राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी पर मैं संघ के सभी विरोधियों के प्रति हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ जिनकी तीखी आलोचना और हरसंभव विरोध के बावजूद यह संगठन सभी बाधाओं को पार करता हुआ दूसरी सदी में प्रविष्ट हो चुका है।
संघ से असहमति का स्वागत है, उसकी विचारधारा का विरोध करना भी अपराध नहीं है किंतु ऐसा करने वालों को चाहिए वे संघ की विकास यात्रा का गहराई से अध्ययन करें कि आखिर वे कौन से कारण रहे जिनके बल पर यह संगठन 100 वर्ष की आयु के बाद भी युवावस्था जैसे उत्साह और ऊर्जा के साथ अपने निर्धारित ध्येय पथ पर बढ़ते रहने प्रतिबद्ध है।
बाप कमाई के नाम पर देश के मालिक बने बैठे रहने वालों को हाशिये पर धकेलकर यदि देश का मानस संघ की ओर आकृष्ट हो रहा है तो वह इसलिए कि संघ की यह सफलता उसके असंख्य स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम से अर्जित आप कमाई है।
आरोप लगाना बहुत आसान है। क्षेत्र ,जाति और भाषा के नाम पर भावनाएं भड़काकर सत्ता हासिल करना भी बड़ा चमत्कार नहीं किंतु समूचे देश में केवल भारत माता की जय कहने वाले निःस्वार्थ कार्यकर्ता तैयार करने जैसे अनुष्ठान को सौ वर्ष तक निरंतर संचालित करना ऐसा विश्व कीर्तिमान है जिसे तोड़ना तो क्या उसकी बराबरी करना तक किसी के लिए संभव नहीं है।
संघ के विरोधियों और आलोचकों के प्रति मेरे मन में कृतज्ञता का भाव इसीलिए है क्योंकि वे संघ के मार्ग में जो बाधाएं उत्पन्न करते हैं उनसे उसका साहस बढ़ता है। इसका प्रमाण उस पर लगाए गए हर प्रतिबंध के बाद उसका और शक्तिशाली होकर उभरना है।
सही बात ये है कि संघ के प्रति वही लोग दुर्भावना रखते हैं जिन्हें इस देश पर मंडराते खतरों का आभास नहीं है। ऐसे सभी लोग देशविरोधी हैं ये कहना तो उचित नहीं किंतु वे अज्ञानवश ही सही किंतु देशविरोधी शक्तियों के षडयंत्र में फंसकर ऐसा करने की गलती करते हैं।
संघ के जन्म से पूर्व सोवियत संघ बना और साम्यवादी विचारधारा पर आधारित सत्ता अस्तित्व में आई जो राष्ट्रवाद की विरोधी थी । लेकिन वह टिक नहीं सकी और उसी सदी में बिखरकर रह गई। भारत की आजादी के बाद दूसरी सबसे बड़ी साम्यवादी व्यवस्था चीन में कायम हुई लेकिन आज वह भी पूंजीवादी ढांचे में ढल चुकी है। भारत में समाजवादी चिंतन की धारा ने भी लंबे समय तक अपना प्रभाव दिखाया किंतु अपने अंतर्विरोधों की वजह से भटकाव का शिकार होकर रह गई।
आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस भी बीते 78 वर्षों में विचार रूपी महासागर से निकलकर एक परिवार की निजी संपत्ति बनकर रह गई। सीमित दायरे और संकुचित सोच वाले अनेक संगठन और राजनीतिक दल भी राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे किंतु कुछ दूर चलकर ही दम तो़ड़ बैठे या फिर अपना विस्तार नहीं कर सके।
इन सबके विपरीत संघ ने देश के हर हिस्से में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की है। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्षेत्र में संघ अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है जिसे व्यापक स्वीकृति और समर्थन मिलने का ही परिणाम है कि केन्द्र सहित अनेक राज्यों में उसकी विचारधारा से प्रेरित व्यक्ति सत्ता में विराजमान हैं।
संघ के विराट रूप ने देश और दुनिया को चमत्कृत किया तो उसके पीछे असंख्य स्वयंसेवकों का त्याग, समर्पण और अथक परिश्रम है। यह उपलब्धि सतत साधना का प्रतिफल है। इसकी निरंतरता देखते हुए ये विश्वास प्रबल होता है कि भारत माता का गौरवगान करने वाले इस संगठन को चिरंजीवी होने का दैवीय आशीर्वाद प्राप्त है ।
महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने 21 वीं सदी में भारत के पुनरुत्थान की भविष्यवाणी की थी । संघ ने उसे साकार करने का जो संकल्प लिया वह सफल होता प्रतीत होने लगा है।
आज संघ देश ही नहीं अपितु दुनिया भर में शक्तिशाली और समृद्ध भारत की छवि प्रस्तुत करने में जुटा हुआ है। इसके सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगे हैं।
लेकिन 100 वर्ष पूर्ण करना संघ यात्रा का एक पड़ाव मात्र है। ये कभी न रुकने वाला कार्य है जिसका ध्येय वाक्य है:-
तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें।
संघ विरोधियों से अपेक्षा भी है और अनुरोध भी कि वे अपना अभियान यथावत जारी रखें क्योंकि देश विदेश में इससे इस संगठन से जुड़े असंख्य स्वयंसेवक इससे बजाय निराश होने के दोगुने उत्साह से भारत माँ की सेवा में जुट जाते हैं:-
मशहूर शायर बशीर बद्र ने शायद इसीलिए लिखा था:-
मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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