Saturday, 18 October 2025

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई संधि की पोल खुली

ऑपरेशन सिंदूर के बाद हाल ही में  पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक संधि हुई जिसमें ये प्रावधान है कि उनमें से किसी एक पर भी हमला दोनों पर माना जाएगा । अर्थात दूसरा भी उसके बचाव में आ खड़ा होगा। भारत में मोदी सरकार के विरोधियों ने फ़ौरन मोर्चा खोलते हुए कहना शुरू कर दिया कि उसकी विदेश नीति विफल साबित हुई क्योंकि भारत और सऊदी अरब एक दूसरे के काफी करीब आ गए थे। स्मरणीय है जिस दिन पहलगाम में आतंकी हमला हुआ उस दिन  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब में ही थे और अपनी यात्रा अधूरी छोड़कर दिल्ली लौटे। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका ने जिस तरह पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखा वह कोई नई बात नहीं थी किंतु एक - दो दशक में भारत - अमेरिकी संबंधों में काफी मधुरता आने के कारण वाशिंगटन का बदला हुआ रुख चौंकाने वाला अवश्य था। हालांकि इसका कारण भारत के मिसाइल हमले में पाकिस्तान के जिन सुरक्षा केंद्रों को नुकसान पहुंचा उनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसमें परमाणु अस्त्र रखे हुए हैं जो दरअसल पाकिस्तान के न होकर अमेरिका के हैं। इसीलिये युद्ध रुकते ही अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ भागे - भागे पाकिस्तान आये। इसकी पुष्टि इस बात से भी हुई कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख मुनीर को अपने साथ बिठाकर भोजन करवाया। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ से ज्यादा महत्व भी ट्रम्प आजकल मुनीर को दे रहे हैं। चूँकि भारत पर दबाव बनाने की हर कोशिश में वे विफल साबित हुए इसलिए उन्होंने सऊदी अरब को पाकिस्तान के साथ उक्त सन्धि करने प्रेरित किया जो अमेरिका का परम मित्र है। यहाँ ये भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की सेना का इस्तेमाल अरब देश पहले भी करते आये हैं। अनेक सेवानिवृत सैन्य अधिकारियों की सेवाएं  दूसरे इस्लामिक देशों ने समय - समय पर लीं। पिछले दिनों  कतर में  मिसाइलें दागकर इसराइल द्वारा हमास के कुछ नेताओं को मारे जाने को भी सऊदी अरब और पाकिस्तान में हुई संधि का एक कारण माना गया। लेकिन भारत का उससे चिंतित होना स्वाभाविक था।  सऊदी अरब अपनी अपार तेल संपदा के कारण अरब जगत का मुखिया माना जाता है। मुसलमानों का प्रमुख धर्मस्थल मक्का चूँकि इसी देश में है इसलिए भी इस्लामिक जगत में सऊदी अरब को बड़े भाई का दर्जा मिला हुआ है। हालांकि उसकी अमेरिका परस्ती से कई मुस्लिम देश उससे खुन्नस खाते हैं किंतु इसके बाद भी उसकी अहमियत बरकरार बनी हुई है। ऐसे में पाकिस्तान और उसके बीच हुई उक्त संधि ने भारत को सोचने के लिए बाध्य कर दिया। ये वही सऊदी अरब है जिसने श्री मोदी को अपना सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया। चूँकि अमेरिका  भारत के प्रति कठोर रुख दिखाने पर उतारू है इसलिए आम धारणा ये बनी कि सऊदी अरब और पाकिस्तान की नजदीकी में  ट्रम्प की भूमिका रही होगी। हालांकि भारत ने इस संधि पर कोई खास ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे विश्वास था कि सऊदी अरब कभी भी पाकिस्तान की तरफ से हमारे साथ जंग नहीं करेगा। वैसे इस संधि की पोल जल्द ही खुल गई जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच चल रही मौजूदा जंग में सऊदी अरब न तो युद्धविराम करवाने आगे आया और न ही पाकिस्तान के साथ खड़े होने की हिम्मत ही दिखा सका। इससे साफ हो गया कि वह सन्धि पत्र मढ़वाकर दीवार पर टांगने लायक ही है। अफ़ग़ानिस्तान की सैन्य शक्ति पाकिस्तान की तुलना में काफी कम है । विशेष रूप से वायुसेना के मामले में अफगानिस्तान उससे पीछे है।। लेकिन लड़ाई में अस्त्र - शस्त्र  के साथ ही जिस हौसले और हिम्मत की जरूरत पड़ती है उस मामले में अफगानी लड़ाके पाकिस्तानी सेना पर भारी पड़ते हैं। वैसे भी पाकिस्तान की सेना अफ़ग़ानिस्तान के अलावा बलूचिस्तान में भी उलझी हुई है। ऐसे में यदि सऊदी अरब इस लड़ाई में पाकिस्तान के साथ खड़ा हो जाता तो तालिबान सरकार पर दबाव बनता किंतु अब तक तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इस जंग का हश्र क्या होगा क्या ये कहना मुश्किल है किंतु सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ हुई संधि के अनुरूप अब तक चूँकि कोई कदम नहीं उठाया इसलिए कहा जा सकता कि इस संधि से भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं है।


 - रवीन्द्र वाजपेयी
   

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