Wednesday, 29 May 2019

खुद विफल रहीं प्रियंका दूसरों को डांट रहीं

ऐसा लगता है कार्यकर्ताओं की भावनाओं का दोहन करते हुए पार्टी पर अपना आधिपत्य बनाए रखने हेतु गांधी परिवार अपने परंपरागत खेल को जारी रखे हुए है। एक तरफ तो राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद छोडऩे को लेकर अनिश्चितता बनाकर रखी जा  रही है वहीं दूसरी  तरफ  उन्हें मनाने का नाटक भी समानांतर चल रहा है। ये भी सुनाई दे रहा है कि श्री गांधी ने यहाँ तक कह दिया है कि नया अध्यक्ष उनके परिवार से बाहर का हो। लेकिन इन सबके बीच उनकी बहिन और कांग्रेस की नई नवेली महासचिव प्रियंका वाड्रा जिस तैश में बड़े - बड़े नेताओं से चुनावी पराजय पर सफाई मांगते हुए डांट-फटकार कर रही हैं उससे तो यही लगता है कि गांधी परिवार पार्टी को अपनी निजी जागीर समझकर बाकी सबको अपना अनुचर समझता है। राहुल गांधी का बतौर अध्यक्ष हार के नतीजों पर नेताओं से सफाई मांगना तो समझ आता है लेकिन श्रीमती वाड्रा को उनके भाई ने चुनाव की घोषणा के बाद अचानक महासचिव नियुक्त करते हुए पूर्वी उप्र का प्रभार सौंपा था। उनके साथ मप्र के ज्योतिरादित्य सिंधिया को महासचिव नियुक्त करते हुए पश्चिमी उप्र में कांग्रेस को जिताने की कमान सौंपी गई। उप्र में पार्टी दुर्दशा की पराकाष्ठा तक जा पहुँची और प्रियंका जमीन आसमान एक करने के बाद भी अमेठी में राहुल तक को हारने से नहीं बचा सकीं जबकि इस सीट से  उनके पिता, माता और भाई जीतते रहे हैं। अमेठी के अलावा अवध और पूर्वी उप्र की सभी सीटों पर कांगे्रस औंधे मुंह गिरी जिसके लिए प्रियंका वाड्रा खुद कठघरे में खड़े किये जाने लायक हैं। कहाँ तो वे वाराणसी में नरेंद्र मोदी को घेरने का हौसला दिखा रही थीं और कहाँ अपना घर बचाने में ही नाकामयाब रहीं। आश्चर्य की बात ये है कि जो राहुल गांधी दूसरे  नेताओं को पुत्र और परिवार प्रेम पर फटकार रहे हैं वे अपनी बहिन से ये पूछने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे  कि वे भी रायबरेली और अमेठी में ही ध्यान लगाए रहीं जिसका खामियाजा अगल-बगल की सीटों पर भी पार्टी को भोगना पड़ा। जब चुनाव पूरे शबाब पर था तब उनका ये बयान कांग्रेस की डूबती नाव में छेद कर गया कि पार्टी ने उप्र में बहुत से उम्मीदवार वोट कटवा के तौर पर खड़े किये  हैं। यदि उनकी जगह किसी अन्य कांग्रेसी नेता ने वह बयान दिया होता तब उसकी शामत आ गई होती लेकिन प्रियंका के बोलने पर सवाल करने की हिम्मत भला कौन दिखाता ? अब ऐतिहासिक पराजय के बाद राहुल गांधी ने दिखावे के लिए ही सही लेकिन इस्तीफ़े  की पेशकश करते हुए पार्टी के माथे पर लगे गांधी परिवार  निशान को अलग करने की बात कहते हुए वरिष्ठ नेताओं पर पुत्र प्रेम में डूबे रहने का आरोप लगाया तब निष्पक्षता का तकाजा है उन्हें अपनी बहिन से भी पूछना चाहिए कि उनके प्रभार वाली उप्र की सीटों पर कांग्रेस का कबाड़ा क्यों और कैसे हो गया और अमेठी में पार्टी की खस्ता हालत का अंदाजा वे क्यों नहीं लगा सकीं ? लेकिन इंग्लेंड मे King can do no wrong(राजा गलती कर ही नहीं सकता ) कांग्रेस में गांधी परिवार पर पूरी तरह फिट बैठती है। वरना जिस तरह से बड़े - बड़े नेताओं से सवाल पूछे जा रहे हैं उसी तरह का व्यवहार प्रियंका वाड्रा के साथ भी होना चाहिए। अखबारी खबरों के मुताबिक कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और उसके बाद श्रीमती वाड्रा वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं पर इस बात के लिए जमकर बरसीं कि जिस तरह राहुल नरेंद्र मोदी पर चौकीदार चोर कहकर हमलावर थे वैसा ही बाकी सभी ने क्यों नहीं किया? अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने पार्टी के अन्य छत्रपों पर उदासीन रहने का आरोप ही मढ़ दिया। गत दिवस राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की जिस तरह से प्रियंका ने खिचाई की उससे तो लगता है राहुल से ज्यादा वे गुस्से में हैं जबकि उनकी हैसियत पार्टी संगठन के बाकी महासचिवों के बराबर की ही है। ये सब नाटकबाजी देखते हुए ये कहना पड़ता है कि गांधी परिवार केवल श्रेय लेना चाहता है। जब भी पार्टी पराजय झेलती है या उसकी स्थिति खराब होती है तब-तब गांधी परिवार ऐसी ही स्थिति पैदा करते हुए पार्टी में विभाजन करवा देता है या फिर अपनी गलतियों की सजा शक्तिहीन नेताओ को बली का बकरा बानकर दे देता है। सही बात तो ये है कि लोकसभा चुनाव की पराजय के लिए केवल और केवल राहुल और पूरा गांधी परिवार जिम्मेदार है जो कांग्रेस पर कुंडली मारकर बैठ गया है और बाकी नेताओं को दरबारी समझता है। यदि राहुल में तनिक भी ईमानदारी है तब उन्हें सबसे पहले प्रियंका वाड्रा से इस्तीफा लेना चाहिए था जिन्हें ब्रह्मास्त्र मानकर मैदान में उतारा गया लेकिन वे पूरी तरह बेअसर ही नहीं अपितु नुकसानदेह साबित हुईं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 May 2019

अगला लक्ष्य साम्यवाद मुक्त भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय दल का नेता चुने के बाद संसद के केंद्रीय कक्ष में पूरे एनडीए नेतृत्व के सामने अपने लम्बे भाषण में राजनीतिक विचारधाराओं का जिक्र करते हुए कहा कि आज की राजनीति में गांधी , लोहिया और दीनदयाल नामक तीन धाराओं से निकले लोग हैं। उनका आशय मुख्यत: कांग्रेस , समाजवादी खेमा और भाजपा से था। सामान्य तौर पर राजनीतिक विश्लेषक इन्हीं तीन का उल्लेख किया करते हैं। दक्षिण भारत की विशिष्ट शैली को छोड़ दें तो अधिकांश राजनेता और पार्टियों का उद्गम स्थल यही हैं। कुछ क्षेत्रीय दल जैसे तेलगु देशम , तृणमूल कांग्रेस , टीआरएस (तेलंगाना राज्य परिषद), वाई एसआर कांग्रेस जहां कांग्रेस से अलग होकर बने वहीं लालू , मुलायम , शरद यादव , रामविलास पासवान, देवेगौड़ा आदि समाजवादी शिविर से निकले। बीजू जनता दल में कांग्रेस और समाजवादी दोनों का समावेश है। भाजपा की अपनी मौलिक पहिचान है जिसके मूल में हिंदूवादी राष्ट्रवाद है जिसका कुछ अंश शिवसेना में भी देखा जा सकता है। अकाली दल और छोटे-छोटे दूसरे क्षेत्रीय दल मुख्यधारा में नहीं हैं इसलिए उनका वैचारिक आधार उल्लेखनीय नहीं है। लेकिन प्रधानमंत्री ने एक प्रमुख वैचारिक शाखा का उल्लेख नहीं किया जिसे साम्यवादी या वामपंथी कहा जाता है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि कांग्रेस यद्यपि राजनीतिक तौर पर भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंदी है लेकिन वैचारिक दृष्टि से उसका मुकाबला वामपंथ से ही है क्योंकि जो राष्ट्रवाद और हिंदुत्व भाजपा का सैद्धांतिक आधार है उसे वामपंथ पूरी तरह से नकार देता है। राष्ट्रवाद को वह संकुचित सोच और धर्म को अफीम मानता है। आज़ादी के पहले से ही देश में वामपंथ की जड़ें जम चुकी थीं। उन्होंने गांधी जी और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को लेकर जो कहा वह इतिहास का अमिट हिस्सा है। आज़ादी के बाद तेलंगाना का सशस्त्र विद्रोह वामपंथियों के भारत विरोधी दुस्साहस का उदाहरण था। सोवियत संघ की बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित पं नेहरू की सरकार ने जब केरल की नंबूदरीपाद सरकार को बर्खास्त किया तब उसके पीछे उनके मन में साम्यवादी खतरे से उत्पन्न भय ही होगा। हालांकि नेहरू जी के इर्दगिर्द सदैव वामपंथ में दीक्षित लोगों का जमावड़ा रहा जिनमें वीके कृष्णा मेनन का नाम प्रमुख था। जब वामपंथियों को लगा कि वे भारत में रूस और चीन जैसी क्रांति नहीं करवा सकेंगे तब उन्होंने नक्सलवाद जैसा छद्म रास्ता अपनाया लेकिन उसके बाद भी वे अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। बंगाल और केरल के अलावा देश के विभिन्न राज्यों में जहां उनका प्रभाव क्षेत्र रहा वहां से उनके सांसद चुनकर आते रहे किन्तु अब वे सुनहरे दिन बीत चुके हैं और साम्यवाद कुछ बुद्धिजीवियों के अलावा शहरी नक्सलियों तक सीमित रह गया है। हालांकि माओवाद अभी भी हिंसा के जरिये अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता रहता है लेकिन धीरे-धीरे उसका प्रभाव भी घट रहा है। क्योंकि बीते पांच वर्ष में उनको विदेश से मिलने वाली सहायता पर काफी रोक लगी है। वहीं बुद्धिजीवियों की जमात में घुसे वामपंथियों की भी जमकर फजीहत होने से वे रक्षात्मक होने को बाध्य हो गए हैं। जेएनयू जैसे उनके अड्डों की असलियत भी जिस तरह राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनी उससे वामपंथी पूरी तरह बेनकाब हो गए। इसका परिणाम लोकसभा चुनाव में साम्यवादियों के सफाए के तौर पर सामने आया। बेगूसराय में कन्हैया कुमार को देश भर के साम्यवादियों ने अपनी प्रतीकात्मक लड़ाई का हिस्सा बनाना चाहा किन्तु वह कामयाब नहीं हुआ। बंगाल और केरल में भी वामपंथी कुछ खास नहीं कर सके। शायद यही वजह रही कि नरेंद्र मोदी ने उन्हें उल्लेख करने लायक तक नहीं समझा। हो सकता है भाजपा की रणनीति ही वामपंथियों को पूरी तरह उपेक्षित करने की हो किन्तु ये बात भी सही है कि केरल में सरकार होने के बावजूद राष्ट्रीय राजनीति में साम्यवाद अब हाशिये से भी बाहर होने लगा है। त्रिपुरा और बंगाल में वह अस्तित्वहीन हो चला है। अन्य राज्यों में एक भी लोकसभा सीट ऐसी नहीं है जिसे वामपंथियों का अभेद्य गढ़ कहा जा सके। त्रिपुरा और बंगाल में भाजपा का अभ्युदय वामपंथ के विकल्प के तौर पर ही हो सका है। भाजपा भी जानती है कि उसका अंतिम वैचारिक संघर्ष वामपंथियों से ही होगा। नरेंद्र मोदी केवल भाजपा के चुनावी चेहरे नहीं बल्कि वैचारिक प्रतीक भी हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी की शैली से अलग विचारधारा के प्रस्तुतीकरण में बेहद मुखर और कठोर भी हैं। ऐसा लगता है अपने दूसरे कार्यकाल में श्री मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की जगह वामपंथ मुक्त भारत पर ध्यान केंद्रित करेंगे लेकिन ये काम बिना शोर -शराबे के होगा क्योंकि साम्यवाद राजनीतिक ताकत बनने की स्थिति खोता जा रहा है। यही बात है 23 मई के बाद से ही छद्म वामपंथियों ने रुदन-क्रंदन शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर घृणा का प्रसार तेज कर दिया गया है। भय के नए भूत पैदा करने का अभियान भी शुरू हो चुका है। इसका असर क्या होगा ये कहना कठिन है क्योंकि उदारीकरण के बाद की नई पीढ़ी में साम्यवाद को लेकर कोई आकर्षण नहीं है। कांग्रेस और भाजपा विरोधी दूसरी पार्टियों को धराशायी करने के बाद नरेंद्र मोदी वामपंथ की जड़ों में मठा डालने से बाज नहीं आएंगे। उस दृष्टि से आगामी पांच साल बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 May 2019

कांग्रेस को परिवार की बजाय विचार आधारित बनना चाहिए

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अब अनुभवहीन कहना गलत होगा। लोकसभा में तीन कार्यकाल वे पूरे कर चुके हैं। बतौर पार्टी उपाध्यक्ष भी वे वस्तुत: अध्यक्ष का कार्यभार ही सम्भाल रहे थे। सोनिया गांधी ने बिगड़ते स्वास्थ्य और बढ़ती आयु की वजह से उन्हें अध्यक्ष का पदभार भी सौंप दिया था। जिसे सभी कांग्रेसजनों ने बिना किसी एतराज के स्वीकार कर लिया। उसके बाद अनेक राज्यों के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस को मिली-जुली सफलता मिली। उस वजह से ये कहा जाने लगा कि श्री गांधी में परिपक्वता और क्षमता दोनों आ गए हैं। विशेष रूप से गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर देने और कर्नाटक में उसको सबसे बड़ी पार्टी होने पर भी सरकार बनाने से रोकने के बाद ये माना जाने लगा कि वे नरेंद्र मोदी के विकल्प बन सकते हैं। कम से कम विपक्ष के अन्य किसी भी युवा अथवा वरिष्ठ नेता की अपेक्षा राहुल को जानने और चाहने वाले अपेक्षाकृत अधिक होते जा रहे थे। बीते वर्ष दिसम्बर में मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भाजपा से सत्ता छीनकर कांग्रेस ने जो कारनामा किया उसने श्री गांधी की लोकप्रियता को और बढ़ा दिया। उसके बाद वे जिस तरह से आक्रामक हुए उससे ये एहसास भी होने लगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी के लिए कठिन चुनौती खड़ी कर देंगे। ज्यों-ज्यों चुनाव करीब आते गए त्यों-त्यों श्री गांधी प्रधानमंत्री के प्रति और कठोर होते गए। जिस अंदाज में वे श्री मोदी को बहस के लिए उकसाते हुए चौकीदार चोर का नारा लगाते रहे उससे उनके आत्मविश्वास की झलक मिलती थी। आखिरी चरण के मतदान के उपरांत तो श्री गांधी ने खुले आम मोदी सरकार की विदाई की भविष्यवाणी कर डाली। यद्यपि कांग्रेस के बहुमत की बात उन्होंनें कभी नहीं कही किन्तु उसके समर्थन से एक मिली जुली सरकार बनाने का दावा वे पूरी जोरदारी से करते रहे। लेकिन 23 मई की दोपहर आते-आते तक उनकी उम्मीदें धूल में मिल चुकी थीं। कांग्रेस के 100 सीटों तक पहुंचने के अनुमान भी ध्वस्त हो गए। बमुश्किल वह 50 की संख्या पार कर सकी किन्तु मान्यता प्राप्त विपक्षी दल बनने की उसकी इच्छा अधूरी रह गई। सबसे ज्यादा शर्मनाक तो ये हुआ कि राहुल अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी ही हार गए। बड़ी संख्या में ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। उसके साथ जुड़े सहयोगी दलों में सिर्फ  द्रमुक ही तमिलनाडु में शानदार प्रदर्शन कर सकी। तेलुगु देशम तो पूरी तरह से फुस्स हो गई। पंजाब छोड़कर कांग्रेस कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं बची। इस शर्मनाक पराजय के बाद श्री गांधी की जो छवि में जो इजाफा हुआ था वह काफूर हो गया। वे एक निरीह और लाचार सेनापति के तौर पर देखे जाने लगे। जो राजनीतिक विश्लेषक उन्हें श्री मोदी का विकल्प मान बैठे थे वे ही कहने लगे कि उन दोनों के बीच कोई बराबरी ही नहीं थी। और यही वह सच है जिसे कांग्रेस को समझना चाहिए। बहरहाल परिणामों से उत्पन्न निराशा या यूं कहें कि खीझ की वजह से कांग्रेस कार्यसमिति की समीक्षा बैठक से पहले उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद से अपने इस्तीफे का शिगूफा छोड़कर ये प्रचारित करवा दिया कि श्रीमती गांधी और डॉ मनमोहन सिंह ने उन्हें रोक रखा है। बैठक में क्या हुआ ये तो खुलकर बाहर नहीं आया लेकिन कहते हैं सभी सदस्यों द्वारा उनका समर्थन किये जाने पर भी राहुल ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ये शर्त भी रखी कि वह गांधी परिवार से बाहर का हो। इसके साथ ही उन्होंने अनेक नेताओं के पुत्र प्रेम पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी करते हए कहा कि वे पार्टी छोड़कर उन्हें जिताने में लगे रहे। जबकि वे स्वयं भी पुत्र मोह के चलते ही कांग्रेस अध्यक्ष बन बैठे। बैठक में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को बड़ी जिम्मेदारी देने की बात भी उठी। बैठक बेनतीजा खत्म हो गई। बाद में जब अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिद्धू की शिकायत हेतु मिलने का समय मांगा जो श्री गांधी ने उन्हें नहीं दिया। इससे ये साबित हो गया कि इतनी बड़ी हार के बावजूद वे अपनी कार्यशैली बदलने तैयार नहीं हैं। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद राहुल ने अपनी बहिन प्रियंका वाड्रा को महासचिव बनाकर पूर्वी उप्र का प्रभार सौंप दिया। ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई जैसे प्रियंका वह ब्रह्मास्त्र हैं जिसे गांधी परिवार ने इस मौके के लिए बचाकर रखा था। फिल्मी स्टाइल में उन्होंने अपना प्रचार शुरू कर दिया और इसी बीच वाराणसी से श्री मोदी के विरुद्ध लडऩे के संकेत भी दे दिए लेकिन बाद में जो हुआ वह सर्वविदित है। कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वह गांधी और अब वाड्रा परिवार के अलावा कुछ और सोचने की मन:स्थिति में ही नहीं आ पाती। प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा अनेक मामलों में फंसे हैं। ऐसे में ये माना गया कि उनके बचाव के लिए ही वे राजनीति में सक्रिय हुईं। होना तो ये चाहिए कि श्री गांधी पार्टी में गम्भीर किस्म के नेताओं से अपनी गलतियों और पार्टी की कमियों के बारे में सही जानकारी हासिल करते हुए उनमें सुधार की तैयारी करते। आगामी महीनों में कई राज्यों के चुनाव होने वाले हैं। उनमें उतरने तथा पार्टीजनों में उत्साह का संचार करने के लिए जरूरी है नेतृत्व की अपनी दिशा और सोच स्पष्ट हो जिसका कांग्रेस में सर्वथा अभाव है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेंद्र हुड्डा, मिलिंद देवड़ा, तरुण गोगोई, मल्लिकार्जुन खडग़े और उन जैसे तमाम सक्रिय और सक्षम सांसदों के हार जाने से लोकसभा में पार्टी के पास नेता बनाने लायक तक कोई नहीं बचा। सोनिया जी कभी-कभार बोलती हैं और राहुल अभी तक संसदीय बहस में खुद को स्थापित नहीं कर सके। ऐसी स्थिति में पहले ही सत्र में भाजपा कांग्रेस पर दबाव बनाने का पुरजोर प्रयास करेगी। बेहतर हो राहुल और कांग्रेस ईवीएम और मीडिया जैसे बहाने छोड़कर हार के असली कारणों को समझें और उन कमियों को दूर करने का प्रयास तेज करें जिनकी वजह से जनता ने उन्हें पूरी तरह खारिज कर दिया। हालांकि इतनी बुरी हार के बाद तत्काल उबरना बहुत कठिन होता है लेकिन कांग्रेस को भाजपा से सीखना चाहिए जिसने पांच महीने पहले अपने कब्जे वाले तीन प्रमुख राज्य गंवाने के बाद बजाय निराश होने के अपने को मुकाबले के लिए तैयार कर लिया और पूरे देश में झंडा गाडऩे में कामयाब हो गई। राहुल गांधी को ये बात महसूस कर लेना चाहिए कि अब गांधी परिवार का वह रुतबा और ग्लैमर नहीं बचा। वरना अमेठी में इतनी बुरी हार नहीं हुई होती। गुना से श्री सिंधिया की चौंकाने वाली हार ने नव सामंतवाद के दिन पूरे होने की पुष्टि कर दी। कांग्रेस के आधा दर्जन से ज्यादा पूर्व मुख्यमंत्रियों और उनके बेटों की पराजय भी पार्टी के भीतर बड़े बदलाव की जरूरत की तरफ  इशारा है। राहुल को ये भी समझ लेना चाहिए कि उन्हें गठबंधन करते समय ज्यादा विवेकशील और सतर्क रहना होगा। कर्नाटक में सरकार बनाने की आपाधापी कांग्रेस को कितनी महंगी पड़ी ये सबके सामने है। बिहार में लालू का मोहपाश उसे ले डूबा। यदि राहुल वाकई पद छोडऩा चाहते हैं तब उन्हें पार्टी में खुलापन लाना चाहिए। भाजपा में मोदी-शाह के आभामंडल के पीछे रास्वसंघ का विशाल संगठन भी है जिसके बिना पार्टी बंगाल सहित पूर्वोत्तर राज्यों में इतनी सफल कभी नहीं हुई होती। वहीं कांग्रेस में संगठन केवल कागजों पर बचा है। राहुल ने जिस तरह हिन्दू मतों को लुभाने की कोशिश की वह दिखावटी होने से जनता को आकर्षित नहीं कर सकी। ऐसे में उसे अल्पसंख्यक प्रेम से ऊपर उठकर बहुसंख्यकों का भरोसा जीतना होगा। यदि अब भी कांग्रेस गांधी परिवार के करिश्मे पर निर्भर बैठी रही तब उसका पुनरुद्धार मुश्किल होगा। देश की सबसे पुरानी पार्टी का लगातार दुरावस्था की तरफ बढऩा ठीक उसी तरह खतरनाक होगा जैसा एक जमाने में उसका विकल्प नहीं होने के समय था। बेहतर होगा गांधी परिवार भी इस सच्चाई को समझे कि कांग्रेस उसके बिना भी चल सकती है। भाजपा ने 2004 की पराजय के दस वर्ष बाद ही राष्ट्रीय राजनीति में खुद को मजबूती से स्थापित करते हुए ये साबित कर दिया कि अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व के बिना भी वह सफलता के शिखर को छू सकती है। कांग्रेस भी परिवार छोड़ यदि विचार आधारित बने तब ही उसका भविष्य है वरना क्या होगा ये बताने की जरूरत नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 May 2019

जो कहा करके दिखाओ : अब नहीं चलेगा बहाना

बीते पांच साल तक नरेंद्र मोदी हर समस्या के लिए नेहरु जी से लेकर मनमोहन सरकार तक पर दोषारोपण करते रहे । 2014 के चुनाव प्रचार में उन्होंने 60 महीने मांगे थे देश की दशा और दिशा ठीक करने के लिए। उसके बाद उन्होंने जितना किया और जितना नहीं कर पाए वह सब लोगों के सामने है। उनकी उपलब्धियों, विफलताओं और उनके लिए बनाये गये बहानों पर जनता ने आँख मूंदकर भरोसा किया और जैसा उनने स्वयं कहा कि फकीर की झोली भर दी। 303 सीटों के विशाल बहुमत के साथ 21 वीं सदी के सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उनका उभरना एक बड़ी घटना है। लेकिन इस ऐतिहासिक सफलता ने श्री मोदी से उम्मीदें और अपेक्षाएं भी उतनी ही बढ़ा दी हैं। अब न वे कांग्रेस के 50 साल के शासन को कोस सकेंगे और न ही सहयोगी दलों के दबाव को ढाल बनाकर बच निकल सकेंगे। पिछला कार्यकाल उन्हें प्रशिक्षु के तौर पर मिला था लेकिन अब वे पूरी तरह देश के सत्ता संचालन में अनुभवी हो चुके हैं। सरकार की क्षमता और कमियों दोनों का उन्हें ज्ञान हो गया होगा। अपने साथी मंत्रियों और सांसदों की काबलियत भी उन्होंने परख ली होगी। भाजपा संगठन के भीतर कोई चुनौती उनके सामने नहीं है। जनमानस मोदी मैजिक से अभिभूत है। वैश्विक परिदृश्य सर्वकालीन अनुकूल है। आर्थिक हालात बहुत अच्छे न होते हुए भी नियन्त्रण में हैं, जिन कड़े निर्णयों की वजह से बीते कुछ साल तक प्रधानमंत्री को आम जनता और व्यापारी विरोधी प्रचारित किया गया उनके अच्छे परिणाम आने का समय आ गया है। विपक्ष भी किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करने की स्थिति में नहीं बचा। सरकार की स्थिरता के साथ ही राज्यसभा में बहुमत की किल्लत लगभग खत्म हो चुकी है। नवीन पटनायक और जगन रेड्डी जैसे नए साथी एनडीए की ताकत और बढ़ा सकते हैं वहीं नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे जैसे सहयोगी टांग अड़ाने की हैसियत खो चुके हैं। पार्टी में डांटने फटकारने वाले बुजुर्गों का युग समाप्तप्राय है। रास्वसंघ भी मोदी मैजिक की आभा से चकाचौंध में है। शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी अप्रासंगिक होकर रह गए। ये सब देखते हुए अब श्री मोदी को वह सब करके दिखाना होगा जिसके लिए देश की जनता ने केवल अपना मत नहीं वन विश्वास उन्हें सौंपा है। चुनाव परिणाम पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में उन्होंने सबका साथ सबका विकास के साथ सबका विश्वास भी जोड़ दिया और यही उनके ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है। इसलिए उन्हें ये साबित करना होगा कि वे इस विश्वास की रक्षा करेंगे। राष्ट्रवाद एक चुनावी मुद्दा बनकर न रह जाए ये देखना जरूरी है। मोदी है तो मुमकिन का नारा वास्तविकता में बदलना ही दूसरी पारी की सफलता की कसौटी बनेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी