शराब राज्य सरकारों का खजाना भरने का प्रमुख जरिया है। इसीलिये वे इस पर रोक लगाने से पीछे हट जाती हैं। हालांकि बिहार, गुजरात, मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप में पूरी तरह से शराबबंदी है।वहीं मणिपुर के कुछ जिलों में आंशिक प्रतिबंध है। लेकिन शराब पीने के शौकीन पड़ोसी राज्य में जाकर गला तर कर लेते हैं। कुछ राज्य इसी वजह से शराबबंदी करने के बाद उसे वापस लेने मजबूर हो गए। इस संबंध में हरियाणा का उदाहरण प्रमुख है जहाँ स्व. बंशीलाल के शासन काल में मद्यनिषेध लागू होने के बाद ये देखने में आया कि हरियाणा के शराबी पड़ोसी राज्यों के मयखानों को आबाद करने लगे। परिणामस्वरूप हरियाणा आबकारी विभाग से होने वाली राजस्व की आय से वंचित हो गया वहीं पड़ोसी सूबों का खजाना भरने लगा। यद्यपि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने शराबबंदी करने के बाद उसे जारी रखा जिससे महिलाएं उनसे खुश हैं। ये बात सभी जानते हैं कि शराब अपराधों और भ्रष्टाचार को बढ़ाने का प्रमुख जरिया है । इसकी वजह से परिवार बर्बाद होते हैं। विशेष रूप से गरीब तबके के लिए तो यह अभिशाप है। लेकिन एक तरफ जहाँ सरकारें, मद्यनिषेध केन्द्र खोलकर नशेलचियों को इस बुराई से निकालने का प्रयास करती हैं वहीं दूसरी ओर वे शराब की बिक्री बढ़ाने में भी संकोच नहीं करतीं क्योंकि यह उनकी आय का बड़ा साधन है। इस विरोधाभास के पीछे का कारण ये है कि शराब बिक्री से सरकार का खजाना तो भरता ही है लेकिन आबकारी विभाग के भ्रष्ट अधिकारी - कर्मचारी भी बेहिसाब कमाते हैं। ज़ाहिर है उनको होने वाली काली कमाई का कुछ हिस्सा ऊपर भी पहुँचता होगा। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि अपवाद स्वरूप उंगलियों पर गिनने लायक हरिश्चंद्रों को छोड़ दें तो आबकारी महकमा भ्रष्टाचार का जीता - जागता प्रतीक है। ताजा प्रमाण म.प्र के एक सेवानिवृत्त आबकारी अधिकारी के यहाँ पड़े छापे में कई किलो सोना - चांदी, करोड़ों की नगदी और अकूत अचल संपत्ति का खुलासा होने से मिला है। हालांकि न तो वह आबकारी विभाग का पहला भ्रष्ट अधिकारी होगा और न ही उसके काले कारनामों पर पड़ा पर्दा उठ जाने से इस विभाग में कार्यरत कर्मचारी और अधिकारी परम पवित्र हो जाएंगे किंतु ये जाँच के साथ ही गहन शोध का विषय है कि शराब बिकवाकर राज्य सरकार ज्यादा कमाती है या आबकारी विभाग में जमे भ्रष्टाचारी? इस सवाल को मजाक में लेने के बजाय गंभीर रुख अपनाने की जरूरत है क्योंकि शराब के कारण समाज में अपराध और पारिवारिक कलह बढ़ने के साथ ही गरीबों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम के बदले अनाज से मिला पैसा बड़ी मात्रा में शराब की लत में खर्च हो जाता है। इसके अलावा यह विभागीय स्तर पर तो क़ाली कमाई का स्रोत है ही जिसका बहाव राजधानी तक जाता है। कुछ लोग ये तर्क भी दे सकते हैं कि अकेला आबकारी विभाग ही तो भ्रष्ट नहीं है अपितु परिवहन, लोक निर्माण, सिंचाई और राजस्व जैसे अनेक सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार सतह पर तैरता नजर आ जाता है। लेकिन आबकारी विभाग चूंकि नशे के कारोबार से जुड़ा हुआ है जो लोगों का स्वास्थ्य बर्बाद करने के साथ ही सामाजिक वातावरण में भी गंदगी पैदा करने का बड़ा कारण है। इसलिए इसमें होने वाली क़ाली कमाई का नुकसान कहीं बड़ा है। ये स्वीकार करने में भी कोई बुराई नहीं है कि बिना ऊपरी संरक्षण के सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार संभव नहीं है। राज्य सरकार को चाहिए वह इस दिशा में विचार करे ताकि आगामी वित्तीय वर्ष से प्रायोगिक तौर शराबबंदी की जा सके। निश्चित ही इससे उसका राजस्व घटेगा किंतु जो अप्रत्यक्ष लाभ हैं उनका सकारात्मक प्रभाव न सिर्फ सरकार अपितु समूचे समाज पर पड़ेगा। इस बारे में ये बात विचारणीय है कि सरकार समाज के वंचित वर्ग के लिए जो कल्याणकारी कार्यक्रम चला रही है उन पर शराबखोरी ग्रहण लगा देती है। लाड़ली बहना जैसी योजना से लाभान्वित अनेक महिलाएं इस बात को लेकर दुखी हैं कि उनके पति दबाव बनाकर वह राशि उनसे लेकर शराब पर लुटा देते हैं। कुल मिलाकर आशय ये है कि सरकारों द्वारा अपनी आय की खातिर शराब बिकवाने का औचित्य साबित करना सत्य से परे है। और यदि शराब जैसी चीज से ही सरकारी खजाना भरता हो तब फिर कैसीनो जैसे धन्धों की अनुमति के अलावा सट्टे के भी लाइसेंस जारी किये जाएं क्योंकि यदि जुआ - सट्टा गैरकानूनी और बुराई का प्रतीक है तब शराब तो उससे भी ज्यादा घातक है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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