पुलिस द्वारा जनता की पिटाई की खबरें तो आये दिन आया करती हैं किंतु बीते कुछ दिनों से म.प्र में जनता द्वारा पुलिस को पीटे जाने की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ी वह वर्दीधारियों के प्रति बढ़ते असंतोष का प्रतीक है या फिर अपराधियों के बेखौफ होने का , ये गंभीर विश्लेषण का विषय है। खनन माफिया और अन्य तस्करों द्वारा पुलिस बल पर वाहन चढ़ाए जाने की घटनाएं तो यदाकदा सुनाई देती थीं किंतु अब तो थानों में घुसकर जनता पुलिस वालों पर हमले कर रही है। पिछले कुछ दिनों में इसकी पुनरावृत्ति होने से ये आशंका होने लगी है कि कानून - व्यवस्था बनाने वाली इस एजेंसी का रौब - रुतबा कम होता जा रहा है। सामान्य स्थिति में अपराधियों से अपनी रक्षा के लिए साधारण नागरिक पुलिस की शरण में जाता है किंतु जब पुलिस खुद ही असुरक्षित हो जाए तब जनता की सुरक्षा कौन करेगा ये सवाल उठ खड़ा हुआ है। देश के अनेक राज्य हैं जहाँ कतिपय दबंग नेता और बाहुबलियों की जमात पुलिस वालों के गिरेबान पर हाथ डालने में नहीं हिचकिचाती। लेकिन म.प्र को शांति का टापू कहा जाता रहा है। चंबल के डकैत भी गुजरे ज़माने की चीज होकर रह गए ।हालांकि अब पूरे देश में एक जैसे अपराधों का चलन है किंतु तुलनात्मक रूप से म.प्र में कानून व्यवस्था की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर मानी जाती है। लेकिन ये भी सही है कि पुलिस का व्यवहार जनता के प्रति उतना संवेदनशील नहीं है जितनी अपेक्षा की जाती है। जुआ - सट्टा, अवैध शराब, ड्रग्स जैसे कारोबार बढ़ते जा रहे हैं। संगठित अपराध भी पूर्वापेक्षा अधिक होने लगे हैं। राजनीतिक संरक्षण भी इसका बड़ा कारण है जिसका प्रमाण निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा पुलिस वालों के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार के वाकयों से मिलता है। लेकिन अपराधी और नेता वर्दीधारियों की इज्जत उतारें तो अचरज नहीं होता क्योंकि पुलिस और इनके बीच संगामित्ती सर्वविदित है। विवाद तब होता है जब आपसी हितों में टकराव हो। लेकिन जिस थाने में जाने से आम नागरिक भयभीत हो जाता है यदि उसमें घुसकर आक्रोशित जनता पुलिस वालों की पिटाई करने जैसा दुस्साहस करने लगे तब ये मान लेना गलत नहीं होगा कि पानी नाक तक पहुँचने लगा है। हालांकि पुलिस के पास ऐसी घटनाओं से निपटने का पूरा इंतजाम और मानसिकता दोनों हैं किंतु खतरा अन्य शासकीय विभागों का भी है जिनमें व्याप्त भ्रष्टाचार से हर कोई त्रस्त है। हाल ही में हाइवे पर नकली आर. टी. ओ वालों की ट्रक ड्राइवरों द्वारा पिटाई किये जाने जैसी घटनाएं सामने आईं। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के दौरान फर्जी आर. टी ओ दस्तों ने म.प्र से गुजरने वाले अन्य राज्यों के वाहनों से जमकर अवैध वसूली की। आबकारी महकमा भी अपनी कारगुजारियों के लिए कुख्यात है। इसी तरह नगर - निगम, कलेक्ट्रेट, पंजीयन कार्यालय आदि में भ्रष्टाचार सतह पर तैरता देखा जा सकता है। जो लोग पहुँच वाले हैं उनका तो सारा काम हो जाता है। इसी तरह दलालों के जरिये भी पैसा खिलाकर लोग अपनी समस्या हल कर लेते हैं किंतु जो साधारण जन हैं उनके पास सिवाय भटकने और तिरस्कृत होने के और कोई विकल्प नहीं रहता। पुलिस थानों के हाल तो बहुत ही बुरे हैं जहाँ सामान्य तौर पर होने वाला व्यवहार किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। समूचे सरकारी तंत्र को कसौटी पर कसें तो उससे जो निराशा उत्पन्न होती है वही धीरे- धीरे आक्रोश का रूप लेती जा रही है। कहीं पुलिस वालों को दौड़ाकर पीटा जा रहा है तो कहीं थानों में घुसकर वर्दी की इज्जत तार - तार की जा रही है। इसका कारण भ्रष्टाचार और अत्याचार दोनों की पराकाष्ठा है। सिवनी जिले में हवाला के करोड़ों रुपयों की जप्ती में हुई बंदरबांट के उजागर होने के बाद भी पुलिस विभाग में खुलेआम पैसा खाए जाने के प्रकरण सामने आये हैं। ऐसे में यदि जनता का धैर्य जवाब देने लगे तो फिर हालात अराजक होते देर नहीं लगेगी क्योंकि जिन लोगों पर समाज की सुरक्षा का भार है जब वे ही असुरक्षित हो गए तब जनता का क्या होगा? थानों या सरकारी कार्यालयों सहित किसी भी शासकीय कर्मी पर हमला केवल कानून - व्यवस्था का उल्लंघन नहीं अपितु समाज की बदलती मनोवृत्ति का प्रारंभिक संकेत भी है। यद्यपि इस तरह की घटनाओं के पीछे अपराधी तत्व एवं समाजविरोधी शक्तियों का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता किंतु समुचित ध्यान नहीं दिया गया तब कानून को अपने हाथ में लेने वाले फिल्मी दृष्य वास्तविकता में बदलते देर नहीं लगेगी। सरकार चला रहे नेता और उनके मातहत काम करने वाली नौकरशाही को संदर्भित घटनाओं का संज्ञान लेकर समाज में व्याप्त गुस्से को दूर करने के प्रभावशाली कदम उठाने चाहिए । वरना देशभक्ति जनसेवा जैसे ध्येय वाक्य की आड़ लेकर अत्याचार करने वालों की बची खुची धाक भी मिट्टी में मिल जाएगी, साख तो वे बहुत पहले गँवा चुके हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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