Wednesday, 15 October 2025

महिला पुलिस अधिकारी का आपराधिक दुस्साहस चिंता का विषय


पहले जमाने में बच्चे चोर - पुलिस नामक खेल खेलते थे। सांकेतिक तौर पर समझें तो पुलिस और चोर एक दूसरे के विपरीत कहे जाते थे। पुलिस का काम चोर को पकड़ना होता था। चोर से अभिप्राय अपराधी से है। अर्थात कानून के विरुद्ध काम करने वाले को पकड़कर सजा दिलवाना ही पुलिस  का आधारभूत कर्तव्य है। आम नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए भी उसी की ओर निहारता है। देशभक्ति - जनसेवा जैसे पवित्र ध्येय के लिए कार्यरत  पुलिस की वर्दी धारण किये हर व्यक्ति से अपराधी डरें , यह एक आदर्श स्थिति होती है किंतु दुर्भाग्य से उससे गैर कानूनी कार्य करने वालों की बजाय कानून पसंद नागरिक भयभीत होते हैं। अपराधी बेखौफ होकर घूमते हैं जबकि किसी शरीफ व्यक्ति को  थाने जाना पड़े तो वह अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार से आशंकित हो जाता है। इसका कारण पुलिस महकमे की छवि में लगे असंख्य दाग हैं जिनके चलते  वर्दीधारी व्यक्ति कानून के  रक्षक के बजाय अपराध और अपराधियों का संरक्षक नजर आने लगा है।  समाज में ये धारणा प्रचलित है कि पुलिस और अपराधियों के बीच अघोषित हिस्सेदारी है। अक्सर ये देखने में आता है कि पुलिस जिस मामले में रुचि रखती है उसमें तो त्वरित कार्रवाई होती है , अन्यथा लीपापोती करने में संकोच नहीं करती। इस संबंध में म.प्र के सिवनी जिले में बीते दिनों हुआ एक कांड चर्चा में है। वहाँ की पुलिस को खबर मिली कि जबलपुर से आ रही एक कार में हवाला कारोबारी करोड़ों रुपये नगद लेकर नागपुर जा रहे हैं।  लिहाजा सिवनी के पुलिस वाले मुस्तैद होकर उस वाहन की प्रतीक्षा करने लगे और जैसे ही वह आया उसे पकड़कर पूरी रकम जप्त कर ली। निश्चित तौर पर ये बड़ी सफलता थी जिसके लिए उनको पुरस्कृत किया जाता। लेकिन इतनी बड़ी रकम देखकर उनका ईमान डोल गया और बजाय  सरकारी खजाने में जमा किये जाने के उसकी बंदरबांट कर ली गई। कार में बैठे लोगों को बिना कार्रवाई के भगा दिया गया। लेकिन हवाला कारोबारी द्वारा इसकी शिकायत पुलिस के उच्च अधिकारियों से किये जाने के बाद  जब जाँच हुई तब एक महिला पुलिस अधिकारी और थाना प्रभारी  सहित दर्जन भर पुलिस कर्मी दोषी  पाए गए जिन पर डकैती जैसा गंभीर प्रकरण दर्ज किया गया है। इस बंदरबाँट में शामिल कुछ अन्य लोग भी महाराष्ट्र से पकड़े जा चुके हैं। पकड़ी गई  राशि का अधिकांश हिस्सा जप्त हो चुका है। जांच में नई - नई जानकारियाँ आ रही हैं जिनसे कुछ और खुलासे हो सकते हैं। बहरहाल प्रथम दृष्ट्या ये तो सामने आ ही गया कि सिवनी पुलिस ने हवाला रकम को जप्त कर दोषियों पर विधि सम्मत कारवाई करने के बजाय  उसको मिलकर हड़प लेने का फैसला किया। यदि हवाला कारोबारी हिम्मत नहीं दिखाता तब शायद तीन करोड़ की मोटी रकम का बंटवारा करने वाले  धूमधाम से दिवाली मनाने में जुट जाते। ये तंज भी सुनने मिल रहे हैं कि सिवनी के पुलिस वालों ने  पूरी रकम मिलकर डकारने का जो लालच दिखाया वह उनके गले का फंदा बन गया। यदि तीन करोड़ में कुछ बड़े वर्दीधारियों को शामिल कर लिया जाता तब सभी की शुभ दीपावली हो जाती। इस घटना से पुलिस की छवि खराब हुई ये कहने की कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि आज के युग में उसके बारे में अच्छी राय रखने वाला इंसान अपवाद स्वरूप ही मिल सकता है। आम अवधारणा यही है कि पुलिस अपराधों को रोकने के बजाय उनको संरक्षण देने में लिप्त है। लेकिन इस कांड में एक महिला अधिकारी द्वारा जप्त हुई  हवाला रकम में से आधा हिस्सा हड़प लेने से आश्चर्य हुआ क्योंकि पुलिस  में पदस्थ  महिलाएं भी इतनी दिलेरी से यदि इस तरह के आपराधिक कृत्य करेंगी तब सरकार का तो जो होना है सो होगा किंतु समाज के भविष्य को लेकर चिंता उत्पन्न होती है। हालांकि शासकीय विभागों में काम करने वाली अन्य  महिला कर्मी और अधिकारी भी घूसखोरी में पकड़ी जाती हैं किंतु संदर्भित प्रकरण की केंद्र बिंदु महिला एस. डी. ओ. पी ने जो दुस्साहस किया वह सोचने बाध्य करता है। आधी आबादी को बराबरी का दर्जा देने की मंशा हर किसी की है लेकिन वह भी यदि भ्रष्टाचार रूपी गंदे नाले में डुबकी लगाने लगी तब बच्चों को नैतिकता और ईमानदारी के संस्कार कौन देगा ये प्रश्न चिंतित करता है।  इसी के साथ आम जनता की ये टिप्पणियां भी सोचने को बाध्य कर देती हैं कि कोई नहीं फंसेगा क्योंकि सवाल वर्दी के रुतबे का भी तो है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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