कुछ लोग बांग्ला देश में हुए सत्ता परिवर्तन को भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के विरुद्ध युवाओं के आक्रोश का परिणाम मानकर भारत में भी वैसा ही होने की उम्मीदें पाल रहे थे । लेकिन बांग्ला देश सरकार के मुख्य सलाहकार मो. युनुस और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच हालिया मुलाकात में हुए फैसले ने शेख हसीना के तख्ता पलट के असली कारण का पर्दाफाश कर दिया। जिसके अनुसार बांग्ला देश द्वारा सेंट मार्टिन द्वीप अमेरिका को 99 वर्ष के लिए पट्टे पर दिया जाएगा। हसीना सरकार पर ट्रम्प पहले कार्यकाल में इसके लिए दबाव बनाते रहे। उनके बाद बने राष्ट्रपति बाइडेन ने भी कोशिश की । जब सफलता हाथ नहीं लगी तब अराजक युवा आंदोलन खड़ा कर उन्हें देश छोड़ने बाध्य किया गया। उस घटनाचक्र में अमेरिका की भूमिका और स्पष्ट हो गई जब उसके यहाँ निर्वासित जीवन काट रहे नोबल विजेता मो. युनुस को बांग्ला देश की अंतरिम सरकार का सलाहकार बनाकर उसने सत्ता अप्रत्यक्ष तौर पर अपने हाथ में ले ली। ट्रम्प दोबारा सत्ता में लौटे तो शुरुआत में उन्होंने बांग्ला देश पर कड़ा रुख दिखाया क्योंकि युनुस चीन की तरफ झुकते दिखे किंतु अचानक वे ट्रम्प के शिकंजे में फंसने लगे जिसका परिणाम उक्त द्वीप को अमेरिका के हवाले करने संबंधी समझौता है। चूंकि बांग्ला देश में निर्वाचित संसद है नहीं लिहाजा युनुस सेना की सहमति लेकर उक्त फैसले पर मोहर लगवा लेंगे । 9 वर्ग किलोमीटर में फैला ये द्वीप बांग्लादेश से लगभग 8 किलोमीटर दूर है जिसके दक्षिण में मलक्का जलडमरूमध्य से दक्षिण पूर्व एशिया और चीन से आने वाले मालवाहक जहाज गुजरते हैं। विश्व का लगभग 30% माल परिवहन यहीं से होता है। ट्रम्प इस पर रिसॉर्ट का निर्माण कर बंगाल की खाड़ी में अमेरिका की उपस्थिति बढ़ाना चाहते हैं। ट्रम्प की योजना में 120 कि.मी पूर्व में मुख्य भूमि पर स्थित कॉक्स बाजार में एक नौसैनिक अड्डा बनाना भी शामिल है। जहाँ बांग्लादेश चीन को दो पनडुब्बियां तैनात करने की अनुमति दे चुका था । उसके बाद गत माह अमेरिकी नौसेना ने भी बांग्ला देश के साथ बंगाल की खाड़ी में अभ्यास भी किया । इस प्रकार बांग्ला देश, चीन और अमेरिका रूपी दो पाटों के बीच फंसता नजर आ रहा है। उसकी स्थिति भी पाकिस्तान जैसी होती जा रही है जो चीन का पालतू होने के साथ ही अमेरिका के सामने भी दुम हिलाने मजबूर है। सेंट मार्टिन पर रिसार्ट बनाकर अमेरिका दक्षिण एशिया में केवल चीन के साथ ही भारत पर भी दबाव बनाना चाहेगा जो उसके कहे अनुसार चलने राजी नहीं है। बांग्ला देश का यह निर्णय उसकी प्रभुसत्ता के लिए खतरा बनेगा क्योंकि अमेरिका उस द्वीप तक ही सीमित नहीं रहेगा। हाल ही में एक अमेरिकी जासूस की ढाका के होटल में रहस्यमय मौत के बाद जिस तरह उसकी लाश अमेरिकी दूतावास ने गायब करवाई उससे अमेरिका की किसी गुप्त कार्ययोजना का संदेह पुख्ता हुआ। कहते हैं उस हत्या में चीन का हाथ था। असल में अफगानिस्तान से पैर उखड़ने के बाद अमेरिका को भी एशिया में कोई अड्डा चाहिए था। पाकिस्तान से उसने बलूचिस्तान की अपार खनिज संपदा हासिल करने का समझौता तो कर लिया किंतु चीन पर दबाव बनाने के लिए वह भरोसे लायक नहीं है। भारत की रूस से नजदीकियां भी ट्रम्प को अखर रही हैं। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह भारत की विदेश नीति को स्वतंत्र बनाया उससे अमेरिका को लगने लगा कि वह चीन के विरुद्ध भारत को अपना औजार नहीं बना सकेगा क्योंकि दोनों ब्रिक्स में साथ मिलकर अमेरिका के प्रभुत्व को तोड़ने प्रयासरत हैं। ये सब देखते हुए ट्रम्प ने बांग्ला देश पर दबाव बनाया जो हसीना के तख्ता पलट के बाद से ही अस्थिरता में फंसा है। रिसार्ट के बहाने वहाँ अमेरिका का कदम रखना चीन के लिए खतरे की घंटी तो है ही किंतु भारत को भी सावधान रहना होगा। अमेरिका मो. युनुस को कितने दिन ढोएगा ये कहना भी कठिन है क्योंकि अंततः वहाँ चुनाव होंगे ही। हसीना की अनुपस्थिति में सत्ता कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं के हाथ आने का खतरा है। अमेरिका इसे शायद ही पसंद करेगा । ऐसे में वहाँ नई ताकतें उभर सकती हैं। ये भी संभव है कि सेंट मार्टिन सौदे को रोकने चीन , बांग्ला देश में अपने समर्थकों के जरिये अस्थिरता पैदा कर अंतरिम सरकार पर तत्काल चुनाव करवाने का दबाव बनवाए । कुल मिलाकर शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद भी बांग्ला देश में स्थिरता आने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। मो. युनुस को अमेरिका की मदद से सत्ता तो मिल गई किंतु अब वह उसकी कीमत मांग रहा है जिसका भुगतान बांग्ला देश को महंगा पड़ेगा क्योंकि चीन भी अमेरिका को अपने करीब अड्डा बनाने में रोड़े अटकाए बिना नहीं रहेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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