आखिरकार बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई। 6 और 11 नवम्बर को मतदान के बाद 14 नवम्बर को मतगणना होगी। इस चुनाव पर पूरे देश की नजर लगी है क्योंकि लोकसभा चुनाव में आशानुरूप नतीजे नहीं मिलने के कारण भाजपा का उत्साह ठंडा हो गया। अबकी बार 400 पार का नारा कारगर नहीं हो पाया और भाजपा 240 पर सिमटकर रह गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर भी अटकलें लगने लगीं। हालांकि चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन की वजह से उनकी ताजपोशी तो हो गई किंतु विपक्ष को ये कहने का मौका मिल गया कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। वाराणसी में उनकी जीत के अंतर में भारी कमी आने से भी विपक्ष का हौसला बुलन्द था। केंद्र सरकार के स्थायित्व पर भी संदेह व्यक्त किया जाने लगा। लेकिन कुछ माह बाद हुए जम्मू कश्मीर और हरियाणा में विधानसभा चुनाव में समीकरण उलट गए। जम्मू कश्मीर में तो खैर भाजपा को सत्ता मिलने की संभावना नहीं थी । बावजूद इसके जम्मू अंचल में अच्छी खासी सफलता हासिल कर वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में स्थापित हो गई। लेकिन हरियाणा में उसने सभी अनुमानों को झुठलाते हुए लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर कांग्रेस को मात दे दी। लोकसभा चुनाव के झटके से उबरने में भाजपा को इस जीत ने काफी मदद की। और यही वजह रही कि उसके कुछ माह बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में वह जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी जहाँ लोकसभा चुनाव में उसे बड़ा झटका लगा था। लेकिन विधानसभा चुनाव में वह अकेले ही बहुमत के करीब जा पहुंची और अपना मुख्यमंत्री भी बनवाने में सफल रही। यद्यपि उसी के साथ हुए झारखंड के चुनाव में बाजी उसके हाथ नहीं आई किंतु महाराष्ट्र की धमाकेदार जीत ने श्री मोदी को एक बार फिर सर्वाधिक लोकप्रिय नेता साबित कर दिया। भाजपा के सामने अगली चुनौती दिल्ली की थी जो आम आदमी पार्टी का मजबूत किला बन चुकी थी। उसने दिल्ली में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए अरविंद केजरीवाल के वर्चस्व को ध्वस्त कर दिया। कांग्रेस को लगातार तीसरी बार शून्य की शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली की जीत से भाजपा का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया। और इसीलिए बिहार में भी वह आक्रामक होकर मुकाबला करने तैयार है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि पर कोई दाग नहीं होने के बाद भी उनका आकर्षण पहले जैसा नहीं रहा। बीते एक दशक में उन्होंने जिस तरह पाला बदलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाए रखी उसकी वजह से उनकी विश्वसनीयता खत्म हो चुकी थी। लेकिन उनके मुकाबले में विपक्ष द्वारा चूंकि लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव को पेश किया जा रहा है इसलिए कमजोर दिख रहे नीतीश की स्वीकार्यता फिर से कायम होने लगी। भाजपा ने भी उन्हीं को आगे रखने की रणनीति अपनाकर अनिश्चितता को खत्म कर दिया। हालांकि राजनीति के जानकार खुलकर कह रहे हैं कि एनडीए को बहुमत मिलने पर भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनायेगी और नीतीश को केंद्र सरकार में स्थान दिया जाएगा। इस चुनाव को रोचक बना दिया है पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने। बीते दो - तीन साल से वे जन सुराज पार्टी बनाकर बिहार में गाँव - गाँव घूमकर बिहार की बदहाली के लिए लालू प्रसाद यादव के साथ ही नीतीश को भी आड़े हाथ ले रहे हैं। तेजस्वी को नौ वीं फेल प्रचारित करने का उनका दांव काफी लोकप्रिय हो चला है। लेकिन वे भाजपा और काँग्रेस को भी नहीं बख्श रहे। उनकी प्रचार शैली में नयापन है। सुशिक्षित वर्ग में उनके व्यक्तित्व की चर्चा तो तो बहुत है लेकिन उनकी कोशिशें वोट में कितनी परिवर्तित होंगी इस पर सभी की निगाहें हैं क्योंकि बिहार की जमीनी हकीकत के जानकार अभी भी इस बात के प्रति आश्वस्त हैं कि अंततः बिहार का चुनाव जातिगत समीकरणों में ही उलझा रहेगा। इसी आधार पर जो ताजा संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार तो एनडीए दिन ब दिन मजबूत हो रहा है। नीतीश की पार्टी जनता दल ( यू ) भी 2020 से बेहतर प्रदर्शन करेगी । वहीं भाजपा ने बिहार में अपना जनाधार तेजी से बढ़ाया है। जहाँ तक बात महागठबंधन की है तो लालू राज की भयावह यादों के अलावा कांग्रेस का कमजोर संगठन उसके लिए समस्या बने हुए हैं। ऊपर से प्रशांत किशोर ने तेजस्वी की छवि को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है। हालांकि वे भाजपा और नीतीश के मतों में भी सेंध लगाकर उलटफेर करने के प्रयास में हैं किंतु अंततः बिहार का फैसला जातिगत वोटबैंक से ही होगा। महागठबंधन को अपने मुस्लिम - यादव गठजोड़ पर भरोसा है तो एनडीए को सवर्ण और अन्य पिछड़ी जातियों सहित दलितों का। प्रत्याशियों के नाम सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी। इस चुनाव में राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता भी कसौटी पर है जिनके वोट चोरी अभियान का फिलहाल तो असर नहीं दिख रहा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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