम्प

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब खुद भी अपने बनाये जाल में फंसते नज़र आ रहे हैं। जिस ठसक के साथ उन्होंने अनाप - शनाप टैरिफ थोपे वह कम होने लगी है। कुछ देशों ने तो  उनके सामने मत्था टेककर रहम की गुजारिश कर ली किंतु भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे मुल्कों ने टैरिफ रूपी आतंक का मुकाबला करने का साहस दिखाया।  ट्रम्प को ये अपनी शान के खिलाफ लगा जो दुनिया को अपने इशारों पर नचाने की महत्वाकांक्षा पाल बैठे थे। दूसरी बार  राष्ट्रपति बनने के बाद से ही उन्होंने बचकानी हरकतें शुरू कर दीं। अवैध घुसपैठियों को निकालने की कारवाई तो खैर अपनी जगह ठीक थी किंतु रूस - यूक्रेन युद्ध को लेकर उनका रवैया बेहद गैर जिम्मेदाराना रहा। उसकी वजह से  परंपरागत मित्र यूरोपीय देश भी उससे कटने लगे। अपने पड़ोसी कैनेडा पर वे अमेरिका में विलय जैसा अव्यवहारिक दबाव बनाने से भी बाज नहीं आये। इसी तरह  विदेश व्यापार में घाटे के नाम पर कई गुना  टैरिफ (आयात शुल्क) लगाकर  एक तरह का आर्थिक आपातकाल पूरे विश्व पर थोप दिया। उन्हें चीन और भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भी ऐतराज है तो ब्रिस्क नामक संगठन से भी क्योंकि इसमें  शामिल ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका , अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने के लिए  यूरो की तरह की साझा मुद्रा प्रारम्भ करने की तैयारी में हैं। ट्रम्प कई मर्तबा ब्रिक्स को भंग करने की मांग  करने के अलावा अन्य देशों पर भी वे अपनी मर्जी थोपने पर आमादा हैं। रूस से तो उनकी नाराजगी का औचित्य भी है हालाँकि उसके राष्ट्रपति पुतिन को  अलास्का में बुलाकर उनसे बात भी उन्होंने की किंतु  न तो यूक्रेन के साथ रूस ने लड़ाई बंद की और न ही किसी अन्य दबाव में आया। भारत और चीन से वे इस वजह से खफ़ा हैं क्योंकि वे रूस से कच्चे तेल के अलावा अस्त्र - शस्त्र भी खरीदते हैं जो ट्रम्प के अनुसार पुतिन को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक सहायता देने जैसा है। लेकिन ट्रम्प के दबाव को धता बताते हुए चीन और भारत दोनों ने रूस से खरीदी बंद नहीं की। भारत ने तो खरीदी और बढ़ाने का दुस्साहस कर दिया। इस सबसे भन्नाए ट्रम्प ने 25  और  50 फीसदी टैरिफ लगाकर डराना चाहा किंतु भारत और चीन दोनों ने उसका मुकाबला करने की ठान ली। चीन ने तो जवाबी कार्रवाई में अमेरिका पर  बढ़ा हुआ टैरिफ लगाने के साथ ही रेयर अर्थ जैसे जरूरी पदार्थ का निर्यात रोक दिया। ट्रम्प ने कई बार  भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकात करनी चाही लेकिन दोनों   टाल गए।  मलेशिया में आयोजित आसियान सम्मेलन में ट्रम्प इसी हसरत से शामिल हुए ताकि श्री मोदी और जिनपिंग से रूबरू बात हो जाए किंतु वहाँ भी दोनों  नहीं गए। हालांकि उसके बाद ट्रम्प और जिनपिंग का दक्षिण कोरिया में मिलना तय हुआ लेकिन वह मुलाकात भी बेहद सतही रही जिसमें जिनपिंग ने तो गहराई दिखाई जबकि ट्रम्प का उतावलापन  सामने आ गया। हालांकि चीन पर बढ़े हुए टैरिफ को कुछ समय के लिए टाल दिया गया वहीं रेयर अर्थ  के निर्यात पर लगी रोक भी चीन ने हटा ली। लेकिन जैसा ढिंढोरा ट्रम्प पीट रहे थे वैसा कुछ भी नहीं हो सका। इस मुलाकात के बाद लौटे ट्रम्प की मुख -  मुद्रा से लगा कि वे दबाव बनाने में कामयाब नहीं रहे। ऐसा ही पुतिन से हुई उनकी मुलाकात के बाद देखने मिला था। ट्रम्प और श्री मोदी की मुलाकात अभी तक नहीं होने के पीछे भारत के यह नीति है कि जब तक अमेरिका के साथ व्यापार संधि संबंधी बातचीत किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती तब तक मुलाकात का औचित्य नहीं है। हालांकि ट्रम्प गाहे - बगाहे  श्री मोदी की प्रशंसा करने से भी बाज नहीं आते जबकि श्री मोदी उनके बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ बोलने से जो परहेज करते हैं वह ट्रम्प को परेशान करने वाला है। सच तो ये है  कि उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा तो मिट्टी में मिलाई ही , अमेरिका जैसी महाशक्ति के रौब - रुतबे को भी धरातल पर पहुंचा दिया। उन्हें लगता था कि टैरिफ रूपी आतंक फैलाकर वे सभी देशों को नत मस्तक करवा लेंगे किंतु उसमें उन्हें निराशा हाथ लगी और इसीलिये अब खुद ही बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलने लालायित हैं। जिनपिंग से उनकी बातचीत उसी का परिणाम थी जिसमें वे कुछ भी हासिल करने में विफल रहे क्योंकि उनके टैरिफ पर चीन का रेयर अर्थ भारी पड़ गया। भारत भी जिस तरह टैरिफ का प्रतिरोध कर रहा है उससे ट्रम्प दबाव में हैं। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को तबाह करने की आपाधापी में वे अपने ही देश को आर्थिक बदहाली की खाई में धकेल बैठे जहाँ सरकार के पास अपने  कर्मचारियों को वेतन बाँटने तक के पैसे नहीं हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 October 2025

तालिबानी हमलों से पाकिस्तान की चिंता और बढ़ी


इस्लामिक जगत में इन दिनों तुर्किये कुछ ज्यादा ही उछल रहा है। विशेष रूप से भारत के ऐलानिया दुश्मन पाकिस्तान की सरपरस्ती में वह चीन और अमेरिका से भी आगे निकलने के प्रयास में है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये में बने ड्रोन और मिसाइलों का पाकिस्तान ने काफी उपयोग किया किंतु भारत की अचूक रक्षा प्रणाली के सामने उनकी एक नहीं चली। संरासंघ में भी तुर्किये के प्रतिनिधि कश्मीर के मामले में पाकिस्तान की तरफदारी करते रहते हैं। हालांकि भारत के प्रति इस देश के शत्रुता भाव का कोई कारण समझ नहीं आता। लेकिन बीते कुछ समय से वह पूरी तरह से पाकिस्तान समर्थक हो गया है। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की जो पिटाई हुई उससे वह उबर पाता उसके  पहले ही अफ़ग़ानिस्तान के साथ चले आ रहे सीमा विवाद ने युद्ध का रूप ले लिया। पाकिस्तानी वायुसेना ने अफ़ग़ानिस्तान में घुसकर हमले किये तो अफ़ग़ानिस्तान के तालिबानी लड़ाकों ने जमीनी मोर्चों पर अपनी ताकत दिखाते हुए पाकिस्तान की अनेक चौकियों पर कब्जा करने के साथ ही उसके  सैकड़ों सैनिक मार दिये। तालिबानी हमलों का खौफ इतना ज्यादा है कि पाकिस्तानी सेना के लोग अब अफगानिस्तान की सीमा पर तैनाती से मना कर रहे  हैं। जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपना डेरा उठाया तब तालिबान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बेहद दोस्ताना दिख रहे थे जबकि भारत के साथ तो बोलचाल भी बंद थी। अमेरिका के  अफगानिस्तान में रहते तक भारतीय कंपनियों के पास बड़े - बड़े ठेके थे जो अधर में लटक गए। चीन भी तालिबानी हुक्मरानों की मिजाजपुर्सी में लगा था। लेकिन अचानक हालात ऐसे बदले कि तालिबानी शासकों की भारत से निकटता बढ़ने लगी।  इसके कारण वहाँ के विकास कार्यों में भारत की हिस्सेदारी बदस्तूर कायम रही और नये काम भी मिले। अफगानिस्तान की खाद्य समस्या को दूर करने के लिए भारत ने बड़ी मात्रा में अनाज भेजा। हाल ही में उसके विदेश मंत्री ने भारत की यात्रा भी की जिसके बाद काबुल में दूतावास संबंधी गतिविधियों  में वृद्धि हुई। विदेश मंत्री ने साफ कह दिया कि उनके देश की धरती का उपयोग भारत के विरुद्ध आतंकवाद के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इसी बीच खबर आई कि जिस बगराम एयर बेस को मांगने  अमेरिका धौंस दे रहा था वह अफगानिस्तान ने भारत को दे दिया। इन सबसे परेशान पाकिस्तान की मदद न अमेरिका कर रहा है और न ही चीन। ऐसे में उसने तुर्किये का सहारा लेकर अफगानिस्तान को ठंडा करने का दांव चला। लेकिन वह भी फुस्स साबित हुआ। तुर्किये ने दोनों देशों के बीच सुलह की जो बैठक अपने यहाँ आयोजित की उसमें पाकिस्तानी नुमाइंदे ने अफगानी प्रतिनिधियों की बहुत खुशामद की लेकिन वे नहीं पसीजे। इसीलिये बाद में बैठक में उपस्थित  पाकिस्तान के मंत्री ने तालिबानों को फिर से गुफाओं में भेजने जैसी धमकी दे डाली जो इस बात का संकेत है कि तुर्किये द्वारा की गई मध्यस्थता विफल हो गई तथा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा विवाद युद्ध की शक्ल में जारी रहेगा। इस्लामिक कट्टरता की प्रबल समर्थक कही जाने वाली  तालिबानी सत्ता का पाकिस्तान से दुश्मनी बढ़ाकर भारत से दोस्ती करना इस क्षेत्र के कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक समीकरणों में बड़े बदलाव का परिचायक है जिससे पाकिस्तान और चीन ही नहीं बल्कि अमेरिका भी हैरान है जो बगराम एयर बेस हथियाकर ईरान और चीन दोनों को अपनी मार में लेना चाहता था। दरअसल भारत और अफगानिस्तान की नजदीकियों से उक्त तीनों देशों के पेट में दर्द होने का बड़ा कारण पाकिस्तान की अखंडता पर मंडराता खतरा है। तालिबानी लड़ाकों के हमलों से भयभीत पाकिस्तान बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर से अपनी सैन्य टुकड़ियों को हटाने मजबूर हो गया है। जबकि इन दोनों इलाकों में  भी उसके विरुद्ध विद्रोह की स्थिति है। शुरू में पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को मुगालता था कि अफ़ग़ानिस्तान के पास संगठित सैन्यबल नहीं है। लेकिन अब तक की जो रिपोर्ट है उसके अनुसार तालिबानी लड़ाके भारी पड़ते दिख रहे हैं। ये जानकारी भी आ रही है कि अफगानिस्तान की पीठ पर भारत ने चूंकि हाथ रख दिया है इसलिए उसके हौसले बुलंद हैं। इसीलिये पाकिस्तान ने तुर्किये को बीच में डालकर तालिबानी लड़ाकों को रोकने का दाँव चला जो नाकामयाब साबित हुआ। इस लड़ाई का अंतिम परिणाम क्या होगा ये फ़िलहाल कहना कठिन है किंतु इतना जरूर है कि अपनी अंदरूनी झंझटों से जूझ रहे पाकिस्तान  को अफगानिस्तान के मोर्चे जो चुनौती मिल रही है उसका सामना करने में उसके पसीने छूट रहे हैं । तालिबानी लड़ाकों की लडाकू क्षमता पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है क्योंकि अमेरिका से लड़ने में वह खुद भी उनकी मदद करता रहा है। इसीलिये उसकी समझ में नहीं आ रहा कि उनसे कैसे निपटे? तुर्किये द्वारा की गई कोशिश विफल हो जाने के बाद उसकी चिंता और बढ़ गई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 October 2025

वेतन बढ़ रहा किंतु नौकरियां घट रहीं


सरकारी कर्मचारियों को केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग का गठन कर वह खुशखबरी दी जिसका  लंबे समय से इंतजार था। हालांकि आयोग की रिपोर्ट आने में डेढ़ वर्ष लग जाएंगे किंतु नया वेतनमान 1 जनवरी 2026 से प्रभावशील माना जाएगा। सातवें आयोग की सिफारिशें 2016 में लागू हुई थीं। वेतन और भत्तों का निश्चित समयावधि के बाद पुनर्निर्धारण  न्यायोचित है।  लोक प्रशासन को सक्षम, गतिशील और दायित्ववान बनाने के लिए वेतन वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसलिए किसी को भी उक्त फैसले पर ऐतराज नहीं हुआ। नये वेतन आयोग की सिफारिशें केंद्र सरकार के 50 लाख कर्मचारियों के साथ ही लगभग 70 लाख पेंशन भोगियों को तो सीधे तौर पर लाभान्वित करेंगी ही , उसके अलावा विभिन्न राज्य सरकारों के कर्मचारियों को भी  इससे फ़ायदा होगा। 2029 में लोकसभा का चुनाव होगा । ऐसे में केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी । वैसे भी  मोदी सरकार के लिए भी अगला लोकसभा चुनाव कड़ी चुनौती लेकर आयेगा। 2024 में लगे झटके के बाद प्रधानमंत्री जान गए होंगे कि मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग  चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की कितनी क्षमता रखता है । इसीलिये केंद्र सरकार ने बिहार  में मतदान के पहले ही आठवां वेतन आयोग गठित कर सरकारी कर्मचारियों को लुभाने का दाँव चल दिया है। ये बात ध्यान रखने वाली है कि निजी क्षेत्र कितना भी विकसित हो जाए किंतु भारत में आज भी सरकारी नौकरी का आकर्षण बना हुआ है क्योंकि इसमें रोजगार सुरक्षित रहने के साथ ही अनेक ऐसी सुविधाएं मिलती हैं जो निजी क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं। इसीलिये जब कोई राजनीतिक पार्टी रोजगार देने का चुनावी  वायदा करती तो उसका अभिप्राय सरकारी नौकरी से ही होता है। बिहार  चुनाव में महागठबंधन के घोषणापत्र में  हर घर में एक सरकारी नौकरी देने के वायदे की देश भर में चर्चा है। उसके पूरा होने को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं परंतु इससे ये तो स्पष्ट होता ही है कि सरकारी नौकरी भारतीय समाज में सदाबहार बनी हुई  है। यद्यपि पुरानी पेंशन व्यवस्था के समाप्त होने से कुछ आकर्षण कम हुआ है । इसीलिये अब उसकी बहाली भी चुनावी वायदों का हिस्सा बन गई है। तेजस्वी ने भी इसका वायदा किया जिसके बल पर कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में सफलता हासिल की। आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा होते ही  वेतन और भत्तों में संभावित वृद्धि का हिसाब लगना शुरू हो गया। जाहिर है इस खबर ने सरकारी नौकरी की चाहत रखने वालों की उम्मीदें और बढ़ा दी हैं किंतु  ये  बात भी विचारणीय है कि भले ही सरकार के स्थायी कर्मचारियों की तन्ख्वाह और सुविधाएं कितनी भी बढ़ जाएं लेकिन नौकरियां दिन ब दिन घटती जा रही हैं। धीरे - धीरे बहुत से कामों के लिए सरकार निजी क्षेत्र की सेवाएं लेने लगी है। अपने वाहनों की जगह टैक्सी का उपयोग इसका एक उदाहरण है। इसी तरह अस्थायी, दैनिक भोगी और संविदा नियुक्तियों के जरिये कम वेतन और सुविधाएं देकर निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं बल्कि महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक तक नियुक्त किये जा रहे हैं। ऐसे हजारों प्रकरण मिलेंगे जिनमें एक अस्थायी कर्मचारी दशकों की सरकारी सेवा के बाद भी स्थायी नहीं हो सका। सरकार जिस तेजी से अपने उपक्रमों का विनिवेश कर रही है उसके कारण भी शासकीय नौकरियां कम हो रही हैं। इसीलिये सरकार पर रोजगार देने में विफल रहने का आरोप लगा करता है। वैसे  निजी क्षेत्र का विस्तार होने से वह भी रोजगार के अवसर उपलब्ध करवा रहा  है। आई.टी सेक्टर ने देश में   युवाओं का एक नया वर्ग पैदा कर दिया जो उच्च मध्यम वर्गीय के तौर पर अपना जीवन शुरू करता है। उपभोक्ता बाजार की रौनक इसी तबके की वजह से है। लेकिन आठवें वेतन आयोग के गठन की खुशी के बीच इस मुद्दे पर भी विचार होना चाहिए कि क्या हम रोजगार विहीन विकास के शिकंजे में फंस रहे हैं? ए. आई नामक नई विधा से मानवीय रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। आठवां वेतन आयोग लागू होते ही बेशक सरकारी कर्मचारियों की बल्ले - बल्ले हो जायेगी किंतु नये रोजगारों का सृजन  भी उतना ही जरूरी है अन्यथा वेतन वृद्धि के साथ ही सरकारी नौकरी के अवसर कम होना भविष्य में नई समस्या उत्पन्न करेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 October 2025

नशे का कारोबार करवाने वाले थानेदारों के चेहरे भी सामने लाएं महानिरीक्षक

.प्र में रीवा संभाग के पुलिस महानिरीक्षक गौरव सिंह  राजपूत ने गत दिवस नशे के विरुद्ध प्रहार 2 नामक कार्यक्रम में उपस्थित पुलिसकर्मियों को सख़्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि बिना थानेदारों की जानकारी के नशे  का विक्रय नहीं हो सकता। इसके आगे महानिरीक्षक महोदय यहाँ तक बोल गए कि जो लोग तालाब को गंदा कर रहे हैं उनकी पूरी सूची चार महीनों में बन चुकी है। ऐसे  लोग  समय रहते सुधर जाएं वरना 15 दिन बाद उन्हें परिणाम भोगने होंगे। श्री राजपूत की उक्त चेतावनी एक तरफ तो उनकी स्पष्टवादिता का सबूत है वहीं इस बात की खुली स्वीकारोक्ति भी कि समाज में होने वाले अपराधों को पुलिस का संरक्षण मिला हुआ है और वह चाह ले तो अपराधियों का हौसला पस्त हो जाएगा। महानिरीक्षक ने बिना लाग - लपेट के कहा कि नशीले कफ सिरप गली - मोहल्लों तक फैल गए हैं। ऐसे में थाने के प्रभारी का फर्ज है वह अपने इलाके को नशे से मुक्त कराए।  उन्होंने यदि अपने मातहतों को केवल नशे का धन्धे रोकने के लिए  कहा होता तब वह साधारण बात होती क्योंकि छिंदवाड़ा में कफ सिरप के कारण बड़े पैमाने पर बच्चों की मौत के बाद मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव की सख्त हिदायत  पर  सरकारी तंत्र नींद से जागा और कर्तव्यनिष्ठा का दिखावा करते हुए जगह - जगह छापेमारी की जाने लगी। लेकिन रीवा के पुलिस महानिरीक्षक ने चिकित्सकों और दवा विक्रेताओं से अलग अपने विभाग के वर्दीधारियों को जिस प्रकार कटघरे में खड़ा किया उसके लिए वे अभिनन्दन के हकदार हैं । आम तौर पर देखने मिलता है कि पुलिस या अन्य शासकीय विभाग में पदस्थ उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थों के काले - कारनामों पर पर्दा डालते हुए उन्हें बचाते हैं। ऐसा क्यों होता है ये किसी से छिपा नहीं है। उस लिहाज से श्री राजपूत की  साफगोई अनुकरणीय है । उनके कथन से साबित हो जाता है कि  उनके पास  सभी दोषी थानेदारों की कर्मपत्री आ चुकी है जिनकी जानकारी में नशे का व्यापार होता रहा। ऐसे में उन्हें सुधरने के लिए मोहलत देने की बजाय उन पर अभी तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई इस प्रश्न का उत्तर भी महानिरीक्षक जी को देना चाहिए । उल्लेखनीय है रीवा  उपमुख्यमंत्री का गृह जिला है जिनके पास स्वास्थ्य विभाग भी है। ऐसे में श्री राजपूत का ये कहना कि नशीले कफ़ सिरप का कारोबार गली - मोहल्लों तक फैल चुका है केवल पुलिस की ही नहीं अपितु स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर भी निशाना साधता है। यद्यपि ये विश्वास करना कठिन है कि वे नशे के कारोबार को संरक्षण देने वाले उन थानेदारों पर नकेल कसेंगे किंतु उन्होंने जिस प्रकार से अपने मातहतों को हड़काया उसने पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर कालिख  पोत दी। जब महानिरीक्षक जैसा उच्च अधिकारी ये स्वीकार करे कि नशे की बिक्री बिना थानेदार की जानकारी के नहीं हो सकती तब किसी और के कहने की जरूरत ही कहां रहती है ? लेकिन   जिन थानेदारों का काला चिट्ठा आ चुका है उनसे ये अपेक्षा करना निरर्थक है कि वे अपने आपको सुधार लेंगे। अच्छा होता महानिरीक्षक महोदय इन थानेदारों की भी जनता के बीच वैसी ही परेड करवाएं जैसी पुलिस कभी - कभी अपराधियों की करवाती है। आखिरकार जनता को भी उन लोगों के चेहरे देखने का हक है जो अपनी काली कमाई के लालच में लोगों के स्वास्थ्य और ज़िंदगी के दुश्मन बने हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 25 October 2025

भारत को बांग्लादेश और नेपाल बनाने वालों के मंसूबे सफल नहीं होंगे


भारत के दो पड़ोसी  बांग्ला देश और नेपाल में  युवा आक्रोश के परिणाम स्वरूप हुए सत्ता परिवर्तन के बाद एक वर्ग विशेष भारत में भी वैसा ही कुछ होने का सपना देखने लगा। अचानक जेन - जी नामक शब्द चर्चा में आ गया। और युवाओं से जुड़ी किसी भी बात में उसका जिक्र आम हो चला । दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी इसी तरह से हुए सत्ता परिवर्तन के बाद  कहा जाने लगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारें चूँकि जन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहीं लिहाजा युवाओं द्वारा बलपूर्वक सत्ता बदलने का दौर शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत संभवतः  श्रीलंका से हुई जहां आक्रोशित लोगों की भीड़ राष्ट्रपति भवन में जा घुसी और उसने जो किया वह अराजकता का साक्षात उदाहरण है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित तमाम सत्ताधीश विदेश भाग गए। लगभग ऐसा ही बांग्लादेश में देखने मिला जहाँ से प्रधानमंत्री हसीना भारत आ गईं और एक परिषद ने सत्ता संभाल ली जिसका मुखिया नोबल विजेता मो. युनुस को बनाया गया जो अमेरिका में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। हाल ही में नेपाल में भी जेन - जी के नेतृत्व में रातों - रात सत्ता बदलने का कारनामा हुआ। हालांकि सत्ताधारी विदेश नहीं गये और सेना  उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गई किंतु मंत्रियों की जमकर  पिटाई के अलावा  कोलंबो तथा ढाका की तरह सरकारी आवासों में घुसकर लूटपाट की गई । इन घटनाओं के बाद भारत में भी ऐसा ही कुछ होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी क्योंकि बेरोजगारी जैसी समस्या तो यहाँ भी है जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित शिक्षित युवा ही है। कोविड के बाद भी बड़ी संख्या में रोजगार छिनने की बात सामने आती रही है। इसके अलावा भी अन्य ऐसी बातें हैं जिनको लेकर युवाओं में चिंता और निराशा होने की बात उठती है। देश में अवसर नहीं होने के कारण प्रतिभाओं का विदेश पलायन भी युवाओं को उद्वेलित करता है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जब वीजा फीस में अनाप शनाप वृद्धि की तब वहाँ  पढ़ने और नौकरी करने वाले भारतीयों के सामने चिंता का पहाड़ खड़ा हो गया। सरकारी नौकरियों के घटने से भी शिक्षित युवाओं में अपने भविष्य को लेकर चिंता व्याप्त है। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए वे लोग अचानक उत्साहित हो उठे  जो निर्वाचन प्रक्रिया के जरिये देश में सत्ता हासिल करने में विफल होते रहे हैं। बांग्लादेश और नेपाल में जो कुछ हुआ उसे भारत में भी साकार करने की बातें होने लगीं। कुछ मुद्दों को छेड़कर व्यापक जनांदोलन खड़ा करने का तानाबना भी बुना जाने लगा। पिछ्ले लोकसभा चुनाव के नतीजों के अलावा कुछ राज्यों में मिली हार की खीझ खुलकर सामने आने लगी। लेकिन ऐसे लोग हमेशा की तरह भारतीय जनमानस को पढ़ने और समझने में नाकामयाब रहे और जन समर्थन नहीं मिलने से निराश भी। सही बात ये है कि बांग्लादेश और नेपाल के युवाओं ने जो उन्माद दिखाया उसने भले ही स्थापित सत्ता को उखाड़ फेंका हो किंतु  उसके बाद समुचित विकल्प नहीं मिलने से देश की हालत आसमान से टपके खजूर पर अटके जैसी होकर रह गई है। लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी बांग्लादेश में चुनाव करवाने की स्थितियाँ नहीं बन पा रहीं। मो. युनुस मूलतः वामपंथी होने से चीन समर्थक हैं किंतु उन्हें देश की बागडोर संभालने का अवसर अमेरिका की कृपा से प्राप्त हुआ। लिहाजा देश चीन और अमेरिका रूपी दो पाटों में पिसने मजबूर है। युवाओं को जिन बातों का लालच देकर तत्कालीन सत्ता के विरुद्ध हिंसक होने उकसाया गया वे सब भुला दी गईं। इसके कारण वहाँ नये सिरे से आक्रोश पनपने की खबरें आने लगीं। नेपाल में हालांकि सेना ने दो दिन में ही हालात संभालकर नई सत्ता बनवा दी लेकिन जिन नेताओं की अगुआई में युवाओं ने सत्ता उलटने का कारनामा कर दिखाया वे खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। नेपाल के घटनाक्रम को भी विदेश से प्रायोजित माना गया किंतु विशेष बात ये रही कि राजशाही को उखाड़ने में जिस युवाशक्ति ने माओवादियों का खुलकर साथ देकर चीन समर्थक सरकार बनवाई वही वामपंथी सत्ताधीशों को सड़कों पर घसीटकर पीटती देखी गई। बांग्लादेश और नेपाल में जेन - जी द्वारा किये गए सत्ता पलट के बाद भी युवाओं की आकांक्षाओं के पूरा होने की कोई संभावना दूर - दराज तक नजर नहीं आने से भारत में वैसा ही कुछ करने का मंसूबा रखने वाले  निश्चित रूप से निराश होंगे। देश के युवाओं ने ये दिखा दिया कि वे अपनी समस्याओं के हल के लिए हिंसा और अराजकता  की बजाय लोकतांत्रिक तौर - तरीकों में ही विश्वास रखते हैं। बिहार चुनाव के पहले  चुनाव व्यवस्था के प्रति अविश्वास की भावना भड़काकर पूरे देश को आंदोलित करने का जो प्रयास किया गया उसे अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिलने से स्पष्ट हो गया कि देश में लोकतंत्र जनता के मन में बसा है और वह सत्ता का चयन के लिए अराजकता की बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही पसंद करती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 October 2025

जब पुलिस ही पिटने लगी तब जनता की रक्षा कौन करेगा


पुलिस द्वारा जनता की पिटाई की खबरें तो आये दिन आया करती हैं किंतु बीते कुछ दिनों से म.प्र में जनता द्वारा पुलिस को पीटे जाने की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ी वह वर्दीधारियों के प्रति बढ़ते असंतोष का प्रतीक है या फिर अपराधियों के बेखौफ होने का , ये गंभीर विश्लेषण का विषय है। खनन माफिया और अन्य तस्करों द्वारा पुलिस बल पर वाहन चढ़ाए जाने की घटनाएं तो यदाकदा सुनाई देती थीं किंतु अब तो थानों में घुसकर जनता पुलिस वालों पर हमले कर रही है। पिछले कुछ दिनों में इसकी पुनरावृत्ति होने से ये आशंका होने लगी है कि  कानून -  व्यवस्था बनाने वाली इस एजेंसी का रौब - रुतबा कम होता जा रहा है। सामान्य स्थिति में अपराधियों से अपनी रक्षा के लिए साधारण नागरिक पुलिस की शरण में जाता है किंतु जब पुलिस खुद ही असुरक्षित हो जाए तब जनता की सुरक्षा कौन करेगा ये सवाल उठ खड़ा हुआ है। देश के अनेक राज्य हैं जहाँ कतिपय दबंग नेता और बाहुबलियों की जमात पुलिस वालों के गिरेबान पर हाथ डालने में नहीं हिचकिचाती। लेकिन म.प्र को शांति का टापू कहा जाता रहा है। चंबल के डकैत भी गुजरे ज़माने की चीज होकर रह गए ।हालांकि अब पूरे देश में एक जैसे अपराधों का चलन है किंतु तुलनात्मक रूप से म.प्र में कानून व्यवस्था की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर मानी जाती है। लेकिन ये भी सही है कि पुलिस का व्यवहार जनता के प्रति उतना संवेदनशील नहीं है जितनी अपेक्षा की जाती है। जुआ - सट्टा, अवैध शराब, ड्रग्स जैसे कारोबार बढ़ते जा रहे हैं। संगठित अपराध भी पूर्वापेक्षा अधिक होने लगे हैं। राजनीतिक संरक्षण भी इसका बड़ा कारण है जिसका प्रमाण निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा पुलिस वालों के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार के वाकयों से मिलता है। लेकिन अपराधी और नेता  वर्दीधारियों की इज्जत उतारें तो अचरज नहीं होता क्योंकि पुलिस और इनके बीच संगामित्ती सर्वविदित है। विवाद तब होता है जब आपसी हितों में टकराव हो। लेकिन जिस थाने में जाने से आम नागरिक भयभीत हो जाता है यदि उसमें घुसकर आक्रोशित जनता  पुलिस वालों की पिटाई करने जैसा दुस्साहस करने लगे तब ये मान लेना गलत नहीं होगा कि पानी नाक तक पहुँचने लगा है। हालांकि पुलिस के पास ऐसी घटनाओं से निपटने का पूरा इंतजाम और मानसिकता दोनों हैं किंतु खतरा अन्य शासकीय विभागों का भी है जिनमें व्याप्त भ्रष्टाचार से हर कोई त्रस्त है। हाल ही में हाइवे पर नकली आर. टी. ओ वालों की ट्रक ड्राइवरों द्वारा पिटाई किये जाने जैसी घटनाएं सामने आईं। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के दौरान फर्जी आर. टी ओ दस्तों ने म.प्र से गुजरने वाले अन्य राज्यों के वाहनों से जमकर अवैध वसूली की। आबकारी महकमा भी अपनी कारगुजारियों के लिए कुख्यात है। इसी तरह नगर -   निगम, कलेक्ट्रेट, पंजीयन कार्यालय आदि में भ्रष्टाचार सतह पर तैरता देखा जा सकता है। जो लोग पहुँच वाले हैं उनका तो सारा काम हो जाता है। इसी तरह दलालों के जरिये भी पैसा खिलाकर लोग अपनी समस्या हल कर लेते हैं किंतु जो साधारण जन हैं उनके पास सिवाय भटकने और तिरस्कृत होने के और कोई विकल्प नहीं रहता। पुलिस थानों के हाल तो बहुत ही बुरे हैं जहाँ सामान्य तौर पर होने वाला व्यवहार किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। समूचे सरकारी तंत्र को कसौटी पर कसें तो उससे जो निराशा उत्पन्न होती है वही धीरे- धीरे आक्रोश का रूप लेती जा रही है। कहीं पुलिस वालों को दौड़ाकर पीटा जा रहा है तो कहीं थानों में घुसकर वर्दी की इज्जत तार - तार की जा रही है। इसका कारण भ्रष्टाचार और अत्याचार दोनों की पराकाष्ठा है। सिवनी जिले में हवाला के करोड़ों रुपयों की  जप्ती में हुई बंदरबांट के उजागर होने के  बाद भी पुलिस विभाग में खुलेआम पैसा खाए जाने के प्रकरण सामने आये हैं। ऐसे में यदि जनता का धैर्य जवाब देने लगे तो फिर हालात अराजक होते देर नहीं लगेगी क्योंकि जिन लोगों पर समाज की सुरक्षा का भार है जब वे ही असुरक्षित हो गए तब जनता का क्या होगा? थानों या सरकारी कार्यालयों सहित किसी भी शासकीय कर्मी पर हमला केवल कानून - व्यवस्था का उल्लंघन नहीं अपितु समाज की बदलती मनोवृत्ति का प्रारंभिक संकेत भी है। यद्यपि इस तरह की घटनाओं के पीछे अपराधी तत्व एवं समाजविरोधी शक्तियों का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता किंतु  समुचित ध्यान नहीं दिया गया तब कानून को अपने हाथ में लेने वाले फिल्मी दृष्य वास्तविकता में बदलते देर नहीं लगेगी। सरकार चला रहे नेता और उनके मातहत काम करने वाली नौकरशाही को संदर्भित घटनाओं का संज्ञान लेकर समाज में व्याप्त गुस्से को दूर करने के प्रभावशाली कदम उठाने चाहिए । वरना देशभक्ति जनसेवा जैसे ध्येय वाक्य की आड़ लेकर अत्याचार करने वालों की बची खुची धाक भी मिट्टी में मिल जाएगी, साख तो वे बहुत पहले गँवा चुके हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 October 2025

टैरिफ घट जाएं तब भी ट्रम्प पर भरोसा नहीं किया जा सकता


दीपावली पर भारत में हुए कारोबार ने अर्थव्यवस्था की मजबूती के साथ ही इस दुष्प्रचार की हवा निकाल दी कि बाजार में नगदी की कमी है और महंगाई के बोझ तले आम आदमी का हाथ तंग है। उपभोक्ता बाजार में हर चीज की बिक्री जमकर हुई। यहाँ तक कि आसमान छूते भावों के बावजूद सोने और चांदी के प्रतिष्ठानों में भी ग्राहकों की भीड़ नजर आई। ऑटोमोबाइल और जमीन - जायजाद की खरीदी में आया उछाल इस बात का प्रमाण है कि भारत की अर्थव्यवस्था ठहराव से उबरकर गतिशीलता का पर्याय बन चुकी है। और इसीलिये अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ से निर्यातकों को होने वाले नुकसान के बावजूद उद्योग - व्यापार जगत का हौसला बुलंद है। शेयर बाजार से भी आशाजनक खबरें आने से निवेशकों में उत्साह है। शायद यही वजह है जो अमेरिका के साथ चले आ रहे तनाव में नरमी दिखने लगी है। हालाँकि ट्रम्प की बदजुबानी जारी है और खिसियाहट में वे भारतीय व्यापारिक नीति की आलोचना करने में तनिक भी संकोच नहीं करते किंतु भारत द्वारा उनके मिथ्या दावों का खंडन किये जाने से वे परेशान हो उठे हैं। दीपावली पर उनके द्वारा अमेरिका में रहे भारतीयों के साथ दीप जलाना और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन पर बधाई देना यद्यपि नई बात नहीं है क्योंकि अब ऐसा आयोजन व्हाइट हाउस में प्रति वर्ष होने लगा है जो अमेरिका के राष्ट्रीय जीवन पर भारत के बढ़ते प्रभाव का प्रमाण है। लेकिन ट्रम्प ने दीपावली के मौके पर वीजा शर्तों को शिथिल करने का जो निर्णय लिया उससे ये लगने लगा है कि वे भारत द्वारा उनके ऊलजलूल फैसलों के प्रति बेफिक्री दिखाये जाने से हैरत में थे। इसी के बाद ये खबर भी आने लगी कि 50 फीसदी टैरिफ को घटाकर  15 प्रतिशत किये जाने पर सहमति बनने जा रही है। उल्लेखनीय है दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर लगातार वार्ता जारी है जिसमें काफी हद तक गतिरोध दूर होने में सफलता मिलने की संभावना है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ट्रम्प भारत की सभी शर्तें मान लेंगे क्योंकि उनका अब तक का व्यवहार बहुत ही अपरिपक्व और गैर जिम्मेदाराना रहा है। यहाँ तक कि वे कूटनीतिक शिष्टाचार तक का ख्याल नहीं रखते। इसके अलावा वे अभी भी इस मुगालते में जी रहे हैं कि दुनिया अमेरिका के इशारे पर उठक - बैठक लगाने बाध्य है। लेकिन भारत और चीन दोनों पर मनमाना टैरिफ थोप देने का उनका दाँव जब बेअसर होने लगा तब जाकर उनको समझ में आया कि 21 वीं सदी में दुनिया का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल चुका है जिसमें आर्थिक हित सामरिक मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। यदि ऐसा न होता तो सीमा विवाद के बाद भी ट्रम्प टैरिफ का मुकाबला करने में  चीन और भारत एक साथ न खड़े नजर आते। रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने के दबाव पर भारत ने जब  पलटवार करते हुए कहा कि अमेरिका खुद भी रूस से व्यापार कर रहा है और यूरोपीय देश उससे गैस खरीद रहे हैं तब वह केवल भारत और चीन पर ही रूसी तेल नहीं खरीदने का दबाव किस अधिकार से बनाता है ? ट्रम्प आज तक इसका जवाब नहीं दे सके।  इस प्रकार ये कहा जा सकता है कि भारत ने अमेरिका को सधी हुई भाषा में जवाब दे दिया है कि टैरिफ बढ़ाये जाने के पीछे ट्रम्प द्वारा जो दलीलें दी गईं उनका कोई औचित्य नहीं है। इस संबंध  में  विचारणीय है कि यदि दोनों देशों में व्यापारिक संधि होती है तब अमेरिका भी  पहले से कुछ न कुछ तो ज्यादा हासिल करना चाहेगा क्योंकि भारत के साथ व्यापार में उसे घाटा होता है जिसे लेकर ट्रम्प चिल्लाया करते हैं। और फिर ये भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि समझौता होने के बाद भी वे  उस पर कायम रहेंगे। भारत लगातार ये स्पष्ट करता आया है कि वह ऊर्जा सहित अन्य तकनीकी जरुरतों के लिए एक या कुछ देशों पर निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करता रहेगा। और ऐसा किया भी गया है जिसके अनुकूल परिणाम दिखने लगे हैं। ये देखते हुए भारत को अपने निर्यात का विकेंद्रीकरण करने की कार्ययोजना बनानी चाहिए क्योंकि वह खुद भी अब आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। अमेरिका को ये महसूस करवाने की जरूरत है कि भारत का काम उसके बिना भी चल सकता है। ट्रम्प की बेवकूफियों ने उनकी छवि तो खराब की ही अमेरिका को भी हास्यास्पद स्थिति में ला खड़ा किया है। भारत और चीन के प्रति टैरिफ विवाद में अमेरिका से जिस नरमी के संकेत आ रहे हैं वे उसकी मजबूरी दर्शाते हैं। ऐसे में भारत ने अभी तक जो दृढ़ता दिखाई उसे जारी रखना चाहिए क्योंकि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 October 2025

देश सुखद और सुरक्षित भविष्य के आत्मविश्वास से भरा हुआ है


    भारत की महान पर्व परंपरा में दीपावली का सर्वोच्च स्थान है । इसका सीधा संबंध सुख - समृद्धि से है इसीलिए यह पर्व धन - संपदा की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी जी को समर्पित है। वैसे तो प्रत्येक दीपावली पर देश ही नहीं अपितु दुनिया के विभिन्न देशों में बसे सनातनी संस्कृति के अनुयायी उत्साहित होकर खुशियाँ मनाते हैं किंतु इस वर्ष की दीपावली पर देश नये आत्मविश्वास  से भरा हुआ है। ऑपरेशन सिंदूर के रूप में हमारे राजनीतिक नेतृत्व और देश की रक्षा के लिए समर्पित  सशस्त्र सेनाओं ने पाकिस्तान को पहलगाम की आतंकी घटना के लिए जो दंड दिया उसने पूरी दुनिया में भारत के सैन्य बल का डंका बजा दिया।
    रक्षा  उत्पादन के क्षेत्र में भारत के बढ़ते कदमों से अमेरिका जैसी महाशक्ति तक चिंतित हो उठी जिसका प्रमाण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जबरन थोपे गए टैरिफ हैं। लेकिन भारत ने जबर्दस्त दृढ़ता दिखाते हुए  उस दबाव के सामने झुकने से इंकार कर दिया। भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बताने वाले ट्रम्प अब अपनी मुद्रा डॉलर के प्रभुत्व को बचाने चिंतित हैं। अमेरिका में लाखों कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा। दूसरी ओर भारत सरकार ने जीएसटी की दरों को घटाकर उपभोक्ताओं के साथ ही उद्योग - व्यापार जगत की खुशियों को भी दोगुना कर दिया।

     देश आर्थिक मोर्चे पर तेजी से आगे बढ़ा है। पाकिस्तान के साथ हाल ही में हुए युद्ध में अपनी सैन्य शक्ति के अभूतपूर्व प्रदर्शन के जरिये भारत ने रक्षा क्षेत्र में अपनी कुशलता के साथ ही आत्मनिर्भरता का जो परिचय दिया उसके कारण अब वह अस्त्र - शस्त्रों  के निर्यात की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है। कूटनीतिक मंचों पर हमारी उपस्थिति अनिवार्य होती जा रही है। दुनिया की महाशक्तियाँ भारत की उपेक्षा करने के बजाय उसके साथ तालमेल बिठाने आगे आ रही हैं। इन सबसे आम भारतीय का हौसला बुलंद हुआ है। एक तरफ जब दिग्गज अर्थव्यवस्थाएँ  डाँवाडोल हो रही हैं और यूक्रेन - रूस युद्ध के लंबे खिंचने से आर्थिक अनिश्चितता ने पूरी दुनिया को हलाकान कर रखा है तब भारत के बारे में सभी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं आशाजनक अनुमान लगा रही हैं। विदेशी निवेशकों को भारत से विमुख करने के जितने भी षडयंत्र बीते एक - दो वर्षों में रचे गए , वे सब अपनी मौत मरते गए। ट्रम्प टैरिफ के कारण जो विदेशी पूंजी वापस लौटी वह फिर वापस आने लगी है। नवरात्रि से भारत के बाजारों में जो रौनक देखने मिल रही है उससे पूरा विश्व चकित है।
      जहाँ तक  राजनीतिक स्थिरता का सवाल है तो हमारे सभी निकटस्थ पड़ोसी आंतरिक  विग्रहों से जूझ रहे हैं तब भारत  मजबूत नेतृत्व  के कारण अस्थिरता और अराजकता से खुद को बचा सका। देश विरोधी शक्तियों का सिर जिस मुस्तैदी से कुचला जा रहा है उसकी वजह से भारत की छवि एक मज़बूत देश के तौर पर स्थापित हुई है। नक्सलियों का सफाया बड़े पैमाने पर होने से देश का बड़ा भाग  मुख्यधारा में शामिल होने को तैयार है। कश्मीर घाटी में आतंकवाद भी दम तोड़ रहा है। पूर्वोत्तर के राज्य  अलगाववाद के शिकंजे से निकलकर तेजी से विकास के मार्ग पर अग्रसर हैं।  आधारभूत ढांचा वैश्विक स्तर को छूने लगा है। ऊर्जा के मामले में देश अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। सौर ऊर्जा के अलावा अन्य विकल्पों की तलाश भी तेजी से हो रही है। हालांकि अभी हर हाथ को काम और हर खेत को पानी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका किंतु समस्याओं से जूझने में लाचार नजर आने वाला भारत आज नई संभावनाओं का वैश्विक केंद्र है जो विज्ञान और तकनीक को अपनाने के साथ ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हुआ है। पूरी दुनिया में फैले भारतीय मूल के अप्रवासियों के प्रति सम्मान बढ़ा है। भारत की प्रतिभाशाली युवा शक्ति महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद की भविष्यवाणी को सत्य साबित करते हुए 21 वीं सदी के भारत को विश्व का सिरमौर बनाने के प्रति कटिबद्ध है। कुल मिलाकर  कहा जा सकता है कि इस दीपावली पर देश उम्मीदों और आत्मविश्वास से भरपूर सुखद और सुरक्षित भविष्य के प्रति आश्वस्त है। लेकिन इसके लिए हम सभी को मिलकर प्रयासों की पराकाष्ठा करनी होगी। आइये संकल्प लें कि हम भारत माता को परम वैभव के उच्चतम शिखर पर ले जाने के लिए अपना योगदान देने में सबसे आगे रहेंगे ,इस भाव के साथ कि:-

देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।

दीप पर्व आप सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आये, यही मंगलकामना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 October 2025

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई संधि की पोल खुली

ऑपरेशन सिंदूर के बाद हाल ही में  पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक संधि हुई जिसमें ये प्रावधान है कि उनमें से किसी एक पर भी हमला दोनों पर माना जाएगा । अर्थात दूसरा भी उसके बचाव में आ खड़ा होगा। भारत में मोदी सरकार के विरोधियों ने फ़ौरन मोर्चा खोलते हुए कहना शुरू कर दिया कि उसकी विदेश नीति विफल साबित हुई क्योंकि भारत और सऊदी अरब एक दूसरे के काफी करीब आ गए थे। स्मरणीय है जिस दिन पहलगाम में आतंकी हमला हुआ उस दिन  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब में ही थे और अपनी यात्रा अधूरी छोड़कर दिल्ली लौटे। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका ने जिस तरह पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखा वह कोई नई बात नहीं थी किंतु एक - दो दशक में भारत - अमेरिकी संबंधों में काफी मधुरता आने के कारण वाशिंगटन का बदला हुआ रुख चौंकाने वाला अवश्य था। हालांकि इसका कारण भारत के मिसाइल हमले में पाकिस्तान के जिन सुरक्षा केंद्रों को नुकसान पहुंचा उनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसमें परमाणु अस्त्र रखे हुए हैं जो दरअसल पाकिस्तान के न होकर अमेरिका के हैं। इसीलिये युद्ध रुकते ही अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ भागे - भागे पाकिस्तान आये। इसकी पुष्टि इस बात से भी हुई कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख मुनीर को अपने साथ बिठाकर भोजन करवाया। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ से ज्यादा महत्व भी ट्रम्प आजकल मुनीर को दे रहे हैं। चूँकि भारत पर दबाव बनाने की हर कोशिश में वे विफल साबित हुए इसलिए उन्होंने सऊदी अरब को पाकिस्तान के साथ उक्त सन्धि करने प्रेरित किया जो अमेरिका का परम मित्र है। यहाँ ये भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की सेना का इस्तेमाल अरब देश पहले भी करते आये हैं। अनेक सेवानिवृत सैन्य अधिकारियों की सेवाएं  दूसरे इस्लामिक देशों ने समय - समय पर लीं। पिछले दिनों  कतर में  मिसाइलें दागकर इसराइल द्वारा हमास के कुछ नेताओं को मारे जाने को भी सऊदी अरब और पाकिस्तान में हुई संधि का एक कारण माना गया। लेकिन भारत का उससे चिंतित होना स्वाभाविक था।  सऊदी अरब अपनी अपार तेल संपदा के कारण अरब जगत का मुखिया माना जाता है। मुसलमानों का प्रमुख धर्मस्थल मक्का चूँकि इसी देश में है इसलिए भी इस्लामिक जगत में सऊदी अरब को बड़े भाई का दर्जा मिला हुआ है। हालांकि उसकी अमेरिका परस्ती से कई मुस्लिम देश उससे खुन्नस खाते हैं किंतु इसके बाद भी उसकी अहमियत बरकरार बनी हुई है। ऐसे में पाकिस्तान और उसके बीच हुई उक्त संधि ने भारत को सोचने के लिए बाध्य कर दिया। ये वही सऊदी अरब है जिसने श्री मोदी को अपना सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया। चूँकि अमेरिका  भारत के प्रति कठोर रुख दिखाने पर उतारू है इसलिए आम धारणा ये बनी कि सऊदी अरब और पाकिस्तान की नजदीकी में  ट्रम्प की भूमिका रही होगी। हालांकि भारत ने इस संधि पर कोई खास ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे विश्वास था कि सऊदी अरब कभी भी पाकिस्तान की तरफ से हमारे साथ जंग नहीं करेगा। वैसे इस संधि की पोल जल्द ही खुल गई जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच चल रही मौजूदा जंग में सऊदी अरब न तो युद्धविराम करवाने आगे आया और न ही पाकिस्तान के साथ खड़े होने की हिम्मत ही दिखा सका। इससे साफ हो गया कि वह सन्धि पत्र मढ़वाकर दीवार पर टांगने लायक ही है। अफ़ग़ानिस्तान की सैन्य शक्ति पाकिस्तान की तुलना में काफी कम है । विशेष रूप से वायुसेना के मामले में अफगानिस्तान उससे पीछे है।। लेकिन लड़ाई में अस्त्र - शस्त्र  के साथ ही जिस हौसले और हिम्मत की जरूरत पड़ती है उस मामले में अफगानी लड़ाके पाकिस्तानी सेना पर भारी पड़ते हैं। वैसे भी पाकिस्तान की सेना अफ़ग़ानिस्तान के अलावा बलूचिस्तान में भी उलझी हुई है। ऐसे में यदि सऊदी अरब इस लड़ाई में पाकिस्तान के साथ खड़ा हो जाता तो तालिबान सरकार पर दबाव बनता किंतु अब तक तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इस जंग का हश्र क्या होगा क्या ये कहना मुश्किल है किंतु सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ हुई संधि के अनुरूप अब तक चूँकि कोई कदम नहीं उठाया इसलिए कहा जा सकता कि इस संधि से भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं है।


 - रवीन्द्र वाजपेयी
   

Friday, 17 October 2025

बेशर्मी से झूठ बोलने का नोबेल पुरस्कार हो तो ट्रम्प उसके सही हकदार


अमेरिका विश्व की आर्थिक और सैन्य महाशक्ति होने के अलावा तकनीक में भी अग्रणी है। दुनिया में जितनी भी संचार सुविधाएं हैं , ज्यादातर का नियंत्रण उसके पास है।  विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा संगठन  उसके प्रभाव में हैं। सं .रा.संघ का मुख्यालय भी उसी के न्यूयॉर्क शहर में है। दोनों विश्व युद्धों को निर्णायक मोड़ देने के कारण उसकी ताकत को वैश्विक मान्यता प्राप्त हो गई। अमेरिकी मुद्रा डॉलर की साख पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है। चाहे अंतरिक्ष कार्यक्रम हों या वैज्ञानिक अनुसंधान, उसका प्रभुत्व कायम है।  लेकिन बीते कुछ दशकों से उसकी छवि लगातार गिरती आ रही है जिसका कारण नेतृत्व के स्तर में आई गिरावट है। दुनिया भर के लोगों ने यहाँ बसकर इसे उन्नति के शिखर पर पहुंचाया तो यह उसके राजनीतिक नेतृत्व की दूरगामी सोच थी जिसने प्रतिभाओं को अपने यहाँ सम्मानजनक स्थान प्रदान किया। लेकिन अमेरिका की श्रेष्ठता उसके अहंकार के तौर पर  सामने आती रही है । जहाँ तक बात भारत की है तो लोकतांत्रिक होने के बाद भी वह कभी भी  हमारा हितचिंतक नहीं रहा। वहीं  पाकिस्तान जैसे देश को सदैव संरक्षण प्रदान किया जहाँ चुनी हुई सरकार भी फौज के इशारों पर नाचती है। बावजूद इसके अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते सामान्य रहे। इसीलिये भारतीय मूल के लाखों प्रवासी वहाँ स्थायी तौर पर बस गये। वहीं बड़ी संख्या में शिक्षा और नौकरी के कारण वहाँ निवासरत हैं। अनेक  दिग्गज अमेरिकी  बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय पेशेवर विराजमान हैं। वहाँ का सामाजिक खुलापन , लोकतांत्रिक व्यवस्था और अंग्रेजी भाषा का प्रचलन होने से भारतीयों के लिए अमेरिका मुख्य आकर्षण का केंद्र  रहा है। उसकी राजनीति में भी भारतीय समुदाय की उपस्थिति तेजी से बढ़ी है। संसद और राज्यों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग चुनकर आते हैं। राष्ट्रपति के निजी सलाहकारों में भी भारतीय चेहरे मौजूद हैं। दोनों देशों में व्यापारिक रिश्ते भी काफी मजबूत रहे हैं। भारत द्वारा सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को किया जाता है। अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के बाद दोनों देशों  में निकटता और बढ़ी। लेकिन अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  दूसरी बार सत्ता में आने के बाद भारत के प्रति जिस प्रकार का  रवैया दिखा रहे हैं वह समझ से परे है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम का झूठा श्रेय लूटने की उनकी कोशिश जगहंसाई का विषय बनी। उसके बाद उन्होंने भारत पर रूस से कच्चा तेल न खरीदने का दबाव डाला और नहीं मानने पर 25 और 50 फीसदी टैरिफ थोपकर भारत के विदेश व्यापार को ठप करने का दांव चला।  उसके बाद भी उनका दबाव बेअसर रहा क्योंकि भारत ने पूरी दुनिया में  बाजारों की खोज करते हुए नये व्यापार  अनुबंध करना शुरू कर दिया। ट्रम्प ने गुस्से में वीजा शुल्क बढ़ाकर भारतीय छात्रों तथा पेशवरों को आने से रोकना चाहा तो अनेक देशों ने अपने दरवाजे उनके लिए खोल दिये। कुल मिलाकर ट्रम्प ने भारत को दबाने के लिए जितने भी प्रपंच रचे उनमें से कोई भी कारगर नहीं रहा। उनके झूठ की पोल खुली सो अलग। लेकिन उनका घटियापन रुकने का नाम नहीं ले रहीं। गत दिवस उन्होंने शिगूफा छोड़ दिया कि उनकी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात हो गई है और वे रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने के लिए  राजी हो गए। उनके बयान पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी मोदी सरकार पर ट्रम्प से दबने का आरोप दोहरा दिया। देश के भीतर भी इस बात पर आश्चर्य हुआ कि अब तक दबाव में नहीं आने के बाद श्री मोदी झुके क्यों? लेकिन विदेश मंत्रालय  ने  उस झूठ का पर्दाफाश करते हुए स्पष्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति के बीच कोई बातचीत नहीं हुई। साथ ही ये भी दोहराया कि भारत अपनी ऊर्जा जरुरतों के लिए नये - नये विकल्प ढूंढ़ता रहेगा। दरअसल ट्रम्प चाह रहे हैं कि भारत और चीन यदि रूसी तेल खरीदना बंद कर दें तो पुतिन के तेवर ढीले पड़ने से  वे यूक्रेन के साथ युद्धविराम के लिए राजी हो जाएंगे। लेकिन भारत ने रूस से तेल के अलावा हथियार खरीदी भी बढ़ा दी।  ट्रम्प अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करें तो इसमें अस्वाभविक कुछ भी नहीं किंतु इतने बड़े देश के मुखिया से ये अपेक्षा रहती है कि उनके व्यवहार में परिपक्वता और बातों में गंभीरता हो। ये कहना गलत न होगा कि वे अब तक के सबसे निकृष्ट अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। शांति के लिए दिये जाने वाले नोबेल पुरस्कार के लिए तो  चयन समिति ने उन्हें अपात्र ठहरा दिया। लेकिन बेशर्मी के साथ झूठ बोलने का कोई नोबेल पुरस्कार यदि हो तो वह ट्रम्प को जरूर दिया जा सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 October 2025

शराब से सरकार ज्यादा कमाती है या आबकारी विभाग के भ्रष्ट अधिकारी

शराब राज्य सरकारों का खजाना भरने का प्रमुख जरिया है। इसीलिये वे इस पर रोक लगाने से पीछे हट जाती हैं। हालांकि बिहार, गुजरात, मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप  में पूरी तरह से शराबबंदी है।वहीं मणिपुर के कुछ जिलों में आंशिक प्रतिबंध है। लेकिन शराब पीने के शौकीन पड़ोसी राज्य में जाकर गला तर कर लेते हैं। कुछ राज्य इसी वजह से शराबबंदी करने के बाद उसे वापस लेने मजबूर हो गए। इस संबंध में हरियाणा का उदाहरण प्रमुख है जहाँ स्व. बंशीलाल के शासन काल में मद्यनिषेध लागू होने के बाद ये देखने में आया कि हरियाणा के शराबी  पड़ोसी राज्यों के मयखानों को आबाद करने लगे। परिणामस्वरूप हरियाणा  आबकारी विभाग से होने वाली राजस्व की आय से वंचित हो गया वहीं पड़ोसी सूबों का खजाना भरने लगा। यद्यपि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने शराबबंदी करने के बाद उसे जारी रखा जिससे महिलाएं उनसे खुश हैं। ये बात सभी जानते हैं कि शराब अपराधों और भ्रष्टाचार को बढ़ाने का प्रमुख जरिया है । इसकी वजह से परिवार बर्बाद होते हैं। विशेष रूप से गरीब तबके के लिए तो यह अभिशाप है। लेकिन एक तरफ जहाँ सरकारें, मद्यनिषेध केन्द्र खोलकर नशेलचियों को इस बुराई से  निकालने का प्रयास करती हैं वहीं दूसरी ओर वे शराब की बिक्री बढ़ाने में भी संकोच नहीं करतीं क्योंकि यह उनकी आय का बड़ा साधन है। इस विरोधाभास के पीछे का कारण ये है कि शराब  बिक्री से सरकार का खजाना तो भरता ही है लेकिन आबकारी विभाग के भ्रष्ट अधिकारी - कर्मचारी भी बेहिसाब कमाते हैं। ज़ाहिर है उनको होने वाली काली कमाई का कुछ हिस्सा ऊपर भी पहुँचता होगा। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि अपवाद स्वरूप उंगलियों पर गिनने लायक हरिश्चंद्रों को छोड़ दें तो आबकारी महकमा भ्रष्टाचार का जीता - जागता प्रतीक है। ताजा प्रमाण म.प्र के एक सेवानिवृत्त आबकारी अधिकारी के यहाँ पड़े छापे में कई किलो सोना - चांदी, करोड़ों की नगदी और अकूत अचल संपत्ति का खुलासा होने से मिला है। हालांकि न तो वह आबकारी विभाग का पहला भ्रष्ट अधिकारी होगा और न ही उसके काले कारनामों पर पड़ा पर्दा उठ जाने से इस विभाग में कार्यरत कर्मचारी और अधिकारी परम पवित्र हो जाएंगे किंतु ये जाँच के साथ ही गहन शोध का विषय है कि शराब बिकवाकर  राज्य सरकार ज्यादा  कमाती है या आबकारी विभाग में जमे भ्रष्टाचारी? इस सवाल को मजाक में लेने के बजाय  गंभीर रुख अपनाने की जरूरत है क्योंकि शराब के कारण समाज में अपराध और पारिवारिक कलह बढ़ने के साथ ही गरीबों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम के बदले अनाज से मिला पैसा बड़ी मात्रा में शराब की लत में खर्च हो जाता है। इसके अलावा यह  विभागीय स्तर पर तो क़ाली कमाई का स्रोत है ही जिसका बहाव राजधानी तक जाता है। कुछ लोग ये तर्क भी दे सकते हैं कि अकेला आबकारी विभाग ही तो भ्रष्ट नहीं है अपितु परिवहन, लोक निर्माण, सिंचाई और राजस्व जैसे अनेक सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार सतह पर तैरता नजर आ जाता है। लेकिन आबकारी विभाग चूंकि नशे के कारोबार से जुड़ा हुआ है जो लोगों का स्वास्थ्य बर्बाद करने के साथ ही सामाजिक वातावरण में भी गंदगी पैदा करने का बड़ा  कारण है। इसलिए इसमें होने वाली क़ाली कमाई का नुकसान कहीं बड़ा है। ये स्वीकार करने में भी कोई बुराई नहीं है कि बिना ऊपरी संरक्षण के सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार संभव नहीं है। राज्य सरकार को चाहिए वह इस दिशा में विचार करे ताकि आगामी वित्तीय वर्ष से प्रायोगिक तौर शराबबंदी की जा सके। निश्चित ही इससे उसका राजस्व घटेगा किंतु  जो अप्रत्यक्ष लाभ हैं उनका सकारात्मक प्रभाव न सिर्फ सरकार अपितु समूचे समाज पर पड़ेगा। इस बारे में ये बात विचारणीय है कि सरकार समाज के वंचित वर्ग के लिए जो कल्याणकारी कार्यक्रम चला रही है उन पर शराबखोरी ग्रहण लगा देती है। लाड़ली बहना जैसी योजना से लाभान्वित अनेक महिलाएं इस बात को लेकर दुखी हैं कि उनके पति दबाव बनाकर वह राशि उनसे लेकर शराब पर लुटा देते हैं। कुल मिलाकर आशय ये है कि सरकारों द्वारा अपनी आय की खातिर शराब बिकवाने का औचित्य साबित करना सत्य से परे है। और यदि शराब जैसी चीज से ही सरकारी खजाना भरता हो तब फिर कैसीनो जैसे धन्धों की अनुमति के अलावा सट्टे के भी लाइसेंस जारी किये जाएं क्योंकि यदि जुआ - सट्टा गैरकानूनी और बुराई का प्रतीक है तब शराब तो उससे भी ज्यादा घातक है।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 October 2025

महिला पुलिस अधिकारी का आपराधिक दुस्साहस चिंता का विषय


पहले जमाने में बच्चे चोर - पुलिस नामक खेल खेलते थे। सांकेतिक तौर पर समझें तो पुलिस और चोर एक दूसरे के विपरीत कहे जाते थे। पुलिस का काम चोर को पकड़ना होता था। चोर से अभिप्राय अपराधी से है। अर्थात कानून के विरुद्ध काम करने वाले को पकड़कर सजा दिलवाना ही पुलिस  का आधारभूत कर्तव्य है। आम नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए भी उसी की ओर निहारता है। देशभक्ति - जनसेवा जैसे पवित्र ध्येय के लिए कार्यरत  पुलिस की वर्दी धारण किये हर व्यक्ति से अपराधी डरें , यह एक आदर्श स्थिति होती है किंतु दुर्भाग्य से उससे गैर कानूनी कार्य करने वालों की बजाय कानून पसंद नागरिक भयभीत होते हैं। अपराधी बेखौफ होकर घूमते हैं जबकि किसी शरीफ व्यक्ति को  थाने जाना पड़े तो वह अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार से आशंकित हो जाता है। इसका कारण पुलिस महकमे की छवि में लगे असंख्य दाग हैं जिनके चलते  वर्दीधारी व्यक्ति कानून के  रक्षक के बजाय अपराध और अपराधियों का संरक्षक नजर आने लगा है।  समाज में ये धारणा प्रचलित है कि पुलिस और अपराधियों के बीच अघोषित हिस्सेदारी है। अक्सर ये देखने में आता है कि पुलिस जिस मामले में रुचि रखती है उसमें तो त्वरित कार्रवाई होती है , अन्यथा लीपापोती करने में संकोच नहीं करती। इस संबंध में म.प्र के सिवनी जिले में बीते दिनों हुआ एक कांड चर्चा में है। वहाँ की पुलिस को खबर मिली कि जबलपुर से आ रही एक कार में हवाला कारोबारी करोड़ों रुपये नगद लेकर नागपुर जा रहे हैं।  लिहाजा सिवनी के पुलिस वाले मुस्तैद होकर उस वाहन की प्रतीक्षा करने लगे और जैसे ही वह आया उसे पकड़कर पूरी रकम जप्त कर ली। निश्चित तौर पर ये बड़ी सफलता थी जिसके लिए उनको पुरस्कृत किया जाता। लेकिन इतनी बड़ी रकम देखकर उनका ईमान डोल गया और बजाय  सरकारी खजाने में जमा किये जाने के उसकी बंदरबांट कर ली गई। कार में बैठे लोगों को बिना कार्रवाई के भगा दिया गया। लेकिन हवाला कारोबारी द्वारा इसकी शिकायत पुलिस के उच्च अधिकारियों से किये जाने के बाद  जब जाँच हुई तब एक महिला पुलिस अधिकारी और थाना प्रभारी  सहित दर्जन भर पुलिस कर्मी दोषी  पाए गए जिन पर डकैती जैसा गंभीर प्रकरण दर्ज किया गया है। इस बंदरबाँट में शामिल कुछ अन्य लोग भी महाराष्ट्र से पकड़े जा चुके हैं। पकड़ी गई  राशि का अधिकांश हिस्सा जप्त हो चुका है। जांच में नई - नई जानकारियाँ आ रही हैं जिनसे कुछ और खुलासे हो सकते हैं। बहरहाल प्रथम दृष्ट्या ये तो सामने आ ही गया कि सिवनी पुलिस ने हवाला रकम को जप्त कर दोषियों पर विधि सम्मत कारवाई करने के बजाय  उसको मिलकर हड़प लेने का फैसला किया। यदि हवाला कारोबारी हिम्मत नहीं दिखाता तब शायद तीन करोड़ की मोटी रकम का बंटवारा करने वाले  धूमधाम से दिवाली मनाने में जुट जाते। ये तंज भी सुनने मिल रहे हैं कि सिवनी के पुलिस वालों ने  पूरी रकम मिलकर डकारने का जो लालच दिखाया वह उनके गले का फंदा बन गया। यदि तीन करोड़ में कुछ बड़े वर्दीधारियों को शामिल कर लिया जाता तब सभी की शुभ दीपावली हो जाती। इस घटना से पुलिस की छवि खराब हुई ये कहने की कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि आज के युग में उसके बारे में अच्छी राय रखने वाला इंसान अपवाद स्वरूप ही मिल सकता है। आम अवधारणा यही है कि पुलिस अपराधों को रोकने के बजाय उनको संरक्षण देने में लिप्त है। लेकिन इस कांड में एक महिला अधिकारी द्वारा जप्त हुई  हवाला रकम में से आधा हिस्सा हड़प लेने से आश्चर्य हुआ क्योंकि पुलिस  में पदस्थ  महिलाएं भी इतनी दिलेरी से यदि इस तरह के आपराधिक कृत्य करेंगी तब सरकार का तो जो होना है सो होगा किंतु समाज के भविष्य को लेकर चिंता उत्पन्न होती है। हालांकि शासकीय विभागों में काम करने वाली अन्य  महिला कर्मी और अधिकारी भी घूसखोरी में पकड़ी जाती हैं किंतु संदर्भित प्रकरण की केंद्र बिंदु महिला एस. डी. ओ. पी ने जो दुस्साहस किया वह सोचने बाध्य करता है। आधी आबादी को बराबरी का दर्जा देने की मंशा हर किसी की है लेकिन वह भी यदि भ्रष्टाचार रूपी गंदे नाले में डुबकी लगाने लगी तब बच्चों को नैतिकता और ईमानदारी के संस्कार कौन देगा ये प्रश्न चिंतित करता है।  इसी के साथ आम जनता की ये टिप्पणियां भी सोचने को बाध्य कर देती हैं कि कोई नहीं फंसेगा क्योंकि सवाल वर्दी के रुतबे का भी तो है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 October 2025

विश्व बैंक के बाद मुद्रा कोष द्वारा भी भारत की प्रशंसा शुभ संकेत



विश्व बैंक द्वारा हाल ही में चालू वित्तीय वर्ष के दौरान  भारत की जीडीपी में वृद्धि के अनुमान को 6.3 से बढ़ाकर 6.5 फीसदी किये जाने से ये बात स्पष्ट हो गई कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आखिर क्यों भारत पर अनाप - शनाप टैरिफ थोप रहे हैं। उल्लेखनीय है ट्रम्प ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मरी हुई बताकर उसका मजाक उड़ाया था । लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने भी उनके दावे को सही बताकर केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को गलत बताने में देर नहीं की। लेकिन जब विश्व बैंक ने जब भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफ्तार में और वृद्धि होने का अनुमान व्यक्त किया तब न तो ट्रम्प कुछ बोल सके और न ही श्री गाँधी। विश्व बैंक के बाद अब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की  प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने भारत की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि संरचनात्मक सुधारों को लेकर उसने सबको चौंकाया है।  जॉर्जीवा ने यह भी कहा कि चीन की आर्थिक रफ्तार धीमी होने के विपरीत भारत प्रमुख विकास इंजन के रूप में उभर रहा है। वाशिंगटन में होने वाली मुद्रा कोष और विश्व बैंक की सालाना बैठकों से पहले की गई उक्त टिप्पणी को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का ताजा प्रमाणपत्र माना जा सकता है। मुद्रा कोष प्रमुख  ने कहा कि वे भारत को उसके साहसिक सुधारों के कारण बहुत महत्व देती हैं क्योंकि उसने उन सभी को गलत साबित कर दिया जो कहते थे कि बड़े पैमाने पर डिजिटल आईडी लागू करना उसके लिए संभव नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक को राजनीतिक व्यक्ति नहीं माना जा सकता जो किसी देश की अनावश्यक प्रशंसा करें। इसी तरह  विश्व बैंक भी ऐसी संस्था  नहीं है जो भारत की अर्थव्यवस्था पर अतिरंजित या तथ्यहीन टिप्पणी करें। इस प्रकार  जब विश्व के दो बड़े आर्थिक संस्थान भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हों तब उसकी प्रामाणिकता पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। सबसे बड़ी बात मुद्रा कोष  प्रमुख द्वारा ये स्वीकार किया जाना है कि कोविड नामक महामारी के बाद वैश्विक विकास दर में गिरावट के बावजूद भारत और चीन उसे सहारा दिये हुए हैं। हालांकि चीन की विकास दर में भी कमी आई है किंतु भारत अपने बेहतर आर्थिक प्रबंधन के कारण दुनिया में आर्थिक विकास का अगुआ बन गया है। भारत की जीडीपी इस वर्ष भले ही 6.8 फीसदी न बढ़े जैसी कि भारतीय रिजर्व बैंक के अध्यक्ष ने हाल ही में उम्मीद जताई किंतु विश्व बैंक के अध्यक्ष  ने भी कुछ माह पूर्व किये आकलन में संशोधन करते हुए उसे 6.5 फीसदी कर दिया जो चीन से दो गुना है, तब मुद्रा कोष  प्रमुख द्वारा भारत की प्रशंसा में की गई टिप्पणी की सार्थकता स्वयंसिद्ध है। हाल ही में किये गए जीएसटी सुधारों ने  उद्योग - व्यापार जगत में जिस उत्साह का संचार किया वह विश्व बैंक और मुद्रा कोष के आशावाद का आधार है। खुदरा महंगाई  में कमी और रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि नहीं किया जाना भी अच्छे संकेत हैं। बाजार के उतार - चढ़ावों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का ये आकलन मायने  रखता है कि ग्रामीण भारत में भी अब उन वस्तुओं की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है जो कुछ समय पहले तक शहरी जीवन शैली का हिस्सा मानी जाती थीं। यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते उपभोक्ताओं को देखकर चकित हैं। बीते वित्तीय वर्ष में प्रत्यक्ष करों में हुई वृद्धि भी जीडीपी में वृद्धि के अनुमानों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि देश आर्थिक तौर पर मजबूत है। सबसे बड़ी बात ये है कि कोरोना के बाद से जहाँ अनेक संपन्न देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट आई वहीं भारत उस संकट से उबरने के बाद तेज गति से आगे बढ़ा है। अमेरिका भी इसी से भयभीत है जिसका प्रमाण ट्रम्प द्वारा किया गया टैरिफ हमला है। उस दबाव के आगे भारत के नहीं झुकने का ही परिणाम है कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तक हमारी प्रशंसा करने प्रेरित हुए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 October 2025

अफगानिस्तान के साथ रिश्ते सुधरना शुभ संकेत


2021 में जब अमेरिकी फ़ौजें वापस लौटीं और 20 सालों बाद तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आये तब भारत के मुसलमानों ने इस अंदाज में जश्न मनाया मानों ये जंग उन्हीं ने जीती हो। उनके साथ ही वामपंथी तबका भी उल्लासित था क्योंकि वह अमेरिका की शिकस्त थी। चूंकि उस समय मोदी सरकार और अमेरिका के रिश्ते काफी अच्छे थे लिहाजा अप्रत्यक्ष रूप से सरकार पर निशाने साधे गए। भारत के लिए चिंता का कारण ये था कि अमेरिकी आधिपत्य के दौरान अफगानिस्तान में अनेक विकास कार्यों के ठेके भारतीय कंपनियों के पास थे। तालिबानी सत्ता  का  पाकिस्तान और चीन ने जिस तरह स्वागत किया उससे भी हमारी चिंताएं बढ़ने लगीं। पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल तालिबानी अड्डों के लिए होता रहा इसलिए उसका सोचना था कि वह काबुल में  इस्लामिक सरकार के साथ बेहतर तालमेल बनाकर भारत को पूरी तरह बाहर कर देगा। चीन की रुचि भी इस पहाड़ी देश की खनिज संपदा पर थी। उल्लेखनीय है अफगानिस्तान में मौजूद बहुमूल्य खनिजों के कारण ही रूस और अमेरिका दोनों इस देश पर काबिज होने का प्रयास करते रहे किंतु आखिरकार उन्हें छोड़कर जाना पड़ा। और इस तरह ये स्पष्ट हो गया कि अफगानिस्तान को साम्राज्यों की कब्रगाह क्यों कहा जाता है। अमेरिकी फ़ौजों के पलायन के बाद वहाँ काफी समय तक अनिश्चितता  रही क्योंकि कुछ लड़ाकू गुट थे जो तालिबान के झंडे तले आने राजी नहीं थे। इससे लगा अफ़ग़ानिस्तान के दुर्दिन दूर नहीं होंगे और  गृहयुद्ध जारी रहेगा। हालांकि धीरे - धीरे तालिबान ने सभी विरोधियों को  घुटने टेकने मजबूर कर दिया। सत्ता में आते ही उन्होंने   महिलाओं पर तरह -  तरह की पाबंदी लगाने के अलावा इस्लामिक व्यवस्था लागू कर दी। हालांकि भारत ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी। लेकिन वहाँ अपना दूतावास 2022 में दोबारा खोलकर कूटनीतिक, संवाद के साथ वहाँ रहने वाले हिंदुओं और सिखों के हितों की रक्षा का प्रबंध किया। अफगानिस्तान भी दिल्ली में दूतावास और मुंबई में वाणिज्यिक काउंसलेट संचालित करता आ रहा है। इस बीच   बड़ा बदलाव ये हुआ कि सीमा विवाद को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनातनी बढ़ने लगी।  इसका कारण  पाकिस्तान के पश्चिमी सीमांत इलाके में बने तालिबानी अड्डों को न हटाया जाना है। पाकिस्तान को लगता था कि तालिबानी सत्ता आते ही उसके यहाँ  चल रहे तालिबानी अड्डे बंद हो जाएंगे  किंतु अफगानिस्तान ने उन क्षेत्रों को अपना बताते हुए अंग्रेजों द्वारा तय की गई डूरंड रेखा नामक सीमा को अमान्य कर दिया। धीरे - धीरे दोनों के बीच तनाव  और बढ़ा और गत सप्ताह बाकायदे युद्ध जैसे हालात   बन गये। भारत ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए  अफगानिस्तान से रिश्ते सुधारने के घोषित- अघोषित कदम उठाये । उसी का परिणाम उसके विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी का भारत दौरे पर आना है। भारतीय नेताओं से मिलने के बाद उनका ये बयान काफी मायने रखता है कि उनका देश अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत पर हमले के लिए नहीं होने देगा। स्मरणीय है कश्मीर में आतंकवाद के लिए पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों के सदस्यों का भी उपयोग किया था। विदेश मंत्री के भारत आगमन से पाकिस्तान के पेट का दर्द तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। उसे डर है तालिबानी सत्ता के साथ भारत की दोस्ती उसके लिए खतरे का कारण बनेगी जबकि भारत के लिए ऐसा होना  दूरगामी हितों के लिए बेहद फायदेमंद रहेगा। हालांकि इसके बाद भी भारत ने अभी तक अफगानिस्तान सरकार को मान्यता नहीं दी। बावजूद इसके  मुत्तकी ने राजनयिक चर्चाओं के अलावा देवबंद के मुस्लिम केंद्र जाकर बड़ा संदेश दे दिया। लेकिन अपने देश का जो तबका अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने पर बल्लियों उछल रहा था वही उसके विदेश मंत्री की भारत यात्रा की कूटनीतिक उपयोगिता को नजरंदाज करते हुए उसमें आलोचना के बिंदु तलाश रहा है। पत्रकार वार्ता में महिला पत्रकारों को अनुमति नहीं देने के अलावा मुत्तकी की देवबंद यात्रा पर योगी आदित्यनाथ द्वारा उनका स्वागत किये जाने पर तंज कसे जा रहे हैं। सरकार में बैठे लोगों के तालिबान को लेकर अतीत में दिये बयानों का भी हवाला दिया जा रहा है। ऐसा करने वाले भूल जाते हैं कि वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है , हमें अपनी विदेश नीति का भी तदनुसार निर्धारण करना जरूरी है। जिसका उदाहरण अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने के लिए चीन के साथ निकटता बढ़ाना है। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति देखते हुए भारत के लिए वहाँ अपने लिए जगह बनाना जरूरी है। यूँ भी अफगानिस्तान के अंदरूनी राजनीति में हमारी भूमिका रही है। पिछली सत्ता के साथ अच्छे रिश्तों के अलावा रूसी कब्जे के दौरान वहाँ के शासक नजीबुल्लाह के परिवार को भारत ने शरण दी थी। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रहे हामिद करजई तो भारत में ही पढ़े थे। आज भी  हिन्दू और सिख आबादी वहाँ रहती है। ये देखते हुए दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की तर्ज पर यदि भारत सरकार ने अफगानिस्तान के साथ  तार जोड़ने की पहल की तो परिणाम की प्रतीक्षा किये बिना जल्दबाजी में टिप्पणियां करना अनुचित है। कूटनीति में बहुत कुछ ऐसा होता है जो देखकर भी समझ नहीं आता। और ये भी कि दो देशों के बीच तनाव के बाद भी कूटनीतिक संवाद चलता रहता है। कंधार विमान अपहरण के समय भारत और अफगानिस्तान के बीच पूरी तरह अनबोला था। तब भी कूटनीतिक संवाद के जरिये ही बात बनी थी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 October 2025

तो प्रशांत और बाकी में क्या अंतर रह जाएगा


बिहार  में सर्वाधिक  चर्चा में हैं जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर।  जिस तरह  दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल का  उदय हुआ था उसी तरह प्रशांत भी प्रचलित तौर - तरीकों से अलग सीधे जनता के बुनियादी मुद्दों को उठा रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में वे नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान को निर्देशित कर चर्चा में आये। अबकी बार  मोदी सरकार का नारा और चाय पर चर्चा उन्हीं के दिमाग की उपज थी। लेकिन अगले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में वे नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की नैया के खेवनहार बन बैठे। बिहार में बहार है, नीतिशै कुमार जैसा नारा देकर उन्होंने मोदी लहर को रोकने का कारनामा कर दिखाया। हालांकि उसके पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी ऐसा ही कर चुकी थी। लेकिन बिहार जैसे राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में श्री मोदी के प्रभाव को क्षीण करते हुए नीतीश - लालू के गठजोड़ को सफलता दिलवाकर प्रशांत चुनावी जीत की गारंटी बन गए।  बाद में वे नीतीश के काफी करीब आकर बिहार सरकार के सलाहकार भी बन बैठे किंतु जल्द ही उनके साथ पंगा हो गया। बावजूद उसके  बतौर चुनाव रणनीतिकार  उनकी मांग बढ़ने लगी। जगन मोहन  रेड्डी , स्टालिन और ममता बैनर्जी सहित 8 पार्टियों के चुनावी सलाहकार प्रशांत केवल एक बार विफल हुए जब उन्होंने उ.प्र में कांग्रेस का चुनाव अभियान संचालित किया। एक समय ऐसा भी आया जब उनके कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें लगने लगीं। लेकिन राहुल गाँधी के साथ तालमेल नहीं बैठ पाने के कारण वह मुहिम आगे नहीं बढ़ पाई। राजनीति से इतर वे विभिन्न कंपनियों के व्यवसायिक सलाहकार भी हैं जिन्होंने बिहार चुनाव लड़ने के लिए जन सुराज को करोड़ों का चंदा भी दिया। जिसे श्री किशोर अपनी पेशेवर सलाह का मेहनताना बताते हैं। बीते दो - तीन साल  वे बिहार में  गाँव - गाँव घूमकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटे रहे । पार्टी बनाकर उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा स्पष्ट कर दी।  शुरुआत में लगा था  वे एनजीओ शैली में अपने गृहराज्य की सूरत और सीरत सुधारने का बीड़ा उठाएंगे। शायद जनता से प्रत्यक्ष जुड़ने के बाद उनकी समझ में आया होगा कि समूची व्यवस्था चूंकि  राजनीतिक सत्ता के शिकंजे में है इसलिए बिना उसके कुछ कर पाना असंभव  है। उनके राजनीति में प्रवेश को शुरुआत में तो सभी ने हल्के में लिया। लेकिन बुनियादी मुद्दों पर लोगों का ध्यान खींचते हुए उन्होंने अपना जनाधार बढ़ाया। वे कितनी सीटें लेंगे ये तो अभी कह पाना मुश्किल है किंतु विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत उस वर्ग को आकर्षित करने में सफल होते दिख रहे हैं जो नीतीश और तेजस्वी यादव दोनों से नाराज है। इसीलिए वे एनडीए और महागठबंधन दोनों पर बराबरी से हमलावर हैं। नीतीश उनकी नजर में अच्छे व्यक्ति होने के बाद भी बतौर मुख्यमंत्री बिहार के लिए कुछ नहीं कर सके वहीं दूसरी ओर तेजस्वी को नौ वीं फेल प्रचारित कर वे उनको अयोग्य साबित करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री पर तीर छोड़ते हुए वे कहते हैं कि बिहार के पिछड़ेपन को दूर करने में वे विफल रहे। कांग्रेस और राहुल की आलोचना का भी कोई मौका वे नहीं छोड़ते। बिहार की राजनीति को जाति के जाल से निकालकर विकास केंद्रित बनाने की उनकी बातें उम्मीदें जगा रही थीं। लेकिन जन सुराज ने 50 उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की उसे देखकर उनके प्रति आकर्षित हो रहे  लोगों को धक्का पहुंचा । यद्यपि राजनीतिक  विश्लेषकों ने श्री किशोर के राजनीतिक चातुर्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने जातीय समीकरणों का ध्यान रखते हुए उम्मीदवारों का जो चयन किया उसने एनडीए और महागठबंधन दोनों की नींद उड़ा दी। मुस्लिम बहुल सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारने का उनका निर्णय महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा है। लेकिन सवाल ये है कि यदि प्रशांत किशोर भी जाति को ही चुनाव जीतने का फार्मूला मानते हैं तो अब तक उन्होंने जिस बदलाव के वादे और दावे बिहार की जनता से  किये वे सब हवा - हवाई होकर रह जाएंगे। ये दुर्भाग्य ही है कि राजनीति में ताजी हवा का जो झोका आता है वह भी उसके वातावरण में आकर प्रदूषित होने जाता है। लगता है प्रशांत दूसरों को चुनाव जीतने के जो फॉर्मूले बताया करते थे , उन्हीं को  स्वयं भी अपना रहे हैं। लेकिन  तब उनमें और बाकी में क्या अंतर रह जाएगा ? उम्मीदवारों  की पहली सूची आने के बाद जन सुराज में भी वैसा ही हंगामा हुआ जैसा अन्य दलों में देखने मिलता है। ये इस बात का संकेत है कि प्रशांत के साथ भी ऐसे तत्व जुड़ गए हैं जिनका उद्देश्य बिहार की बजाय अपनी बदहाली दूर करना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 October 2025

क्या मायावती और बसपा के सुनहरे दिन लौटेंगे


बसपा  संस्थापक कांशीराम के जीते जी ही  मायावती दलित राजनीति का चेहरा बन चुकी थीं। तीन बार भाजपा के सहयोग के अलावा एक बार वे पूर्ण बहुमत के साथ  पूरे पांच साल उ.प्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य की मुख्यमंत्री रहीं। कांशीराम के दौर में  उ.प्र की दीवारों पर तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार जैसे नारे दिखाई देते थे किंतु मायावती ने उसे हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है में बदल दिया। यही नहीं महामंत्री पद प्रख्यात अधिवक्ता सतीश चंद्र मिश्र को सौंपकर सवर्ण जातियों को लुभाने का दाँव भी चला।  2007 के विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत में उक्त नारे का खासा योगदान रहा। उनकी पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौर में शासन और प्रशासन  में यादवों के बढ़ते वर्चस्व के कारण न सिर्फ दलित अपितु  सवर्ण जातियाँ भी त्रस्त हो उठी थीं। भाजपा उस समय  पाँव जमाने की कोशिश में थी। इसलिए लोगों ने मायावती को सत्ता सौंप दी।   उन्होंने कानून व्यवस्था में तो काफी सुधार किया किंतु  जाति की राजनीति से बाहर आने का साहस नहीं दिखा सकीं जिसका खामियाजा अगले चुनाव में भुगतना पड़ा। उसके बाद अखिलेश यादव पांच साल मुख्यमंत्री बने और 2017 में भाजपा ने योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व  पहली बार स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बनाई जो आज भी सत्ता में है। सत्ता से हटने के बाद मायावती और बसपा दोनों का ग्राफ गिरता गया। आज की स्थिति में वे न सांसद हैं न विधायक। जिस उ.प्र में उनकी तूती बोलती थी वहाँ बसपा का मात्र एक विधायक है जबकि लोकसभा में  नामलेवा तक नहीं बचा। एक समय था जब मायावती के आगे  टिकिट मांगने वालों की भीड़ नजर आती थी जिनमें सवर्ण भी होते थे किंतु जैसे - जैसे भाजपा आगे बढ़ी बसपा सिमटती गई। 2019 में तो मायावती ने सपा तक से समझौता किया और उन मुलायम सिंह यादव के प्रचार हेतु मैनपुरी गईं जिनके साथ  सांप - नेवले जैसी दुश्मनी थी। लेकिन अवसरवादी राजनीति और अविश्वसनीय स्वभाव के कारण वे राजनीतिक बिरादरी में अलग - थलग पड़ गईं। बीते कुछ सालों से तो उनकी चर्चा भी कम होने लगी थी। भाजपा ने दलित वोट बैंक को अपनी तरफ खींचकर मायावती को राजनीतिक तौर पर दिवालिया बना दिया। उनके ऊपर भाजपा की बी टीम होने का आरोप भी लगने लगा। अपना उत्तराधिकारी किसी दलित को चुनने की बजाय उन्होंने अपने भतीजे आनंद को आगे बढ़ाया जिससे नाराज होकर अनेक कद्दावर दलित नेता पार्टी छोड़ गए। लेकिन अपने शक्की स्वभाव के चलते उन्होंने आंनद को भी पार्टी और परिवार से निकाल बाहर किया। अपने जन्मदिन पर बड़ी रैली आयोजित कर उपहार बटोरने वाली मायावती काफी समय से अकेलापन झेल रही थीं। इसी बीच  उ.प्र में चंद्रशेखर आजाद नामक दलित नेता की भीम आर्मी ने बसपा के कमजोर होने से उत्पन्न  दलित नेतृत्व के खालीपन को भरने के प्रयास किये। हालांकि उनका प्रभाव पश्चिमी उ.प्र तक ही सीमित है किंतु लोकसभा चुनाव जीतकर वे लोकसभा में दलित चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने मायावती के साथ जुड़ने की काफी पहल की किंतु उनकी तरफ से ठण्डा रुख दिखाए जाने के कारण चंद्रशेखर अपना जनाधार बढ़ाने में लग गए। राजनीतिक विश्लेषक भी मायावती को डूबते जहाज का कप्तान मानने लगे थे। लेकिन गत दिवस कांशीराम की पुण्यतिथि पर उन्होंने लखनऊ में  विशाल रैली का आयोजन कर न सिर्फ बसपा की ताकत का प्रदर्शन किया अपितु भतीजे आनंद को एक बार फिर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर अनिश्चितता समाप्त कर दी। उक्त रैली में मायावती ने कांग्रेस और सपा पर तीखे हमले किये। उनके निशाने पर भाजपा भी रही लेकिन मुख्यमंत्री योगी की प्रशंसा कर सपा और कांग्रेस को उन्हें भाजपा की बी टीम प्रचारित करने का अवसर भी दे दिया। मायावती ने रैली की तैयारी जिस गुपचुप तरीके से की उससे साफ हो गया कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई हैं। हालांकि ये सवाल भी उठने लगा कि क्या बसपा और मायावती का सुनहरा दौर वापस लौटेगा क्योंकि अब न तो कांशीराम का नाम भुनाने लायक बचा और न ही उनकी अपनी विश्वसनीयता । भतीजे आनंद को तो खुद उन्होंने ही विवादास्पद बना दिया था जो भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हैं। सही बात ये है कि अपने गुरु के विपरीत मायावती ने बसपा को दलित समुदाय की बजाय अपनी निजी जागीर बना लिया। यही वजह है कि पार्टी के वफादार रहे नेता छोड़कर चले गए। ये देखते हुए कल की रैली के बाद बसपा उ.प्र की राजनीति में क्या दोबारा अपने पैर जमा सकेगी और मायावती फिर दलित राजनीति का  चेहरा बन सकेंगी, इस सवाल का उत्तर फिलहाल कोई नहीं दे सकता क्योंकि 2007 में  उ.प्र की मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका नाम  प्रधानमंत्री बनने वाले नेताओं के तौर पर लिया जाने लगा था। लेकिन आज वे किसी सदन की सदस्य तक नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 October 2025

इजराइल का अस्तित्व स्वीकारने में ही मुस्लिम देशों की भलाई


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने हमास और इजराइल के बीच  युद्ध रुकवाकर शांति प्रक्रिया शुरू करवा दी। इसके अंतर्गत इजरायल  गाजा पट्टी के उन इलाकों को खाली कर देगा जिन पर उसने कब्जा कर लिया। साथ ही दोनों एक दूसरे के बंधक छोड़ेंगे। हालांकि ये शर्त इजराइल को महंगी पड़ेगी क्योंकि उसके पास हमास के बड़े आतंकी हैं जिन्हें रिहा करना आदमखोर शेर को पिंजरे से निकालने जैसा होगा। लेकिन उस पर अपने बंधकों को छुड़ाने का जो घरेलू दबाव है उसकी वजह से वह हमास के आतंकियों को रिहा करने बाध्य है। ट्रम्प के अनुसार अंतर्गत इजरायल गाजा से अपने सैनिक  हटाना शुरू कर देगा।  गाजा के पुनर्निर्माण को लेकर  ट्रम्प से हमास कितना सहमत होगा ये कह पाना फिलहाल कठिन है क्योंकि अमेरिका गाजा पट्टी को दुबई जैसा विकसित करने की योजना बना रहा है। वह चाहता है   हमास गाजा का शासन छोड़कर आतंकी गतिविधियां बन्द कर दे। उल्लेखनीय है  गाजा पट्टी का प्रशासन 2007 में हमास ने हथिया लिया था । कहने को तो वह एक राजनीतिक आंदोलन था लेकिन ईरान सहित कुछ अन्य मुस्लिम देशों की मदद से उसने आतंकवादियों जैसा ढांचा खड़ा कर लिया। और इसीलिए वह इजराइल के अस्तित्व को ही मान्य नहीं करता। 7 अक्टूबर 2023 को उसने इजराइल पर सैकड़ों राकेट और ड्रोन से बड़ा हमला किया। उसके लड़ाकों ने इजराइल में घुसकर बड़े पैमाने पर हत्याएं कीं और  बड़ी संख्या में इजराइली नागरिकों को बंधक बनाकर ले गए। अपनी अभेद्य सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगने से  प्रधानमंत्री नेतन्याहू सवालों के घेरे में आ गए। हमास ने वह दुस्साहस क्यों और कैसे किया इसका खुलासा भी जल्द हो गया। दरअसल  इजराइल और सऊदी अरब के बीच  समझौते की बातचीत अंतिम चरण में थी। उसके पहले संयुक्त अरब अमीरात  से भी इजराइल का समझौता हो चुका था। ऐसे में ईरान और तुर्किये को लगा कि मुस्लिम संपन्न देश इजराइल से  रिश्ते बना लेंगे तो  फिलीस्तीनियों का अपना देश बनाने का सपना हमेशा के लिए टूटकर रह जाएगा। इसीलिए उनने हमास को उकसाकर  हमला करवा दिया। प्रतिक्रियास्वरूप नेतन्याहू ने जो पलटवार किया उसके कारण सऊदी अरब और इजराइल के बीच की बातचीत तो रुक गई लेकिन इजराइल हमास को नेस्तनाबूत करने के लिए गाजा को तबाह  करने पर आमादा हो उठा। उसके बाद जो हुआ वह पूरी दुनिया ने देखा। गाजा तक ही सीमित न रहकर लेबनान और यमन पर भी इजराइल ने  कहर बरपाया जहाँ हिजबुल्ला और हूथी जैसे इस्लामिक आतंकी संगठन उस पर हमले कर रहे थे। गाजा को इजराइल के हमलों ने खंडहर में बदल दिया। हजारों लोग मारे गए। लाखों बेघर हो गए। भोजन - पानी, दवाओं का टोटा हो गया। बिना इलाज के हजारों बच्चे चल बसे। कुल मिलाकर गाजा पट्टी पूरी तरह से तबाह हो गई ।  लेकिन हमास को ईरान और टर्की से अस्त्र - शस्त्रों की आपूर्ति जारी रहने से वह घुटने टेकने तैयार नहीं हुआ। और तब इजराइल ने ईरान को निशाना बनाया। कहने को तो उसके परमाणु बम बनाने की क्षमता को नष्ट करना था किंतु असली उद्देश्य उसे हमास की मदद से रोकना था। अमेरिका ने भी ईरान के परमाणु संयंत्रों पर अपने सबसे शक्तिशाली बमवर्षकों से हमला किया। जिसके बाद उसके तेवर ढीले पड़े और गाजा में युद्धविराम की पटकथा तैयार होने लगी। इस बीच अनेक यूरोपीय देशों ने फिलीस्तीन को स्वतंत्र देश की  मान्यता देकर इजराइल पर दबाव बनाना चाहा किंतु नेतन्याहू विचलित नहीं हुए। फिलीस्तीन के अस्तित्व को स्वीकार करने वे किसी भी स्थिति में राजी नहीं हैं। संरासंघ महासभा में उनका हालिया भाषण इसका प्रमाण है। लेकिन नोबल शांति पुरस्कार के लिए हाथ पाँव मार रहे ट्रम्प ने इजराइल पर दबाव बनाकर युद्धविराम के लिए राजी कर लिया। नेतन्याहू इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं थे। उनकी दूरगामी योजना हमास को समूल नष्ट करने के अलावा गाजा पर पूर्ण आधिपत्य बनाये रखने की थी। लेकिन ट्रम्प के मन में गाजा को लेकर कुछ अलग ही पक रहा है और इसीलिये वे हमास को धमकाने के साथ ही इजराइल पर भी दबाव बनाने से बाज नहीं आये।  जबकि इजराइली प्रधानमंत्री सांप का फन कुचलने के लिए अड़े थे। ट्रम्प जिस तरह की कूटनीति का प्रदर्शन कर रहे हैं उसमें गंभीरता का अभाव होने के साथ ही विश्वसनीयता की भी कमी है।  अपनी सनक में वे इजराइल की सुरक्षा की अनदेखी  कर रहे हैं। हमास को अधमरा छोड़ना अमेरिका के लिए भी अच्छा नहीं क्योंकि ईरान और तुर्किये जैसे  संरक्षक उसे फिर ताकतवर बनाये बिना नहीं रहेंगे। इजराइल पर आरोप लगता है कि उसने गाजा में निरपराध नागरिकों को मारा , हजारों बच्चे अनाथ हो गए।  लेकिन इसका असली दोषी तो हमास है जिसने दो साल पहले इजराइल पर अकारण हमला कर उसे उकसाया था। बेहतर तो यही होता कि गाजा को इजराइल के हवाले कर दिया जाए जिससे भविष्य में  युद्ध की चिंगारी फिर न भड़के। मुस्लिम देशों को ये स्वीकार करना ही होगा कि इजराइल एक वास्तविकता है और उसके साथ बेहतर रिश्ते बनाना उनके लिए भी फायदेमंद है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 October 2025

कौन किसकी बी टीम कहना मुश्किल




     ममता बैनर्जी ने काँग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस बनाते समय  कहा था कि प. बंगाल में  कांग्रेस , सीपीएम की बी टीम बन गई है। दरअसल जब उसके  गुर्गे ममता पर हमले करते , तब कांग्रेस ने उनका बचाव नहीं किया।  नाराज होकर उन्होंने ऐलान किया था कि वामपंथी सरकार के रहते राइटर्स बिल्डिंग में कदम नहीं रखेंगी। और उन्होंने प्रतिज्ञा पूरी भी की। 

     वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वामपंथियों और कांग्रेस दोनों की जमीन खिसकती चली गई। 2021 के विधानसभा चुनाव में  दोनों एक सीट  भी नहीं जीते जबकि  मिलकर चुनाव लड़े थे। कांग्रेस की दुर्गति आश्चर्यजनक नहीं थी क्योंकि उसकी ताकत तो ममता ही थीं।  राष्ट्रीय राजनीति में ममता भाजपा विरोधी गठबंधन में होने पर भी बंगाल में कांग्रेस और   वामपंथियों  को बर्दाश्त करने राजी नहीं थीं जिसका लाभ उठाकर भाजपा  3 से 73 विधायकों तक पहुँच गई। 

     पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तो एक सीट जीत भी गई लेकिन वामपंथी शून्य पर ही अटके रहे। कांग्रेस  नेता अधीररंजन चौधरी तक हार गए जिन्हें  क्रिकेटर युसुफ पठान ने मात दे दी। दरअसल ममता नहीं चाहती थीं कि उनके राज्य से कोई नेता राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे। 

     इस प्रकार प. बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन जनता ने नकार दिया। साथ ही ममता ने सीपीएम  और कांग्रेस की संगामित्ती का जो आरोप लगाया था वह भी प्रमाणित हो गया। हालांकि आज की स्थिति में ये कहना कठिन है उन दोनों में कौन ए टीम है और कौन बी? 

    रोचक बात  है कि  ममता के विरुद्ध एकजुट कांग्रेस और वामपंथी केरल में एक दूसरे के खिलाफ  हैं। यहाँ तक कि वायनाड में राहुल और प्रियंका वाड्रा तक के विरुद्ध वामपंथियों ने प्रत्याशी उतारा। 

   वैसे ए और बी टीम का आरोप - प्रत्यारोप  अब सामान्य है। कांग्रेस की नजर में अरविंद केजरीवाल, असदुद्दीन ओवैसी , और अब प्रशांत किशोर भाजपा की बी टीम हैं। अखिलेश यादव के अनुसार मायावती भी उसी श्रेणी में आती हैं। हाल ही में तमिलनाडु में अभिनेता विजय की जो पार्टी खड़ी हो रही है उसे स्टालिन भाजपा द्वारा प्रायोजित बताते हैं। केरल में वामपंथियों की नजर में भाजपा , कांग्रेस की बी टीम बनकर चुनाव लड़ती है। 

    बिहार में होने जा रहे  विधानसभा चुनाव में  रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया। पहले कहा गया  वे राजद और कांग्रेस के  वोट बैंक तोड़ेंगे। इसीलिए उनको भाजपा की बी टीम प्रचारित किया गया। वे जिस तरह से तेजस्वी पर आक्रामक थे उससे उक्त आरोप को बल मिला।  इसीलिए उन्होंने भाजपा को भी घेरना शुरू कर दिया। प्रशांत किसकी नाव डुबोते हैं ये तो नतीजे बतायेंगे किंतु फिलहाल उन्होंने मुकाबला रोचक बना दिया है। 

     वैसे बी टीम का आरोप जिस पार्टी पर लगता है उसके प्रति मतदाता सशंकित हो उठता है। तेलंगाना  में ओवैसी की पार्टी जोर - शोर से उतरी। कांग्रेस को लगा कि उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को खींचा तो बाजी हाथ आते रह जाएगी। हालांकि ओवैसी और भाजपा के बीच नजदीकियां कल्पना से परे हैं परंतु मुस्लिमों के मन में ये बात बैठने के कारण ओवैसी को बंगाल और उ.प्र में अपेक्षित सफलता नहीं मिली जबकि वहाँ मुस्लिम वोट बैंक बहुत है। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने सीमांचल की  सीटें जीतकर  राजद और कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया । उसके बाद से उत्तर भारत में उनको मुस्लिम समर्थन मिलना कम हो गया क्योंकि भाजपा की बी टीम का ठप्पा वे हटा नहीं पा रहे। 

     बात केजरीवाल की करें तो कांग्रेस उन्हें भाजपा की बी टीम कहती है क्योंकि उन्होंने हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव में  लड़कर कांग्रेस को हरवा दिया जबकि लोकसभा चुनाव दोनों मिलकर लड़े थे। दिल्ली में कांग्रेस का सफाया करने में  उनका प्रमुख योगदान है । 2014 में जब विधानसभा में किसी को बहुमत नहीं मिला तब भाजपा बहुमत से  चार सीट दूर रह गई। कांग्रेस के आठ विधायक थे। ऐसे में उसने केजरीवाल को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवाने के कुछ महीनों बाद उस सरकार को गिरवा दिया।  नये चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी की सुनामी आ गई। कांग्रेस शून्य और भाजपा तीन पर सिमट गई। भाजपा ने तो आखिर 10 साल बाद केजरीवाल  से सत्ता छीन ली लेकिन कांग्रेस शून्य पर ही अटकी है। इसके बाद केजरीवाल ने कांग्रेस को भाजपा की बी टीम कहकर भविष्य में एकला चलो का ऐलान कर दिया।  कांग्रेस को भी ये शिकायत  है कि गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में उसकी फजीहत आम आदमी पार्टी के कारण हुई। 

     कुल मिलाकर वर्तमान दौर में कौन किसके साथ और कौन विरोध में है कहना मुश्किल है। जो चंद्राबाबू नायडू 2019 में एनडीए छोड़ गए थे वे 2024 में फिर टीम मोदी का हिस्सा बन गए और मुख्यमंत्री बनने के साथ ही केंद्र सरकार को सहारा दे रहे हैं। इसी तरह इंडिया गठबंधन के संयोजक नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव के पहले फिर भाजपा में आ गए। अब तो महाराष्ट्र में शरद पवार तक पर भाजपा की  बी टीम होने के आरोप लगने लगे हैं। 

     सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि शिवसेना जैसी हिंदूवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन हो सकता है तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। इन दिनों बिहार में महागठबंधन के नेता के तौर पर तेजस्वी का बोलबाला है किंतु राहुल गाँधी  उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से कन्नी काट जाते हैं। इसी तरह इंडिया गठबंधन में होने के बाद भी ममता बैनर्जी श्री गाँधी को प्रधानमंत्री का चेहरा मानने से इंकार करती रही हैं। 
   राजनीतिक गठबंधन और उनके अंतर्विरोध पहले भी देखने मिलते रहे लेकिन सिद्धांतों की धज्जियां इस तरह उड़ाए जाने का जो खेल बीते एक - डेढ़ दशक से देखने मिल रहा है उसके कारण  राजनीति और राजनेताओं की विश्वसनीयता दो कौड़ी की होकर रह गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

विश्व बैंक का अनुमान अर्थव्यवस्था की मज़बूती का संकेत


विश्व बैंक ने इस वर्ष भारत की जीडीपी 6.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई है।  इस वृद्धि का कारण जीएसटी  में किया गया सुधार माना जा रहा है। हालांकि अमेरिका द्वारा बढ़ाए टैरिफ के परिप्रेक्ष्य में उसने विकास दर 6.3 रहने कीआशंका भी व्यक्त की है। दूसरी तरफ भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर माह के अंत में आयोजित बैठक के बाद जीडीपी के 6.8 प्रतिशत तक  जाने की बात कही है। किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन अनेक मापदंडों पर होता है। उनमें उपभोक्ता बाजार की हलचल के साथ ही लोगों की बचत करने की क्षमता भी कसौटी पर रहती है। अन्य बातों पर भी गौर किया जाता है। उस लिहाज से देश का आर्थिक वातावरण आश्वस्त करने वाला है। जीएसटी की दरों में कमी ने उपभोक्ता और उत्पादक दोनों को उत्साहित किया जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण नवरात्रि के दौरान बाजारों में टूटी  ग्राहकों की भीड़ से मिला। जीएसटी की दरों में कमी के बावजूद सितंबर माह की वसूली का आंकड़ा गत वर्ष से 9 प्रतिशत बढ़कर 1.89 लाख करोड़ पहुँच गया जिससे स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार के उक्त निर्णय का सकारात्मक असर हुआ। अर्थव्यवस्था की मजबूती का दूसरा बड़ा पैमाना है किसी देश के लोगों की घरेलू बचत और निवेश की क्षमता। उस लिहाज से भी स्थिति आशाजनक प्रतीत होती है। कोविड के बाद आम भारतीय द्वारा की जाने वाली घरेलू बचत में जबरदस्त गिरावट आ गई। विशेष रूप से मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग परेशानी महसूस करने लगा था। कोविड काल में केंद्र सरकार ने रेलवे  टिकिट में मिलने वाली वरिष्ट नागरिकों की छूट भी बंद कर दी। उद्योग - व्यापार जगत भी लॉक डाउन के दौरान हुए घाटे से नहीं उबर पा रहा था। केंद्र सरकार के  कर संग्रह में काफी कमी आ गई जिसके कारण वह राहत देने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। लोकसभा चुनाव के बाद  मोदी सरकार ने जब अपनी तीसरी पारी शुरू की तब तक जीएसटी संग्रह रफ्तार पकड़ चुका था। प्रत्यक्ष करों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने से खजाना भरने लगा। इसी का परिणाम इस साल के बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख किये जाने के रूप में देखने मिला । जिसकी वजह से मध्यमवर्गीय नौकरपेशा और व्यापारी वर्ग को राहत मिली।  अगली सौगात मिली जीएसटी दरों में कटौती से। ये कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 50 फीसदी का भारी -  भरकम टैरिफ थोपकर भारतीय उद्योगों की कमर तोड़ने का जो दांव चला उससे हमारे निर्यात को बड़े नुकसान का खतरा पैदा हो गया। लेकिन जीएसटी कटौती से वह डर कम होने लगा । सितंबर खत्म होते ही दीपावली की खरीदी शुरू होने के साथ ही विवाह सीजन का असर भी बाजार में दिखने लगा। सबसे ज्यादा चर्चा में है शेयर बाजार की गतिविधियां जो ट्रम्प टैरिफ की मार से सहमा - सहमा नजर आ रहा था।  विदेशी निवेशकों की बिकवाली से अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट का खतरा महसूस किया जाने लगा। लेकिन जल्द ही उसने अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ ली। इसका कारण भारतीय निवेशकों द्वारा अपनी बचत को पूँजी बाजार में लगाना है। म्यूचल फंड के प्रति बढ़ता आकर्षण इस बात का प्रमाण है कि मध्यम वर्ग में बचत की क्षमता बढ़ी है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे काले बादल छँट गए हैं ।  ट्रम्प ने जो चक्रव्यूह रचा उससे बाहर निकलना और अमेरिका के विकल्प के तौर पर  भारतीय उत्पादों के लिए नये बाजार ढूँढना आसान नहीं है । लेकिन धैर्य और बुद्धिमत्ता के समन्वय से इसमें सफलता मिली। शेयर बाजार में बीते कुछ दिनों से आ रही उछाल इसका प्रमाण है। यही वजह है कि विश्व बैंक जैसी अमेरिकी प्रभाव वाली संस्था तक भारत की विकास दर के बारे में उत्साहजनक अनुमान लगाने के लिए बाध्य हुई। जाहिर है ट्रम्प को ये अनुमान रास नहीं आयेगा जो कि हमारी अर्थव्यवस्था को मरी हुई बताने की मूर्खता कर बैठे। यदि अनिश्चित वैश्विक हालातों में हमारी जीडीपी यदि 6 प्रतिशत के आसपास भी रही तब भी वह अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों से अधिक ही रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 October 2025

बिहार का फैसला जातिगत समीकरण ही करेंगे


आखिरकार बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई। 6 और 11 नवम्बर को मतदान के बाद 14 नवम्बर को मतगणना होगी।  इस चुनाव पर पूरे देश की नजर लगी है क्योंकि  लोकसभा चुनाव में आशानुरूप नतीजे नहीं मिलने के कारण भाजपा का उत्साह ठंडा हो गया। अबकी बार 400 पार का नारा कारगर नहीं हो पाया और भाजपा 240 पर सिमटकर रह गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर भी अटकलें लगने लगीं। हालांकि चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन की वजह से उनकी ताजपोशी तो हो गई किंतु विपक्ष को ये कहने का मौका मिल गया कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। वाराणसी में उनकी जीत के अंतर में भारी कमी आने से भी विपक्ष का हौसला बुलन्द था। केंद्र सरकार के स्थायित्व पर भी संदेह व्यक्त किया जाने लगा। लेकिन कुछ माह बाद हुए जम्मू कश्मीर और हरियाणा में विधानसभा चुनाव में समीकरण उलट गए। जम्मू कश्मीर में तो खैर भाजपा को सत्ता मिलने की संभावना नहीं थी । बावजूद इसके  जम्मू अंचल में अच्छी खासी सफलता हासिल कर वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में स्थापित हो गई। लेकिन हरियाणा में उसने सभी अनुमानों को झुठलाते हुए लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर कांग्रेस को मात दे दी। लोकसभा चुनाव के झटके से उबरने में भाजपा को इस जीत ने काफी मदद की। और यही वजह रही कि उसके कुछ माह बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में वह जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी जहाँ  लोकसभा चुनाव में उसे बड़ा झटका लगा था। लेकिन विधानसभा चुनाव में वह अकेले ही बहुमत के करीब जा पहुंची और अपना मुख्यमंत्री भी बनवाने में सफल रही। यद्यपि उसी के साथ हुए झारखंड के चुनाव में बाजी उसके हाथ नहीं आई किंतु महाराष्ट्र की धमाकेदार जीत ने श्री मोदी को एक बार फिर सर्वाधिक लोकप्रिय नेता साबित कर दिया। भाजपा के सामने अगली चुनौती दिल्ली की थी जो आम आदमी पार्टी  का मजबूत किला बन चुकी थी। उसने दिल्ली में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए अरविंद केजरीवाल के वर्चस्व को ध्वस्त कर दिया। कांग्रेस को लगातार तीसरी बार शून्य की शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली की जीत से भाजपा का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया। और इसीलिए बिहार में भी वह आक्रामक होकर मुकाबला करने तैयार है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि पर कोई दाग नहीं होने के बाद भी उनका आकर्षण पहले जैसा नहीं रहा। बीते एक दशक में उन्होंने जिस तरह पाला बदलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाए रखी उसकी वजह से उनकी विश्वसनीयता खत्म हो चुकी थी। लेकिन उनके मुकाबले में विपक्ष  द्वारा चूंकि लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव को पेश किया जा रहा है इसलिए कमजोर दिख रहे नीतीश की स्वीकार्यता फिर से कायम होने लगी। भाजपा ने भी उन्हीं को आगे रखने की रणनीति अपनाकर अनिश्चितता को खत्म कर दिया। हालांकि राजनीति के जानकार खुलकर कह रहे हैं कि एनडीए को बहुमत मिलने पर भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनायेगी  और नीतीश को केंद्र सरकार में स्थान दिया जाएगा। इस चुनाव को रोचक बना दिया है पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने। बीते दो - तीन साल से वे जन सुराज पार्टी बनाकर बिहार में गाँव - गाँव घूमकर बिहार की बदहाली के लिए लालू प्रसाद यादव के साथ ही नीतीश को भी आड़े हाथ ले रहे हैं। तेजस्वी को नौ वीं फेल प्रचारित करने का उनका दांव काफी लोकप्रिय हो चला है। लेकिन वे भाजपा और काँग्रेस को भी नहीं बख्श रहे। उनकी प्रचार शैली में नयापन है। सुशिक्षित वर्ग में उनके व्यक्तित्व की चर्चा तो तो बहुत है लेकिन उनकी कोशिशें वोट में कितनी परिवर्तित होंगी इस पर सभी की निगाहें हैं क्योंकि बिहार की जमीनी हकीकत के जानकार अभी भी इस बात के प्रति आश्वस्त हैं कि अंततः बिहार का चुनाव जातिगत समीकरणों में ही उलझा रहेगा। इसी आधार पर जो ताजा संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार तो एनडीए दिन ब दिन मजबूत हो रहा है। नीतीश की पार्टी जनता दल ( यू ) भी 2020 से बेहतर प्रदर्शन करेगी ।  वहीं भाजपा ने बिहार में अपना जनाधार तेजी से बढ़ाया है। जहाँ तक बात महागठबंधन की है तो लालू राज की भयावह यादों के अलावा कांग्रेस का कमजोर संगठन उसके लिए समस्या बने हुए हैं। ऊपर से प्रशांत किशोर ने तेजस्वी  की छवि को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है। हालांकि वे भाजपा और नीतीश के मतों में भी सेंध लगाकर उलटफेर  करने के प्रयास में हैं किंतु अंततः बिहार का फैसला जातिगत वोटबैंक से ही होगा। महागठबंधन को अपने मुस्लिम - यादव गठजोड़ पर भरोसा है तो एनडीए को सवर्ण और अन्य पिछड़ी जातियों सहित दलितों का।  प्रत्याशियों के नाम सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी। इस चुनाव में राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता भी कसौटी पर है  जिनके वोट चोरी अभियान का फिलहाल तो असर नहीं दिख रहा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 October 2025

ज़हर ही शुद्ध बचा बाकी सभी में ज़हर की मिलावट


आम बोलचाल में दवा और दारू का उल्लेख एक साथ होता है। शायद इसीलिए हमारे देश में धन कमाने की वासना में डूबे कतिपय नरपिशाच दवा और दारू दोनों में ज़हर घोलने से बाज नहीं आते। ज़हरीली शराब पीकर हजारों नशैलची दोबारा होश में नहीं आ सके। किसी का मरना निःसंदेह दुखद होता है। और यदि वह अनजाने में जहर खाकर मौत के मुँह में चला जाए तो दुख और भी बढ़ जाता है। लेकिन कोई उसे बिना बताये ज़हर देकर मरने को मजबूर करे तो ऐसा करने वाला हत्यारा ही कहलाएगा। हालांकि कड़वी सच्चाई ये है कि जहरीली शराब पीकर मरने वालों के प्रति समाज में अपेक्षाकृत कम सहानुभूति देखने मिलती है। इसका कारण शराबखोरी के प्रति सम्मान न होना है। लेकिन इसके उलट जब जहरीली दवाई से लोगों की जान जाती है तब दुख, चिंता और गुस्सा खुलकर सामने आता है। उस पर भी यदि जहरीली दवाई मासूम बच्चों की ज़िंदगी छीन ले तब हर उस व्यक्ति अथवा व्यवस्था के प्रति घृणा उत्पन्न होती है जो उसके लिए जिम्मेदार हो। इसका ताजा उदाहरण म.प्र में ज़हरीले कफ सिरप से 16 बच्चों की मौत है।  राजस्थान में भी 3 बच्चों के मरने की जानकारी आई है। तमिलनाडु की निजी दवा कंपनी द्वारा बनाये गए कफ सिरप का उपयोग जिस चिकित्सक के पर्चे के आधार पर हुआ वह शासकीय सेवा में रहते हुए  निजी दवाखाना भी चलाता है जिसके साथ संलग्न दवा दुकान उसी के परिजन (शायद बेटे) की है। म.प्र में जिन 16 बच्चों की मृत्यु हुई वे छिंदवाड़ा और उसके निकटवर्ती इलाकों के थे। मौतों का कारण उजागर होते  ही सरकारी तंत्र कुंभकर्णी निद्रा से जागा। कफ सिरप के ज़हरीले होने की जाँच रिपोर्ट भी म.प्र के पहले तमिलनाडु से आने से संदेह हुआ कि प्रदेश में बैठे भ्रष्ट लोगों ने प्राथमिक स्तर पर दोषियों को बचाने का भरसक प्रयास किया। हालांकि हल्ला मचने पर  दवा और दोषी कंपनी पर प्रतिबंध लग गया।  केंद्र सरकार ने  देश भर में बिक रहे  कफ सिरप  की जाँच हेतु कहा है । छिंदवाड़ा के आरोपी चिकित्सक की गिरफ्तारी और निलंबन जैसे कदम भी उठा लिए गए। जाँच की प्रक्रिया भी चल पड़ी है जिसकी रिपोर्ट आते  तक लोग इस दर्दनाक घटना को या तो भूल चुके होंगे या ऐसे ही किसी और हादसे के हो जाने से इस कांड पर विस्मृति की धूल जम जाएगी। दुख के  साथ ही आश्चर्य का विषय है कि जो दवा इंसान को  बीमारी से राहत देकर स्वस्थ करने के लिए बनाई जाती हो,  वही उसकी मौत का कारण बन जाए। और ऐसा यदि समय - समय पर होता रहे तो फिर ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिन लोगों को मौत के इस व्यापार को रोकने का दायित्व सौंपा गया  वे या तो पूरी तरह लापरवाह हैं या खुद भी उसमें हिस्सेदार । वरना क्या कारण था कि कफ सिरप में जानलेवा पदार्थ निर्धारित मात्रा से कई गुना अधिक मिला होने के बावजूद उसकी जांच का  ध्यान नहीं रखा गया। बहरहाल 16 नौनिहालों के प्राण लेने के बाद म.प्र से लेकर तमिलनाडु तक में हड़कंप है। सरकारी तंत्र अपनी चिर परिचित  मुस्तैदी का दिखावा कर रहा है। दोषियों को कड़ा दंड दिये जाने की घोषणाओं के जरिये जनता के गुस्से को शांत करने का प्रयास भी हो रहा है। इसी के समानांतर दोषियों को बचाने की व्यूह रचना भी  सरकारी तंत्र के भीतर रची जा रही होगी क्योंकि ज़हर के कारोबार में केवल एक या कुछ लोग नहीं बल्कि बहुत सारे लोगों की अघोषित हिस्सेदारी होगी। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि  खाने पीने की चीजों के अलावा दवा  और  दारू तक में  मनुष्य को नुकसान पहुंचाने वाली चीजें मिलाई जाती हैं किंतु ये आज तक नहीं सुनाई दिया कि नकली या मिलावटी ज़हर भी मिलता है जिसके खाने से  किसी की मौत न होती हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 October 2025

अमेरिका के चंगुल में फंस रहा बांग्ला देश


कुछ लोग बांग्ला देश में हुए सत्ता परिवर्तन को भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के विरुद्ध युवाओं के आक्रोश का परिणाम मानकर भारत में भी वैसा ही होने की उम्मीदें पाल रहे थे । लेकिन बांग्ला देश सरकार के मुख्य सलाहकार मो. युनुस और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच हालिया मुलाकात में हुए फैसले ने शेख हसीना के तख्ता पलट के असली कारण का पर्दाफाश कर दिया। जिसके अनुसार बांग्ला देश द्वारा सेंट मार्टिन द्वीप अमेरिका को 99 वर्ष के लिए पट्टे पर दिया जाएगा। हसीना सरकार पर ट्रम्प  पहले कार्यकाल में इसके लिए दबाव बनाते रहे। उनके बाद बने  राष्ट्रपति बाइडेन ने भी कोशिश की । जब सफलता हाथ नहीं लगी तब  अराजक युवा आंदोलन खड़ा कर  उन्हें देश छोड़ने बाध्य किया गया। उस घटनाचक्र में अमेरिका की भूमिका और स्पष्ट हो गई जब उसके यहाँ  निर्वासित जीवन काट रहे नोबल विजेता मो. युनुस को बांग्ला देश की अंतरिम सरकार का सलाहकार बनाकर उसने सत्ता अप्रत्यक्ष तौर पर अपने हाथ में ले ली। ट्रम्प दोबारा सत्ता में लौटे तो शुरुआत में उन्होंने बांग्ला देश पर कड़ा रुख दिखाया क्योंकि युनुस चीन की तरफ झुकते दिखे  किंतु अचानक वे ट्रम्प के शिकंजे में फंसने लगे जिसका परिणाम उक्त द्वीप को अमेरिका के हवाले करने संबंधी समझौता है। चूंकि बांग्ला देश में निर्वाचित संसद है नहीं लिहाजा युनुस सेना की सहमति लेकर उक्त फैसले पर मोहर लगवा लेंगे । 9 वर्ग किलोमीटर में फैला ये द्वीप बांग्लादेश से लगभग 8 किलोमीटर दूर है जिसके दक्षिण में मलक्का जलडमरूमध्य से दक्षिण पूर्व एशिया और चीन से आने वाले मालवाहक जहाज गुजरते हैं। विश्व का लगभग 30% माल परिवहन यहीं  से होता है। ट्रम्प इस पर रिसॉर्ट का निर्माण कर बंगाल की खाड़ी में अमेरिका की उपस्थिति बढ़ाना चाहते  हैं। ट्रम्प की योजना में 120 कि.मी पूर्व में मुख्य भूमि पर स्थित कॉक्स बाजार में एक  नौसैनिक अड्डा बनाना भी शामिल है। जहाँ बांग्लादेश चीन को दो पनडुब्बियां तैनात करने की अनुमति दे चुका था । उसके बाद गत माह अमेरिकी नौसेना ने भी बांग्ला देश के साथ बंगाल की खाड़ी में अभ्यास भी किया । इस प्रकार बांग्ला देश, चीन और अमेरिका रूपी दो पाटों के बीच फंसता नजर आ रहा है। उसकी स्थिति भी पाकिस्तान जैसी होती जा रही है जो चीन का पालतू होने के साथ ही अमेरिका के सामने भी दुम हिलाने मजबूर है। सेंट मार्टिन पर रिसार्ट बनाकर अमेरिका दक्षिण एशिया में केवल चीन के साथ ही भारत पर भी  दबाव बनाना चाहेगा जो उसके कहे अनुसार चलने  राजी नहीं है। बांग्ला देश का यह निर्णय उसकी प्रभुसत्ता के लिए  खतरा बनेगा क्योंकि अमेरिका उस द्वीप तक ही सीमित नहीं रहेगा। हाल ही में एक अमेरिकी जासूस की ढाका के होटल में  रहस्यमय मौत के बाद जिस तरह उसकी लाश अमेरिकी दूतावास ने गायब करवाई उससे  अमेरिका की किसी गुप्त कार्ययोजना का संदेह पुख्ता हुआ। कहते हैं उस हत्या में चीन का हाथ था। असल में अफगानिस्तान से पैर उखड़ने के बाद अमेरिका को भी एशिया में  कोई अड्डा  चाहिए था। पाकिस्तान से उसने बलूचिस्तान की अपार खनिज संपदा हासिल करने का समझौता तो कर लिया किंतु चीन पर दबाव बनाने के लिए वह भरोसे लायक नहीं है। भारत की रूस से नजदीकियां भी ट्रम्प को अखर रही हैं। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह भारत की विदेश नीति को स्वतंत्र बनाया उससे अमेरिका को लगने लगा कि वह चीन के विरुद्ध भारत को अपना औजार नहीं बना सकेगा क्योंकि दोनों ब्रिक्स में साथ मिलकर अमेरिका के प्रभुत्व को तोड़ने प्रयासरत हैं। ये सब देखते हुए ट्रम्प ने बांग्ला देश पर दबाव बनाया जो हसीना के तख्ता पलट के बाद से ही अस्थिरता में फंसा है।  रिसार्ट के बहाने वहाँ अमेरिका का कदम रखना चीन के  लिए खतरे की घंटी तो है ही किंतु भारत को भी  सावधान रहना होगा। अमेरिका मो. युनुस को कितने दिन ढोएगा ये कहना भी कठिन है क्योंकि अंततः वहाँ चुनाव होंगे ही। हसीना की अनुपस्थिति में सत्ता कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं के हाथ आने का खतरा है। अमेरिका इसे शायद ही पसंद करेगा । ऐसे में वहाँ नई ताकतें उभर सकती हैं। ये भी संभव है कि सेंट मार्टिन सौदे को रोकने चीन ,  बांग्ला देश में अपने समर्थकों के जरिये अस्थिरता पैदा कर अंतरिम सरकार पर तत्काल चुनाव करवाने का दबाव  बनवाए । कुल मिलाकर शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद भी बांग्ला देश में स्थिरता आने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। मो. युनुस को अमेरिका की मदद से सत्ता तो मिल गई किंतु अब वह उसकी कीमत मांग  रहा है जिसका भुगतान बांग्ला देश को महंगा पड़ेगा क्योंकि चीन भी अमेरिका को अपने करीब अड्डा बनाने में रोड़े अटकाए बिना नहीं रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 October 2025

देश की छवि खराब कर अपना नुकसान कर रहे राहुल



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जब भारत की अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बताया तब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने उनकी बात का समर्थन किया था। ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए टैरिफ पर भी श्री गाँधी केन्द्र सरकार पर हमलावर रहे। लेकिन गत दिवस कोलंबिया दौरे में अपने एक भाषण में उन्होंने भारत में लोकतंत्र को खतरे में बताकर एक बार फिर अपने पद की गरिमा गिराई। यही नहीं तो  एक बार फिर दोहराया कि नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के परिणामस्वरूप भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। वे इतने पर ही नहीं रुके अपितु रास्वसंघ और भाजपा की भी आलोचना कर बैठे। श्री गाँधी ने ऐसा पहली बार नहीं किया। अपनी गोपनीय विदेश यात्राओं को छोड़कर अन्य सभी में वे इसी तरह भारत की छवि खराब करते आये हैं। लेकिन ऐसा करने से उनकी अपनी प्रतिष्ठा पर भी आंच आती है। देश में लोकतंत्र कमजोर होता तब श्री गाँधी इतना बोलने का साहस नहीं जुटा पाते। ये बात अलग है कि देश में उनकी बातों को लोग गंभीरता से नहीं लेते। इसका कारण उनके बयानों में हलकापन होना है। भाजपा विरोधी चंद यू ट्यूबर पत्रकार उनकी राजनीतिक जड़ें मजबूत  करने का प्रायोजित कार्यक्रम कितना भी चलाएं किंतु श्री गाँधी में आयु का अर्धशतक पार करने के बाद भी  नेता प्रतिपक्ष लायक परिपक्वता का अभाव होने से वे अपने प्रति विश्वास अर्जित नहीं कर पा रहे। नशीली दवाओं के कारोबार के लिए कुख्यात कोलंबिया जैसे देश में वे किस उद्देश्य से गए ये भी बड़ा सवाल है क्योंकि वहाँ की सत्ता तक  माफिया के दबाव में रहती है। ऐसे देश में जहाँ लंबे समय तक तानाशाही रही और आज भी  लोकतंत्र की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, वहाँ जाकर श्री गाँधी द्वारा भारत में लोकतंत्र के लिए खतरे की बात कहना उनकी राजनीतिक समझ पर संदेह को और पुख्ता करने के लिए पर्याप्त है। एक लैटिन अमेरिकी देश में बैठकर रास्वसंघ की आलोचना करने का क्या औचित्य था ये भी समझ से परे है। भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में भी उन्होंने जो कहा वह विरोधाभासी था। मसलन उन्होंने स्वीकार किया कि भारत में आर्थिक विकास हुआ है किंतु नोटबंदी और जीएसटी से उद्योग - व्यापार को नुकसान हुआ जबकि सच्चाई ये है कि उन दोनों के लागू होने के बाद थोड़े समय तक आर्थिक जगत में अनिश्चितता का माहौल जरूर दिखा किंतु आज भारत  दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के साथ ही अपनी शर्तों पर काम करने का माद्दा रखता है। ट्रम्प द्वारा बनाये गये दबाव का जिस साहस के साथ सामना किया गया उसने भारत की छवि एक मजबूत देश की बना दी है। अमेरिका सोचता था कि वे नरेंद्र मोदी को झुका लेंगे किंतु अब उसके उलट भारत ने दुनिया भर में व्यापार की संभावनाएं तलाशकर नये समझौते करते हुए अमेरिका को ठेंगा दिखा दिया। ऐसे में  श्री गाँधी विदेश जाकर अपने देश की आलोचना कर कुछ सुर्खियां भले  बटोर लें किंतु देश के भीतर उसकी विपरीत  प्रतिक्रिया होती है। उनके सलाहकारों की क्षमता पर भी संदेह होता है जो श्री गाँधी की विदेश यात्राओं का आयोजन करते हैं । प्रधानमंत्री श्री मोदी आज दुनिया भर में एक प्रभावशाली नेता के तौर पर प्रतिष्ठित हैं। देश के भीतर भी उनकी लोकप्रियता कायम है। उनकी कार्यक्षमता उदाहरण बन गई है। विश्व राजनीति में भारत की अग्रणी भूमिका की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। देश में राजनीतिक स्थिरता है। सरकार ठोस निर्णय ले रही है। जीएसटी दरों में कमी इसका उदाहरण है जिसके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में भारी उछाल आया। शेयर बाजार में घरेलू निवेशकों की बढ़ती संख्या मजबूत आर्थिक स्थिति का संकेत है। ये सब इसीलिए संभव है क्योंकि देश में लोकतंत्र सुचारु रूप से चल रहा है। ये देखते हुए विदेशों में जाकर देश की नकारात्मक छवि बनाना बेहद गैर जिम्मेदाराना है। इससे उनको और कांग्रेस दोनों को नुकसान होता है। लेकिन पता नहीं क्यों वे इसे समझ नहीं पाते।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 1 October 2025

संदर्भ:- रास्वसंघ के 100 वर्ष : मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है...




     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी पर मैं संघ के सभी विरोधियों के प्रति हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ जिनकी तीखी आलोचना और हरसंभव विरोध के बावजूद यह संगठन सभी बाधाओं को पार करता हुआ दूसरी सदी में प्रविष्ट हो चुका है। 

    संघ से असहमति का स्वागत है, उसकी विचारधारा का विरोध करना भी अपराध नहीं है किंतु ऐसा करने वालों को चाहिए वे संघ की विकास यात्रा का गहराई से अध्ययन करें कि आखिर वे कौन से कारण रहे जिनके बल पर यह संगठन 100 वर्ष की आयु के बाद भी युवावस्था जैसे उत्साह और ऊर्जा के साथ अपने निर्धारित ध्येय पथ पर बढ़ते रहने प्रतिबद्ध  है। 

    बाप कमाई के नाम पर देश के मालिक बने बैठे रहने वालों को  हाशिये पर धकेलकर यदि देश का मानस संघ की ओर आकृष्ट हो रहा है तो वह इसलिए कि संघ की यह सफलता उसके असंख्य स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम से अर्जित आप कमाई है। 

    आरोप लगाना बहुत आसान है। क्षेत्र ,जाति और भाषा के नाम पर भावनाएं भड़काकर सत्ता हासिल करना भी बड़ा चमत्कार नहीं किंतु समूचे देश में केवल भारत माता की जय कहने वाले निःस्वार्थ कार्यकर्ता तैयार करने जैसे अनुष्ठान को सौ वर्ष तक निरंतर संचालित करना ऐसा विश्व कीर्तिमान है जिसे तोड़ना तो क्या उसकी बराबरी करना तक किसी के लिए संभव नहीं है। 

    संघ के विरोधियों और आलोचकों के प्रति मेरे मन में कृतज्ञता का भाव इसीलिए है क्योंकि वे संघ के मार्ग में जो बाधाएं उत्पन्न करते हैं उनसे उसका साहस बढ़ता है। इसका प्रमाण उस पर लगाए गए हर प्रतिबंध के बाद उसका और शक्तिशाली होकर उभरना है। 

    सही बात ये है कि संघ के प्रति वही लोग दुर्भावना रखते हैं जिन्हें इस देश पर मंडराते खतरों का आभास नहीं है। ऐसे सभी लोग देशविरोधी हैं ये कहना तो उचित नहीं किंतु वे अज्ञानवश ही सही किंतु देशविरोधी शक्तियों के षडयंत्र में फंसकर ऐसा करने की गलती करते हैं। 

    संघ के जन्म से पूर्व सोवियत संघ बना और साम्यवादी विचारधारा पर आधारित सत्ता अस्तित्व में आई जो राष्ट्रवाद की विरोधी थी । लेकिन वह टिक नहीं सकी और उसी सदी में बिखरकर रह गई। भारत की आजादी के बाद दूसरी सबसे बड़ी साम्यवादी व्यवस्था चीन में कायम हुई लेकिन आज वह भी पूंजीवादी ढांचे में ढल चुकी है। भारत में समाजवादी चिंतन की धारा ने भी लंबे समय तक अपना प्रभाव दिखाया किंतु अपने अंतर्विरोधों की वजह से भटकाव का शिकार होकर रह गई। 

    आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस भी बीते 78 वर्षों में विचार रूपी महासागर से निकलकर एक परिवार की निजी संपत्ति बनकर रह गई। सीमित दायरे और संकुचित सोच वाले अनेक संगठन और राजनीतिक दल भी राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे किंतु कुछ दूर चलकर ही दम तो़ड़ बैठे या फिर अपना विस्तार नहीं कर सके। 

इन सबके विपरीत संघ ने देश के हर हिस्से में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की है। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्षेत्र में संघ अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है जिसे व्यापक स्वीकृति और समर्थन मिलने का ही परिणाम है कि केन्द्र सहित अनेक राज्यों में उसकी विचारधारा से प्रेरित व्यक्ति सत्ता में विराजमान हैं। 

     संघ के विराट रूप ने देश और दुनिया को चमत्कृत किया तो उसके पीछे असंख्य स्वयंसेवकों का त्याग, समर्पण और अथक परिश्रम है। यह उपलब्धि सतत साधना का प्रतिफल है। इसकी निरंतरता देखते हुए ये विश्वास प्रबल होता है कि भारत माता का गौरवगान करने वाले इस संगठन को चिरंजीवी होने का दैवीय आशीर्वाद प्राप्त है । 
     महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने 21 वीं सदी में भारत के पुनरुत्थान की भविष्यवाणी की थी । संघ ने उसे साकार करने का जो संकल्प लिया वह सफल होता प्रतीत होने लगा है। 

    आज संघ देश ही नहीं अपितु दुनिया भर में शक्तिशाली और समृद्ध भारत की छवि प्रस्तुत करने में जुटा हुआ है। इसके सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगे हैं। 

     लेकिन 100 वर्ष पूर्ण करना संघ यात्रा का एक पड़ाव मात्र है। ये कभी न रुकने वाला कार्य है जिसका ध्येय वाक्य है:-

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें। 

संघ विरोधियों से अपेक्षा भी है और अनुरोध भी कि वे अपना अभियान यथावत जारी रखें क्योंकि देश विदेश में इससे इस संगठन से जुड़े असंख्य स्वयंसेवक इससे बजाय निराश होने के दोगुने उत्साह से भारत माँ की सेवा में जुट जाते हैं:-

मशहूर शायर बशीर बद्र ने शायद इसीलिए लिखा था:-

मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है, 
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

बिहार में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण सही साबित हुआ

बिहार में  सघन पुनरीक्षण के पश्चात मतदाता सूचियों के प्राथमिक प्रकाशन में 65 लाख नाम काटे जाने पर विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया था। प्रजातंत्र खतरे में होने का रोना रोया गया, भाजपा पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को भी कठघरे में खड़ा किया जाने लगा। पुनरीक्षण रुकवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक के दरवाजे खटखटाए गए । उसने विपक्ष की कुछ बातों को तो माना किंतु पुनरीक्षण पर रोक लगाने से साफ मना करते हुए कहा कि समय - समय पर  मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करने का अधिकार चुनाव आयोग को है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की तो सारी राजनीति ही वोट चोरी पर आकर टिक गई। बिहार में तेजस्वी यादव के साथ उन्होंने पूरे प्रदेश में यात्रा भी निकाली। पत्रकार वार्ताओं में उन्होंने अतीत में मतदाता सूचियों में हुई गड़बड़ियों की जानकारी देते हुए चुनाव आयोग को घेरने का भरसक प्रयास किया जो उनके मुताबिक हाइड्रोजन बम था। हालांकि उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अधिकांश प्रेक्षकों ने भी माना कि  बिहार में राहुल और तेजस्वी द्वारा निकाली गई वोट चोरी यात्रा का कोई असर जनमानस पर नहीं पड़ा। प्राथमिक मतदाता सूची में 65 लाख काटने के बाद एक माह का समय दिया गया आपत्ति करने और नये नाम जुड़वाने के लिए। उक्त अवधि बीत जाने के बाद गत दिवस अंतिम प्रकाशन भी हो गया। उसके अनुसार अब 48 लाख मतदाताओं के नाम कट गए वहीं 14 लाख नये जुड़े भी। अब इसी सूची पर चुनाव होंगे जिसकी अधिसूचना जल्द जारी हो जाएगी। इस पुनरीक्षण का उद्देश्य बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के नाम मतदाता सूचियों से अलग करना था। अंतिम सूची के अनुसार  नेपाल की तराई से सटे सीमांचल कहलाने वाले इलाके की सीटों में बड़ी संख्या में मतदाता घटे जिनमें घुसपैठियों के अलावा मृत और बाहर जा चुके मतदाता ही हैं। राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा ही हुआ। 65 लाख नाम काटे जाने पर हायतौबा मचाने वाले नेता अंतिम सूची में भी 48 लाख नाम कट जाने के बाद कुछ कहने की स्थिति में नहीं बचे। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर काटे गए 65 लाख नामों को सार्वजनिक करते हुए एक माह का समय दिया था । लेकिन अब जबकि 48 लाख मतदाताओं के नाम कट गए तब ये मान लेना होगा कि पुनरीक्षण अपने मकसद में सफ़ल हो गया। अब चुनाव आयोग पूरे देश में इसकी प्रक्रिया प्रारंभ करने जा रहा है। विशेष सघन पुनरीक्षण का विरोध करने वालों के पास भी अब कोई आधार नहीं बचा है। मतदाता सूचियों में गड़बड़ी होती आई है क्योंकि उनको बनाने का तरीका घिसा - पिटा था। सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण आधार कार्ड आसानी से बन जाते हैं। इसी तरह फर्जी राशन कार्ड बनवाने में भी घूसखोरी चलती रही। जब सघन जाँच हुई तो करोड़ों फर्जी राशन कार्ड और रसोई गैस कनेक्शन पकड़ में आये। आयकर देने वालों के गरीबी रेखा कार्ड भी बने जिसके आधार पर वे मुफ्त राशन और 5 लाख तक की  चिकित्सा का लाभ उठाते रहे। शिकंजा कसा जाने पर  इन सबसे परदा हटा। असल में मतदाता सूचियों  को बनाने का जिम्मा भी उसी सरकारी मशीनरी के पास होता है जो उक्त धांधलेबाजी के लिए जिम्मेदार है। सबसे खतरनाक बात ये है कि देश भर में फैले अवैध घुसपैठिये सरकारी विभागों में पोल का लाभ उठाकर मतदाता बनकर चुनावों को प्रभावित करने लगे। बिहार के सीमांचल में पिछले विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के पांच  मुस्लिम विधायक जीते थे। इन सीटों पर गैर मुस्लिम का जीतना असंभव हो गया जिसका कारण घुसपैठियों का मतदाता बन जाना था। नई सूची में यहाँ की सूची में बड़ी संख्या में नाम कटे हैं। इन सबके कारण ही पूरे देश में मतदाता सूचियों की सघन जाँच कर अवांछित नाम हटाये जाने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। चुनाव आयोग को चाहिए वह बिना डरे युद्ध स्तर पर इस कार्य को आगे बढ़ाये। राजनीतिक दलों का भी दायित्व है कि वे शासकीय कर्मचारियों का सहयोग करते हुए मतदाता सूचियों में व्याप्त विसंगतियाँ दूर करने सहायक बनें। देश हित में ये बेहद जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी