2021 में जब अमेरिकी फ़ौजें वापस लौटीं और 20 सालों बाद तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आये तब भारत के मुसलमानों ने इस अंदाज में जश्न मनाया मानों ये जंग उन्हीं ने जीती हो। उनके साथ ही वामपंथी तबका भी उल्लासित था क्योंकि वह अमेरिका की शिकस्त थी। चूंकि उस समय मोदी सरकार और अमेरिका के रिश्ते काफी अच्छे थे लिहाजा अप्रत्यक्ष रूप से सरकार पर निशाने साधे गए। भारत के लिए चिंता का कारण ये था कि अमेरिकी आधिपत्य के दौरान अफगानिस्तान में अनेक विकास कार्यों के ठेके भारतीय कंपनियों के पास थे। तालिबानी सत्ता का पाकिस्तान और चीन ने जिस तरह स्वागत किया उससे भी हमारी चिंताएं बढ़ने लगीं। पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल तालिबानी अड्डों के लिए होता रहा इसलिए उसका सोचना था कि वह काबुल में इस्लामिक सरकार के साथ बेहतर तालमेल बनाकर भारत को पूरी तरह बाहर कर देगा। चीन की रुचि भी इस पहाड़ी देश की खनिज संपदा पर थी। उल्लेखनीय है अफगानिस्तान में मौजूद बहुमूल्य खनिजों के कारण ही रूस और अमेरिका दोनों इस देश पर काबिज होने का प्रयास करते रहे किंतु आखिरकार उन्हें छोड़कर जाना पड़ा। और इस तरह ये स्पष्ट हो गया कि अफगानिस्तान को साम्राज्यों की कब्रगाह क्यों कहा जाता है। अमेरिकी फ़ौजों के पलायन के बाद वहाँ काफी समय तक अनिश्चितता रही क्योंकि कुछ लड़ाकू गुट थे जो तालिबान के झंडे तले आने राजी नहीं थे। इससे लगा अफ़ग़ानिस्तान के दुर्दिन दूर नहीं होंगे और गृहयुद्ध जारी रहेगा। हालांकि धीरे - धीरे तालिबान ने सभी विरोधियों को घुटने टेकने मजबूर कर दिया। सत्ता में आते ही उन्होंने महिलाओं पर तरह - तरह की पाबंदी लगाने के अलावा इस्लामिक व्यवस्था लागू कर दी। हालांकि भारत ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी। लेकिन वहाँ अपना दूतावास 2022 में दोबारा खोलकर कूटनीतिक, संवाद के साथ वहाँ रहने वाले हिंदुओं और सिखों के हितों की रक्षा का प्रबंध किया। अफगानिस्तान भी दिल्ली में दूतावास और मुंबई में वाणिज्यिक काउंसलेट संचालित करता आ रहा है। इस बीच बड़ा बदलाव ये हुआ कि सीमा विवाद को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनातनी बढ़ने लगी। इसका कारण पाकिस्तान के पश्चिमी सीमांत इलाके में बने तालिबानी अड्डों को न हटाया जाना है। पाकिस्तान को लगता था कि तालिबानी सत्ता आते ही उसके यहाँ चल रहे तालिबानी अड्डे बंद हो जाएंगे किंतु अफगानिस्तान ने उन क्षेत्रों को अपना बताते हुए अंग्रेजों द्वारा तय की गई डूरंड रेखा नामक सीमा को अमान्य कर दिया। धीरे - धीरे दोनों के बीच तनाव और बढ़ा और गत सप्ताह बाकायदे युद्ध जैसे हालात बन गये। भारत ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अफगानिस्तान से रिश्ते सुधारने के घोषित- अघोषित कदम उठाये । उसी का परिणाम उसके विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी का भारत दौरे पर आना है। भारतीय नेताओं से मिलने के बाद उनका ये बयान काफी मायने रखता है कि उनका देश अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत पर हमले के लिए नहीं होने देगा। स्मरणीय है कश्मीर में आतंकवाद के लिए पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों के सदस्यों का भी उपयोग किया था। विदेश मंत्री के भारत आगमन से पाकिस्तान के पेट का दर्द तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। उसे डर है तालिबानी सत्ता के साथ भारत की दोस्ती उसके लिए खतरे का कारण बनेगी जबकि भारत के लिए ऐसा होना दूरगामी हितों के लिए बेहद फायदेमंद रहेगा। हालांकि इसके बाद भी भारत ने अभी तक अफगानिस्तान सरकार को मान्यता नहीं दी। बावजूद इसके मुत्तकी ने राजनयिक चर्चाओं के अलावा देवबंद के मुस्लिम केंद्र जाकर बड़ा संदेश दे दिया। लेकिन अपने देश का जो तबका अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने पर बल्लियों उछल रहा था वही उसके विदेश मंत्री की भारत यात्रा की कूटनीतिक उपयोगिता को नजरंदाज करते हुए उसमें आलोचना के बिंदु तलाश रहा है। पत्रकार वार्ता में महिला पत्रकारों को अनुमति नहीं देने के अलावा मुत्तकी की देवबंद यात्रा पर योगी आदित्यनाथ द्वारा उनका स्वागत किये जाने पर तंज कसे जा रहे हैं। सरकार में बैठे लोगों के तालिबान को लेकर अतीत में दिये बयानों का भी हवाला दिया जा रहा है। ऐसा करने वाले भूल जाते हैं कि वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है , हमें अपनी विदेश नीति का भी तदनुसार निर्धारण करना जरूरी है। जिसका उदाहरण अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने के लिए चीन के साथ निकटता बढ़ाना है। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति देखते हुए भारत के लिए वहाँ अपने लिए जगह बनाना जरूरी है। यूँ भी अफगानिस्तान के अंदरूनी राजनीति में हमारी भूमिका रही है। पिछली सत्ता के साथ अच्छे रिश्तों के अलावा रूसी कब्जे के दौरान वहाँ के शासक नजीबुल्लाह के परिवार को भारत ने शरण दी थी। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रहे हामिद करजई तो भारत में ही पढ़े थे। आज भी हिन्दू और सिख आबादी वहाँ रहती है। ये देखते हुए दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की तर्ज पर यदि भारत सरकार ने अफगानिस्तान के साथ तार जोड़ने की पहल की तो परिणाम की प्रतीक्षा किये बिना जल्दबाजी में टिप्पणियां करना अनुचित है। कूटनीति में बहुत कुछ ऐसा होता है जो देखकर भी समझ नहीं आता। और ये भी कि दो देशों के बीच तनाव के बाद भी कूटनीतिक संवाद चलता रहता है। कंधार विमान अपहरण के समय भारत और अफगानिस्तान के बीच पूरी तरह अनबोला था। तब भी कूटनीतिक संवाद के जरिये ही बात बनी थी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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