Saturday, 30 December 2023

नीतीश : होशियार बनने के फेर में हास्यास्पद बन गए


तमाम विपक्षी दलों को एकजुट कर भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी पार्टी जनता दल (यू) को एकजुट  रखने में पसीना आ रहा है।  पार्टी के भीतर चल रही खींचातानी के बाद  ललन सिंह को हटाकर वे खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। दरअसल जिन ललन को नीतीश का बाल सखा माना जाता है वे  कुछ विधायकों को तोड़कर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनवाने का षडयंत्र रच रहे थे। इसके बदले उन्हें राज्यसभा की सीट देने का वचन दिया गया था।  ये भी सुनने में आया है कि ललन सिंह ने नीतीश से मिलकर तेजस्वी की ताजपोशी का सुझाव दिया था । इसी के बाद से वे उनकी गतिविधियों पर निगाह रखे हुए थे। हालांकि खुद नीतीश ने ही  राष्ट्रीय राजनीति में जाने की रणनीति के अंतर्गत विपक्ष का गठबंधन बनाने की पहल की थी। उनका सोचना था वे उसके संयोजक बनकर प्रधानमंत्री पद का विपक्षी चेहरा बन जाएंगे । हालांकि इंडिया गठबंधन अस्तित्व में भी आ गया  किंतु संयोजक को लेकर  फैसला नहीं हो पा रहा। इसे लेकर नीतीश  नाराज भी थे और परेशान भी। लेकिन 19 दिसंबर की बैठक में ममता बैनर्जी ने बिना किसी भूमिका के जब नरेंद्र मोदी के मुकाबले मल्लिकार्जुन खरगे का नाम उछाल दिया तब उनको लगा कि उन्हें किनारे किया जा रहा है। इधर बिहार में लालू यादव एंड कंपनी ने भी परदे के पीछे से तख्ता पलट की तैयारी शुरू कर दी। शुरुआत में  तेजस्वी को लग रहा था कि गठबंधन का संयोजक बनने के बाद नीतीश मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली कर देंगे किंतु उसकी नौबत न आते देख  ललन के जरिए दूसरा दांव चलने का प्रयास किया । इसके अलावा नीतीश की पार्टी के कुछ विधायक दोबारा भाजपा के साथ गठजोड़ के पक्षधर हैं। उनको लग रहा है कि लालू का साथ  लेकर नीतीश ने जनता दल (यू) का भविष्य खतरे में डाल दिया है। मुख्यमंत्री भले ही वे हों किंतु लालू का पूरा परिवार शासन तंत्र पर हावी है। नीतीश पर ये दबाव भी बनाया जाने लगा कि वे अपने दल का लालू की पार्टी राजद में विलय कर दें।  इस पूरे घटनाक्रम में ललन की भूमिका संदिग्ध रही। ये अटकल भी आए दिन लगती रही कि नीतीश एक बार फिर एनडीए का दामन थाम सकते हैं। लेकिन भाजपा ने उनके लिए दरवाजे बंद करने की घोषणा कर डाली। कुल मिलाकर जो हालात उत्पन्न हुए उनमें नीतीश का सत्ता और संगठन दोनों  से नियंत्रण कम हो रहा था । राष्ट्रीय नेता बनने के लालच में राज्य  भी  हाथों से सरकने का अंदेशा पैदा हो गया । न सिर्फ तेजस्वी अपितु भाजपा भी जनता दल (यू) में सेंध लगाने के प्रयास में जुटी हुई थी। सुशील कुमार मोदी और गिरिराज सिंह जैसे नेता खुलकर कहने लगे थे कि नीतीश चलाचली की बेला में है। ऐसे में मुख्यमंत्री पद के साथ ही उनको पार्टी बचाने की चिंता हुई और ललन सिंह को हटाकर वे खुद अध्यक्ष बन बैठे। लेकिन इस पूरे खेल में नीतीश ने अपनी स्थिति हास्यास्पद बना ली। उल्लेखनीय है पार्टी के पिछले अध्यक्ष आरसीपी सिंह मोदी सरकार में मंत्री थे। नीतीश को शक था कि वे भाजपा के साथ मिलीभगत कर रहे हैं। इसीलिए उनकी राज्यसभा सदस्यता का नवीनीकरण नहीं किया गया और अध्यक्ष के साथ - साथ पार्टी से भी अलग कर दिया गया।  ये सब देखते हुए नीतीश की स्थिति बड़ी ही विचित्र हो गई है। धीर - गंभीर राजनेता की  छवि के विपरीत वे सत्ता के लोभी के तौर पर जाने जा रहे हैं। पहले लालू और अब कांग्रेस सहित विपक्ष के अन्य नेतागण उनकी महत्वाकांक्षाओं को जान चुके हैं और इसीलिए उनको इंडिया का संयोजक  नहीं बनाया जा रहा। जनता दल (यू) के मौजूदा संकट में हालांकि सतही तौर पर तो वे विजेता बनकर उभरे हैं लेकिन सच्चाई ये है कि नीतीश लगातार अपनी जमीन खोते जा रहे हैं। पार्टी विधायकों को अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है। लोकसभा की सीटों के लिए कांग्रेस के साथ ही वामपंथी भी दबाव बना रहे हैं। नीतीश की सबसे बड़ी चिंता इंडिया गठबंधन में अपनी वजनदारी घटने को लेकर है। बिहार की राजनीति में लालू परिवार जहां भ्रष्टाचार के कारण बदनाम है वहीं नीतीश की छवि पलटूराम की बन चुकी है। इसी सबके कारण वे बौखलाने लगे हैं। जातीय जनगणना को वे अपना तुरुप का पत्ता मान रहे थे किंतु तीन राज्यों में हार के बाद उसके प्रति कांग्रेस भी उदासीन हो चली है। ममता बैनर्जी ने तो प.बंगाल में  उसे लागू करने से साफ इंकार कर दिया।  इन सबकी वजह से ये कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश जल्द ही नया धमाका करेंगे । उनकी पीड़ा इस बात को लेकर भी है कि जब ममता ने इंडिया की बैठक में श्री खरगे का नाम प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर उछाला और अरविंद केजरीवाल ने उसका समर्थन किया तब न लालू और तेजस्वी ने उसका विरोध किया ,  न ही शरद पवार तथा अखिलेश यादव ने । 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 29 December 2023

जब तक नेता लोग आर.टी.ओ से मुफ्त बसें लेंगे ऐसे हादसे होते रहेंगे


किसी बड़ी दुर्घटना या भ्रष्टाचार के मामले में आम तौर पर निचले स्तर के सरकारी अमले पर गाज गिराकर बड़े ओहदेदारों को बचा लिया जाता है। इसे आम बोलचाल की भाषा में छोटी मछलियों को फंसाकर मगरमच्छों को छोड़ देना कहते हैं। हाल ही में म.प्र के गुना में हुई बस दुर्घटना में 13 लोगों के जलकर मर जाने की दर्दनाक घटना के बाद डा.मोहन यादव की सरकार ने परिवहन विभाग के स्थानीय अधिकारी और कर्मचारियों के साथ  ही जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को हटाने का निर्णय भी कर डाला । लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा है परिवहन आयुक्त को हटाए जाने की। प्राप्त जानकारी के अनुसार दुर्घटनाग्रस्त बस का न तो फिटनेस प्रमाणपत्र था और न ही परमिट। उसका मालिक स्थानीय भाजपा नेता का रिश्तेदार बताया जा रहा है। इससे संदेह होता है कि उसके अवैध कारनामे की स्थानीय पुलिस , प्रशासन और परिवहन विभाग अनदेखी करता रहा। वैसे भी परिवहन को मलाईदार विभागों की श्रेणी में सबसे ऊपर माना जाता है , जहां भ्रष्टाचार  चिल्ला - चिल्लाकर अपनी उपस्थिति का एहसास करवाता है। ड्राइविंग लाइसेंस जैसा साधारण काम हो या ट्रकों और बसों के परमिट जैसे बड़े मामले , परिवहन विभाग के किसी भी कार्यालय में बिना दलालों के काम करवाना आसमान से तारे तोड़कर लाने से भी कठिन है। सरकार के सैकड़ों प्रयासों के बावजूद आर. टी.ओ नामक इस व्यवस्था को दलालों से मुक्त करवाने में सफलता नहीं मिली। बहुत सारा काम ऑन लाइन होने के बाद भी  बिना बिचौलियों के इस महकमे में पत्ता भी नहीं खड़कता। ऐसा नहीं है कि सरकार में बैठे हुक्मरान इस विभाग के काले कारनामों से अपरिचित हों । लेकिन सत्ताधारी पार्टी की रैलियों और जलसों में भीड़ को ढोकर लाने के लिए परिवहन अधिकारी के जरिए मुफ्त में बसें और ट्रकों की व्यवस्था करवाए जाने के एवज में इस विभाग को भ्रष्टाचार की खुली छूट दे दी जाती है। अन्यथा कोई कारण नहीं है कि जमाने भर के प्रशासनिक सुधारों के बाद भी परिवहन विभाग की चाल , चरित्र और चेहरे में रत्ती भर का परिवर्तन नहीं हुआ। गुना में हुई दुर्घटना निश्चित रूप से समूची व्यवस्था के मुंह पर झन्नाटेदार तमाचा है। सत्ता संभालने के कुछ दिनों के भीतर ही मुख्यमंत्री डा.यादव के सामने ये मुसीबत आकर खड़ी हो गई। हालांकि ये घटना न होती तब भी प्रशासनिक शल्य  क्रिया के अंतर्गत परिवहन आयुक्त सहित अन्य अधिकारी भी आने वाले दिनों में इधर से उधर किए जाते । लेकिन 13 लोगों की दुखद मृत्यु जिन हालातों में हुई उसके कारण सामने आने के बाद भी यदि मुख्यमंत्री शांत बैठे रहते तो उन पर चौतरफा हमले होते। इसीलिए उन्होंने बिना देर किए बड़े पैमाने पर निलंबन और स्थानांतरण कर डाले। जल्द ही नया परिवहन आयुक्त नियुक्त हो जाएगा। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित बाकी जगहों पर दूसरे चेहरे नजर आएंगे। बस मालिक के साथ ही जिम्मेदार शासकीय अमले पर कार्रवाई का कर्मकांड होगा। मृतकों और घायलों के लिए निर्धारित मुआवजा सरकार बांट देगी , इलाज भी करवा दिया जाएगा । लेकिन आर.टी.ओ नामक कुख्यात व्यवस्था में सुधार का कोई ठोस उपाय किए बिना इस तरह के हादसों की पुनरावृत्ति असंभव है। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि राजमार्गों पर वाहनों की जांच करने वाले परिवहन विभाग के दस्ते अवैध वसूली में ही लिप्त रहते हैं। कई स्थानों पर तो  परिवहन विभाग के लोगों द्वारा अपने निजी लोगों को आर. टी.ओ दस्ते के तौर पर खड़ा कर काली कमाई की जाती है। ओवर लोडिंग के अलावा बिना वाहन बीमा , परमिट और ड्राइविंग लाइसेंस के  वाहन चालन आम बात है। व्यवसायिक वाहनों की जांच यदि सही तरीके से हो  तो आधे से ज्यादा चलने लायक नहीं निकलेंगे। आजकल कम उम्र के बच्चों द्वारा दोपहिया तो क्या चार पहिया वाहन चलाए जाने का चलन बढ़ गया है । ऐसे वाहन चालक आए दिन दुर्घटना का कारण बनते हैं। उच्चस्तरीय राजमार्गों के विकास की वजह से सड़क यातायात काफी बढ़ा है । उसी के साथ दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं जिनमें प्रतिवर्ष लाखों लोगों की जान चली जाती है। इन सबसे बचा जा सकता है ,बशर्ते परिवहन विभाग अपने दायित्व का सही तरीके से निर्वहन करे । लेकिन ये तभी संभव है जब सरकार में बैठे महानुभाव इस महकमे को दुधारू गाय समझना बंद करें । जब तक आर.टी.ओ से मुफ्त बसों की मांग नेता बिरादरी करती रहेगी तब तक न परिवहन विभाग का भ्रष्टाचार रुकेगा और न अवैध रूप से चल रहे वाहनों से होने वाली जानलेवा दुर्घटनाएं। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 December 2023

गठबंधन में बिखराव का कारण बन सकती है राहुल की न्याय यात्रा


कांग्रेस नेता राहुल गांधी आगामी 14 जनवरी से न्याय यात्रा पर निकलने वाले हैं। 6,200 किलोमीटर की यह यात्रा मणिपुर से शुरुआत के बाद  नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात  होते हुए  20 मार्च को मुंबई में समाप्त होगी। इसके पहले श्री गांधी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक की भारत जोड़ो  यात्रा की थी जिसमें वे 3500 किमी पैदल चले थे। लेकिन न्याय यात्रा के कुछ हिस्सों में वे वाहन का उपयोग भी करेंगे। गौरतलब है यह यात्रा  इंडिया गठबंधन के आकार लेने के बाद होने जा रही है किंतु इसका आयोजन कांग्रेस द्वारा किया जा रहा है । ये प.बंगाल , झारखंड  और बिहार जैसे राज्यों से भी गुजरेगी जहां गठबंधन में शामिल दलों का शासन है। जाहिर है इसका उद्देश्य कांग्रेस को मजबूती प्रदान करना है। उस दृष्टि से देखें तो भारत जोड़ो यात्रा का असर  मिला - जुला ही कहा जाएगा क्योंकि कांग्रेस ने इसके बाद तेलंगाना में तो सरकार बनाई किंतु छत्तीसगढ़ और राजस्थान उसके हाथ से निकल गए । वहीं म.प्र में जीत की उम्मीदों पर पानी फिर गया। स्मरणीय है म.प्र और राजस्थान के बड़े हिस्से से  भारत जोड़ो यात्रा निकली थी । इस प्रकार ये कहना गलत होगा कि उस यात्रा के बाद राहुल की छवि एक परिपक्व नेता में बदल गई । तेलंगाना के अलावा म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो उन्होंने धुंआधार प्रचार और रोड शो किए ही साथ ही वे मिजोरम में भी कांग्रेस की विजय हेतु अभियान पर गए। इन पांच राज्यों में केवल दक्षिण का तेलंगाना ही कांग्रेस के कब्जे में आ सका जबकि हिन्दी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों में कांग्रेस को जिस तरह की हार देखने मिली उसके कारण  हिमाचल और कर्नाटक में भाजपा को सत्ता से  बाहर करने के बाद अन्य विपक्षी दलों पर हावी होने की उसकी कोशिश धरी की धरी रह गई। चुनाव परिणाम आने के बाद इंडिया गठबंधन की जो बैठक हुई उसमें ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर  मल्लिकार्जुन खरगे का नाम उछालकर  स्पष्ट कर दिया कि गठबंधन के भीतर ही श्री गांधी की  क्षमता पर अविश्वास है। उक्त प्रस्ताव का अरविंद केजरीवाल ने भी समर्थन किया था। सही बात ये है कि कर्नाटक की जीत के बाद कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन के संयोजक और सीटों के बंटवारे के लिए फार्मूला तय करने के काम को ये सोचकर टाला कि चार राज्यों में विजय हासिल करने के बाद गठबंधन में शामिल दल उसके इशारे पर नाचने मजबूर हो जाएंगे । स्मरणीय है कर्नाटक और हिमाचल का चुनाव भी भाजपा ने प्रधानमंत्री के नाम को सामने रखकर ही लड़ा था ।  हार के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने ये कहना शुरू कर दिया कि मोदी मैजिक असरकारक नहीं रहा। लेकिन भाजपा इससे हताश नहीं हुई और उसने म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मोदी की गारंटी के नारे पर कांग्रेस को पूरी तरह धराशायी कर दिया। तेलंगाना में भी उसकी सीटें और मत प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इन परिणामों से नीतीश कुमार ,ममता बैनर्जी , अखिलेश यादव , अरविंद केजरीवाल जैसे क्षेत्रीय छत्रप भी गठबंधन में कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने के प्रति अनिच्छुक नजर आने लगे। 19 दिसंबर की बैठक के पहले शिवसेना के मुखपत्र सामना में कांग्रेस को लेकर की गई तीखी टिप्पणी अपने आप में बहुत कुछ कह गई। ऐसे में श्री गांधी की न्याय यात्रा के जरिए कांग्रेस के वर्चस्व को साबित करने का जो दांव चला जा रहा है वह कितना कारगर होगा यह तो समय बताएगा किंतु  इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि यह  गठबंधन के बिखराव का कारण बन सकता है। बिहार में जद (यू) में चल रही खींचातानी के बीच ये अटकल लगाई जा रही है कि नीतीश फिर पलटी मारेंगे। हालांकि भाजपा इस बार उनको साथ लेने के प्रति उत्साहित नहीं है किंतु नीतीश का इतिहास देखते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि वे लोकसभा चुनाव के पहले ऐसा कुछ कर सकते हैं जिससे कांग्रेस को झुकने के लिए मजबूर किया जा सके । ये देखते हुए  न्याय यात्रा का समय रणनीतिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। एक तरफ जहां भाजपा जनवरी के अंत तक 2019 में  हारी हुई लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी घोषित करने का संकेत दे रही है तब कांग्रेस की शक्ति और संसाधन इस यात्रा के प्रबंधन में खर्च होंगे। 22 जनवरी को अयोध्या में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद भाजपा उसका लाभ लेने के लिए योजनाबद्ध तरीके से जुटी है । होना तो ये चाहिए ऐसे समय बजाय यात्रा के राहुल गठबंधन के सदस्यों के बीच सामंजस्य बनाकर सीट बंटवारे का आधार तय करते हुए अपने नेतृत्व के प्रति उनमें भरोसा पैदा करते । लेकिन ऐसा लगता है न तो वे और न ही उनकी पार्टी दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ पा रही है। इसलिए 3 दिसंबर के पहले तक जो राजनीतिक विश्लेषक श्री गांधी की शान में कसीदे पढ़ते थे , उनके सुर बदल गए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 26 December 2023

अयोध्या न जाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे विपक्षी नेता


कांग्रेस दावा करती है कि राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने की परिस्थिति ही न बनती यदि स्व.राजीव गांधी राम लला की मूर्तियों पर लगे ताले न खुलवाते। लेकिन जब राम जन्मभूमि पर बना बाबरी ढांचा हटाकर  राम मंदिर बनाने की मांग उठी तो कांग्रेस पीछे हट गई। 6 दिसंबर 1992 को जब कारसेवकों ने वह ढांचा धराशायी कर दिया तब कांग्रेस के प्रधानमंत्री स्व. पी.वी नरसिम्हा राव ने उसे दोबारा खड़ा करने का आश्वासन सार्वजनिक रूप से  दिया था। उस घटना के बाद रामसेतु और भगवान राम के अस्तित्व सहित राम लला का मामला अदालतों में चला तब भी कांग्रेस के वरिष्ट नेता बतौर अधिवक्ता विरोध में पैरवी करने खड़े हुए। हालांकि चुनाव के दौरान राहुल गांधी अयोध्या से प्रचार शुरू करने जाते रहे और देश भर के मंदिरों में पूजा - अर्चना करते हुए खुद को हिंदू साबित करने का प्रयास भी करते दिखे परंतु  उसका न उनको लाभ मिला और न ही कांग्रेस पार्टी को। म.प्र के हालिया विधानसभा चुनाव में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए गए कमलनाथ ने तो खुद को भाजपा से बड़ा हिंदूवादी प्रचारित करने के लिए तरह - तरह के हथकंडे अपनाए किंतु  कोई प्रभाव नहीं पड़ा । इसकी वजह हिंदुत्व के प्रति कांग्रेस का दोहरा रवैया है । 2014 के बाद  ए.के. एंटोनी समिति द्वारा दी गई समझाइश के बाद कांग्रेस ने नर्म हिंदुत्व अपनाने का स्वांग रचा किंतु उसके भीतर ही इसे लेकर असमंजस है। सबसे बड़ा मजाक तो ये हुआ कि केरल में एंटोनी जी का बेटा ही भाजपा में  आ गया। कर्नाटक में सरकार बनते ही कांग्रेस ने जिस तरह का मुस्लिम तुष्टिकरण शुरू किया उससे साफ है कि राहुल और उनकी बहिन प्रियंका का हिंदू धर्म के प्रति झुकाव महज दिखावा है।  आगमी 22 जनवरी को अयोध्या में राम लला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने को लेकर कांग्रेस में जो अनिश्चितता और अनिर्णय नजर आ रहा है वह हिंदुत्व के प्रति उसके उपेक्षा पूर्ण रवैये का ज्वलंत प्रमाण है। उसकी देखासीखी अन्य विपक्षी दल भी उक्त आयोजन के निमंत्रण को स्वीकार करने के प्रति ढुलमुल बने हुए हैं। इस मामले में वामपंथियों की तारीफ करने होगी जिनकी ओर से वृंदा करात और सीताराम येचुरी ने दो टूक इंकार कर दिया। जहां तक बात कपिल सिब्बल की है तो राम मंदिर के विरुद्ध अदालत में खड़े होने के अपराधबोध के चलते वे अयोध्या जाने की हिम्मत ही नहीं कर पा रहे। सपा भी तय नहीं कर पा रही कि वह अयोध्या में आयोजित ऐतिहासिक समरोह में शिरकत करे या न करे। उसके एक नेता स्वामी प्रसाद मौर्य तो हिन्दू धर्म को धोखा बताने पर आमादा हैं । रामचरित मानस की प्रतियां जलाने जैसा घृणित अपराध करने के बावजूद अखिलेश यादव द्वारा उनको पार्टी में बनाए रखना हिन्दू विरोधी मानसिकता का परिचायक है। शरद पवार की बेटी और एनसीपी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने भी उक्त समारोह के राजनीतिकरण का बहाना बनाकर अयोध्या जाने में अरुचि दिखाई है।  वहीं इंडिया गठबंधन के कुछ और सदस्य भी न जाने का बहाना ढूंढ़ रहे हैं। ज्यादातर को इस बात की शिकायत है कि राम लला की प्राण प्रतिष्ठा और राम मंदिर के निर्माण का श्रेय भाजपा अकेले लूटकर 2024 के लोकसभा चुनाव में हिंदुओं को  अपने पक्ष में गोलबंद करना चाह रही है किंतु गैर भाजपा दल जब मुस्लिम तुष्टीकरण करने के लिए सारी मर्यादाएं तोड़ रहे हैं तब उसकी प्रतिक्रिया तो होगी ही। तमिलनाडु के द्रमुक मुख्यमंत्री का बेटा सनातन को डेंगू ,मलेरिया और कोरोना बताकर खत्म करने की बात करे और कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे द्वारा उसका समर्थन किए जाने के बाद भी कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के घटक दल मुंह में दही जमाए  बैठे रहें तो सनातन धर्म के  अनुयायी स्वाभाविक रूप से हिंदुत्व की बात करने वाली भाजपा के साथ खड़े होंगे। म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त पराजय का कारण सनातन के विरोध के कारण हिन्दुओं में उत्पन्न गुस्सा भी रहा। ये देखते हुए विपक्षी पार्टियों द्वारा राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक उत्सव का बहिष्कार  अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी मूर्खता होगी। उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि राम मंदिर आंदोलन का विरोध करने की उनकी गलती के कारण ही भाजपा देखते - देखते देश की सबसे ताकतवर पार्टी बन गई। और ये भी कि हिन्दुत्व अब राजनीति नहीं अपितु राष्ट्रहित से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।  विपक्ष का बैर भाजपा से हो सकता है किंतु मुस्लिम वोटों के हाथ से खिसकने के भय से यदि वे अयोध्या जाने से बच रहे हैं तो फिर ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि उसके नेताओं की बुद्धि और विवेक दोनों नष्ट हो चुके हैं। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 



म.प्र में मंत्रीमंडल के गठन के पीछे भाजपा की दूरगामी सोच


कांग्रेस नेता राहुल गांधी बीते काफी समय से संसद और अन्य स्थानों पर जो ओबीसी राग अलाप रहे थे , वह कांग्रेस के गले पड़ गया। भाजपा ने म.प्र में ओबीसी की सबसे प्रमुख यादव जाति का मुख्यमंत्री और छत्तीसगढ़ में उपमुख्यमंत्री बनाकर अपनी सोशल इंजीनियरिंग का डंका पीट दिया। जातिगत जनगणना का जो वायदा कांग्रेस ने चुनाव घोषणापत्र में किया था उसकी भी हवा निकल गई । वह मुद्दा जितनी तेजी से उठा उतनी ही तेजी से धड़ाम हो गया। गत दिवस म.प्र मंत्रीमंडल के विस्तार में भी भाजपा ने ओबीसी पर विशेष ध्यान दिया और 12 मंत्री इस वर्ग के बनाकर लोकसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति का संकेत दे दिया ।  प्रदेश में कुल 35 मंत्री बनाए जा सकते हैं जिनमें से मुख्यमंत्री और 2 उपमुख्यमंत्री के अलावा 28 मंत्री बनाए जाए के बाद अब 4 स्थान मंत्रीमंडल में रिक्त हैं। जिनको संभवतः लोकसभा चुनाव के बाद भरे जाने की नीति बनाई गई है। ये भी मुमकिन है कि कुछ युवा विधायकों को और भी शामिल किया जाए जिनकी क्षमता का आकलन केंद्रीय नेतृत्व करेगा । बहरहाल , फिलहाल तो जातीय संतुलन के लिहाज से भाजपा ने बाजी मार ली है। यद्यपि कांग्रेस ने आदिवासी नेता प्रतिपक्ष और ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष के साथ ही ब्राह्मण को उप नेता प्रतिपक्ष बनाकर मुकाबले में खड़ा होने का प्रयास तो किया है किंतु तीनों चेहरे ऐसे नहीं हैं जो लोकसभा चुनाव में उसकी नैया पार लग सकें। मंत्रीमंडल के गठन में  भले ही 10 दिन का समय लगा लेकिन क्षेत्रीय संतुलन के साथ ही वरिष्टता और नए खून को समुचित महत्व देकर पार्टी ने भविष्य की व्यूह रचना जमा ली है। उसकी तुलना में कांग्रेस अभी तक पराजय के झटके से उबर नहीं पा रही। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को पूरी तरह किनारे किए जाने के बाद नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करने वाला कोई वरिष्ट नेता नजर नहीं आ रहा। प्रदेश में पार्टी का संगठन पूरी तरह से बिखरा हुआ है। छिंदवाड़ा छोड़कर बाकी एक भी जिला नहीं है जहां कांग्रेस का एक छत्र प्रभाव हो। विधानसभा चुनाव में ज्यादातर दिग्गज हार चुके हैं और जो जीते वे अब हथियार उठाने लायक नहीं रहे। ऐसे में भाजपा सरकार का नया मंत्रीमंडल लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक मजबूत दस्ते की तरह है जो  प्रदेश में उसको और ताकतवर बनाने में सहायक होगा। कांग्रेस दरअसल इस समय निहत्थी है क्योंकि वह राहुल की भारत जोड़ो यात्रा पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो गई थी। हिमाचल और कर्नाटक की जीत को भी उसी से जोड़कर देखा जा रहा था। इसी वजह से इंडिया गठबंधन में  उसने बड़े भाई की भूमिका निभाने का दबाव बनाया किंतु म. प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में करारी हार के बाद पार्टी में सन्नाटा छा गया। गठबंधन में शामिल बाकी दलों ने चुनाव परिणाम आते ही कांग्रेस पर हमला बोल दिया। 19 दिसंबर को इंडिया की जो बैठक हुई उसमें प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तो गठबंधन की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रस्तावित कर राहुल गांधी को हाशिए पर धकेलने का जो दांव चला उसे समर्थन देने में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक क्षण भी नहीं गंवाया। बैठक में मौजूद अन्य दलों के नेताओं में से किसी ने भी ममता और अरविंद की उस जुगलबंदी का विरोध नहीं किया जिसे मौन समर्थन ही कहा जायेगा । हालांकि श्री खरगे ने चुनाव के बाद प्रधानमंत्री तय होने की बात कहकर मुद्दे को टालने की कोशिश की लेकिन तीर तो धनुष से निकल ही चुका था। बहरहाल , कांग्रेस तीन राज्यों में मिली पराजय के बाद पूरी तरह हताश नजर आ रही है। दूसरी तरफ भाजपा तिहरी जीत की खुशी में डूबी रहने की बजाय लोकसभा चुनाव की मोर्चेबंदी में जुट चुकी है। म. प्र में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बाद मंत्रीमंडल के सदस्यों का जिस तरह चयन हुआ उससे ये बात स्पष्ट है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व 2024 की रणभूमि में अपनी सेना और उसके नायकों की तैनाती काफी सोच - समझकर कर रही है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी सरकार का नेतृत्व तय करते समय बहुत ही दूरदर्शिता दिखाई गई। सबसे बड़ी बात ये रही कि जिन दिग्गजों को अपरिहार्य माना जाता था उनको दौड़ से बाहर कर ये संदेश दे दिया गया कि भाजपा के पास वैकल्पिक नेतृत्व की कमी नहीं है। पार्टी ने पीढ़ी परिवर्तन की प्रक्रिया को जिस चतुराई से शुरू किया वह अन्य पार्टियों के लिए सबक है। विशेष तौर पर कांग्रेस के लिए जो कुछ नेताओं के शिकंजे से बाहर ही नहीं निकल पाती। हालांकि म.प्र जनसंघ के जमाने से हिंदुत्ववादी राजनीति का गढ़ रहा है लेकिन वह मध्य भारत और मालवा अंचल तक ही सीमित था परंतु भाजपा ने समूचे प्रदेश में अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं। ये देखते हुए लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतने का जो दावा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया वह सच हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जो दुर्गति हुई उसके बाद छिंदवाड़ा के मतदाताओं में कमलनाथ को लेकर जो आकर्षण था उसका भी ढलान पर आना तय है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 December 2023

मस्जिद में अजान देने वाले की हत्या आतंकवादियों की बौखलाहट का प्रमाण


कश्मीर घाटी के बारामूला में मस्जिद से अजान दे रहे एक पूर्व पुलिस अधिकारी को आतंकवादियों ने गोलियों से भून दिया। बीते काफी समय से घाटी में पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादी निर्दोष नागरिकों की  बेरहमी से हत्या कर रहे हैं।  पुलिस कर्मियों के साथ ही छुट्टी पर घर लौटे फौजी भी उनका निशाना बनते हैं। बीच - बीच में कुछ ऐसे लोग भी गोलियों के शिकार बने जिनका शासन या प्रशासन से कोई संबंध नहीं है। अनेक मर्तबा मस्जिदों पर भी वे धावा बोल चुके हैं। उल्लेखनीय ये है कि इस्लाम के नाम पर आतंक का सहारा लेने वाले मुसलमानों की जान लेने में भी नहीं हिचक रहे। जिस पूर्व पुलिस अधिकारी को गत दिवस बारामूला में गोली मारी गई वह मस्जिद में नमाज के लिए अजान दे रहा था , जो इस्लाम के नजरिए से बड़ा ही पवित्र कार्य होता है। ऐसे व्यक्ति को मौत के घाट उतारने वाले लोग कानून की नजर में तो अपराधी हैं ही किंतु इस्लाम की स्थापित मान्यताओं के तहत भी गुनहगार कहे जाएंगे। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को समाप्त करने और राज्य का विभाजन किए जाने के फैसले को सही बताए जाने  के बाद घाटी  में सक्रिय भारत विरोधी तत्वों की बौखलाहट बढ़ गई है। न्यायालय के आदेश पर विधानसभा चुनाव की तैयारी भी की जाने लगी है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान राज्य में परिसीमन संबंधी व्यवस्था भी पारित कर ली गई। इसके बाद वहां की  राजनीति पर कुंडली मारकर बैठे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के होश उड़े हुए हैं। जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा भी लौटाया जा रहा है। लेकिन जम्मू अंचल में विधानसभा सीटें बढ़ जाने से अलगाववादी चिंतित हैं । राज्य की राजनीति में घाटी का जो दबदबा था वह खत्म तो मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही होने लगा था। रही - सही कसर पूरी हो गई धारा 370 हटाए जाने के बाद बने हालातों से। सर्वोच्च न्यायालय में उस निर्णय के विरुद्ध दायर याचिकाओं के निपटारे तक घाटी में कार्यरत पाकिस्तान समर्थक नेताओं और संगठनों की उम्मीदें जीवित थीं  किंतु फैसला आने के बाद वे हताश हो उठे। उसके बाद से घाटी में फौजी काफिले पर हमले जैसी घटनाएं देखने मिल रही हैं। लेकिन मस्जिद में अजान दे रहे पूर्व पुलिस अधिकारी की हत्या निश्चित रूप से साबित करती है कि आतंकवादी बदहवासी पर उतर आए हैं। दरअसल ये सब राज्य में पिछले चार वर्षों के दौरान बने शांतिपूर्ण वातावरण को खत्म कर एक बार फिर घाटी को हिंसा की आग में झोंकने का षडयंत्र है । इसे अलगाववादी नेता और उनकी पार्टियां परदे के पीछे रहते हुए समर्थन और सहायता दे रही हैं। ये वही तबका है जिसने चेतावनी दी थी कि कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद वहां तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा। लेकिन केंद्र सरकार की तगड़ी मोर्चेबंदी के कारण जब उस फैसले के बाद कश्मीर घाटी में भारत विरोधी ताकतों की कमर टूटने लगी और आम जनता को केंद्र सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना भ्रष्टाचार के मिलने लगा तो घाटी के अंदरूनी इलाकों तक में लोग खुश हुए किंतु अलगाववादी इस बदलाव को बर्दाश्त नहीं पा रहे थे। और इसीलिए वे कभी छोटी तो कभी बड़ी घटना के जरिए भय का माहौल बनाए रखने की कोशिशें करते रहे। सेना द्वारा किसी आतंकवादी को मारे जाने पर हल्ला मचाने वाले अब्दुल्ला और मुफ्ती ब्रांड नेताओं द्वारा न तो किसी शिक्षक की हत्या पर आंसू बहाए गए न ही वर्दीधारी पुलिस कर्मी अथवा फौजी जवान या अधिकारी की। गत दिवस बारामूला में की गई हत्या मस्जिद में की गई किंतु घाटी के नेताओं ने मुंह में दही जमा रखा है। इस सबसे लगता है कि ज्यों - ज्यों चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी त्यों - त्यों घाटी को अशांत करने वाली घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। धारा 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू कश्मीर में पर्यटन उद्योग में जिस तरह का उछाल आया वह इस दावे को सही साबित करने के लिए पर्याप्त है कि घाटी में आतंकवादी ताकतें कमजोर हुई हैं। इसका कारण जनता का भी उनसे दूरी बनाना है । उसे ये बात  समझ में आने लगी है कि आतंकवाद के रहते उसके जीवन में शांति और समृद्धि नहीं आ सकती। घाटी के नेताओं को यही बात अखर रही है। पाकिस्तान भी ये देखकर हैरान है कि अब उसके भेजे आतंकवादियों को जनता का पहले जैसा सहयोग नहीं मिल रहा। कुल मिलाकर 370 हटाए जाने का दर्द छोटी - छोटी घटनाओं के तौर पर देखने मिलता रहेगा । इसलिए केंद्र सरकार को पूरी तरह सतर्क रहना होगा क्योंकि आतंकवादी और अलगाववादी ताकतें बौखलाहट में किसी भी हद तक जा सकती हैं।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 December 2023

कर्ज : विकास के लिए अच्छा किंतु खैरात के लिए नुकसानदेह


एक तरफ तो अनेक विश्वस्तरीय संगठन भारत की आर्थिक प्रगति की प्रशंसा करते हैं। विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद जल्द ही उसके तीसरे स्थान पर पहुंचने की संभावना है। भारत के प्रति विदेशी निवेशकों का आकर्षण बढ़ा है। विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर से भी ऊपर है। शेयर बाजार नई ऊंचाइयां छूने लगा है। चीन से निकलीं अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत का रुख किया है। मोबाइल फोन उत्पादन के पश्चात भारत अब ऑटोमोबाइल उद्योग में भी विश्वस्तरीय हो रहा है। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में तो दबदबा पहले से ही था किंतु  अंतरिक्ष और सैन्य उपकरणों के मामले में भी भारत ने ऊंची छलांग लगाई है। बावजूद इसके अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा बढ़ते हुए कर्ज पर दी गई चेतावनी चर्चा का विषय  है।  तमाम विशेषज्ञों ने उसके पक्ष - विपक्ष में अपने विचार रखे हैं। केंद्र सरकार ने स्पष्टीकरण दिया कि  हालात नियंत्रण में हैं क्योंकि कुल कर्ज में विदेशी  हिस्सेदारी बहुत कम है ।  बड़ा हिस्सा भारतीय स्रोतों से लिए जाने से परेशानी नहीं होगी। आंकड़ों के अनुसार देश के हर नागरिक पर 1.50 लाख रु. का कर्ज है। उल्लेखनीय है डा.मनमोहन सिंह की सरकार ने जो कर्ज लिया वह पहले से तीन गुना अधिक था। नरेंद्र मोदी के  कार्यकाल में उसमें तीन गुनी वृद्धि और हो जाने से वह भारी - भरकम नजर आने लगा। मुद्रा कोष को चिंता है कि भारत इसी गति से कर्ज लेता रहा तो  श्रीलंका सरीखे हालात पैदा हो सकते हैं। दरअसल  1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के वित्तमंत्री रहते हुए डा. सिंह द्वारा आर्थिक सुधारों की जो शुरुआत की उसने पूंजी को महत्वपूर्ण बना दिया । जिस शेयर बाजार पर पैसे वालों का एकाधिकार  था उसमें मध्यम वर्ग का प्रवेश होने लगा । बैंकों में जमा राशि पर ब्याज घटने से घरेलू बचत का रुख पूंजी बाजार की तरफ हो गया। उदारीकरण ने उधारीकरण को भी बढ़ावा दिया जिससे न सिर्फ सरकार अपितु आम उपभोक्ता में भी कर्ज लेकर जरूरतें पूरी करने की प्रवृत्ति जागी। परिणामस्वरूप चारों तरफ विकास के नाम पर समृद्धि नजर आने लगी। जिस साधारण नौकर पेशा की पहिचान  साइकिल थी  ,वह कर्ज के बल पर स्कूटर  और मोटर सायकिल से बढ़ते हुए छोटी कार तक आ पहुंचा। 20 साल पहले तक जितने युवाओं के पास सायकिल थी उससे ज्यादा के पास आज मोटर सायकिल है। दुनिया के सर्वाधिक मोबाइल फोन उपभोक्ता इस देश में हैं। झुग्गियों में भी टीवी की मौजूदगी है। इसके अलावा देश में विश्वस्तरीय राजमार्गों का निर्माण हो सका। पुल  , फ्लायओवर , नई रेल लाइनें, हवाई सेवा का विस्तार , विशाल हवाई अड्डे , बंदरगाह , पांच सितारा होटल , पर्यटन केंद्रों पर बढ़ती भीड़ , विदेश यात्रा का बढ़ता चलन , उच्च शिक्षा हेतु विदेश जाने वालों की बढ़ती संख्या  कर्ज की सहज उपलब्धता के कारण ही संभव हो सकी।  साथ ही अनेक ऐसे कार्य किए गए  जो  आय का साधन बनते जा रहे हैं।  सच तो यह है कि कर्ज चाहे घरेलू हो या विदेशी , यदि उसका उपयोग अनुत्पादक कार्यों में होता है तब वह समस्या बनता है किंतु अधोसंरचना जैसे प्रकल्पों में उसे इस्तेमाल करें तो कालांतर में वह समृद्धि का आधार बनता है। मसलन राजमार्गों के उन्नयन में लगाया गया धन टोल टैक्स के जरिए तो लौटता ही है उसकी वजह से परिवहन और ऑटोमोबाइल उद्योग भी तेज गति से आगे बढ़ा है। आधुनिक  स्टेडियम बनाने से विश्वस्तरीय आयोजन संभव होते हैं जिनसे खेल और खिलाड़ियों के विकास के साथ ही मोटी कमाई होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में संपन्न क्रिकेट  विश्व  कप है जिससे बीसीसीआई को करोड़ों की आय हुई और आज वह दुनिया का सबसे धनवान खेल संगठन है। आईपीएल का सफल आयोजन भी अच्छे स्टेडियम होने के कारण ही संभव हो सका जिसने इंग्लिश काउंटी जैसे क्लब क्रिकेट की चमक फीकी कर दी। लेकिन चिंता का विषय केंद्र और  राज्यों की वे योजनाएं हैं जिनके जरिए लोगों को विभिन्न नामों से  नगद राशि , मुफ्त अनाज  और घर ,  सायकिल , स्कूटी, टीवी , सस्ती और मुफ्त बिजली तथा रसोई गैस आदि  मिलती हैं । इनके जरिए   राजनीतिक दल चुनाव तो जीत जाते हैं लेकिन इनका बोझ करदाताओं पर पड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पेट्रोल और डीजल पर लगाया जाने  वाला भारी - भरकम कर। जीएसटी लागू होने पर इसे एक देश , एक कर का नाम दिया गया  परंतु राज्यों की जिद में उक्त दोनों को जीएसटी में शामिल नहीं किया जाता ताकि उनकी आय न घटे । लेकिन वही सरकारें वोट बैंक को लुभाने के लिए दोनों हाथों से लुटाती हैं तब उनको घाटे की फिक्र नहीं रहती। हो सकता है हालिया विधानसभा चुनावों में मुफ्त खैरातों की बाढ़ के कारण मुद्रा कोष को चिंता हुई हो क्योंकि ये चलन बढ़ता ही जा रहा है। म.प्र के नए मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने सत्ता संभालते ही  नौकरशाहों को बुलाकर आय बढ़ाने के रास्ते खोजने कहा किंतु वे तो निहायत ही सीमित हैं। ऐसे में सरकारों को अनुत्पादक खर्च रोकने पर ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री स्वयं भी मुफ्तखोरी के विरुद्ध चेतावनी दे चुके हैं किंतु उनकी अपनी सरकार और भाजपा शासित राज्य सरकारें भी  सबक नहीं ले रहीं , जो समझ से परे है। समय आ गया है जब चुनाव जीतने हेतु की जाने वाली मुफ्त योजनाओं की प्रतिस्पर्धा रोकी जाए। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अपना नजरिया हो सकता है किंतु उसकी चेतावनी में छिपे खतरे को नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी