Friday, 10 October 2025

क्या मायावती और बसपा के सुनहरे दिन लौटेंगे


बसपा  संस्थापक कांशीराम के जीते जी ही  मायावती दलित राजनीति का चेहरा बन चुकी थीं। तीन बार भाजपा के सहयोग के अलावा एक बार वे पूर्ण बहुमत के साथ  पूरे पांच साल उ.प्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य की मुख्यमंत्री रहीं। कांशीराम के दौर में  उ.प्र की दीवारों पर तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार जैसे नारे दिखाई देते थे किंतु मायावती ने उसे हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है में बदल दिया। यही नहीं महामंत्री पद प्रख्यात अधिवक्ता सतीश चंद्र मिश्र को सौंपकर सवर्ण जातियों को लुभाने का दाँव भी चला।  2007 के विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत में उक्त नारे का खासा योगदान रहा। उनकी पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौर में शासन और प्रशासन  में यादवों के बढ़ते वर्चस्व के कारण न सिर्फ दलित अपितु  सवर्ण जातियाँ भी त्रस्त हो उठी थीं। भाजपा उस समय  पाँव जमाने की कोशिश में थी। इसलिए लोगों ने मायावती को सत्ता सौंप दी।   उन्होंने कानून व्यवस्था में तो काफी सुधार किया किंतु  जाति की राजनीति से बाहर आने का साहस नहीं दिखा सकीं जिसका खामियाजा अगले चुनाव में भुगतना पड़ा। उसके बाद अखिलेश यादव पांच साल मुख्यमंत्री बने और 2017 में भाजपा ने योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व  पहली बार स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बनाई जो आज भी सत्ता में है। सत्ता से हटने के बाद मायावती और बसपा दोनों का ग्राफ गिरता गया। आज की स्थिति में वे न सांसद हैं न विधायक। जिस उ.प्र में उनकी तूती बोलती थी वहाँ बसपा का मात्र एक विधायक है जबकि लोकसभा में  नामलेवा तक नहीं बचा। एक समय था जब मायावती के आगे  टिकिट मांगने वालों की भीड़ नजर आती थी जिनमें सवर्ण भी होते थे किंतु जैसे - जैसे भाजपा आगे बढ़ी बसपा सिमटती गई। 2019 में तो मायावती ने सपा तक से समझौता किया और उन मुलायम सिंह यादव के प्रचार हेतु मैनपुरी गईं जिनके साथ  सांप - नेवले जैसी दुश्मनी थी। लेकिन अवसरवादी राजनीति और अविश्वसनीय स्वभाव के कारण वे राजनीतिक बिरादरी में अलग - थलग पड़ गईं। बीते कुछ सालों से तो उनकी चर्चा भी कम होने लगी थी। भाजपा ने दलित वोट बैंक को अपनी तरफ खींचकर मायावती को राजनीतिक तौर पर दिवालिया बना दिया। उनके ऊपर भाजपा की बी टीम होने का आरोप भी लगने लगा। अपना उत्तराधिकारी किसी दलित को चुनने की बजाय उन्होंने अपने भतीजे आनंद को आगे बढ़ाया जिससे नाराज होकर अनेक कद्दावर दलित नेता पार्टी छोड़ गए। लेकिन अपने शक्की स्वभाव के चलते उन्होंने आंनद को भी पार्टी और परिवार से निकाल बाहर किया। अपने जन्मदिन पर बड़ी रैली आयोजित कर उपहार बटोरने वाली मायावती काफी समय से अकेलापन झेल रही थीं। इसी बीच  उ.प्र में चंद्रशेखर आजाद नामक दलित नेता की भीम आर्मी ने बसपा के कमजोर होने से उत्पन्न  दलित नेतृत्व के खालीपन को भरने के प्रयास किये। हालांकि उनका प्रभाव पश्चिमी उ.प्र तक ही सीमित है किंतु लोकसभा चुनाव जीतकर वे लोकसभा में दलित चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने मायावती के साथ जुड़ने की काफी पहल की किंतु उनकी तरफ से ठण्डा रुख दिखाए जाने के कारण चंद्रशेखर अपना जनाधार बढ़ाने में लग गए। राजनीतिक विश्लेषक भी मायावती को डूबते जहाज का कप्तान मानने लगे थे। लेकिन गत दिवस कांशीराम की पुण्यतिथि पर उन्होंने लखनऊ में  विशाल रैली का आयोजन कर न सिर्फ बसपा की ताकत का प्रदर्शन किया अपितु भतीजे आनंद को एक बार फिर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर अनिश्चितता समाप्त कर दी। उक्त रैली में मायावती ने कांग्रेस और सपा पर तीखे हमले किये। उनके निशाने पर भाजपा भी रही लेकिन मुख्यमंत्री योगी की प्रशंसा कर सपा और कांग्रेस को उन्हें भाजपा की बी टीम प्रचारित करने का अवसर भी दे दिया। मायावती ने रैली की तैयारी जिस गुपचुप तरीके से की उससे साफ हो गया कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई हैं। हालांकि ये सवाल भी उठने लगा कि क्या बसपा और मायावती का सुनहरा दौर वापस लौटेगा क्योंकि अब न तो कांशीराम का नाम भुनाने लायक बचा और न ही उनकी अपनी विश्वसनीयता । भतीजे आनंद को तो खुद उन्होंने ही विवादास्पद बना दिया था जो भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हैं। सही बात ये है कि अपने गुरु के विपरीत मायावती ने बसपा को दलित समुदाय की बजाय अपनी निजी जागीर बना लिया। यही वजह है कि पार्टी के वफादार रहे नेता छोड़कर चले गए। ये देखते हुए कल की रैली के बाद बसपा उ.प्र की राजनीति में क्या दोबारा अपने पैर जमा सकेगी और मायावती फिर दलित राजनीति का  चेहरा बन सकेंगी, इस सवाल का उत्तर फिलहाल कोई नहीं दे सकता क्योंकि 2007 में  उ.प्र की मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका नाम  प्रधानमंत्री बनने वाले नेताओं के तौर पर लिया जाने लगा था। लेकिन आज वे किसी सदन की सदस्य तक नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment