सरकारी कर्मचारियों को केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग का गठन कर वह खुशखबरी दी जिसका लंबे समय से इंतजार था। हालांकि आयोग की रिपोर्ट आने में डेढ़ वर्ष लग जाएंगे किंतु नया वेतनमान 1 जनवरी 2026 से प्रभावशील माना जाएगा। सातवें आयोग की सिफारिशें 2016 में लागू हुई थीं। वेतन और भत्तों का निश्चित समयावधि के बाद पुनर्निर्धारण न्यायोचित है। लोक प्रशासन को सक्षम, गतिशील और दायित्ववान बनाने के लिए वेतन वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसलिए किसी को भी उक्त फैसले पर ऐतराज नहीं हुआ। नये वेतन आयोग की सिफारिशें केंद्र सरकार के 50 लाख कर्मचारियों के साथ ही लगभग 70 लाख पेंशन भोगियों को तो सीधे तौर पर लाभान्वित करेंगी ही , उसके अलावा विभिन्न राज्य सरकारों के कर्मचारियों को भी इससे फ़ायदा होगा। 2029 में लोकसभा का चुनाव होगा । ऐसे में केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी । वैसे भी मोदी सरकार के लिए भी अगला लोकसभा चुनाव कड़ी चुनौती लेकर आयेगा। 2024 में लगे झटके के बाद प्रधानमंत्री जान गए होंगे कि मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की कितनी क्षमता रखता है । इसीलिये केंद्र सरकार ने बिहार में मतदान के पहले ही आठवां वेतन आयोग गठित कर सरकारी कर्मचारियों को लुभाने का दाँव चल दिया है। ये बात ध्यान रखने वाली है कि निजी क्षेत्र कितना भी विकसित हो जाए किंतु भारत में आज भी सरकारी नौकरी का आकर्षण बना हुआ है क्योंकि इसमें रोजगार सुरक्षित रहने के साथ ही अनेक ऐसी सुविधाएं मिलती हैं जो निजी क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं। इसीलिये जब कोई राजनीतिक पार्टी रोजगार देने का चुनावी वायदा करती तो उसका अभिप्राय सरकारी नौकरी से ही होता है। बिहार चुनाव में महागठबंधन के घोषणापत्र में हर घर में एक सरकारी नौकरी देने के वायदे की देश भर में चर्चा है। उसके पूरा होने को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं परंतु इससे ये तो स्पष्ट होता ही है कि सरकारी नौकरी भारतीय समाज में सदाबहार बनी हुई है। यद्यपि पुरानी पेंशन व्यवस्था के समाप्त होने से कुछ आकर्षण कम हुआ है । इसीलिये अब उसकी बहाली भी चुनावी वायदों का हिस्सा बन गई है। तेजस्वी ने भी इसका वायदा किया जिसके बल पर कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में सफलता हासिल की। आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा होते ही वेतन और भत्तों में संभावित वृद्धि का हिसाब लगना शुरू हो गया। जाहिर है इस खबर ने सरकारी नौकरी की चाहत रखने वालों की उम्मीदें और बढ़ा दी हैं किंतु ये बात भी विचारणीय है कि भले ही सरकार के स्थायी कर्मचारियों की तन्ख्वाह और सुविधाएं कितनी भी बढ़ जाएं लेकिन नौकरियां दिन ब दिन घटती जा रही हैं। धीरे - धीरे बहुत से कामों के लिए सरकार निजी क्षेत्र की सेवाएं लेने लगी है। अपने वाहनों की जगह टैक्सी का उपयोग इसका एक उदाहरण है। इसी तरह अस्थायी, दैनिक भोगी और संविदा नियुक्तियों के जरिये कम वेतन और सुविधाएं देकर निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं बल्कि महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक तक नियुक्त किये जा रहे हैं। ऐसे हजारों प्रकरण मिलेंगे जिनमें एक अस्थायी कर्मचारी दशकों की सरकारी सेवा के बाद भी स्थायी नहीं हो सका। सरकार जिस तेजी से अपने उपक्रमों का विनिवेश कर रही है उसके कारण भी शासकीय नौकरियां कम हो रही हैं। इसीलिये सरकार पर रोजगार देने में विफल रहने का आरोप लगा करता है। वैसे निजी क्षेत्र का विस्तार होने से वह भी रोजगार के अवसर उपलब्ध करवा रहा है। आई.टी सेक्टर ने देश में युवाओं का एक नया वर्ग पैदा कर दिया जो उच्च मध्यम वर्गीय के तौर पर अपना जीवन शुरू करता है। उपभोक्ता बाजार की रौनक इसी तबके की वजह से है। लेकिन आठवें वेतन आयोग के गठन की खुशी के बीच इस मुद्दे पर भी विचार होना चाहिए कि क्या हम रोजगार विहीन विकास के शिकंजे में फंस रहे हैं? ए. आई नामक नई विधा से मानवीय रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। आठवां वेतन आयोग लागू होते ही बेशक सरकारी कर्मचारियों की बल्ले - बल्ले हो जायेगी किंतु नये रोजगारों का सृजन भी उतना ही जरूरी है अन्यथा वेतन वृद्धि के साथ ही सरकारी नौकरी के अवसर कम होना भविष्य में नई समस्या उत्पन्न करेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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