Saturday, 25 October 2025

भारत को बांग्लादेश और नेपाल बनाने वालों के मंसूबे सफल नहीं होंगे


भारत के दो पड़ोसी  बांग्ला देश और नेपाल में  युवा आक्रोश के परिणाम स्वरूप हुए सत्ता परिवर्तन के बाद एक वर्ग विशेष भारत में भी वैसा ही कुछ होने का सपना देखने लगा। अचानक जेन - जी नामक शब्द चर्चा में आ गया। और युवाओं से जुड़ी किसी भी बात में उसका जिक्र आम हो चला । दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी इसी तरह से हुए सत्ता परिवर्तन के बाद  कहा जाने लगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारें चूँकि जन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहीं लिहाजा युवाओं द्वारा बलपूर्वक सत्ता बदलने का दौर शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत संभवतः  श्रीलंका से हुई जहां आक्रोशित लोगों की भीड़ राष्ट्रपति भवन में जा घुसी और उसने जो किया वह अराजकता का साक्षात उदाहरण है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित तमाम सत्ताधीश विदेश भाग गए। लगभग ऐसा ही बांग्लादेश में देखने मिला जहाँ से प्रधानमंत्री हसीना भारत आ गईं और एक परिषद ने सत्ता संभाल ली जिसका मुखिया नोबल विजेता मो. युनुस को बनाया गया जो अमेरिका में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। हाल ही में नेपाल में भी जेन - जी के नेतृत्व में रातों - रात सत्ता बदलने का कारनामा हुआ। हालांकि सत्ताधारी विदेश नहीं गये और सेना  उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गई किंतु मंत्रियों की जमकर  पिटाई के अलावा  कोलंबो तथा ढाका की तरह सरकारी आवासों में घुसकर लूटपाट की गई । इन घटनाओं के बाद भारत में भी ऐसा ही कुछ होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी क्योंकि बेरोजगारी जैसी समस्या तो यहाँ भी है जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित शिक्षित युवा ही है। कोविड के बाद भी बड़ी संख्या में रोजगार छिनने की बात सामने आती रही है। इसके अलावा भी अन्य ऐसी बातें हैं जिनको लेकर युवाओं में चिंता और निराशा होने की बात उठती है। देश में अवसर नहीं होने के कारण प्रतिभाओं का विदेश पलायन भी युवाओं को उद्वेलित करता है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जब वीजा फीस में अनाप शनाप वृद्धि की तब वहाँ  पढ़ने और नौकरी करने वाले भारतीयों के सामने चिंता का पहाड़ खड़ा हो गया। सरकारी नौकरियों के घटने से भी शिक्षित युवाओं में अपने भविष्य को लेकर चिंता व्याप्त है। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए वे लोग अचानक उत्साहित हो उठे  जो निर्वाचन प्रक्रिया के जरिये देश में सत्ता हासिल करने में विफल होते रहे हैं। बांग्लादेश और नेपाल में जो कुछ हुआ उसे भारत में भी साकार करने की बातें होने लगीं। कुछ मुद्दों को छेड़कर व्यापक जनांदोलन खड़ा करने का तानाबना भी बुना जाने लगा। पिछ्ले लोकसभा चुनाव के नतीजों के अलावा कुछ राज्यों में मिली हार की खीझ खुलकर सामने आने लगी। लेकिन ऐसे लोग हमेशा की तरह भारतीय जनमानस को पढ़ने और समझने में नाकामयाब रहे और जन समर्थन नहीं मिलने से निराश भी। सही बात ये है कि बांग्लादेश और नेपाल के युवाओं ने जो उन्माद दिखाया उसने भले ही स्थापित सत्ता को उखाड़ फेंका हो किंतु  उसके बाद समुचित विकल्प नहीं मिलने से देश की हालत आसमान से टपके खजूर पर अटके जैसी होकर रह गई है। लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी बांग्लादेश में चुनाव करवाने की स्थितियाँ नहीं बन पा रहीं। मो. युनुस मूलतः वामपंथी होने से चीन समर्थक हैं किंतु उन्हें देश की बागडोर संभालने का अवसर अमेरिका की कृपा से प्राप्त हुआ। लिहाजा देश चीन और अमेरिका रूपी दो पाटों में पिसने मजबूर है। युवाओं को जिन बातों का लालच देकर तत्कालीन सत्ता के विरुद्ध हिंसक होने उकसाया गया वे सब भुला दी गईं। इसके कारण वहाँ नये सिरे से आक्रोश पनपने की खबरें आने लगीं। नेपाल में हालांकि सेना ने दो दिन में ही हालात संभालकर नई सत्ता बनवा दी लेकिन जिन नेताओं की अगुआई में युवाओं ने सत्ता उलटने का कारनामा कर दिखाया वे खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। नेपाल के घटनाक्रम को भी विदेश से प्रायोजित माना गया किंतु विशेष बात ये रही कि राजशाही को उखाड़ने में जिस युवाशक्ति ने माओवादियों का खुलकर साथ देकर चीन समर्थक सरकार बनवाई वही वामपंथी सत्ताधीशों को सड़कों पर घसीटकर पीटती देखी गई। बांग्लादेश और नेपाल में जेन - जी द्वारा किये गए सत्ता पलट के बाद भी युवाओं की आकांक्षाओं के पूरा होने की कोई संभावना दूर - दराज तक नजर नहीं आने से भारत में वैसा ही कुछ करने का मंसूबा रखने वाले  निश्चित रूप से निराश होंगे। देश के युवाओं ने ये दिखा दिया कि वे अपनी समस्याओं के हल के लिए हिंसा और अराजकता  की बजाय लोकतांत्रिक तौर - तरीकों में ही विश्वास रखते हैं। बिहार चुनाव के पहले  चुनाव व्यवस्था के प्रति अविश्वास की भावना भड़काकर पूरे देश को आंदोलित करने का जो प्रयास किया गया उसे अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिलने से स्पष्ट हो गया कि देश में लोकतंत्र जनता के मन में बसा है और वह सत्ता का चयन के लिए अराजकता की बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही पसंद करती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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