Wednesday, 8 October 2025

विश्व बैंक का अनुमान अर्थव्यवस्था की मज़बूती का संकेत


विश्व बैंक ने इस वर्ष भारत की जीडीपी 6.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई है।  इस वृद्धि का कारण जीएसटी  में किया गया सुधार माना जा रहा है। हालांकि अमेरिका द्वारा बढ़ाए टैरिफ के परिप्रेक्ष्य में उसने विकास दर 6.3 रहने कीआशंका भी व्यक्त की है। दूसरी तरफ भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर माह के अंत में आयोजित बैठक के बाद जीडीपी के 6.8 प्रतिशत तक  जाने की बात कही है। किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन अनेक मापदंडों पर होता है। उनमें उपभोक्ता बाजार की हलचल के साथ ही लोगों की बचत करने की क्षमता भी कसौटी पर रहती है। अन्य बातों पर भी गौर किया जाता है। उस लिहाज से देश का आर्थिक वातावरण आश्वस्त करने वाला है। जीएसटी की दरों में कमी ने उपभोक्ता और उत्पादक दोनों को उत्साहित किया जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण नवरात्रि के दौरान बाजारों में टूटी  ग्राहकों की भीड़ से मिला। जीएसटी की दरों में कमी के बावजूद सितंबर माह की वसूली का आंकड़ा गत वर्ष से 9 प्रतिशत बढ़कर 1.89 लाख करोड़ पहुँच गया जिससे स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार के उक्त निर्णय का सकारात्मक असर हुआ। अर्थव्यवस्था की मजबूती का दूसरा बड़ा पैमाना है किसी देश के लोगों की घरेलू बचत और निवेश की क्षमता। उस लिहाज से भी स्थिति आशाजनक प्रतीत होती है। कोविड के बाद आम भारतीय द्वारा की जाने वाली घरेलू बचत में जबरदस्त गिरावट आ गई। विशेष रूप से मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग परेशानी महसूस करने लगा था। कोविड काल में केंद्र सरकार ने रेलवे  टिकिट में मिलने वाली वरिष्ट नागरिकों की छूट भी बंद कर दी। उद्योग - व्यापार जगत भी लॉक डाउन के दौरान हुए घाटे से नहीं उबर पा रहा था। केंद्र सरकार के  कर संग्रह में काफी कमी आ गई जिसके कारण वह राहत देने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। लोकसभा चुनाव के बाद  मोदी सरकार ने जब अपनी तीसरी पारी शुरू की तब तक जीएसटी संग्रह रफ्तार पकड़ चुका था। प्रत्यक्ष करों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने से खजाना भरने लगा। इसी का परिणाम इस साल के बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख किये जाने के रूप में देखने मिला । जिसकी वजह से मध्यमवर्गीय नौकरपेशा और व्यापारी वर्ग को राहत मिली।  अगली सौगात मिली जीएसटी दरों में कटौती से। ये कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 50 फीसदी का भारी -  भरकम टैरिफ थोपकर भारतीय उद्योगों की कमर तोड़ने का जो दांव चला उससे हमारे निर्यात को बड़े नुकसान का खतरा पैदा हो गया। लेकिन जीएसटी कटौती से वह डर कम होने लगा । सितंबर खत्म होते ही दीपावली की खरीदी शुरू होने के साथ ही विवाह सीजन का असर भी बाजार में दिखने लगा। सबसे ज्यादा चर्चा में है शेयर बाजार की गतिविधियां जो ट्रम्प टैरिफ की मार से सहमा - सहमा नजर आ रहा था।  विदेशी निवेशकों की बिकवाली से अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट का खतरा महसूस किया जाने लगा। लेकिन जल्द ही उसने अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ ली। इसका कारण भारतीय निवेशकों द्वारा अपनी बचत को पूँजी बाजार में लगाना है। म्यूचल फंड के प्रति बढ़ता आकर्षण इस बात का प्रमाण है कि मध्यम वर्ग में बचत की क्षमता बढ़ी है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे काले बादल छँट गए हैं ।  ट्रम्प ने जो चक्रव्यूह रचा उससे बाहर निकलना और अमेरिका के विकल्प के तौर पर  भारतीय उत्पादों के लिए नये बाजार ढूँढना आसान नहीं है । लेकिन धैर्य और बुद्धिमत्ता के समन्वय से इसमें सफलता मिली। शेयर बाजार में बीते कुछ दिनों से आ रही उछाल इसका प्रमाण है। यही वजह है कि विश्व बैंक जैसी अमेरिकी प्रभाव वाली संस्था तक भारत की विकास दर के बारे में उत्साहजनक अनुमान लगाने के लिए बाध्य हुई। जाहिर है ट्रम्प को ये अनुमान रास नहीं आयेगा जो कि हमारी अर्थव्यवस्था को मरी हुई बताने की मूर्खता कर बैठे। यदि अनिश्चित वैश्विक हालातों में हमारी जीडीपी यदि 6 प्रतिशत के आसपास भी रही तब भी वह अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों से अधिक ही रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment