आम बोलचाल में दवा और दारू का उल्लेख एक साथ होता है। शायद इसीलिए हमारे देश में धन कमाने की वासना में डूबे कतिपय नरपिशाच दवा और दारू दोनों में ज़हर घोलने से बाज नहीं आते। ज़हरीली शराब पीकर हजारों नशैलची दोबारा होश में नहीं आ सके। किसी का मरना निःसंदेह दुखद होता है। और यदि वह अनजाने में जहर खाकर मौत के मुँह में चला जाए तो दुख और भी बढ़ जाता है। लेकिन कोई उसे बिना बताये ज़हर देकर मरने को मजबूर करे तो ऐसा करने वाला हत्यारा ही कहलाएगा। हालांकि कड़वी सच्चाई ये है कि जहरीली शराब पीकर मरने वालों के प्रति समाज में अपेक्षाकृत कम सहानुभूति देखने मिलती है। इसका कारण शराबखोरी के प्रति सम्मान न होना है। लेकिन इसके उलट जब जहरीली दवाई से लोगों की जान जाती है तब दुख, चिंता और गुस्सा खुलकर सामने आता है। उस पर भी यदि जहरीली दवाई मासूम बच्चों की ज़िंदगी छीन ले तब हर उस व्यक्ति अथवा व्यवस्था के प्रति घृणा उत्पन्न होती है जो उसके लिए जिम्मेदार हो। इसका ताजा उदाहरण म.प्र में ज़हरीले कफ सिरप से 16 बच्चों की मौत है। राजस्थान में भी 3 बच्चों के मरने की जानकारी आई है। तमिलनाडु की निजी दवा कंपनी द्वारा बनाये गए कफ सिरप का उपयोग जिस चिकित्सक के पर्चे के आधार पर हुआ वह शासकीय सेवा में रहते हुए निजी दवाखाना भी चलाता है जिसके साथ संलग्न दवा दुकान उसी के परिजन (शायद बेटे) की है। म.प्र में जिन 16 बच्चों की मृत्यु हुई वे छिंदवाड़ा और उसके निकटवर्ती इलाकों के थे। मौतों का कारण उजागर होते ही सरकारी तंत्र कुंभकर्णी निद्रा से जागा। कफ सिरप के ज़हरीले होने की जाँच रिपोर्ट भी म.प्र के पहले तमिलनाडु से आने से संदेह हुआ कि प्रदेश में बैठे भ्रष्ट लोगों ने प्राथमिक स्तर पर दोषियों को बचाने का भरसक प्रयास किया। हालांकि हल्ला मचने पर दवा और दोषी कंपनी पर प्रतिबंध लग गया। केंद्र सरकार ने देश भर में बिक रहे कफ सिरप की जाँच हेतु कहा है । छिंदवाड़ा के आरोपी चिकित्सक की गिरफ्तारी और निलंबन जैसे कदम भी उठा लिए गए। जाँच की प्रक्रिया भी चल पड़ी है जिसकी रिपोर्ट आते तक लोग इस दर्दनाक घटना को या तो भूल चुके होंगे या ऐसे ही किसी और हादसे के हो जाने से इस कांड पर विस्मृति की धूल जम जाएगी। दुख के साथ ही आश्चर्य का विषय है कि जो दवा इंसान को बीमारी से राहत देकर स्वस्थ करने के लिए बनाई जाती हो, वही उसकी मौत का कारण बन जाए। और ऐसा यदि समय - समय पर होता रहे तो फिर ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिन लोगों को मौत के इस व्यापार को रोकने का दायित्व सौंपा गया वे या तो पूरी तरह लापरवाह हैं या खुद भी उसमें हिस्सेदार । वरना क्या कारण था कि कफ सिरप में जानलेवा पदार्थ निर्धारित मात्रा से कई गुना अधिक मिला होने के बावजूद उसकी जांच का ध्यान नहीं रखा गया। बहरहाल 16 नौनिहालों के प्राण लेने के बाद म.प्र से लेकर तमिलनाडु तक में हड़कंप है। सरकारी तंत्र अपनी चिर परिचित मुस्तैदी का दिखावा कर रहा है। दोषियों को कड़ा दंड दिये जाने की घोषणाओं के जरिये जनता के गुस्से को शांत करने का प्रयास भी हो रहा है। इसी के समानांतर दोषियों को बचाने की व्यूह रचना भी सरकारी तंत्र के भीतर रची जा रही होगी क्योंकि ज़हर के कारोबार में केवल एक या कुछ लोग नहीं बल्कि बहुत सारे लोगों की अघोषित हिस्सेदारी होगी। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि खाने पीने की चीजों के अलावा दवा और दारू तक में मनुष्य को नुकसान पहुंचाने वाली चीजें मिलाई जाती हैं किंतु ये आज तक नहीं सुनाई दिया कि नकली या मिलावटी ज़हर भी मिलता है जिसके खाने से किसी की मौत न होती हो।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment