बिहार में सर्वाधिक चर्चा में हैं जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर। जिस तरह दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल का उदय हुआ था उसी तरह प्रशांत भी प्रचलित तौर - तरीकों से अलग सीधे जनता के बुनियादी मुद्दों को उठा रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में वे नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान को निर्देशित कर चर्चा में आये। अबकी बार मोदी सरकार का नारा और चाय पर चर्चा उन्हीं के दिमाग की उपज थी। लेकिन अगले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में वे नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की नैया के खेवनहार बन बैठे। बिहार में बहार है, नीतिशै कुमार जैसा नारा देकर उन्होंने मोदी लहर को रोकने का कारनामा कर दिखाया। हालांकि उसके पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी ऐसा ही कर चुकी थी। लेकिन बिहार जैसे राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में श्री मोदी के प्रभाव को क्षीण करते हुए नीतीश - लालू के गठजोड़ को सफलता दिलवाकर प्रशांत चुनावी जीत की गारंटी बन गए। बाद में वे नीतीश के काफी करीब आकर बिहार सरकार के सलाहकार भी बन बैठे किंतु जल्द ही उनके साथ पंगा हो गया। बावजूद उसके बतौर चुनाव रणनीतिकार उनकी मांग बढ़ने लगी। जगन मोहन रेड्डी , स्टालिन और ममता बैनर्जी सहित 8 पार्टियों के चुनावी सलाहकार प्रशांत केवल एक बार विफल हुए जब उन्होंने उ.प्र में कांग्रेस का चुनाव अभियान संचालित किया। एक समय ऐसा भी आया जब उनके कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें लगने लगीं। लेकिन राहुल गाँधी के साथ तालमेल नहीं बैठ पाने के कारण वह मुहिम आगे नहीं बढ़ पाई। राजनीति से इतर वे विभिन्न कंपनियों के व्यवसायिक सलाहकार भी हैं जिन्होंने बिहार चुनाव लड़ने के लिए जन सुराज को करोड़ों का चंदा भी दिया। जिसे श्री किशोर अपनी पेशेवर सलाह का मेहनताना बताते हैं। बीते दो - तीन साल वे बिहार में गाँव - गाँव घूमकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटे रहे । पार्टी बनाकर उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा स्पष्ट कर दी। शुरुआत में लगा था वे एनजीओ शैली में अपने गृहराज्य की सूरत और सीरत सुधारने का बीड़ा उठाएंगे। शायद जनता से प्रत्यक्ष जुड़ने के बाद उनकी समझ में आया होगा कि समूची व्यवस्था चूंकि राजनीतिक सत्ता के शिकंजे में है इसलिए बिना उसके कुछ कर पाना असंभव है। उनके राजनीति में प्रवेश को शुरुआत में तो सभी ने हल्के में लिया। लेकिन बुनियादी मुद्दों पर लोगों का ध्यान खींचते हुए उन्होंने अपना जनाधार बढ़ाया। वे कितनी सीटें लेंगे ये तो अभी कह पाना मुश्किल है किंतु विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत उस वर्ग को आकर्षित करने में सफल होते दिख रहे हैं जो नीतीश और तेजस्वी यादव दोनों से नाराज है। इसीलिए वे एनडीए और महागठबंधन दोनों पर बराबरी से हमलावर हैं। नीतीश उनकी नजर में अच्छे व्यक्ति होने के बाद भी बतौर मुख्यमंत्री बिहार के लिए कुछ नहीं कर सके वहीं दूसरी ओर तेजस्वी को नौ वीं फेल प्रचारित कर वे उनको अयोग्य साबित करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री पर तीर छोड़ते हुए वे कहते हैं कि बिहार के पिछड़ेपन को दूर करने में वे विफल रहे। कांग्रेस और राहुल की आलोचना का भी कोई मौका वे नहीं छोड़ते। बिहार की राजनीति को जाति के जाल से निकालकर विकास केंद्रित बनाने की उनकी बातें उम्मीदें जगा रही थीं। लेकिन जन सुराज ने 50 उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की उसे देखकर उनके प्रति आकर्षित हो रहे लोगों को धक्का पहुंचा । यद्यपि राजनीतिक विश्लेषकों ने श्री किशोर के राजनीतिक चातुर्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने जातीय समीकरणों का ध्यान रखते हुए उम्मीदवारों का जो चयन किया उसने एनडीए और महागठबंधन दोनों की नींद उड़ा दी। मुस्लिम बहुल सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारने का उनका निर्णय महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा है। लेकिन सवाल ये है कि यदि प्रशांत किशोर भी जाति को ही चुनाव जीतने का फार्मूला मानते हैं तो अब तक उन्होंने जिस बदलाव के वादे और दावे बिहार की जनता से किये वे सब हवा - हवाई होकर रह जाएंगे। ये दुर्भाग्य ही है कि राजनीति में ताजी हवा का जो झोका आता है वह भी उसके वातावरण में आकर प्रदूषित होने जाता है। लगता है प्रशांत दूसरों को चुनाव जीतने के जो फॉर्मूले बताया करते थे , उन्हीं को स्वयं भी अपना रहे हैं। लेकिन तब उनमें और बाकी में क्या अंतर रह जाएगा ? उम्मीदवारों की पहली सूची आने के बाद जन सुराज में भी वैसा ही हंगामा हुआ जैसा अन्य दलों में देखने मिलता है। ये इस बात का संकेत है कि प्रशांत के साथ भी ऐसे तत्व जुड़ गए हैं जिनका उद्देश्य बिहार की बजाय अपनी बदहाली दूर करना है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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