ममता बैनर्जी ने काँग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस बनाते समय कहा था कि प. बंगाल में कांग्रेस , सीपीएम की बी टीम बन गई है। दरअसल जब उसके गुर्गे ममता पर हमले करते , तब कांग्रेस ने उनका बचाव नहीं किया। नाराज होकर उन्होंने ऐलान किया था कि वामपंथी सरकार के रहते राइटर्स बिल्डिंग में कदम नहीं रखेंगी। और उन्होंने प्रतिज्ञा पूरी भी की।
वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वामपंथियों और कांग्रेस दोनों की जमीन खिसकती चली गई। 2021 के विधानसभा चुनाव में दोनों एक सीट भी नहीं जीते जबकि मिलकर चुनाव लड़े थे। कांग्रेस की दुर्गति आश्चर्यजनक नहीं थी क्योंकि उसकी ताकत तो ममता ही थीं। राष्ट्रीय राजनीति में ममता भाजपा विरोधी गठबंधन में होने पर भी बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों को बर्दाश्त करने राजी नहीं थीं जिसका लाभ उठाकर भाजपा 3 से 73 विधायकों तक पहुँच गई।
पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तो एक सीट जीत भी गई लेकिन वामपंथी शून्य पर ही अटके रहे। कांग्रेस नेता अधीररंजन चौधरी तक हार गए जिन्हें क्रिकेटर युसुफ पठान ने मात दे दी। दरअसल ममता नहीं चाहती थीं कि उनके राज्य से कोई नेता राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे।
इस प्रकार प. बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन जनता ने नकार दिया। साथ ही ममता ने सीपीएम और कांग्रेस की संगामित्ती का जो आरोप लगाया था वह भी प्रमाणित हो गया। हालांकि आज की स्थिति में ये कहना कठिन है उन दोनों में कौन ए टीम है और कौन बी?
रोचक बात है कि ममता के विरुद्ध एकजुट कांग्रेस और वामपंथी केरल में एक दूसरे के खिलाफ हैं। यहाँ तक कि वायनाड में राहुल और प्रियंका वाड्रा तक के विरुद्ध वामपंथियों ने प्रत्याशी उतारा।
वैसे ए और बी टीम का आरोप - प्रत्यारोप अब सामान्य है। कांग्रेस की नजर में अरविंद केजरीवाल, असदुद्दीन ओवैसी , और अब प्रशांत किशोर भाजपा की बी टीम हैं। अखिलेश यादव के अनुसार मायावती भी उसी श्रेणी में आती हैं। हाल ही में तमिलनाडु में अभिनेता विजय की जो पार्टी खड़ी हो रही है उसे स्टालिन भाजपा द्वारा प्रायोजित बताते हैं। केरल में वामपंथियों की नजर में भाजपा , कांग्रेस की बी टीम बनकर चुनाव लड़ती है।
बिहार में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया। पहले कहा गया वे राजद और कांग्रेस के वोट बैंक तोड़ेंगे। इसीलिए उनको भाजपा की बी टीम प्रचारित किया गया। वे जिस तरह से तेजस्वी पर आक्रामक थे उससे उक्त आरोप को बल मिला। इसीलिए उन्होंने भाजपा को भी घेरना शुरू कर दिया। प्रशांत किसकी नाव डुबोते हैं ये तो नतीजे बतायेंगे किंतु फिलहाल उन्होंने मुकाबला रोचक बना दिया है।
वैसे बी टीम का आरोप जिस पार्टी पर लगता है उसके प्रति मतदाता सशंकित हो उठता है। तेलंगाना में ओवैसी की पार्टी जोर - शोर से उतरी। कांग्रेस को लगा कि उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को खींचा तो बाजी हाथ आते रह जाएगी। हालांकि ओवैसी और भाजपा के बीच नजदीकियां कल्पना से परे हैं परंतु मुस्लिमों के मन में ये बात बैठने के कारण ओवैसी को बंगाल और उ.प्र में अपेक्षित सफलता नहीं मिली जबकि वहाँ मुस्लिम वोट बैंक बहुत है। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने सीमांचल की सीटें जीतकर राजद और कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया । उसके बाद से उत्तर भारत में उनको मुस्लिम समर्थन मिलना कम हो गया क्योंकि भाजपा की बी टीम का ठप्पा वे हटा नहीं पा रहे।
बात केजरीवाल की करें तो कांग्रेस उन्हें भाजपा की बी टीम कहती है क्योंकि उन्होंने हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव में लड़कर कांग्रेस को हरवा दिया जबकि लोकसभा चुनाव दोनों मिलकर लड़े थे। दिल्ली में कांग्रेस का सफाया करने में उनका प्रमुख योगदान है । 2014 में जब विधानसभा में किसी को बहुमत नहीं मिला तब भाजपा बहुमत से चार सीट दूर रह गई। कांग्रेस के आठ विधायक थे। ऐसे में उसने केजरीवाल को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवाने के कुछ महीनों बाद उस सरकार को गिरवा दिया। नये चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी की सुनामी आ गई। कांग्रेस शून्य और भाजपा तीन पर सिमट गई। भाजपा ने तो आखिर 10 साल बाद केजरीवाल से सत्ता छीन ली लेकिन कांग्रेस शून्य पर ही अटकी है। इसके बाद केजरीवाल ने कांग्रेस को भाजपा की बी टीम कहकर भविष्य में एकला चलो का ऐलान कर दिया। कांग्रेस को भी ये शिकायत है कि गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में उसकी फजीहत आम आदमी पार्टी के कारण हुई।
कुल मिलाकर वर्तमान दौर में कौन किसके साथ और कौन विरोध में है कहना मुश्किल है। जो चंद्राबाबू नायडू 2019 में एनडीए छोड़ गए थे वे 2024 में फिर टीम मोदी का हिस्सा बन गए और मुख्यमंत्री बनने के साथ ही केंद्र सरकार को सहारा दे रहे हैं। इसी तरह इंडिया गठबंधन के संयोजक नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव के पहले फिर भाजपा में आ गए। अब तो महाराष्ट्र में शरद पवार तक पर भाजपा की बी टीम होने के आरोप लगने लगे हैं।
सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि शिवसेना जैसी हिंदूवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन हो सकता है तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। इन दिनों बिहार में महागठबंधन के नेता के तौर पर तेजस्वी का बोलबाला है किंतु राहुल गाँधी उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से कन्नी काट जाते हैं। इसी तरह इंडिया गठबंधन में होने के बाद भी ममता बैनर्जी श्री गाँधी को प्रधानमंत्री का चेहरा मानने से इंकार करती रही हैं।
राजनीतिक गठबंधन और उनके अंतर्विरोध पहले भी देखने मिलते रहे लेकिन सिद्धांतों की धज्जियां इस तरह उड़ाए जाने का जो खेल बीते एक - डेढ़ दशक से देखने मिल रहा है उसके कारण राजनीति और राजनेताओं की विश्वसनीयता दो कौड़ी की होकर रह गई है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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