Thursday, 9 October 2025

इजराइल का अस्तित्व स्वीकारने में ही मुस्लिम देशों की भलाई


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने हमास और इजराइल के बीच  युद्ध रुकवाकर शांति प्रक्रिया शुरू करवा दी। इसके अंतर्गत इजरायल  गाजा पट्टी के उन इलाकों को खाली कर देगा जिन पर उसने कब्जा कर लिया। साथ ही दोनों एक दूसरे के बंधक छोड़ेंगे। हालांकि ये शर्त इजराइल को महंगी पड़ेगी क्योंकि उसके पास हमास के बड़े आतंकी हैं जिन्हें रिहा करना आदमखोर शेर को पिंजरे से निकालने जैसा होगा। लेकिन उस पर अपने बंधकों को छुड़ाने का जो घरेलू दबाव है उसकी वजह से वह हमास के आतंकियों को रिहा करने बाध्य है। ट्रम्प के अनुसार अंतर्गत इजरायल गाजा से अपने सैनिक  हटाना शुरू कर देगा।  गाजा के पुनर्निर्माण को लेकर  ट्रम्प से हमास कितना सहमत होगा ये कह पाना फिलहाल कठिन है क्योंकि अमेरिका गाजा पट्टी को दुबई जैसा विकसित करने की योजना बना रहा है। वह चाहता है   हमास गाजा का शासन छोड़कर आतंकी गतिविधियां बन्द कर दे। उल्लेखनीय है  गाजा पट्टी का प्रशासन 2007 में हमास ने हथिया लिया था । कहने को तो वह एक राजनीतिक आंदोलन था लेकिन ईरान सहित कुछ अन्य मुस्लिम देशों की मदद से उसने आतंकवादियों जैसा ढांचा खड़ा कर लिया। और इसीलिए वह इजराइल के अस्तित्व को ही मान्य नहीं करता। 7 अक्टूबर 2023 को उसने इजराइल पर सैकड़ों राकेट और ड्रोन से बड़ा हमला किया। उसके लड़ाकों ने इजराइल में घुसकर बड़े पैमाने पर हत्याएं कीं और  बड़ी संख्या में इजराइली नागरिकों को बंधक बनाकर ले गए। अपनी अभेद्य सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगने से  प्रधानमंत्री नेतन्याहू सवालों के घेरे में आ गए। हमास ने वह दुस्साहस क्यों और कैसे किया इसका खुलासा भी जल्द हो गया। दरअसल  इजराइल और सऊदी अरब के बीच  समझौते की बातचीत अंतिम चरण में थी। उसके पहले संयुक्त अरब अमीरात  से भी इजराइल का समझौता हो चुका था। ऐसे में ईरान और तुर्किये को लगा कि मुस्लिम संपन्न देश इजराइल से  रिश्ते बना लेंगे तो  फिलीस्तीनियों का अपना देश बनाने का सपना हमेशा के लिए टूटकर रह जाएगा। इसीलिए उनने हमास को उकसाकर  हमला करवा दिया। प्रतिक्रियास्वरूप नेतन्याहू ने जो पलटवार किया उसके कारण सऊदी अरब और इजराइल के बीच की बातचीत तो रुक गई लेकिन इजराइल हमास को नेस्तनाबूत करने के लिए गाजा को तबाह  करने पर आमादा हो उठा। उसके बाद जो हुआ वह पूरी दुनिया ने देखा। गाजा तक ही सीमित न रहकर लेबनान और यमन पर भी इजराइल ने  कहर बरपाया जहाँ हिजबुल्ला और हूथी जैसे इस्लामिक आतंकी संगठन उस पर हमले कर रहे थे। गाजा को इजराइल के हमलों ने खंडहर में बदल दिया। हजारों लोग मारे गए। लाखों बेघर हो गए। भोजन - पानी, दवाओं का टोटा हो गया। बिना इलाज के हजारों बच्चे चल बसे। कुल मिलाकर गाजा पट्टी पूरी तरह से तबाह हो गई ।  लेकिन हमास को ईरान और टर्की से अस्त्र - शस्त्रों की आपूर्ति जारी रहने से वह घुटने टेकने तैयार नहीं हुआ। और तब इजराइल ने ईरान को निशाना बनाया। कहने को तो उसके परमाणु बम बनाने की क्षमता को नष्ट करना था किंतु असली उद्देश्य उसे हमास की मदद से रोकना था। अमेरिका ने भी ईरान के परमाणु संयंत्रों पर अपने सबसे शक्तिशाली बमवर्षकों से हमला किया। जिसके बाद उसके तेवर ढीले पड़े और गाजा में युद्धविराम की पटकथा तैयार होने लगी। इस बीच अनेक यूरोपीय देशों ने फिलीस्तीन को स्वतंत्र देश की  मान्यता देकर इजराइल पर दबाव बनाना चाहा किंतु नेतन्याहू विचलित नहीं हुए। फिलीस्तीन के अस्तित्व को स्वीकार करने वे किसी भी स्थिति में राजी नहीं हैं। संरासंघ महासभा में उनका हालिया भाषण इसका प्रमाण है। लेकिन नोबल शांति पुरस्कार के लिए हाथ पाँव मार रहे ट्रम्प ने इजराइल पर दबाव बनाकर युद्धविराम के लिए राजी कर लिया। नेतन्याहू इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं थे। उनकी दूरगामी योजना हमास को समूल नष्ट करने के अलावा गाजा पर पूर्ण आधिपत्य बनाये रखने की थी। लेकिन ट्रम्प के मन में गाजा को लेकर कुछ अलग ही पक रहा है और इसीलिये वे हमास को धमकाने के साथ ही इजराइल पर भी दबाव बनाने से बाज नहीं आये।  जबकि इजराइली प्रधानमंत्री सांप का फन कुचलने के लिए अड़े थे। ट्रम्प जिस तरह की कूटनीति का प्रदर्शन कर रहे हैं उसमें गंभीरता का अभाव होने के साथ ही विश्वसनीयता की भी कमी है।  अपनी सनक में वे इजराइल की सुरक्षा की अनदेखी  कर रहे हैं। हमास को अधमरा छोड़ना अमेरिका के लिए भी अच्छा नहीं क्योंकि ईरान और तुर्किये जैसे  संरक्षक उसे फिर ताकतवर बनाये बिना नहीं रहेंगे। इजराइल पर आरोप लगता है कि उसने गाजा में निरपराध नागरिकों को मारा , हजारों बच्चे अनाथ हो गए।  लेकिन इसका असली दोषी तो हमास है जिसने दो साल पहले इजराइल पर अकारण हमला कर उसे उकसाया था। बेहतर तो यही होता कि गाजा को इजराइल के हवाले कर दिया जाए जिससे भविष्य में  युद्ध की चिंगारी फिर न भड़के। मुस्लिम देशों को ये स्वीकार करना ही होगा कि इजराइल एक वास्तविकता है और उसके साथ बेहतर रिश्ते बनाना उनके लिए भी फायदेमंद है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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