विश्व बैंक द्वारा हाल ही में चालू वित्तीय वर्ष के दौरान भारत की जीडीपी में वृद्धि के अनुमान को 6.3 से बढ़ाकर 6.5 फीसदी किये जाने से ये बात स्पष्ट हो गई कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आखिर क्यों भारत पर अनाप - शनाप टैरिफ थोप रहे हैं। उल्लेखनीय है ट्रम्प ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मरी हुई बताकर उसका मजाक उड़ाया था । लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने भी उनके दावे को सही बताकर केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को गलत बताने में देर नहीं की। लेकिन जब विश्व बैंक ने जब भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफ्तार में और वृद्धि होने का अनुमान व्यक्त किया तब न तो ट्रम्प कुछ बोल सके और न ही श्री गाँधी। विश्व बैंक के बाद अब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने भारत की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि संरचनात्मक सुधारों को लेकर उसने सबको चौंकाया है। जॉर्जीवा ने यह भी कहा कि चीन की आर्थिक रफ्तार धीमी होने के विपरीत भारत प्रमुख विकास इंजन के रूप में उभर रहा है। वाशिंगटन में होने वाली मुद्रा कोष और विश्व बैंक की सालाना बैठकों से पहले की गई उक्त टिप्पणी को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का ताजा प्रमाणपत्र माना जा सकता है। मुद्रा कोष प्रमुख ने कहा कि वे भारत को उसके साहसिक सुधारों के कारण बहुत महत्व देती हैं क्योंकि उसने उन सभी को गलत साबित कर दिया जो कहते थे कि बड़े पैमाने पर डिजिटल आईडी लागू करना उसके लिए संभव नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक को राजनीतिक व्यक्ति नहीं माना जा सकता जो किसी देश की अनावश्यक प्रशंसा करें। इसी तरह विश्व बैंक भी ऐसी संस्था नहीं है जो भारत की अर्थव्यवस्था पर अतिरंजित या तथ्यहीन टिप्पणी करें। इस प्रकार जब विश्व के दो बड़े आर्थिक संस्थान भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हों तब उसकी प्रामाणिकता पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। सबसे बड़ी बात मुद्रा कोष प्रमुख द्वारा ये स्वीकार किया जाना है कि कोविड नामक महामारी के बाद वैश्विक विकास दर में गिरावट के बावजूद भारत और चीन उसे सहारा दिये हुए हैं। हालांकि चीन की विकास दर में भी कमी आई है किंतु भारत अपने बेहतर आर्थिक प्रबंधन के कारण दुनिया में आर्थिक विकास का अगुआ बन गया है। भारत की जीडीपी इस वर्ष भले ही 6.8 फीसदी न बढ़े जैसी कि भारतीय रिजर्व बैंक के अध्यक्ष ने हाल ही में उम्मीद जताई किंतु विश्व बैंक के अध्यक्ष ने भी कुछ माह पूर्व किये आकलन में संशोधन करते हुए उसे 6.5 फीसदी कर दिया जो चीन से दो गुना है, तब मुद्रा कोष प्रमुख द्वारा भारत की प्रशंसा में की गई टिप्पणी की सार्थकता स्वयंसिद्ध है। हाल ही में किये गए जीएसटी सुधारों ने उद्योग - व्यापार जगत में जिस उत्साह का संचार किया वह विश्व बैंक और मुद्रा कोष के आशावाद का आधार है। खुदरा महंगाई में कमी और रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि नहीं किया जाना भी अच्छे संकेत हैं। बाजार के उतार - चढ़ावों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का ये आकलन मायने रखता है कि ग्रामीण भारत में भी अब उन वस्तुओं की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है जो कुछ समय पहले तक शहरी जीवन शैली का हिस्सा मानी जाती थीं। यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते उपभोक्ताओं को देखकर चकित हैं। बीते वित्तीय वर्ष में प्रत्यक्ष करों में हुई वृद्धि भी जीडीपी में वृद्धि के अनुमानों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि देश आर्थिक तौर पर मजबूत है। सबसे बड़ी बात ये है कि कोरोना के बाद से जहाँ अनेक संपन्न देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट आई वहीं भारत उस संकट से उबरने के बाद तेज गति से आगे बढ़ा है। अमेरिका भी इसी से भयभीत है जिसका प्रमाण ट्रम्प द्वारा किया गया टैरिफ हमला है। उस दबाव के आगे भारत के नहीं झुकने का ही परिणाम है कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तक हमारी प्रशंसा करने प्रेरित हुए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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