Thursday, 23 October 2025

टैरिफ घट जाएं तब भी ट्रम्प पर भरोसा नहीं किया जा सकता


दीपावली पर भारत में हुए कारोबार ने अर्थव्यवस्था की मजबूती के साथ ही इस दुष्प्रचार की हवा निकाल दी कि बाजार में नगदी की कमी है और महंगाई के बोझ तले आम आदमी का हाथ तंग है। उपभोक्ता बाजार में हर चीज की बिक्री जमकर हुई। यहाँ तक कि आसमान छूते भावों के बावजूद सोने और चांदी के प्रतिष्ठानों में भी ग्राहकों की भीड़ नजर आई। ऑटोमोबाइल और जमीन - जायजाद की खरीदी में आया उछाल इस बात का प्रमाण है कि भारत की अर्थव्यवस्था ठहराव से उबरकर गतिशीलता का पर्याय बन चुकी है। और इसीलिये अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ से निर्यातकों को होने वाले नुकसान के बावजूद उद्योग - व्यापार जगत का हौसला बुलंद है। शेयर बाजार से भी आशाजनक खबरें आने से निवेशकों में उत्साह है। शायद यही वजह है जो अमेरिका के साथ चले आ रहे तनाव में नरमी दिखने लगी है। हालाँकि ट्रम्प की बदजुबानी जारी है और खिसियाहट में वे भारतीय व्यापारिक नीति की आलोचना करने में तनिक भी संकोच नहीं करते किंतु भारत द्वारा उनके मिथ्या दावों का खंडन किये जाने से वे परेशान हो उठे हैं। दीपावली पर उनके द्वारा अमेरिका में रहे भारतीयों के साथ दीप जलाना और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन पर बधाई देना यद्यपि नई बात नहीं है क्योंकि अब ऐसा आयोजन व्हाइट हाउस में प्रति वर्ष होने लगा है जो अमेरिका के राष्ट्रीय जीवन पर भारत के बढ़ते प्रभाव का प्रमाण है। लेकिन ट्रम्प ने दीपावली के मौके पर वीजा शर्तों को शिथिल करने का जो निर्णय लिया उससे ये लगने लगा है कि वे भारत द्वारा उनके ऊलजलूल फैसलों के प्रति बेफिक्री दिखाये जाने से हैरत में थे। इसी के बाद ये खबर भी आने लगी कि 50 फीसदी टैरिफ को घटाकर  15 प्रतिशत किये जाने पर सहमति बनने जा रही है। उल्लेखनीय है दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर लगातार वार्ता जारी है जिसमें काफी हद तक गतिरोध दूर होने में सफलता मिलने की संभावना है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ट्रम्प भारत की सभी शर्तें मान लेंगे क्योंकि उनका अब तक का व्यवहार बहुत ही अपरिपक्व और गैर जिम्मेदाराना रहा है। यहाँ तक कि वे कूटनीतिक शिष्टाचार तक का ख्याल नहीं रखते। इसके अलावा वे अभी भी इस मुगालते में जी रहे हैं कि दुनिया अमेरिका के इशारे पर उठक - बैठक लगाने बाध्य है। लेकिन भारत और चीन दोनों पर मनमाना टैरिफ थोप देने का उनका दाँव जब बेअसर होने लगा तब जाकर उनको समझ में आया कि 21 वीं सदी में दुनिया का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल चुका है जिसमें आर्थिक हित सामरिक मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। यदि ऐसा न होता तो सीमा विवाद के बाद भी ट्रम्प टैरिफ का मुकाबला करने में  चीन और भारत एक साथ न खड़े नजर आते। रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने के दबाव पर भारत ने जब  पलटवार करते हुए कहा कि अमेरिका खुद भी रूस से व्यापार कर रहा है और यूरोपीय देश उससे गैस खरीद रहे हैं तब वह केवल भारत और चीन पर ही रूसी तेल नहीं खरीदने का दबाव किस अधिकार से बनाता है ? ट्रम्प आज तक इसका जवाब नहीं दे सके।  इस प्रकार ये कहा जा सकता है कि भारत ने अमेरिका को सधी हुई भाषा में जवाब दे दिया है कि टैरिफ बढ़ाये जाने के पीछे ट्रम्प द्वारा जो दलीलें दी गईं उनका कोई औचित्य नहीं है। इस संबंध  में  विचारणीय है कि यदि दोनों देशों में व्यापारिक संधि होती है तब अमेरिका भी  पहले से कुछ न कुछ तो ज्यादा हासिल करना चाहेगा क्योंकि भारत के साथ व्यापार में उसे घाटा होता है जिसे लेकर ट्रम्प चिल्लाया करते हैं। और फिर ये भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि समझौता होने के बाद भी वे  उस पर कायम रहेंगे। भारत लगातार ये स्पष्ट करता आया है कि वह ऊर्जा सहित अन्य तकनीकी जरुरतों के लिए एक या कुछ देशों पर निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करता रहेगा। और ऐसा किया भी गया है जिसके अनुकूल परिणाम दिखने लगे हैं। ये देखते हुए भारत को अपने निर्यात का विकेंद्रीकरण करने की कार्ययोजना बनानी चाहिए क्योंकि वह खुद भी अब आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। अमेरिका को ये महसूस करवाने की जरूरत है कि भारत का काम उसके बिना भी चल सकता है। ट्रम्प की बेवकूफियों ने उनकी छवि तो खराब की ही अमेरिका को भी हास्यास्पद स्थिति में ला खड़ा किया है। भारत और चीन के प्रति टैरिफ विवाद में अमेरिका से जिस नरमी के संकेत आ रहे हैं वे उसकी मजबूरी दर्शाते हैं। ऐसे में भारत ने अभी तक जो दृढ़ता दिखाई उसे जारी रखना चाहिए क्योंकि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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