.प्र में रीवा संभाग के पुलिस महानिरीक्षक गौरव सिंह राजपूत ने गत दिवस नशे के विरुद्ध प्रहार 2 नामक कार्यक्रम में उपस्थित पुलिसकर्मियों को सख़्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि बिना थानेदारों की जानकारी के नशे का विक्रय नहीं हो सकता। इसके आगे महानिरीक्षक महोदय यहाँ तक बोल गए कि जो लोग तालाब को गंदा कर रहे हैं उनकी पूरी सूची चार महीनों में बन चुकी है। ऐसे लोग समय रहते सुधर जाएं वरना 15 दिन बाद उन्हें परिणाम भोगने होंगे। श्री राजपूत की उक्त चेतावनी एक तरफ तो उनकी स्पष्टवादिता का सबूत है वहीं इस बात की खुली स्वीकारोक्ति भी कि समाज में होने वाले अपराधों को पुलिस का संरक्षण मिला हुआ है और वह चाह ले तो अपराधियों का हौसला पस्त हो जाएगा। महानिरीक्षक ने बिना लाग - लपेट के कहा कि नशीले कफ सिरप गली - मोहल्लों तक फैल गए हैं। ऐसे में थाने के प्रभारी का फर्ज है वह अपने इलाके को नशे से मुक्त कराए। उन्होंने यदि अपने मातहतों को केवल नशे का धन्धे रोकने के लिए कहा होता तब वह साधारण बात होती क्योंकि छिंदवाड़ा में कफ सिरप के कारण बड़े पैमाने पर बच्चों की मौत के बाद मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव की सख्त हिदायत पर सरकारी तंत्र नींद से जागा और कर्तव्यनिष्ठा का दिखावा करते हुए जगह - जगह छापेमारी की जाने लगी। लेकिन रीवा के पुलिस महानिरीक्षक ने चिकित्सकों और दवा विक्रेताओं से अलग अपने विभाग के वर्दीधारियों को जिस प्रकार कटघरे में खड़ा किया उसके लिए वे अभिनन्दन के हकदार हैं । आम तौर पर देखने मिलता है कि पुलिस या अन्य शासकीय विभाग में पदस्थ उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थों के काले - कारनामों पर पर्दा डालते हुए उन्हें बचाते हैं। ऐसा क्यों होता है ये किसी से छिपा नहीं है। उस लिहाज से श्री राजपूत की साफगोई अनुकरणीय है । उनके कथन से साबित हो जाता है कि उनके पास सभी दोषी थानेदारों की कर्मपत्री आ चुकी है जिनकी जानकारी में नशे का व्यापार होता रहा। ऐसे में उन्हें सुधरने के लिए मोहलत देने की बजाय उन पर अभी तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई इस प्रश्न का उत्तर भी महानिरीक्षक जी को देना चाहिए । उल्लेखनीय है रीवा उपमुख्यमंत्री का गृह जिला है जिनके पास स्वास्थ्य विभाग भी है। ऐसे में श्री राजपूत का ये कहना कि नशीले कफ़ सिरप का कारोबार गली - मोहल्लों तक फैल चुका है केवल पुलिस की ही नहीं अपितु स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर भी निशाना साधता है। यद्यपि ये विश्वास करना कठिन है कि वे नशे के कारोबार को संरक्षण देने वाले उन थानेदारों पर नकेल कसेंगे किंतु उन्होंने जिस प्रकार से अपने मातहतों को हड़काया उसने पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर कालिख पोत दी। जब महानिरीक्षक जैसा उच्च अधिकारी ये स्वीकार करे कि नशे की बिक्री बिना थानेदार की जानकारी के नहीं हो सकती तब किसी और के कहने की जरूरत ही कहां रहती है ? लेकिन जिन थानेदारों का काला चिट्ठा आ चुका है उनसे ये अपेक्षा करना निरर्थक है कि वे अपने आपको सुधार लेंगे। अच्छा होता महानिरीक्षक महोदय इन थानेदारों की भी जनता के बीच वैसी ही परेड करवाएं जैसी पुलिस कभी - कभी अपराधियों की करवाती है। आखिरकार जनता को भी उन लोगों के चेहरे देखने का हक है जो अपनी काली कमाई के लालच में लोगों के स्वास्थ्य और ज़िंदगी के दुश्मन बने हुए हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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