Thursday, 30 October 2025

तालिबानी हमलों से पाकिस्तान की चिंता और बढ़ी


इस्लामिक जगत में इन दिनों तुर्किये कुछ ज्यादा ही उछल रहा है। विशेष रूप से भारत के ऐलानिया दुश्मन पाकिस्तान की सरपरस्ती में वह चीन और अमेरिका से भी आगे निकलने के प्रयास में है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये में बने ड्रोन और मिसाइलों का पाकिस्तान ने काफी उपयोग किया किंतु भारत की अचूक रक्षा प्रणाली के सामने उनकी एक नहीं चली। संरासंघ में भी तुर्किये के प्रतिनिधि कश्मीर के मामले में पाकिस्तान की तरफदारी करते रहते हैं। हालांकि भारत के प्रति इस देश के शत्रुता भाव का कोई कारण समझ नहीं आता। लेकिन बीते कुछ समय से वह पूरी तरह से पाकिस्तान समर्थक हो गया है। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की जो पिटाई हुई उससे वह उबर पाता उसके  पहले ही अफ़ग़ानिस्तान के साथ चले आ रहे सीमा विवाद ने युद्ध का रूप ले लिया। पाकिस्तानी वायुसेना ने अफ़ग़ानिस्तान में घुसकर हमले किये तो अफ़ग़ानिस्तान के तालिबानी लड़ाकों ने जमीनी मोर्चों पर अपनी ताकत दिखाते हुए पाकिस्तान की अनेक चौकियों पर कब्जा करने के साथ ही उसके  सैकड़ों सैनिक मार दिये। तालिबानी हमलों का खौफ इतना ज्यादा है कि पाकिस्तानी सेना के लोग अब अफगानिस्तान की सीमा पर तैनाती से मना कर रहे  हैं। जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपना डेरा उठाया तब तालिबान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बेहद दोस्ताना दिख रहे थे जबकि भारत के साथ तो बोलचाल भी बंद थी। अमेरिका के  अफगानिस्तान में रहते तक भारतीय कंपनियों के पास बड़े - बड़े ठेके थे जो अधर में लटक गए। चीन भी तालिबानी हुक्मरानों की मिजाजपुर्सी में लगा था। लेकिन अचानक हालात ऐसे बदले कि तालिबानी शासकों की भारत से निकटता बढ़ने लगी।  इसके कारण वहाँ के विकास कार्यों में भारत की हिस्सेदारी बदस्तूर कायम रही और नये काम भी मिले। अफगानिस्तान की खाद्य समस्या को दूर करने के लिए भारत ने बड़ी मात्रा में अनाज भेजा। हाल ही में उसके विदेश मंत्री ने भारत की यात्रा भी की जिसके बाद काबुल में दूतावास संबंधी गतिविधियों  में वृद्धि हुई। विदेश मंत्री ने साफ कह दिया कि उनके देश की धरती का उपयोग भारत के विरुद्ध आतंकवाद के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इसी बीच खबर आई कि जिस बगराम एयर बेस को मांगने  अमेरिका धौंस दे रहा था वह अफगानिस्तान ने भारत को दे दिया। इन सबसे परेशान पाकिस्तान की मदद न अमेरिका कर रहा है और न ही चीन। ऐसे में उसने तुर्किये का सहारा लेकर अफगानिस्तान को ठंडा करने का दांव चला। लेकिन वह भी फुस्स साबित हुआ। तुर्किये ने दोनों देशों के बीच सुलह की जो बैठक अपने यहाँ आयोजित की उसमें पाकिस्तानी नुमाइंदे ने अफगानी प्रतिनिधियों की बहुत खुशामद की लेकिन वे नहीं पसीजे। इसीलिये बाद में बैठक में उपस्थित  पाकिस्तान के मंत्री ने तालिबानों को फिर से गुफाओं में भेजने जैसी धमकी दे डाली जो इस बात का संकेत है कि तुर्किये द्वारा की गई मध्यस्थता विफल हो गई तथा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा विवाद युद्ध की शक्ल में जारी रहेगा। इस्लामिक कट्टरता की प्रबल समर्थक कही जाने वाली  तालिबानी सत्ता का पाकिस्तान से दुश्मनी बढ़ाकर भारत से दोस्ती करना इस क्षेत्र के कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक समीकरणों में बड़े बदलाव का परिचायक है जिससे पाकिस्तान और चीन ही नहीं बल्कि अमेरिका भी हैरान है जो बगराम एयर बेस हथियाकर ईरान और चीन दोनों को अपनी मार में लेना चाहता था। दरअसल भारत और अफगानिस्तान की नजदीकियों से उक्त तीनों देशों के पेट में दर्द होने का बड़ा कारण पाकिस्तान की अखंडता पर मंडराता खतरा है। तालिबानी लड़ाकों के हमलों से भयभीत पाकिस्तान बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर से अपनी सैन्य टुकड़ियों को हटाने मजबूर हो गया है। जबकि इन दोनों इलाकों में  भी उसके विरुद्ध विद्रोह की स्थिति है। शुरू में पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को मुगालता था कि अफ़ग़ानिस्तान के पास संगठित सैन्यबल नहीं है। लेकिन अब तक की जो रिपोर्ट है उसके अनुसार तालिबानी लड़ाके भारी पड़ते दिख रहे हैं। ये जानकारी भी आ रही है कि अफगानिस्तान की पीठ पर भारत ने चूंकि हाथ रख दिया है इसलिए उसके हौसले बुलंद हैं। इसीलिये पाकिस्तान ने तुर्किये को बीच में डालकर तालिबानी लड़ाकों को रोकने का दाँव चला जो नाकामयाब साबित हुआ। इस लड़ाई का अंतिम परिणाम क्या होगा ये फ़िलहाल कहना कठिन है किंतु इतना जरूर है कि अपनी अंदरूनी झंझटों से जूझ रहे पाकिस्तान  को अफगानिस्तान के मोर्चे जो चुनौती मिल रही है उसका सामना करने में उसके पसीने छूट रहे हैं । तालिबानी लड़ाकों की लडाकू क्षमता पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है क्योंकि अमेरिका से लड़ने में वह खुद भी उनकी मदद करता रहा है। इसीलिये उसकी समझ में नहीं आ रहा कि उनसे कैसे निपटे? तुर्किये द्वारा की गई कोशिश विफल हो जाने के बाद उसकी चिंता और बढ़ गई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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