Monday, 8 June 2020

पैसा मिले न मिले पर अनमोल दुआएं मिल सकती हैंनिजी चिकित्सकों के लिए छवि सुधारने का बेहतरीन अवसर




 
बीते कुछ दिनों से कतिपय निजी अस्पतालों में कोरोना के मरीजों का इलाज करवाने वालों को जिस तरह लूटा गया उसे लेकर काफी हल्ला मचा | रियायती दरों पर सरकार से जमीनें लेकर आलीशान अस्पताल बनाने के बाद इलाज में किसी  भी प्रकार की रियायत नहीं करने और कोरोना मरीजों को भर्ती करने में  आनाकानी किये जाने पर अनेक राज्यों में सरकार और निजी अस्पताल  प्रबंधन में विवाद की स्थिति बन गई है |  दिल्ली  के सुप्रसिद्ध गंगाराम अस्पताल के विरुद्ध केजरीवाल सरकार ने पुलिस में एफ़आईआर दर्ज करवा दी तो राजधानी के चिकित्सक समुदाय में नाराजगी व्याप्त हो गई | दिल्ली सरकार का आरोप है कि निजी अस्पताल वाले कोरोना के मरीजों को भर्ती करने से इंकार कर  रहे हैं |  इसलिए अब वहां  एक सरकारी व्यक्ति बिठाया  जाएगा जो तय करेगा कि मरीज भरती किये जाने लायक है या नहीं ? गत दिवस दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने फरमान निकाल दिया कि उनकी सरकार के अधीन  अस्पतालों में केवल दिल्ली वालों का इलाज ही हो सकेगा | बाकी के लिए केंद्र सरकार द्वारा संचालित अस्पताल हैं | यद्यपि इस निर्णय पर उपराज्यपाल ने रोक लगा दी | एनसीआर ( राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र ) के अंतर्गत गाज़ियाबाद , नोएडा , गुरुग्राम आदि के निवासी आते हैं | तकनीकी दृष्टि से ये क्रमशः उप्र और हरियाणा के नागरिक कहे जाते हैं लेकिन इनका काम धंधा या नौकरी दिल्ली में है | मुख्यमंत्री बनने के पहले तक श्री केजरीवाल सहित आम आदमी पार्टी के तमाम नेता एनसीआर में ही रहा करते थे | सर्वोच्च न्यायालय तो साफ़ कह भी चुका है कि जीवन रक्षा चूँकि मौलिक अधिकार है इसलिए किसी  की चिकित्सा से इंकार  नहीं किया जा सकता |

ये विवाद  इसलिए तब उठा जब  देश भर से इस आशय की खबरें आने लगीं कि निजी अस्पताल  सर्दी - खांसी और साधारण बुखार वाले मरीज को भी कोराना संक्रमित मानकर सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं | जिन नामी - गिरामी अस्पतालों में कोरोना के मरीज  भर्ती हो रहे हैं उनमें  इलाज का खर्च किसी  सात सितारा होटल में ठहरने से भी ज्यादा है | इसके अलावा मुम्बई में एक पैथालाजी लैब द्वारा निजी अस्पतालों से सांठगाँठ कर कोरोना की झूठी रिपोर्ट तैयार करने क़ा मामला भी सामने आया | इसके पहले मुम्बई से प्रवासी मजदूरों से पैसा लेकर कोरोना मुक्त होने का प्रमाणपत्र भी खूब बिका |  

इस प्रकार ये देखने में आया कि जब मानवता पर एक अभूतपूर्व जानलेवा विपत्ति आई हो तब उसकी जीवनरक्षा की प्रतिज्ञा लेने वाले जो चिकित्सक इस दौर में भी धन बटोरने की वासना में लिप्त रहे वे कहने को तो इन्सान हैं लेकिन उनमें इंसानियत के गुण लेशमात्र भी नहीं हैं | चिकित्सक का पेशा आज भी हमारे समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा का माना जाता है | भले ही उसके साथ कितनी  भी बदनामियाँ जुड़ गयी हों लेकिन आम भारतीय इस पेशे के प्रति आदरभाव रखता है | और फिर कोरोना संकट के दौरान शासकीय अस्पतालों के चिकित्सकों , नर्सें और उनके सहयोगी स्टाफ ने जिस समर्पण भाव से इस महामारी से संक्रमित लोगों की प्राण रक्षा करने के लिए अथक परिश्रम  किया उसने एक बार फिर चिकित्सक समुदाय के प्रति धारणा में जबरदस्त सुधार किया |

अनेक चिकित्सक , नर्सें और अन्य स्टाफ  अनेक दिनों तक दिन रात अस्पताल  में ही रहे | अपने घर गये भी तो बाहर से ही परिजनों को चेहरा दिखाकर वापिस अपने दायित्व निर्वहन में जुट गए | कुछ तो संक्रमित होकर जान से हाथ तक धो बैठे। इसके  ठीक विपरीत निजी  डिस्पेंसरी खोलकर बैठे चिकित्सकों ने लॉक डाउन घोषित होते ही अपने क्लीनिक बंद कर लिए जो अभी तक पूरी तरह नहीं   खुल सके | वहीं अनेक निजी अस्पतालों ने या तो नये मरीज लेना बंद कर दिया या सर्दी - खांसी  , बुखार सुनकर बाहर से ही विदा कर  दिया | हालांकि अनेक निजी अस्पतालों ने कोरोना के इलाज हेतु अपनी सेवाएँ भी दीं  | लेकिन इसमें भी बड़े घपले - घोटाले के आरोप लगना शुरू हो गये हैं | भोपाल का चिरायु अस्पताल का मामला इसका उदाहरण है |

बीते एक सप्ताह से कोरोना का संक्रमण निरंतर बढ़ता जा रहा है और बकौल चिकित्सा विशेषज्ञ  उसका चरमोत्कर्ष जुलाई माह में आएगा | दूसरी तरफ दिल्ली और मुम्बई से मिल रही जानकारी के अनुसार अब मरीजों को भर्ती करने की  क्षमता नहीं बची है | खाली जगहों पर अस्थायी अस्पताल खड़े किये जा रहे हैं | उसमें भी परेशानी ये है कि मानसून सिर पर खड़ा हुआ है | अस्थायी अस्पताल बनाने में गुणवत्ता से लेशमात्र भी समझौता किया गया तब किसी अनहोनी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता |

और ऐसी स्थिति में  घूम फिरकर नजर निजी क्षेत्र के उन अस्पतालों की तरफ ही जाती है जो अभी तक कोरोना के इलाज से दूर रहे |  सरकारी अस्पताल में कोरोना मरीजों का इलाज निःशुल्क होता है | जिन निजी चिकित्सालयों के साथ अनुबंध हुआ उन्हें तदनुसार भुगतान किया जाता है | लेकिन महानगरों के साथ अन्य बड़े शहरों में जो नामी अस्पताल हैं उनका इलाज महंगा होने से शायद सरकार ने उनसे बात नहीं की होगी | आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न जो लोग महंगे  अस्पतालों में कोरोना के इलाज हेतु दाखिल हुए उनका खर्च सुनकर साधारण व्यक्ति को तो पसीना आ जायेगा | ऐसे में चाहे सरकार से मिली रियायती जमीन पर बना हो या निजी भूमि खरीदकर , लेकिन इन अस्पतालों का उपयोग यदि साधारण हैसियत वाले कोरोना मरीज के इलाज के लिए नहीं किया जा सके तो फिर इनके  होने न होने का अर्थ ही क्या है ?

सरकार अपने अधिकारों का उपयोग करे अथवा न्यायालय को फरमान जारी करना पड़े , उसके पहले चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े लोगों को स्वयं होकर अपनी सेवाएँ और संसाधन इस महामारी से लड़ने के लिए प्रदान करना चाहिए | ये समय पैसा कमाने अथवा नफ़ा - नुकसान देखने का न होकर मानवता की  रक्षा  के लिए अपना हरसंभव योगदान देने का है  | निजी क्षेत्र के जो भी अस्पताल कोरोना का इलाज करने में सक्षम हों उन्हें सरकार के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ा होना चाहिए | यदि उनके सहयोग से एक व्यक्ति को भी मरने से बचाया जा सके तो वह सहयोग अमूल्य होगा |

ये कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि निजी क्षेत्र के अस्पताल और चिकित्सक जनता की  निगाहों में पहले जैसे सम्मानित नहीं रहे | निश्चित रूप से आज भी कुछ ऐसे चिकित्सक हैं जिनके सेवाभाव और पेशे  की पवित्रता को बनाये रखने की प्रतिबद्धता के कारण जनता उन्हें सिर आँखों पर बिठाती है । लेकिन चिकित्सा व्यवसाय रूपी तालाब को गन्दा करने में एक नहीं  सैकड़ों मछलियों का योगदान है | सामान्यतः निजी अस्पतालों के प्रति  आम जन की अवधारणा इतनी नकारात्मक है कि उसको ज्यों का त्यों  उद्धृत नहीं किया जा सकता |

बावजूद इस सबके ये अवसर है चिकित्सक समुदाय के लिए  कर्तव्य पथ पर ईमानदारी से आगे बढ़ते हुए पीड़ित मानवता की निःस्वार्थ सेवा करने का | हो सकता है इसके बदले उन्हें आर्थिक दृष्टि से अपेक्षित लाभ न हो किन्तु लोगों की जो  दुआएं मिलेंगी  वे अनमोल होंगी  |

और इन दुआओं का क्या महत्व है ये चिकित्सकों   से ज्यादा और कौन जानता होगा जो किसी मर्ज के लाइलाज होने पर खुद होकर उसके लिए दुआ करने की सलाह देते हैं |

विद्यार्थियों की शिक्षा और सुरक्षा दोनों जरुरी



केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ने गत दिवस स्पष्ट कर  दिया कि विद्यालय और महाविद्यालय 15 अगस्त के बाद ही खोले जायंगे | यद्यपि उनके बयान  से ये स्पष्ट नहीं हुआ कि ये निर्णय केवल केंद्र के संदर्भ में है या फिर राज्य भी इसका पालन करने बाध्य होंगे | क्योंकि अनेक राज्यों में जुलाई से शैक्षणिक सत्र शुरू करने जैसी खबरें आने  से अभिभावकों में घबराहट फ़ैल रही थी | विशेष रूप से जिनके बच्चे प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में पढ़ते हैं , वे माँ - बाप काफी  चिंतित थे | सोशल मीडिया पर तो बाकायदा इस बारे में आभियान भी  चल पड़ा | जैसी कि सम्भावना व्यक्त की जा रही है उसके अनुसार तो कोरोना का असर आगामी कुछ महीनों तक रहने वाला है | ऐसे में जब तक ये सुनिश्चित नहीं हो जाता कि संक्रमण का प्रसार रुक गया है तब तक छोटे बच्चों को घर से बाहर भेजना खतरे से खाली नहीं होगा | सवाल ये है कि उनकी पढ़ाई का क्या होगा तो इसका सीधा जवाब है कि देश के भविष्य को सही  - सलामत रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है | जहाँ तक बात पाठ्यक्रम के पूरी होने की है तो उसको इस तरह नए सिरे से निर्धारित किया जाए जिससे कुछ हिस्सा अगले वर्ष में जोड़ा जा सके | क्योंकि अगस्त में भी यदि सत्र  शुरू नहीं  हो सका तब पाठ्यक्रम पूरा करना  संभव नहीं  होगा | जहाँ तक बात शून्य वर्ष मानकर प्राथमिक  और माध्यमिक स्तर तक के विद्यार्थियों को बिना परीक्षा अगली कक्षा में पदोन्नत कर देने की है तो आपातकालीन व्यवस्था के कारण वैसा करना जरूरी है किन्तु  इस स्तर पर बच्चों की  बुनियाद कमजोर न हो इसका ध्यान भी  रखना होगा | वैसे तो  ऑन लाइन पढ़ाई करवाई जा रही है लेकिन साधन सम्पन्न  विद्यालय ही वैसा  कर रहे हैं और फिर बच्चों के पास भी तो मोबाईल और लैप टॉप की व्यवस्था होनी जरूरी है | लेकिन सबसे बड़ी बात है बच्चे का विद्यालय जाना , क्योंकि शैक्षणिक के साथ ही शारीरिक और मानसिक विकास के लिए वैसा करना निहायत जरूरी है |  दरअसल यही वह बिंदु है जिस पर शिक्षा जगत से जुड़े लोग गम्भीरता से विचार कर रहे हैं | विगत दिवस दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसौदिया द्वारा श्री  पोखरियाल को खुला पत्र लिखकर बच्चों के सर्वतोमुखी विकास में शाला की महत्ता का जो वर्णन किया गया वह अत्यंत व्यवहारिक है | जब शिक्षा आज की तरह औपचारिक स्वरूप में नहीं थी  तब भी विद्या प्राप्ति हेतु गुरुकुल जाना होता था | गुरु के आश्रम में रहकर विद्यार्थी  शास्त्र के साथ ही शस्त्र अर्थात व्यवहारिक ज्ञान भी हासिल करते थे | सबसे बड़ी बात आर्थिक , सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेद नहीं  होता था वरना श्रीकृष्ण और सुदामा सहपाठी नहीं होते | आज के दौर में जब शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चुका  है तब प्राथमिक स्तर से ही वर्गभेद होने लगा  और इस वजह से समाज का निचला तबका अपेक्षित विकास से वंचित रह जाता है | अंग्रेजी माध्यम भी इसमें सहायक हुआ है | कोरोना  के कारण शैक्षणिक संस्थान बंद होने से निम्न आय वर्ग के परिवारों के बच्चे ही सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं | लेकिन महामारी के भय से विद्यालय  खोलना संभव भी नहीं रहा | ऐसे में इस तबके के छात्रों को लेकर जरुर चिंता रहेगी क्योंकि ऐसे परिवारों में बच्चों के विकास पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता | कुल मिलाकर कोरोना काल में चूंकि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया है इसलिए शिक्षा व्यवस्था  भी अछूती नहीं रह सकती | लेकिन विद्यार्थियों की जीवन रक्षा सबसे ज्यादा जरूरी है और उसके लिए पूरा  शैक्षणिक सत्र भी यदि रद्द करना पड़े तो संकोच नहीं करना चाहिए | हाँ , एक बात जरुर है कि निजी शिक्षा संस्थान अभिभावकों पर दबाव बनाकर जो शुल्क वसूल कर रहे हैं उस बारे में जरुर कोई समाधान निकालना होगा  | ये बात सही है कि संस्थान के प्रबन्धन को भी वेतन सहित अन्य खर्चे वहन करना पड़  रहे हैं किन्तु विद्यालय या महाविद्यालय में शिक्षण कार्य नही होने से काफी खर्च घटे भी होंगे | सरकार को समन्वय स्थापित करते हुए दोनों पक्षों के आर्थिक हित सुरक्षित रखने संबंधी प्रबंध करना चाहिए | निश्चित रूप से हालात अनिश्चित होने  के साथ ही चिंताजनक भी हैं | नामी गिरामी पब्लिक स्कूलों में तो प्राथमिक कक्षा के बच्चे तक बाहर से आकर छात्रावास में रहते हैं | ऐसे में उन विद्यालयों को खोलना खतरे से खाली नहीं है | अर्थव्यवस्था के साथ ही देश के शैक्षणिक कैलेंडर का भी बड़ा महत्व है क्योंकि भविष्य का पूरा नियोजन शिक्षा संस्थानों से निकले युवाओं पर ही  निर्भर है | ऐसे में अनिश्चितकाल तक शिक्षा व्यवस्था को ठप्प रखना जहाँ समस्या पैदा करने वाला होगा वहीं छोटे बच्चों की  सुरक्षा को भी नजरंदाज करना उचित नहीं होगा | केन्द्रीय मानव  संसाधन मंत्री श्री पोखरियाल  ने 15 अगस्त के बाद की तारीख  बताकर अनिश्चितता तो फिलहाल दूर कर दी लेकिन सत्र जब भी शुरू हो तब आगे की  व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके इस बात पर भी  अभी से ध्यान दिए जाने की जरूरत है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 7 June 2020

केवल भूमिपुत्र ही नहीं भारत माँ का हर पुत्र मूल्यवान राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र जैसी सोच विघटनकारी





कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित महाराष्ट्र और उसमें भी सर्वाधिक संक्रमित मुम्बई में हैं | सर्वाधिक मौतें भी वहीं हुई है | यद्यपि अधिकृत आंकड़े तो नहीं  हैं लेकिन दूसरे राज्यों से आकर काम करने वाले कुशल और अकुशल श्रमिकों का पलायन भी सर्वाधिक  मुम्बई से ही हुआ | वे अपने गाँवों तक कैसे पहुंचे उसकी दर्द भरी दास्तान सभी ने देखी | उनको पलायन के लिए किसने और क्यों मजबूर किया ये भी धीरे - धीरे लोगों को समझ में आ गया | देश के सबसे धनवान लोग  जिस महानगर में रहते हों वह उन मजदूरों की भूख न मिटा सका इसके लिए किसी सबूत की जरूरत भी  नहीं रही | वे अपने गन्तव्य तक किसी तरह पहुंच गये ये संतोष का विषय है | लेकिन जब धनकुबेरों की सम्वेदनाएँ समंदर की गहराइयों में डूब चुकी थें तब सोनू सूद नामक एक अभिनेता ने पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अपने आपको पेश किया और हजारों प्रवासियों को मुम्बई से सुरक्षित और सुविधा के साथ उनके गन्तव्य तक पहुँचाने के लिए वाहनों की व्यवस्था की | बाकायदा उन्होंने अपना सम्पर्क सूत्र प्रचारित किया और जिसने भी मदद की गुहार लगाई उसको सोनू ने हरसंभव सहायता पहुंचाई | अपने निजी संसाधनों से ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसकी  पूरे देश में प्रशंसा हुई | मुम्बई में अन्य किसी ने जरुरतमंदों की कोई मदद  नहीं की ये कहना पूरी तरह से सही नहीं होगा लेकिन प्रवासियों की  पीड़ा को दूर करने के लिए जो कदम सोनू सूद ने उठाया और खुद कड़ी धूप में  खड़े होकर एक - एक बस को रवाना करवाया वह मानव सेवा का आदर्श रूप था | सोशल मीडिया सहित अन्य संचार माध्यमों में इस अभिनेता के सेवा भाव और समर्पण  को जी भर के सराहा गया | 

वैसे प्रवासी मजदूरों का प्रस्थान तकरीबन पूरा हो चुका है | उलटे अब तो उनके वापिस आने की अटकलें लगने लगी हैं | कुछ बड़े कारोबारी तो अपने खर्चे से विशेष ट्रेन की व्यवस्था करने के लिय भी राजी बताये जा रहे हैं | हालांकि वे लौटेंगे या नहीं ये कोई  नहीं बता पा रहा | और लौटे भी तो कब लौटेंगे ये भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है |

लेकिन  शिवसेना के बड़बोले नेता संजय राउत ने पार्टी के मुखपत्र सामना में एक लेख लिखकर  सोनू सूद की आलोचना करते हुए कहा कि रातों - रात एक नये महात्मा का  अवतार हो गया , जो ये साबित करना चाहता है कि प्रवासी मजदूरों के कल्याण  के लिए सरकार द्वारा कुछ भी नहीं किया गया | वे यहीं तक नहीं रुके , आगे उन्होंने सोनू को भाजपा का प्यादा बताते हुए लिखा कि कुछ दिनों बाद वे प्रधानमन्त्री से मिलेंगे और फिर बिहार चुनाव में उनकी पार्टी का प्रचार करेंगे | 

लेकिन दूसरी तरफ महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने सोनू के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस अभिनेता ने प्रवासी श्रमिकों की सहायता कर अच्छा काम किया और जो भी ऐसा काम करे उसकी प्रशंसा होनी चाहिए |

कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने भी उक्त लेख पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी  पार्टी प्रवासियों की सहायता करने में विफल रही है | जब शिवसेना नेता को लगा कि  सहयोगी ही उनकी  मुखालफत  करने लगे तब उन्होंने सोनू को एक अच्छा अभिनेता बताते हुए तंज कसा कि जिस तरह फिल्मों में डायरेक्टर होते हैं वैसे ही इसके पीछे भी कोई राजनीतिक डायरेक्टर है |

संजय राउत का बड़बोलापन नई बात तो है नहीं लेकिन पार्टी के मुख़पत्र में उनका लेख केवल अकेले उनके दिमाग की उपज नहीं है | महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिवसेना के सर्वोच्च नेता उद्धव ठाकरे ने भी प्रवासी  श्रमिकों के चले जाने से खाली हुए स्थान को भूमिपुत्रों अर्थात स्थानीय लोगों से भरे जाने का आह्वान करते हुए उन्हें प्रशिक्षित किये जाने की मुहिम भी छेड़ दी | वैसे इसमें चौंकाने वाला कुछ भी नहीं है क्योंकि ये तो स्व. बाल ठाकरे के जमाने से ही चली आ रही मांग है | केंद्र सरकार की कुछ भर्ती परीक्षाओं में शामिल होने आये दूसरे राज्यों के युवकों को शिवसैनिकों द्वारा पीट - पीटकर भगाने जैसी अनेक घटनाएँ अतीत में होती रही हैं |

ऐसे में श्री राउत द्वारा सोनू सूद की आलोचना और श्री ठाकरे द्वारा भूमिपुत्रों को काम देने  के निर्देश के साथ महाराष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने जैसा बयान  दिया जाना ये साबित करने के लिए काफी है कि प्रवासी पलायन के पीछे एक सुनियोजित योजना थी और राजनीतिक निर्देशक होने जैसा जो तंज उन्होंने अभिनेता के सेवा कार्य की लिए कसा गया , दरअसल वह शिवसेना पर ज्यादा सटीक बैठ रहा है , जिसने प्रवासियों के  महाराष्ट्र छोड़ने की राजनीतिक पटकथा लिखकर अपनी  चिर प्रतीक्षित मंशा पूरी कर ली | 

कांग्रेस `चूँकि राष्ट्रीय पार्टी है इसलिए उसे श्री राउत के लेख का विरोध करना पड़ा किन्तु मुख्यमंत्री श्री ठाकरे द्वारा भूमिपुत्र जैसे विशेषण के उपयोग पर वह भी शांत रही | गृहमंत्री श्री देशमुख यूँ तो जिस राकांपा के है   उसमें पहला शब्द राष्ट्रवादी है लेकिन उसका प्रभाव क्षेत्र महाराष्ट्र में ही है | ऐसे में इस पार्टी के कोटे से गृहमंत्री बने श्री देशमुख ने भले श्री राउत की टिप्पणी को गलत बता दिया लेकिन पार्टी के दिग्गज नेता शरद पवार , अजीत पवार और सुप्रिया सुले ने प्रवासी श्रामिकों के पलायन पर  शायद ही कभी  कुछ कहा हो | 

इस तरह शिवसेना की कुटिल नीति तो सामने आ गई | लेकिन उसे अकेले कठघरे में खड़ा करते हुए बाकी सबको बरी कर दिया जाना भी न्यायोचित  नहीं होगा | संजय निरुपम और कांग्रेस ने प्रवासियों के  दुख दर्द बाँटने के लिए क्या किया इसका भी खुलासा होना चाहिए | शरद पवार तो केंद्र में कृषि और रक्षा मंत्री रहे हैं | वे चाहते तो बेरोजगारी और भूख से हलाकान लोगों के मददगार बन जाते | और तो और भाजपा ने जो राज्य सरकार को कसूरवार मान रही है , प्रवासी मजदूरों की किस प्रकार  सहायता की ये भी  स्पष्ट नहीं  है | जबकि अधिकतर उत्तर भारतीय प्रवासी  उसके कट्टर समर्थक रहे |

इस प्रकार एक अभिनेता द्वारा किये गये काम में सहयोग तो दूर उसे लेकर राजनीति का गंदा खेल चल पड़ा | हालांकि राजनीतिक बिरादरी से  किसी  अच्छे कार्य की उम्मीद तो वैसे भी नहीं की जाती लेकिन शकुनी मानसिकता वाले संजय राउत सरीखे नेता भले ही सोनू के योगदान की  प्रशंसा न करते लेकिन उसे महात्मा का अवतार बताकर भाजपा का प्यादा बताना भी कहाँ  जरूरी था ? और यदि उन्हें उसकी तारीफ इसलिए हजम नहीं हुई क्योंकि उसके सेवा कार्य के कारण उद्धव सरकार की किरकिरी हुई तो वे भूल गये कि लोगों ने समूची  राजनीतिक बिरादरी को कठघरे में खड़ा किया | यहाँ तक कि केंद्र सरकार तक को नहीं बख्शा | और भी अनेक लोग हैं जिन्हें सोनू की प्रशंसा से ईर्ष्या हुई |

कोरोना एक राष्ट्रीय संकट है जिसने अमीर - गरीब , भाषा , प्रांत , जाति , विचारधारा रूपी दीवारों को ध्वस्त कर दिया | ये ऐसी लड़ाई है जो समन्वय और सहयोग से ही लड़ी जा सकती है | इसमें किसी राज्य के भूमिपुत्र की नहीं अपितु  भारत माँ के सभी  पुत्रों की कुशलक्षेम महत्वपूर्ण है | दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दिल्ली वालों का ही इलाज होगा जैसे बयान देने वाले अरविन्द केजरीवाल राष्ट्रीय  राजधानी के मुख्यमंत्री होने के बाद भी मोहल्ला मानसिकता दिखा रहे हैं |

ये स्थिति दुखद है | राजनीति अपनी जगह है । और महामारी पर विजय पाने के बाद जी भरकर उसके दांवपेंच चले जाएं तो किसी को आपत्ति नहीं होगी | लेकिन जानलेवा विपदा के समय इस तरह का  संकुचित दृष्टिकोण देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं है | नेताओं को भले ही राजनीति किये बिना नींद न आती हो लेकिन उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि:-

और भी गम हैं जमाने में सियासत के सिवा .....

एक दाने की बर्बादी भी अन्न देवता का अपमान है भण्डारण , कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण सुविधाओं से ही बढ़ेगी किसानों की आय




आज एक किसान भाई से अनायास मुलाकात हो गई | मैंने उसे बधाई  दी तो उसने पूछा किसलिए ? तब मैंने उससे कहा कि जब आर्थिक मोर्चे पर चौतरफा निराशाजनक खबरें आ रही हैं तब देश के किसानों ने रबी फसल में रिकॉर्ड पैदावार करते हुए देश का मनोबल बढ़ाया और उसी कारण से कोरोना संकट आते ही सरकार  भी देश भर में गरीबों को सस्ता और मुफ्त अनाज बाँट सकी । उसके तत्काल बाद लॉक डाउन के दौरान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी जैसे कठिन कार्य को संपन्न करवाया जिससे देश को आगामी  दो वर्षों तक अन्न संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा | जैसी जानकारी आई है उसके अनुसार इस वर्ष गेंहू की सरकारी खरीदी में भी रिकॉर्ड वृद्धि हुई है | लेकिन ये सब सुनने के बाद वह किसान बोला ये सब हर वर्ष होता है | किसान जी तोड़  मेहनत से अन्न उत्पादन करता है | सरकार उसे अच्छे दाम पर खरीदती भी है | इसी खरीदी से वह राशन की दुकान ( सार्वजानिक वितरण प्रणाली ) के माध्यम से गरीबों को सस्ता अनाज वितरण करती है  | लेकिन किसान की मेहनत से उपजे अन्न को पैसा देकर खरीदने के बाद समय पर उसके सुरक्षित  भंडारण की  व्यवस्था नहीं किये जाने के कारण हर वर्ष गोदामों में जाने से पहले ही काफी अनाज बरसात से भीगकर खराब  हो जाता है | इस तरह  रिकॉर्ड खरीदी किये जाने के बाद भी उसका समुचित लाभ नहीं हो पाता |

किसान की बात में कुछ भी  नयापन नहीं था | इस आशय की खबरें आये दिन देखने - सुनने मिला करती हैं | सरकार जिन केन्द्रों में किसान का अनाज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती है वहां उसे ढांकने तक की उचित व्यवस्था नहीं होने से थोड़ी देर की बरसात से ही अनाज खराब हो जाता है | उसकी ये बात भी ध्यान देने योग्य थी कि सरकारी मशीनरी निजी क्षेत्र के जिन गोदामों का चयन करती है उनमें निकटस्थ को छोड़ ज्यादा दूर वाले गोदामों में भंडारण किये जाने से अनाज के परिवहन में विलम्ब होता है | उसने ये आरोप भी लगाया कि अनाज की खरीद के बाद से उसके गोदाम में जाने तक  के काम में सरकारी तंत्र का चिर - परिचित खेल चला करता है जिसकी जानकारी सबको होने के बावजूद व्यवस्था में सुधार नहीं होने से  बेशकीमती अनाज बरबाद होने के साथ ही किसान की मेहनत का भी अपमान होता है | गोदामों के चयन और परिवहन ठेकों में होने वाले भ्रष्टाचार का जिक्र भी उसने किया |

उसकी  बातें सुनने के बाद मुझे लगा कि उक्त सभी जानकारियाँ  शासन और प्रशासन में बैठे जिम्मेदार लोगों को होने के बाद भी व्यवस्था में सुधार करते हुए पिछली गलतियाँ ठीक करने के बजाय उन्हें दोहराने का अपराध होता है | जबलपुर  से भोपाल जाते समय रेल की खिड़की से नरसिंहपुर , करेली , गाडरवारा में सरकारी खरीद के अनाज को ऊँचे चबूतरों पर टीन शेड के नीचे प्लस्टिक शीट से ढंका देखा जा सकता है | इससे साफ होता है कि भले ही  किसानों ने अपने पौरुष से देश का पेट भरने के लिए हरित क्रांति के सपने को साकार कर दिखाया हो लेकिन उसके परिश्रम को अपेक्षित सम्मान देने की क्षमता हमारी शासकीय व्यवस्था आज तक उत्पन्न नहीं कर  सकी |

 सत्तर के दशक में जब खाद्यान्न संकट के कारण भारत को अंतर्राष्ट्रीय दबाव झेलने पड़ते थे तब स्व. इंदिरा गांधी ने अन्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए हरित क्रांति की शुरुवात करवाई थी | देश के किसानों और कृषि वैज्ञनिकों के समन्वित प्रयासों से वह अभियान अपने उद्देश्य में सफल हुआ और खाद्यान्न की कमी से उबरते हुए आखिरकार  अपनी जरूरत से अधिक अनाज पैदा करने में सफल हो गया | लेकिन उस महत्वपूर्ण लक्ष्य को तय करते समय इस बात को ध्यान नहीं रखा गया कि बढ़े हुए उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त  भंडारण क्षमता भी होनी चाहिए | उस समय तक देश में निजी क्षेत्र की गोदामें सरकार द्वारा किराये पर लिए जाने का चलन नहीं था | भारतीय खाद्य निगम के अपने गोदामों में भंडारण किया जाता था | कालान्तर में सरकार को जब एहसास हुआ तब उसने निजी गोदाम बनाने हेतु बैंकों से ऋण उपलब्ध करवाने के साथ ही  कुछ और सहूलियतें भी प्रदान कीं जिसकी वजह से देश में गोदामें तो खूब बन गईं किन्तु सरकारी तंत्र की दोषपूर्ण कार्यप्रणाली के कारण आज भी प्रतिवर्ष समय पर भंडारण नहीं होने से बहुत बड़ी मात्रा में सरकार द्वारा किसानों से खरीदी के बाद अनाज खराब हो जाता है |

उस किसान का ये दर्द वाकई संज्ञान लेने लायक है | हमारे देश में खेतों से निकलने वाले अनाज को सोना कहा जाता है और घर - परिवार में अन्न को देवता कहकर उसे सम्मान दिया जाता है  | जमीन में गिरे एक - एक दाने को उठाकर उसका उपयोग करने का संस्कार आम भारतीय में है | भोजन प्रारम्भ करने के पहले उसे प्रणाम करने और बाद में ईश्वर को धन्यवाद देने के पीछे भी अन्न के महत्व को स्वीकार करने की ही सोच थी |

भंडारण क्षमता के अलावा कोल्ड स्टोरेज और खाद्य प्रसंस्करण ( फ़ूड प्रोसेसिंग ) के प्रति भी लम्बे समय तक दुर्लक्ष्य किये जाने के कारण सब्जी और फल आदि का उत्पादन करने वाले अधिकतर किसान को उनकी मेहनत का वाजिब लाभ नहीं  मिलता | वहीं कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण सुविधा  की कमी से सब्जी और फल उत्पादकों को नुकसान होने के साथ ही आम उपभोक्ता को भी जरूरत के समय गुणवत्ता युक्त ताजी सब्जी , फलों के रस   आदि से वंचित होना पड़ता है |

आज जब भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहा है तब हमें अपनी भण्डारण क्षमता के साथ ही अन्न के अलावा अन्य कृषि उत्पादों को कोल्ड स्टोरेज सुविधा के साथ ही  प्रसंस्करण करते हुए उनका मूल्य बढ़ाने की ओर भी ध्यान देना चाहिए |

कोरोना संकट के समय यदि रबी फसल भी अर्थव्यवस्था के बाकी हिस्सों  की तरह निराश कर देती  तो इस महामारी से लड़ने में सरकार का हौसला टूट गया होता | लेकिन देश में भरपूर अन्न पैदा कर किसानों ने जो कारनामा किया उसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए | एक भी दाना यदि नष्ट होता है तो ये राष्ट्रीय क्षति ही नहीं नैतिकता के पैमाने पर भी अपराध ही है |

 संदर्भित किसान की पीड़ा को राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिलना चाहिए क्योंकि उस छोटी सी बात में देश का बड़ा हित छिपा है | भारत आज एक विश्व शक्ति के तौर पर उभरा है तो उसके लिए हमारी सैन्य शक्ति के  साथ किसानों के पसीने का भी उतना ही योगदान है ।  जिसके कारण आज हम 135 करोड़ जनता का पेट कम से कम दो वर्ष तक भर सकने लायक भंडारण करने में सक्षम हो सके | लेकिन सरकारी खरीद का अनाज यदि बिना खराब हुए सही समय पर गोदामों तक पहुंच  जाये तो गरीबों को दिए जाने वाले गेंहू वगैरह की गुणवत्ता भी अपेक्षाकृत बेहतर रहेगी |

कोरोना के बाद देश में अनेक बड़े बदलाव होने की चर्चा के बीच यदि अन्न , सब्जी , फल आदि के  लिए पर्याप्त , गोदामें , कोल्ड स्टोरेज तथा गाँवों के निकट ही प्रसंस्करण सुविधाएँ  उपलब्ध हों तो हरित क्रांति का उद्देश्य सार्थकता के साथ पूरा हो सकेगा |

 इस बारे में अमूल को आदर्श माना जा सकता है जिसने केवल दूध बेचकर मुनाफा कमाने के  बजाय दुग्ध उत्पादकों को अधिकतम उत्पादन के लिए प्रेरित करते हुए दूध से बनी चीजों की श्रृंखला तैयार करते हुए उसका मूल्य बढ़ा दिया | इसी तरह कृषि उत्पादों मसलन अन्न , सब्जी  और फल आदि का व्यावसायिक  उपयोग होने पर ही खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने का लक्ष्य पूरा हो सकेगा |

Saturday, 6 June 2020

कोरोना के फैलाव वाले इलाकों का अध्ययन जरूरी



भारत में कोरोना संक्रमण की संख्या में रोजाना तेजी से वृद्धि होने की वजह से आम जनता में भय का माहौल है | केंद्र सरकार द्वारा विशेष रेलगाड़ियाँ चलाये जाने के बाद भी लोग यात्रा करने से बच रहे हैं | श्रमिक एक्सप्रेस भी खाली  जा रही  हैं | बीते एक सप्ताह में ही 60 हजार नये संक्रमित  निकलने से कुल मरीजों की  संख्या 2 लाख 26 हजार पार कर गई | गत दिवस 10 हजार से ज्यादा नये संक्रमण सामने आये | लेकिन इन आंकड़ों में सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि महाराष्ट्र , दिल्ली , तमिलनाडु और गुजरात में ही लगभग 1.50 लाख संक्रमित अब तक मिले हैं | ये महत्वपूर्ण संख्या  है जिसका अध्ययन करने पर भविष्य में आने वाली ऐसी ही  आपदा के समय चिकित्सा प्रबन्धन पहले से कहीं बेहतर हो सकेगा |  अब तो उप्र , मप्र और राजस्थान भी 10 हजार  के आंकड़े को छू रहे हैं | इस तरह कुल सवा दो लाख में से तकरीबन 1.80 लाख संक्रमित तो केवल 7  राज्यों से ही निकले है |  हालाँकि इस समय देश में कोरोना के इलाज हेतु भर्ती मरीज कुल संख्या के आधे ही हैं | और यही वह आधार है जिस के बलबूते सरकार और जनता दोनों का आत्मविश्वास अभी तक बना हुआ है | बीते कुछ  दिनो में नए संक्रमण बढ़ने की  वजह प्रवासी श्रमिकों का पलायन माना जा सकता है | उप्र ,मप्र , राजस्थान , बंगाल , झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों में लौटे प्रवासी मजदूरों में से अनेक  अपने साथ कोरोना का संक्रमण लेकर लौटे हैं | जिस वजह से इन राज्यों में संक्रमितों  का आंकडा तेजी से बढ़ने  लगा | सबसे बड़ी बात ये है कि इन राज्यों में प्रवासी श्रमिकों की वापिसी के बाद कोरोना शहरों के अलावा ग्रामीण इलाकों तक भी जा पहुंचा है | लेकिन अभी तक  भयावह स्थिति महाराष्ट्र , तमिलनाडु , दिल्ली और गुजरात में ही है | इन चारों के कुल आंकड़े का ही आधा तो केवल महाराष्ट्र में ही निकल आया जिसका बड़ा हिस्सा मुम्बई में है | इन राज्यों और उनके भी कुछ विशेष शहरों में कोरोना संक्रमण के  औसत से भी ज्यादा फैलाव ने इस बात की जरूरत पैदा कर दी है कि सूक्ष्म  अध्ययन करते हुए पता लगाया जाए कि कोरोना का कहर इन्हीं पर ज्यादा क्यों फूटा ? भले ही सरकार ने संक्रमित व्यक्ति का नाम और पहिचान गोपनीय रखने की व्यवस्था की  हो  लेकिन इस जानकारी को वह लम्बे समय तक छिपाकर भी नहीं रख सकेगी | महामारी के बाद उसके कारण और निदान हेतु जब अध्ययन और शोध होंगे तब संक्रमित लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करना ही होगी | कोरोना ने जिन राज्यों को सर्वाधिक पीड़ित किया वहां कुछ न कुछ तो ऐसा होगा जिसकी वजह से संक्रमण का विस्तार बड़े पैमाने पर हुआ | उदाहरण के तौर पर मप्र के इंदौर और भोपाल तथा उनके निकटवर्ती क्षेत्रों में कोरोना का जितना फैलाव हुआ उतना प्रदेश के महाकौशल और विन्ध्य अंचलों में नहीं होना अध्ययन का विषय तो ही | इसी तरह महाराष्ट्र में कोरोना का प्रकोप मुम्बई  , पुणे  नासिक और ठाणे में जितना है उतना बाकी क्षेत्रों में नहीं होना महज संयोग नहीं बल्कि इसके पीछे कुछ विशेष कारण जरूर होंगे | भले ही मौजूदा हालातों में समूचा ध्यान कोरोना के इलाज और बचाव पर लगा हो लेकिन आखिरकार इस बीमारी के संदर्भ में उठे सवालों का जवाब तो तलाशना ही होगा क्योंकि चाहे दवा हो या वैक्सीन , ह तभी कामयाब होते हैं जब मरीजों और बीमारी के चरित्र का सही अध्ययन किया गया हो | अब तक इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया जाता रहा कि कोरोना संक्रमण शहरी क्षेत्रों में ही फैला जबकि आदिवासी अंचल उससे अछूते रहे | हालाँकि प्रवासी श्रमिकों के लौटने के बाद आदिवासी जिलों में भी संक्रमित सामने आये हैं लेकिन उनकी संख्या तुलनात्मक रूप से बेहद कम है | ऐसे में चिकित्सा विज्ञान के लिए ये अध्ययन और अनुसन्धान का अच्छा विषय होगा | महामारी का कुछ विशेष क्षेत्र या समुदायों में फैलना या न फैलना दोनों महत्वपूर्ण है | इनके अध्ययन के उपरान्त ही न सिर्फ चिकित्सा क्षेत्र अपितु शहरों की बसाहट की  समूची योजना पर भी नए सिरे से विचार करना होगा | क्योंकि  वैश्विक हालातों के परिप्रेक्ष्य में इस तरह की आपदा के पुनरागमन की आशंका को नजरअंदाज नहीं  किया जा सकता | विशेषज्ञों का अभिमत है कि भारत में कोरोना अपने चरम बिंदु की ओर बढ़ रहा है  औरर जून तथा जुलाई में वह अपना उच्चतम शिखर छू लेगा | यदि जिन राज्यों में अभी उसका सर्वाधिक प्रकोप है उन्हीं में उसका संक्रमण और बढ़ा तब ये मान लेना पडेगा कि वहां संक्रमण को खाद पानी देने वाली तत्व मौजूद है | और तभी कोरोना को सही तरीके से घेरकर हराया जा सकेगा | चूँकि ये बीमारी भारतीय परिस्थितियों में नहीं पनपी इसलिए भविष्य के लिए रक्षा कवच तैयार करना ही बुद्धिमानी होगी | केवल पीपीई किट , सैनिटाईजर और मास्क बनाना उपलब्धि नहीं है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 June 2020

लॉक डाउन : पर्यावरण संरक्षण का प्रशिक्षण काल



आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इस साल कोरोना संक्रमण के कारण बड़े आयोजन तो नहीं हो पा रहे लेकिन साधारण जन भी  महसूस कर रहे हैं कि प्रकृति के प्रति उनका व्यवहार बेहद असंवेदनशील होने से उसका रौद्र रूप किसी  न किसी तरह से सामने आता रहा है। कोरोना एक वायरस है जिसका प्रकोप पर्यावरण को हुए नुकसान का प्रमाण है या नहीं इस बारे में अभी तक कोई निश्चित राय नहीं बन सकी लेकिन लॉक डाउन के दौरान प्रकृति जिस तरह श्रृंगारित होकर सामने आई उसने समूची मानव जाति को आत्मावलोकन के लिए मजबूर कर दिया। हम अपने ही देश में देखें तो सबसे पहले ध्यान खींचा वाराणसी में गंगा नदी के जल में आये परिवर्तन ने। उसका पानी न केवल स्वच्छ हुआ अपितु मछलियाँ भी जल क्रीड़ा करते हुए किनारों पर मंडराने लगीं। पहले चूँकि नदियों के किनारे श्रद्धालुओं द्वारा फेंकी गई पूजन सामग्री से लबालब रहते थे इसलिए मछलियां वहां तक नहीं आती थीं। गंगा की शुद्धता के लिए करोड़ों रु. खर्च होने के बाद भी उसे प्रदूषित होने से नहीं बचाया जा सका लेकिन लॉक डाउन के कुछ दिन बाद ही जब वैज्ञनिकों ने वाराणसी में उसके जल के नमूनों का परीक्षण किया तब वे उसकी गुणवत्ता में हुए सुधार को देखकर भौचक रह गये। ऐसी ही खबरें देश की दूसरी नदियों के बारे में आने लगीं। चूँकि कारखानों से निकलने वाला दूषित जल आना रुक गया इसलिए भी नदियों को सांस लेने का अवसर मिला। भरी गर्मी में बढ़ते हुए तापमान ने इस वर्ष हलाकान नहीं किया। महानगरों के वायुमंडल में जहरीली गैसों की मात्रा बिना कुछ किये घट गई। वातावरण में छाई धूल के अलावा वाहनों और कारखानों से निकलने वाला धुंआ कम हो जाने से 100 किमी से भी ज्यादा दूरी से पहाड़ों की चोटियाँ नजर आने लगीं। सबसे बड़ी बात ये देखने में आई कि उक्त रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, दमा के अतिरिक्त मौसमी बदलाव से होने वाली आम बीमारियों से लोगों को राहत मिली। उल्लेखनीय है लॉक डाउन के दौरान जनरल प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक अपनी डिस्पेंसरी बंद कर घर बैठ गए थे लेकिन अपवादस्वरूप कुछ को छोड़कर अधिकतर को पर्यावरण में आये सुखद बदलाव ने स्वस्थ बनाये रखा। शहरों में कम होते जा रहे पक्षी वापिस नजर आने लगे। तितलियों की रंग बिरंगी उड़ानें भी घरों के बगीचों में अरसे बाद दिखने लगीं। संरक्षित वन होने के बावजूद सैलानियों की नजरों से बचकर छिपने वाले वन्य पशु निर्भय होकर बाहर आने लगे। इस दृष्टि से बीते दो माह एक तरह से प्रकृति और पर्यावरण के लिए वरदान बनकर आये। लेकिन ज्योंहीं लॉक डाउन में ढील दी गयी त्योंहीं हालात जैसे थे की ओर लौटने लगे। मात्र कुछ दिनों में ही दो महीने के पर्यावरण संरक्षण के सुखद एहसास पर पानी फेरने के लिए मानवीय वासना फिर अपने असली रूप में आने लगी। बौद्धिक अंदाज में कहें तो लॉक डाउन था तो कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए लेकिन उसका सर्वाधिक लाभ हुआ प्रकृति और पर्यावरण को। ऐसे में इसे पर्यावरण संरक्षण का प्रशिक्षण काल भी कह सकते हैं। पर इस दौरान मिले सबक से हम मनुष्यों ने कुछ नहीं सीखा तो फिर ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि हमने नहीं सुधरने की कसम खा रखी है। यदि लॉक डाउन के दौरान जैसा आचरण हमारा रहा उसका आधा भी हम अपने चरित्र में उतार सकें तो पर्यावरण संरक्षण को लेकर व्याप्त चिंताएं दूर हो सकती हैं। सही कहा जाए तो पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस या कुछ दिनों की औपचारिकताओं तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा होना चाहिए। जिस तरह हमारी जि़न्दगी के लिये सांस लेना जरूरी है वैसी ही जरुरत कुछ-कुछ  प्रकृति और पर्यावरण की भी हैं। जिस दिन हम इस बात को समझकर सहअस्तित्व की आवश्यकता को जान लेंगे उस दिन से रोज पर्यावरण दिवस होगा। जल, जंगल और जमीन के नैसर्गिक स्वरूप को हम जितना ज्यादा सुरक्षित रख सकेंगे हमारी भावी पीढिय़ां उतनी ही स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगी। पूर्वजों ने हमें एक हरी-भरी वसुंधरा दी थी। हम अपने बच्चों को क्या देने जा रहे हैं उसका विचार करने का समय आ गया है। कोरोना ने सुधरने का जो अवसर दिया उसका लाभ नहीं उठाया तो फिर ये कहना ही ठीक होगा कि हम खुद अपना विनाश करने पर आमादा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 June 2020

फसल बेचने की स्वतंत्रता : देर आये दुरुस्त आये



मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बारे में उनके आलोचक कुछ भी कहें लेकिन उनकी सरकार सदैव किसानों के हित में सार्थक कदम उठाती रही है। फरवरी में  सत्ता में लौटते ही कोरोना संकट आ गया लेकिन इस दौरान भी उन्होंने किसानों को फसल का वाजिब मूल्य दिलवाने के लिए कृषि उपज मंडी रूपी बाधा दूर करते हुए देश में कहीं भी अपना उत्पाद बेचने की जो सुविधा दी उसका अनेक राज्यों ने अनुसरण किया और अब केन्द्र सरकार ने उस व्यवस्था को पूरे देश के लिए लागू करते हुए किसानों को अपनी फसल देश में कहीं भी बेचने की छूट देकर एक क्रांतिकारी कदम उठाया जो सही मायनों में तो पहले ही उठा लिया जाना चाहिए था। कृषि उपज मंडी नामक व्यवस्था किसानों को आढ़तियों के शोषण से बचाने के लिए बनाई गयी थी। सिद्धान्त: वह एक अच्छा प्रयोग था किन्तु कालान्तर में वह भी राजनेताओं और अफसरों के भ्रष्ट गठजोड़ का अड्डा बन गया। उसके चुनावों में असली  किसानों की स्थिति महज मतदाता की रह जाती जबकि महत्वपूर्ण पदों पर नेता या माफिया किस्म के लोग जम जाते। परिणाम ये हुआ कि बजाय किसानों का फायदा होने के मंडियां उन्हें परेशान करने का कारण बन गईं। जिस तरह से बाजार में व्यापारी उन्हें भुगतान के लिए रुलाते थे उसी तरह का खेल कृषि उपज मंडियों में भी होने लगा। ऐसा नहीं है कि ये मंडियां पूरी तरह से अनुपयोगी हैं लेकिन वे अपनी स्थापना के व्यापक उद्देश्य से भटक गईं, ये कहना गलत नहीं होगा। हालांकि श्री चौहान पहले भी एक दशक से ज्यादा तक प्रदेश की सत्ता में रहे किन्तु किसानों के हित में अनेक अच्छे फैसले लेने के बावजूद कृषि उपज मंडी नामक भ्रष्टाचार के अड्डे से किसानों को मुक्ति दिलवाने के लिये न जाने क्यों इन्तजार किया गया ? इसी तरह से किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य लेकर चल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के दिमाग में भी ये छोटी सी बात क्यों नहीं आई ? खैर, कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियों में मानव जाति के मन में सर्वशक्तिमान होने का घमंड जिस तरह टूटा उसी तरह से सरकार को भी आखिऱकार ये समझ में आने लगा कि वह हर क्षेत्र में प्रभावशाली और सफल नहीं हो सकती। इसीलिये इस दौरान उसने राहत पैकेज के नाम पर जिस तरह के सुधार किये उनको लेकर आलोचना के स्वर गूंज रहे हैं लेकिन ये बात पूरे तौर पर सही है कि 1991 में डा. मनमोहन सिंह द्वारा प्रारम्भ किये गए आर्थिक सुधारों को राजनीतिक दबावों के कारण पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका। जब भी थोड़ी कोशिश हुई तब कोई न कोई अड़ंगा आ गया। सही बात तो ये है कि नेता और नौकरशाहों का गठजोड़ अपना वर्चस्व कहीं से भी छोड़ना नहीं चाहता। यही वजह है कि समझ में ही नहीं आता कि कौन सा क्षेत्र सरकारी दखलंदाजी से मुक्त है और कौन सा नियन्त्रण में ? इसलिए किसानों की फसल को बेचने में लगे अवरोधक हटा देने के निर्णय की हर सुलझा हुआ व्यक्ति प्रशंसा करेगा। हालांकि ये बात भी सही है कि किसान समुदाय में आज भी शिक्षा और डिजिटल मार्कटिंग की समुचित जानकारी रखने वाले गिने-चुने हैं। लेकिन कृषि उपज मंडी वाली बाधा दूर होने से स्थानीय और बाहरी व्यापारी खुद उनके पास पहुँचने लगेगा। और उस समय वे ज्यादा भाव पर सौदा कर सकेंगे। रही बात मंडियों की आवश्यकता की तो वे अपना काम करती रहें। जो किसान उनके माध्यम से अपना अनाज बेचना चाहें वे बेशक उनकी सेवाएँ लेते रहें लेकिन जिन्हें ये लगे कि उन्हें सीधी बिक्री से लाभ मिल रहा हो वे मनमाफिक व्यापारी को बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं। इस निर्णय को देर आये दुरुस्त आये कहना गलत नहीं होगा। पुरानी कहावत है राजा का कम नियमन करना है व्यापार करना नहीं। लेकिन हमारे देश में सरकारे खुद ही मुनाफाखोर हो उठीं और इसीलिये हर क्षेत्र में उनका नियन्त्रण या हस्तक्षेप होता रहा। अब जबकि सुधार प्रक्रिया एक बार फिर से शुरू हो गई है तब इसे और आगे बढ़ाना चाहिए। किसानों के अलावा उद्योग-व्यापार में भी सरकारी दखलंदाजी जरूरत से ज्यादा है। कोरोना काल में जब भारत खुद को विश्व के सबसे बड़े मैन्युफेक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने का ख्वाब संजो रहा है तब उसे वैश्विक स्तर पर ये छवि भी बनानी होगी कि भारत में उद्योग-व्यापार करना पूर्वापेक्षा न सिर्फ आसान वरन फायदेमंद भी हो गया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी