अमेरिका विश्व की आर्थिक और सैन्य महाशक्ति होने के अलावा तकनीक में भी अग्रणी है। दुनिया में जितनी भी संचार सुविधाएं हैं , ज्यादातर का नियंत्रण उसके पास है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा संगठन उसके प्रभाव में हैं। सं .रा.संघ का मुख्यालय भी उसी के न्यूयॉर्क शहर में है। दोनों विश्व युद्धों को निर्णायक मोड़ देने के कारण उसकी ताकत को वैश्विक मान्यता प्राप्त हो गई। अमेरिकी मुद्रा डॉलर की साख पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है। चाहे अंतरिक्ष कार्यक्रम हों या वैज्ञानिक अनुसंधान, उसका प्रभुत्व कायम है। लेकिन बीते कुछ दशकों से उसकी छवि लगातार गिरती आ रही है जिसका कारण नेतृत्व के स्तर में आई गिरावट है। दुनिया भर के लोगों ने यहाँ बसकर इसे उन्नति के शिखर पर पहुंचाया तो यह उसके राजनीतिक नेतृत्व की दूरगामी सोच थी जिसने प्रतिभाओं को अपने यहाँ सम्मानजनक स्थान प्रदान किया। लेकिन अमेरिका की श्रेष्ठता उसके अहंकार के तौर पर सामने आती रही है । जहाँ तक बात भारत की है तो लोकतांत्रिक होने के बाद भी वह कभी भी हमारा हितचिंतक नहीं रहा। वहीं पाकिस्तान जैसे देश को सदैव संरक्षण प्रदान किया जहाँ चुनी हुई सरकार भी फौज के इशारों पर नाचती है। बावजूद इसके अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते सामान्य रहे। इसीलिये भारतीय मूल के लाखों प्रवासी वहाँ स्थायी तौर पर बस गये। वहीं बड़ी संख्या में शिक्षा और नौकरी के कारण वहाँ निवासरत हैं। अनेक दिग्गज अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय पेशेवर विराजमान हैं। वहाँ का सामाजिक खुलापन , लोकतांत्रिक व्यवस्था और अंग्रेजी भाषा का प्रचलन होने से भारतीयों के लिए अमेरिका मुख्य आकर्षण का केंद्र रहा है। उसकी राजनीति में भी भारतीय समुदाय की उपस्थिति तेजी से बढ़ी है। संसद और राज्यों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग चुनकर आते हैं। राष्ट्रपति के निजी सलाहकारों में भी भारतीय चेहरे मौजूद हैं। दोनों देशों में व्यापारिक रिश्ते भी काफी मजबूत रहे हैं। भारत द्वारा सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को किया जाता है। अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के बाद दोनों देशों में निकटता और बढ़ी। लेकिन अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दूसरी बार सत्ता में आने के बाद भारत के प्रति जिस प्रकार का रवैया दिखा रहे हैं वह समझ से परे है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम का झूठा श्रेय लूटने की उनकी कोशिश जगहंसाई का विषय बनी। उसके बाद उन्होंने भारत पर रूस से कच्चा तेल न खरीदने का दबाव डाला और नहीं मानने पर 25 और 50 फीसदी टैरिफ थोपकर भारत के विदेश व्यापार को ठप करने का दांव चला। उसके बाद भी उनका दबाव बेअसर रहा क्योंकि भारत ने पूरी दुनिया में बाजारों की खोज करते हुए नये व्यापार अनुबंध करना शुरू कर दिया। ट्रम्प ने गुस्से में वीजा शुल्क बढ़ाकर भारतीय छात्रों तथा पेशवरों को आने से रोकना चाहा तो अनेक देशों ने अपने दरवाजे उनके लिए खोल दिये। कुल मिलाकर ट्रम्प ने भारत को दबाने के लिए जितने भी प्रपंच रचे उनमें से कोई भी कारगर नहीं रहा। उनके झूठ की पोल खुली सो अलग। लेकिन उनका घटियापन रुकने का नाम नहीं ले रहीं। गत दिवस उन्होंने शिगूफा छोड़ दिया कि उनकी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात हो गई है और वे रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने के लिए राजी हो गए। उनके बयान पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी मोदी सरकार पर ट्रम्प से दबने का आरोप दोहरा दिया। देश के भीतर भी इस बात पर आश्चर्य हुआ कि अब तक दबाव में नहीं आने के बाद श्री मोदी झुके क्यों? लेकिन विदेश मंत्रालय ने उस झूठ का पर्दाफाश करते हुए स्पष्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति के बीच कोई बातचीत नहीं हुई। साथ ही ये भी दोहराया कि भारत अपनी ऊर्जा जरुरतों के लिए नये - नये विकल्प ढूंढ़ता रहेगा। दरअसल ट्रम्प चाह रहे हैं कि भारत और चीन यदि रूसी तेल खरीदना बंद कर दें तो पुतिन के तेवर ढीले पड़ने से वे यूक्रेन के साथ युद्धविराम के लिए राजी हो जाएंगे। लेकिन भारत ने रूस से तेल के अलावा हथियार खरीदी भी बढ़ा दी। ट्रम्प अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करें तो इसमें अस्वाभविक कुछ भी नहीं किंतु इतने बड़े देश के मुखिया से ये अपेक्षा रहती है कि उनके व्यवहार में परिपक्वता और बातों में गंभीरता हो। ये कहना गलत न होगा कि वे अब तक के सबसे निकृष्ट अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। शांति के लिए दिये जाने वाले नोबेल पुरस्कार के लिए तो चयन समिति ने उन्हें अपात्र ठहरा दिया। लेकिन बेशर्मी के साथ झूठ बोलने का कोई नोबेल पुरस्कार यदि हो तो वह ट्रम्प को जरूर दिया जा सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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