Monday, 4 March 2024

सांसदों - विधायकों की घूसखोरी रोकने सर्वोच्च न्यायालय का साहसिक फैसला


सर्वोच्च न्यायालय ने आज ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सांसदों और विधायकों को पैसा लेकर सवाल पूछने और मत देने पर अपराधिक प्रकरण से छूट दिए जाने के 1998 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए स्पष्ट कर दिया कि सांसद या विधायक द्वारा सदन में किए गए किसी भी कार्य के लिए ली गई घूस को अभियोजन से मुक्त रखने का फैसला गलत था क्योंकि यह  सार्वजनिक जीवन में  ईमानदारी को नष्ट कर देता है। मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता  वाली 7 सदस्यों की संविधान पीठ ने 1998 में न्यायमूर्ति  पी. वी. नरसिम्हा राव वाली 5 सदस्यों की संविधान सभा द्वारा 3 : 2 से दिए उस फैसले को पलट दिया जिसके अनुसार सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण देने , प्रश्न पूछने अथवा मत देने के लिए मिली घूस अपराध की श्रेणी में नहीं आती। श्री चंद्रचूड़ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसा कृत्य जनप्रिधिनिधियों को मिले विशेषाधिकार की श्रेणी में नहीं आता और उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है। सांसदों और विधायकों को सदन के भीतर  किसी कृत्य या कथन के लिए अपराधिक प्रकरण से मिली छूट उनके विशिष्ट कर्तव्यों की दृष्टि से उचित थी। आजादी के बाद के कुछ दशकों तक जनप्रतिनिधि अपने विशेषाधिकार के साथ जुड़े सम्मान के प्रति जिम्मेदार रहे । इस कारण इस बारे में कभी कोई समस्या उत्पन्न नहीं हई। लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक से जनप्रतिनिधियों के आचरण में अनेक प्रकार की विकृति दिखाई देने लगी। दलबदल नामक  बीमारी का प्रकोप जैसे - जैसे बढ़ता गया वैसे - वैसे पैसे का प्रवाह संसदीय प्रणाली में तेज होने लगा। राज्यसभा में मतदान के समय निर्दलीय विधायकों की खरीद - फरोख्त आम हो चली। सदन में मत देने , प्रश्न पूछने और किसी निहित उद्देश्य से  भाषण देने के लिए जनप्रतिनिधियों के घूस दिए जाने की घटनाएं भी चर्चा का विषय बनने लगीं। स्व.नरसिम्हा राव की सरकार के बहुमत को साबित करने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चे के सांसदों को दी गई घूस  प्रकरण से जबरदस्त राजनीतिक बवाल पैदा हुआ था। 1998 में   सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए  निर्णय में झारखंड से उक्त पार्टी की विधायक सीता सोरेन द्वारा राज्यसभा चुनाव हेतु मिली घूस को अपराध योग्य नहीं माना गया था। आज सुनाए गए फैसले ने उसे निरस्त करते हुए जो व्यवस्था दी वह संसदीय जीवन में आई विकृतियों को कितना दूर कर पाएगी ये तत्काल कह पाना तो कठिन है किंतु जब विशेषधिकारों के गलत उपयोग को मिले कानूनी संरक्षण को समाप्त करने की शुरुआत हो ही गई है तब जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सामंती सुविधाओं पर उठने वाले सवालों पर भी विमर्श होना चाहिए। बेहतर हो सर्वोच्च न्यायालय इन मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर अपना अभिमत सार्वजनिक करे। ऐसे अनेक विषयों पर वह अक्सर वह  कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि ये काम संसद अथवा चुनाव आयोग का है। प्रजातंत्र सुचारू रूप से चले उसके लिए जिस नियंत्रण और संतुलन की बात सोची जाती है उसमें न्यायपालिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उसके ऊपर न तो राजनीतिक दबाव होता है और न ही नौकरशाही का । संविधान संबंधी किसी भी पेचीदगी के समय राष्ट्रपति तक सर्वोच्च न्यायालय की सलाह लेते हैं। यद्यपि कार्यपालिका , विधायिका और न्यायपालिका तीनों अपने - अपने स्तर पर स्वायत्त हैं किंतु किसी भी विवाद का अंतिम हल करने का अधिकार न्यायपालिका का ही है। और ऐसे में यदि उसे लगता है कि शेष दोनों स्तंभ उन्हें प्राप्त विशेषाधिकारों का अनुचित लाभ ले रहे हैं तब सलाह या नाराजगी के तौर पर बिना निर्णय सुनाए भी न्यायपालिका अपनी मंशा जाहिर कर सकती है । अनेक मामलों में उसने ऐसा किया भी । हालांकि विधायिका को ये लगता है कि जरूरत से ज्यादा न्यायिक सक्रियता उसके क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप है और इसीलिए दोनों पक्ष इस बारे में तीखी टिप्पणियां करते रहते हैं। लेकिन  न्यायपालिका निर्विकार भाव से लोकतांत्रिक व्यवस्था की बेहतरी के लिए सुझाव दे तो उन्हें सकारात्मक भाव से लिया जाना चाहिए। हो सकता है आज का फैसला भी सांसदों - विधायकों को नागवार गुजरे और जवाबी तौर पर वे भी न्यायाधीशों को मिले  विशेषाधिकारों पर उंगली उठाएं किंतु इस बात को भला कौन सही मानेगा कि संसद और विधानसभा में सवाल पूछने या मत देने के लिए ली गई घूस अपराध की श्रेणी में न मानी  जाए। श्री चंद्रचूड़ और उनके साथ पीठ में शामिल अन्य न्यायाधीश बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने 26 वर्ष  हुए फैसले को गलत ठहराने का साहस दिखाया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 March 2024

पेट्रोल ,डीजल और रसोई गैस तो सस्ते किए ही जा सकते हैं


2023 की आखिरी तिमाही में भारत की जीडीपी द्वारा 8 फीसदी का आंकड़ा पार करने की खबर आते ही शेयर बाजार ने सर्वकालिक उच्च स्तर को छू लिया । उसी के साथ ये जानकारी भी सार्वजनिक हुई कि फरवरी में जीएसटी से 1.68 लाख करोड़ रु. की प्राप्ति हुई। जो अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियां भारत की विकास दर को लेकर संशय में थीं वे भी अनुमान बदलने मजबूर हो रही हैं । आर्थिक जगत में चल पड़ी चर्चाओं से पता चलता है कि इस वित्तीय वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि 8 फीसदी तक होने की संभावना है जो बड़ी सफलता कही जाएगी । ऐसे समय जब दुनिया रूस - यूक्रेन और इजरायल - हमास युद्ध की विभीषिका से गुजर रही हो तथा अनेक विकसित देशों का अर्थतंत्र लड़खड़ाने की स्थिति में आ गया तब भारतीय अर्थव्यवस्था की ऊंची छलांग निश्चित तौर पर सुखद है। चीन की प्रगति में गिरावट आने से भारत को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी थीं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि जापान जैसी ठोस अर्थव्यवस्था तक डगमगाने लगी है। ब्रिटेन , जर्मनी , फ्रांस सभी संकट से गुज़र रहे हैं। ऐसे में भारत का आर्थिक मोर्चे पर शानदार प्रदर्शन आशान्वित कर रहा है। अर्थव्यवस्था के जो स्थापित मानदंड हैं वे सभी बेहतर भविष्य का इशारा कर रहे हैं। उपभोक्ता बाजार में अच्छी मांग से उत्पादन इकाइयों का उत्साह बढ़ा है। निर्यात में भी निरंतर सफलता मिल रही है। गृह निर्माण के अलावा , सड़कों और फ्लायओवर का काम तेजी से चलने के कारण उद्योग - व्यवसाय को सहारा मिलने के साथ ही श्रमिकों को काम भी मिल रहा है। सड़क , रेल और वायु मार्ग से परिवहन वृद्धि की ओर है। घरेलू पर्यटन में आशातीत परिणाम बेहद सुखद संकेत हैं। प्रत्यक्ष करों का संग्रह बढ़ना आर्थिक स्थिति के ठोस होने का प्रमाण है। इसीलिए सरकार जनहित की योजनाओं पर मुक्तहस्त से खर्च करने की स्थिति में है। मुफ्त अनाज योजना को पांच साल तक के लिए बढ़ा देना ये साबित करता है कि कृषि क्षेत्र अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम है। इसी माहौल के कारण भारत दुनिया भर के निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है और दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में इकाई लगाने तत्पर हैं। आर्थिक सुधारों ने उद्योगों के लिए जो अनुकूल वातावरण बनाया उसके सुपरिणाम सामने हैं। वहीं कच्चे तेल के आयात से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बोझ को कम करने की दिशा में किए गए प्रयास फलीभूत होने लगे हैं। बैटरी चलित वाहनों की बढ़ती बिक्री इसका सबूत है। वैकल्पिक ऊर्जा के तौर पर सौर ऊर्जा का बढ़ता उत्पादन अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी का काम करेगा। इतनी सारी उपलब्धियां देखकर प्रत्येक नागरिक को गौरव की अनुभूति होती है। इसकी वजह से वैश्विक स्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बढ़ी है। लेकिन इसके बावजूद आम जनता के बड़े वर्ग के चेहरे पर मुस्कान नहीं दिखाई दे रही क्योंकि उत्साहवर्धक आंकड़ों के बावजूद उसकी जेब खाली है। जीएसटी का मासिक आंकड़ा बीते साल भर से 1.5 लाख करोड़ से ऊपर बना हुआ है। इसी तरह प्रत्यक्ष करों की आय भी उम्मीद से ज्यादा है ।लेकिन जीएसटी की दरों के साथ ही पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस की ऊंची कीमतें विरोधाभासी तस्वीर पेश करती हैं। सरकार में बैठे लोगों का कहना है कि गरीब कल्याण की योजनाएं और कार्यक्रमों तो पर वह दिल खोलकर खर्च कर रही है। उसकी इस नीति पर किसी को एतराज नहीं है किंतु अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाले नौकरपेशा, मध्यम श्रेणी व्यापारी , लघु उद्योग संचालक और स्वरोजगार से आजीविका चलाने वालों की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि अर्थव्यवस्था की स्थिति मजबूत है तब जीएसटी की दरों को कम करने के साथ ही उसके केवल दो स्तर अर्थात 5 और 12 प्रतिशत ही रखे जाएं। रही बात पेट्रोल - डीजल की तो इनकी कीमतें बेशक वैश्विक स्तर पर तय होती हैं । लेकिन पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा बीते कुछ समय से अनाप - शनाप मुनाफा अर्जित किए जाने के बाद भी दाम नहीं घटाए जाने से आम जनता नाखुश है। यद्यपि लोकसभा चुनाव नजदीक होने के कारण केंद्र सरकार जीएसटी संबंधी नीतिगत फैसले नहीं ले सकती क्योंकि उसकी कौंसिल में राज्य भी हैं जो अपनी आय का हवाला देते हुए न तो दरें कम करने राजी होते हैं और न ही पेट्रोलियम पदार्थों को उसके अंतर्गत लाने पर सहमति देते हैं । फिर भी पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस सस्ते करना तो सरकार के अधिकार क्षेत्र में ही है। और लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने के पहले तो ऐसा किया ही जा सकता है। 

 -रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 1 March 2024

मुंबई बम विस्फोटों के आरोपी टुंडा का बरी हो जाना चिंता का विषय


1993 में  मुंबई सहित कुछ और शहरों में हुए बम विस्फोटों का कर्ताधर्ता  अब्दुल करीम उर्फ टुंडा गत दिवस अजमेर की टाडा अदालत से बरी कर दिया गया क्योंकि सीबीआई उसके विरुद्ध  आरोप पत्र प्रस्तुत नहीं कर सकी। वह दाऊद इब्राहीम के करीबियों में शुमार था। उसे बेकसूर मान लेना तो उचित नहीं होगा किंतु अदालत में किसी को अपराधी साबित करने के लिए प्रमाण सहित आरोप पत्र  प्रस्तुत करना पड़ता है। टुंडा जिस घटना के लिए पकड़ा गया उसे 30 वर्ष से भी अधिक बीत चुके हैं। लेकिन सिर्फ इसलिए कि जांच एजेंसी उसके विरुद्ध आरोप पत्र पेश नहीं कर सकी , वह बरी हो जाए तो फिर समूची अभियोजन प्रक्रिया पर सवाल उठ खड़े होते हैं। सीबीआई देश की प्रमुख जांच एजेंसी है। किसी भी बड़ी वारदात की जांच उससे करवाने की मांग उठती है। उसके द्वारा अनेक गंभीर मामलों के अपराधियों को दंडित करवाया जा चुका है। अनेक राजनीतिक नेता भी सीबीआई जांच के बाद  जेल जाने मजबूर हुए। भ्रष्टाचार के सैकड़ों मामलों के पर्दाफाश में उसने सराहनीय भूमिका का निर्वहन किया। लेकिन  अनेक चर्चित अपराधिक मामलों में वह दोषियों को दंड दिलवाने में विफल रही। टुंडा का बरी हो जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है क्योंकि मुंबई में हुए विस्फोट साधारण अपराध नहीं थे। देश की आर्थिक राजधानी में आतंक उत्पन्न करने के उस प्रयास में  पड़ोसी शत्रु राष्ट्र की भूमिका भी सामने आ चुकी है। कुख्यात माफिया सरदार दाऊद इब्राहीम उसके बाद  पाकिस्तान भाग गया था । लेकिन देश विरोधी गंभीर वारदातों के जो आरोपी पकड़ में आ गए उन सबको दंडित करने में भी जब लंबा समय लगाया जाता है तो अन्य अपराधियों का हौसला बुलंद होता है। टुंडा का मामला अकेला नहीं है जिसमें सीबीआई द्वारा आरोप पत्र दाखिल नहीं किए जाने के कारण अपराधी बरी हो गए हों। अन्य जांच एजेंसियां भी इसी तरह की उदासीनता के लिए जिम्मेदार हैं। गत दिवस चार वर्ष पूर्व दिल्ली में हुए दंगों की एक महिला आरोपी ने उसके विरुद्ध आरोप पत्र पेश न किए जाने की शिकायत की। यही तोहमत ईडी पर भी लगती है कि वह छापेमारी और गिरफ्तारी करने के बाद आरोप पत्र दाखिल करने में जो विलम्ब करती है उससे उसकी दुर्भावना जाहिर होने के साथ ही उसके शिकंजे में आए व्यक्ति के प्रति सहानुभूति उत्पन्न होने लगती है। हमारे देश में सिविल सोसायटी के नाम पर कुछ लोगों का समूह है जो किसी आतंकवादी की फांसी रुकवाने के लिए देर रात सर्वोच्च न्यायालय खुलवाने की हद तक चला जाता है। टुंडा जैसों के बरी हो जाने के बाद इस तबके को जांच एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करने का अवसर मिल जाता है। कई बार ऐसा लगता है कि सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों के पास काम का बोझ जरूरत से ज्यादा है।  गत दिवस खबर आई कि सीबीआई द्वारा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में हुए किसी भ्रष्टाचार के सिलसिले में पूछताछ हेतु बुलाया गया है । उन्हें सत्ता से हटे हुए सात वर्ष बीत चुके हैं। उ.प्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के विरुद्ध भी सीबीआई जांच एक बार बंद किए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उपरांत दोबारा शुरू की गई थी। इसीलिए ये आरोप केंद्र सरकार पर लगते हैं कि वह सीबीआई और ईडी का उपयोग अपने स्वार्थ साधने के लिए करती है। नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से घंटों पूछताछ होने के बाद मामला कहां पहुंचा ये कोई नहीं जानता। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया  साल भर से जेल में हैं। उनके विरुद्ध भी विस्तृत आरोप पत्र लंबित हैं। अदालत इस बारे में ईडी से तीखे सवाल भी कर चुकी है। हालांकि प्रभावशाली व्यक्तियों की ओर से जांच एजेंसी द्वारा की जाने वाली पूछताछ में अड़ंगे लगाया जाना भी जांच प्रक्रिया को विलंबित करने का कारण बनता है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लंबे  समय तक ईडी के समन को ठुकराते रहे और अंततः गिरफ्तार हुए। दिल्ली के मुख्यमंत्री भी ईडी के बुलावे को अनेक महीनों से नजरंदाज करते आ रहे हैं । इस तरह की रस्साखींच में आरोपी अपने बचाव के रास्ते तलाश लेता है। जांच एजेंसी के कार्यालय में पूछताछ होने के दौरान नेताओं के समर्थक बाहर धरना - प्रदर्शन देने बैठे रहते हैं। ये देखते हुए जरूरी हो गया है कि सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों की कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु उनको पर्याप्त स्टाफ दिया जाए । साथ ही लंबित प्रकरणों के जल्द निबटारे की समुचित व्यवस्था की जावे। अन्यथा इन एजेंसियों पर लगाए जाने वाले प्रश्नचिन्ह और गहरे हो जाएंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 February 2024

उच्च न्यायालय सख्त न होता तो शाहजहां की गिरफ्तारी नहीं होती



प.बंगाल के 24 परगना जिले का संदेशखाली नामक कस्बा बीते काफी समय से चर्चा में है। जनवरी माह में शाहजहां शेख नामक एक व्यक्ति के यहां ईडी का दल जब छापा मारने गया तो सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के उक्त  नेता के गुर्गों ने उस पर हमला कर दिया जिसमें ईडी के अनेक लोग घायल हो गए। उसी बीच शाहजहां भाग निकला। उस घटना के बाद संदेशखाली में उसके अत्याचारों का खुलासा होने लगा। वह और उसके गैंग के लोग महिलाओं के यौन शोषण और जमीनों पर कब्जा करने जैसा काम लंबे समय से करते आ रहे थे ।  उनके आतंक का  कोई विरोध इसलिए नहीं करता था क्योंकि  पुलिस द्वारा उनकी शिकायतें अनसुनी कर दी जाती थीं और पता लगने पर शाहजहां के लोग उन्हें और प्रताड़ित करते। महिलाओं को घर से उठा ले जाना और बलात्कार करने के बाद छोड़ देना वहां  आम हो चला था। नव विवाहिता तक के साथ इस तरह की अमानवीयता की जाती रही । जाहिर है शाहजहां और उसकी गैंग को सत्ता का संरक्षण था । ईडी के छापे के बाद शाहजहां के फरार होने और उसके खास साथियों के  भूमिगत हो जाने के बाद संदेशखाली में जो जनजागृति आई उसने पूरे देश को चौंका दिया। महिलाओं ने सड़कों पर आकर अपने साथ हुए अत्याचार का  वृतांत उजागर किया।  विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल , महिला और मानव अधिकार आयोग जैसी  संस्थाओं सहित समाचार माध्यमों के  प्रतिनिधियों ने भी संदेशखाली पहुंचकर वहां के हालात को देश और दुनिया की जानकारी में लाने का कार्य किया। होना तो ये चाहिए था कि मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  पीड़ित महिलाओं के जख्मों पर मरहम लगातीं और तृणमूल से जुड़े नरपिशाचों को गिरफ्तार करवाने की कार्रवाई करतीं। लेकिन इसके उलट उन्होंने विपक्षी दलों पर अशांति फैलाने का आरोप मढ़ दिया। सबसे  चौंकाने वाली बात रही शाहजहां को गिरफ्तार न किया जाना। बीच - बीच में खबर उड़ी कि वह बांग्ला देश भाग गया किंतु संदेशखाली में ही रह रहे उसके भाई दावा करते रहे कि वह प.बंगाल में ही था। कुछ दिन पहले कोलकाता उच्च न्यायालय ने ममता सरकार को लताड़ते हुए एक सप्ताह के भीतर शाहजहां को गिरफ्तार कर पेश करने का हुक्म दिया। उसके बाद सरकार हरकत में आई और आज सुबह उसे 24 परगना के ही किसी इलाके में गिरफ्तार कर लिया गया। अब जबकि शाहजहां पकड़ा जा चुका है तब ये प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठ खड़ा हुआ है कि उच्च न्यायालय द्वारा  डांट पिलाए जाने के बाद गिरफ्तारी इतनी आसानी से कैसे हो गई ? ये बात इसलिए उठ खड़ी हुई क्योंकि शाहजहां अपने ही जिले में पकड़ा गया। ये भी शंका है कि वह किसी अन्य जगह पर रहा हो और गिरफ्तार करने के लिए 24 परगना बुलवा लिया गया। भाजपा इस मामले को पूरे जोरशोर से उठाती आई है। वहीं कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर तो ममता सरकार पर हमला बोलने से परहेज किया किंतु उसकी प.बंगाल इकाई जरूर इस मुद्दे पर तृणमूल को घेरती रही।  उच्च न्यायालय द्वारा  दी गई  मोहलत के पहले ही पुलिस द्वारा शाहजहां को पकड़ लेने से ये स्पष्ट हो गया कि उसके ठिकाने के बारे में  शासन - प्रशासन को सब कुछ पता था। ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के जो आरोप लगते रहे , संदेशखाली ने उनकी पुष्टि कर दी है। शाहजहां और उसके गुर्गों के अत्याचार के जो किस्से वहां की महिलाओं द्वारा बताए जा रहे हैं वे दिल दहला देने वाले हैं । सबसे शर्मनाक ये है कि महिलाओं के साथ सामूहिक दुराचार तृणमूल के कार्यालय तक में होता रहा। अब जबकि शाहजहां और उसके साथ के लोग पकड़े जा चुके हैं तब सुश्री बैनर्जी को चाहिए उन्हें पार्टी से  बाहर करने के साथ ही संदेशखाली की पीड़ित महिलाओं और उनके परिवार को सुरक्षा और न्याय दिलवाने की पुख्ता व्यवस्था करें।  शाहजहां को राज्य सरकार का कितना  संरक्षण था ये उसके 55 दिन तक फरार रहने से स्पष्ट हो गया। उच्च न्यायालय यदि सख्ती न दिखाता तो वह अभी भी गिरफ्तार नहीं होता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 28 February 2024

क्रॉस वोटिंग : विपक्ष से अपना घर नहीं संभल रहा



गत दिवस उ.प्र, हिमाचल और कर्नाटक में राज्यसभा चुनाव के जो परिणाम आए उनमें सपा और कांग्रेस को  झटका लगा । उ.प्र में सपा के आधा दर्जन विधायकों ने भाजपा के आठवें प्रत्याशी को मत देकर अपने एक प्रत्याशी को हरवा दिया। इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस के 6 विधायकों द्वारा भाजपा प्रत्याशी को मत देने से अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। यदि  तीन निर्दलीय ही साथ देते तो कांग्रेस उम्मीदवार जीत जाता। लेकिन पार्टी का नेतृत्व सिर पर मंडराते खतरे को भांप नहीं सका । उ.प्र में भी सपा विधायकों द्वारा बगावत की आशंका  थी । वैसे बगावत कर्नाटक में भी हुई जहां भाजपा विधायक ने कांग्रेस प्रत्याशी को मत देकर सबको चौंका दिया। लेकिन उ.प्र में सपा और हिमाचल में कांग्रेस का प्रत्याशी चूंकि हार गया इसलिए भाजपा पर विधायकों को लालच और भय दिखाकर तोड़ने का आरोप लगाया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसमें सपा और कांग्रेस के नेतृत्व की विफलता देख रहे हैं जिसने सामने खड़े खतरे को नजरंदाज किया। उ.प्र में जया बच्चन को उम्मीदवार बनाए जाते ही सपा में बगावत के सुर उठने लगे थे जिन्हें अखिलेश यादव ने  अनसुना कर दिया । इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस को बगावत की आशंका थी इसीलिए सोनिया गांधी को राजस्थान से राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया  । कुछ मंत्री और विधायक खुलकर मुख्यमंत्री के विरुद्ध थे। राम मंदिर के शुभारंभ पर विक्रमादित्य सिंह नामक मंत्री  पार्टी लाइन से अलग हटकर अयोध्या भी गए। आज उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया । अनेक विधायक खुलकर मुख्यमंत्री बदलने पर अड़े हुए थे  जिसके बाद  मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू ने भी इस्तीफा दे दिया। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक शाम तक कांग्रेस नया नेता चुन सकती है। लेकिन बागी विधायक नहीं माने और  निर्दलीय भी छिटक गए तो सरकार की स्थिरता संदिग्ध रहेगी। उ.प्र में सपा चूंकि विपक्ष में है इसलिए उसे सरकार गिरने की चिंता तो है नहीं किंतु लोकसभा चुनाव के ठीक पहले पार्टी के विधायकों की बगावत अखिलेश के लिए चेतावनी है। निश्चित रूप से भाजपा की रणनीति विपक्षी दलों में सेंध लगाने की है । सत्ता में होने के कारण उसका प्रभाव और दबाव दोनों बढ़े हैं। लेकिन विपक्ष को अपनी कमजोरी भी देखनी होगी। हिमाचल में कांग्रेस की अंतर्कलह का लाभ ही भाजपा ने उठाया । उसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस के पास भारी बहुमत होने के बाद भी उसने एक भाजपा विधायक को तोड़ने में संकोच नहीं किया।  हिमाचल में मुख्यमंत्री द्वारा त्यागपत्र दिए जाने से स्पष्ट हो गया कि कल बगावत न हुई होती तब भी  उनके विरुद्ध  ज्वालामुखी फूटने के कगार पर था। स्मरणीय है श्री सुक्खू कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा की पसंद थे जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री स्व.वीरभद्र सिंह का परिवार पसंद नहीं करता । विक्रमादित्य उन्हीं के बेटे हैं और  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह उनकी माता जी । इस प्रकार श्री सिंघवी न हारते तब भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को हिलाने का प्रयास जारी रहता। दरअसल ये कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए चेतावनी है कि उसके द्वारा थोपे गए नेताओं को आंख मूंदकर स्वीकार कर लेने वाला दौर चला गया। वैसे भी पुरानी कहावत है कि जब केंद्रीय सत्ता कमजोर होती है तो सूबे सिर उठाने लगते हैं। गांधी परिवार राज्यों में अपनी मर्जी के नेताओं को लादने की जो गलती कर रहा है उसी के कारण अनेक राज्य उसके हाथ से खिसक गए। म.प्र में झटका खाने के बाद भी उसने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पनपे असंतोष का समय रहते इलाज नहीं किया जिसका नतीजा सामने है। सपा में भी अखिलेश खुद को सर्वेसर्वा मानकर नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ ही गठबंधन के साथियों से  दूरी बनाए रहते हैं। यही कारण है कि ओमप्रकाश राजभर  और स्वामीप्रसाद मौर्य के  बाद जयंत चौधरी ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया । रही - सही कसर पूरी कर दी राज्यसभा चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग ने। इस प्रकार ये स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस और सपा जैसी पाटियों के शीर्ष नेतृत्व का  निचले स्तर तक संवाद  टूट चुका है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक खबर आ गई कि असम में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ने भी पार्टी छोड़ दी। प. बंगाल से भी ऐसी ही जानकारी आई है। बेहतर है भाजपा को कोसने के बजाय कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियां अपने अंदरूनी हालात सुधारें। केवल आपस में गठबंधन कर लेने से उनका  बेड़ा पार नहीं होने वाला। भाजपा की रणनीति बेशक विपक्ष का मनोबल तोड़ने की है। इसके लिए वह कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहती परंतु जहां भाजपा कमजोर है वहां विपक्ष को भी सफलता मिली । कर्नाटक और तेलंगाना इसके उदाहरण हैं । ऐसे में विपक्षी दलों को चाहिए वे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें पार्टी में बने रहने प्रेरित करें । यदि वे इस काम में असफल रहते हैं तब फिर किसी और को दोष देना कहां तक उचित है ? 
क्रॉस वोटिंग : विपक्ष से अपना घर नहीं संभल रहा

गत दिवस उ.प्र, हिमाचल और कर्नाटक में राज्यसभा चुनाव के जो परिणाम आए उनमें सपा और कांग्रेस को  झटका लगा । उ.प्र में सपा के आधा दर्जन विधायकों ने भाजपा के आठवें प्रत्याशी को मत देकर अपने एक प्रत्याशी को हरवा दिया। इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस के 6 विधायकों द्वारा भाजपा प्रत्याशी को मत देने से अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। यदि  तीन निर्दलीय ही साथ देते तो कांग्रेस उम्मीदवार जीत जाता। लेकिन पार्टी का नेतृत्व सिर पर मंडराते खतरे को भांप नहीं सका । उ.प्र में भी सपा विधायकों द्वारा बगावत की आशंका  थी । वैसे बगावत कर्नाटक में भी हुई जहां भाजपा विधायक ने कांग्रेस प्रत्याशी को मत देकर सबको चौंका दिया। लेकिन उ.प्र में सपा और हिमाचल में कांग्रेस का प्रत्याशी चूंकि हार गया इसलिए भाजपा पर विधायकों को लालच और भय दिखाकर तोड़ने का आरोप लगाया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसमें सपा और कांग्रेस के नेतृत्व की विफलता देख रहे हैं जिसने सामने खड़े खतरे को नजरंदाज किया। उ.प्र में जया बच्चन को उम्मीदवार बनाए जाते ही सपा में बगावत के सुर उठने लगे थे जिन्हें अखिलेश यादव ने  अनसुना कर दिया । इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस को बगावत की आशंका थी इसीलिए सोनिया गांधी को राजस्थान से राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया  । कुछ मंत्री और विधायक खुलकर मुख्यमंत्री के विरुद्ध थे। राम मंदिर के शुभारंभ पर विक्रमादित्य सिंह नामक मंत्री  पार्टी लाइन से अलग हटकर अयोध्या भी गए। आज उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया । अनेक विधायक खुलकर मुख्यमंत्री बदलने पर अड़े हुए थे  जिसके बाद  मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू ने भी इस्तीफा दे दिया। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक शाम तक कांग्रेस नया नेता चुन सकती है। लेकिन बागी विधायक नहीं माने और  निर्दलीय भी छिटक गए तो सरकार की स्थिरता संदिग्ध रहेगी। उ.प्र में सपा चूंकि विपक्ष में है इसलिए उसे सरकार गिरने की चिंता तो है नहीं किंतु लोकसभा चुनाव के ठीक पहले पार्टी के विधायकों की बगावत अखिलेश के लिए चेतावनी है। निश्चित रूप से भाजपा की रणनीति विपक्षी दलों में सेंध लगाने की है । सत्ता में होने के कारण उसका प्रभाव और दबाव दोनों बढ़े हैं। लेकिन विपक्ष को अपनी कमजोरी भी देखनी होगी। हिमाचल में कांग्रेस की अंतर्कलह का लाभ ही भाजपा ने उठाया । उसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस के पास भारी बहुमत होने के बाद भी उसने एक भाजपा विधायक को तोड़ने में संकोच नहीं किया।  हिमाचल में मुख्यमंत्री द्वारा त्यागपत्र दिए जाने से स्पष्ट हो गया कि कल बगावत न हुई होती तब भी  उनके विरुद्ध  ज्वालामुखी फूटने के कगार पर था। स्मरणीय है श्री सुक्खू कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा की पसंद थे जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री स्व.वीरभद्र सिंह का परिवार पसंद नहीं करता । विक्रमादित्य उन्हीं के बेटे हैं और  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह उनकी माता जी । इस प्रकार श्री सिंघवी न हारते तब भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को हिलाने का प्रयास जारी रहता। दरअसल ये कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए चेतावनी है कि उसके द्वारा थोपे गए नेताओं को आंख मूंदकर स्वीकार कर लेने वाला दौर चला गया। वैसे भी पुरानी कहावत है कि जब केंद्रीय सत्ता कमजोर होती है तो सूबे सिर उठाने लगते हैं। गांधी परिवार राज्यों में अपनी मर्जी के नेताओं को लादने की जो गलती कर रहा है उसी के कारण अनेक राज्य उसके हाथ से खिसक गए। म.प्र में झटका खाने के बाद भी उसने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पनपे असंतोष का समय रहते इलाज नहीं किया जिसका नतीजा सामने है। सपा में भी अखिलेश खुद को सर्वेसर्वा मानकर नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ ही गठबंधन के साथियों से  दूरी बनाए रहते हैं। यही कारण है कि ओमप्रकाश राजभर  और स्वामीप्रसाद मौर्य के  बाद जयंत चौधरी ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया । रही - सही कसर पूरी कर दी राज्यसभा चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग ने। इस प्रकार ये स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस और सपा जैसी पाटियों के शीर्ष नेतृत्व का  निचले स्तर तक संवाद  टूट चुका है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक खबर आ गई कि असम में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ने भी पार्टी छोड़ दी। प. बंगाल से भी ऐसी ही जानकारी आई है। बेहतर है भाजपा को कोसने के बजाय कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियां अपने अंदरूनी हालात सुधारें। केवल आपस में गठबंधन कर लेने से उनका  बेड़ा पार नहीं होने वाला। भाजपा की रणनीति बेशक विपक्ष का मनोबल तोड़ने की है। इसके लिए वह कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहती परंतु जहां भाजपा कमजोर है वहां विपक्ष को भी सफलता मिली । कर्नाटक और तेलंगाना इसके उदाहरण हैं । ऐसे में विपक्षी दलों को चाहिए वे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें पार्टी में बने रहने प्रेरित करें । यदि वे इस काम में असफल रहते हैं तब फिर किसी और को दोष देना कहां तक उचित है ? 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 27 February 2024

वायनाड में सीपीआई प्रत्याशी के उतरने से विपक्षी एकता सवालों के घेरे में



राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय न्याय यात्रा अपने अंतिम चरण में आने जा रही है। इसका उद्देश्य लोकसभा चुनाव में उनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प साबित करने के अलावा इंडिया गठबंधन के घटक दलों को ये संदेश देना था कि कांग्रेस ही राष्ट्रीय पार्टी होने की वजह से भाजपा को टक्कर दे सकती है। हालांकि इस यात्रा के दौरान ही विपक्षी एकता को लगातार झटके लगते रहे। अनेक कांग्रेसी नेताओं के अलावा कुछ विपक्षी नेता इंडिया गठबंधन से निकलकर भाजपा के साथ चले गए। उ.प्र और दिल्ली में क्षेत्रीय दल द्वारा सीमित संख्या में सीटें दिए जाने से भी कांग्रेस का वजन घटा है। ममता बैनर्जी ने प.बंगाल और अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में अकेले लड़ने का ऐलान कर रखा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव तो न्याय यात्रा में शरीक ही तभी हुए जब कांग्रेस ने 17 सीटों पर लड़ने की शर्त स्वीकार कर ली। सही बात ये है कि नीतीश कुमार और जयंत चौधरी के अलग होने के बाद इंडिया गठबंधन की धमक कम हुई है। वह बिखराव की ओर बढ़ रहा है ये कहना जल्दबाजी होगी किंतु जैसे संकेत आ रहे हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि घटक दलों की प्रतिबद्धता घटती जा रही है। इसका ताजा प्रमाण केरल से मिला जहां की वायनाड सीट से राहुल गांधी लोकसभा के सदस्य हैं। 2019 में अमेठी में हार का खतरा देखते हुए उन्होंने अचानक केरल की इस सीट से भी लड़ने का निर्णय लिया जिसमें मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं की संख्या निर्णायक है। उनका वह दांव कारगर रहा और अमेठी में परास्त होने के बाद भी वायनाड के रास्ते वे लोकसभा में आ गए। उस चुनाव में उनके विरुद्ध सीपीआई प्रत्याशी था जो कि सत्तारूढ़ वाममोर्चे की घटक है। ये भी उल्लेखनीय है कि प.बंगाल में वाममोर्चे के साथ कांग्रेस का गठबंधन होने के बाद भी केरल में वे अलग - अलग लड़ते रहे। विधानसभा में भी कांग्रेस मुख्य विपक्ष की भूमिका में है। लेकिन इंडिया गठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद ये माना जा रहा था कि केरल में भी वामपंथी और कांग्रेस एकजुट होकर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे । लेकिन गत दिवस सीपीआई महासचिव डी. राजा ने अपनी पत्नी एनी राजा को वायनाड से चुनाव मैदान में राहुल के विरुद्ध उतारने की घोषणा करते हुए सबको चौंका दिया। यही नहीं उन्होंने तिरूवनंतपुरम सीट से कांग्रेस सांसद शशि थरूर के सामने भी सीपीआई उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया। वामपंथी पार्टियों में महासचिव ही सबसे प्रमुख पद होता है । वैसे भी श्री राजा वर्तमान में वामपंथियों के सबसे वरिष्ट नेता हैं। ऐसे में उनके द्वारा प्रत्याशियों की घोषणा को हवा - हवाई नहीं माना जा सकता। लेकिन श्री गांधी और श्री थरूर जैसे बड़े कांग्रेस नेताओं के विरुद्ध सीपीआई द्वारा अचानक प्रत्याशी उतार देने से इंडिया गठबंधन में दरार आने की आशंका तो बढ़ी ही है। पंजाब में भी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अलग - अलग लड़ने जा रही हैं। वहीं प.बंगाल में ममता बैनर्जी के रुख में नरमी नहीं आ रही। ये देखते हुए इस गठबंधन की एकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ये बात भी सामने आ रही है कि गठबंधन के सदस्यों के बीच संवादहीनता बढ़ती जा रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद दिसंबर में उसकी बैठक हुई थी जिसमें राज्यों के स्तर पर सीटों का बंटवारा करने की बात तय की गई थी। उसी आधार पर कुछ राज्यों में फार्मूला तय भी हुआ लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन यह एहसास करवाने में अब तक सफल नहीं हो सका कि भाजपा के विरुद्ध साझा प्रत्याशी खड़ा करने की नीति पर अमल होगा। यही कारण है कि वह अब तक खुद को विकल्प के तौर पर प्रचारित करने में नाकामयाब साबित हुआ है। कुछ राज्यों में दोस्ताना संघर्ष के बावजूद घटक दलों के प्रमुख नेताओं के विरुद्ध प्रत्याशी लड़ाने से राष्ट्रीय स्तर पर गलत संदेश जाएगा । सोनिया गांधी के चुनाव मैदान से हट जाने के बाद राहुल ही कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे हैं। पार्टी के अलावा लालू प्रसाद यादव जैसे नेता तो उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार भी करते हैं। ऐसे में यदि गठबंधन का कोई घटक उनके विरुद्ध प्रत्याशी खड़ा करता है तो इससे आम जनता में ये बात फैलेगी कि जिस नेता का उसके सहयोगी दल ही विरोध करते हों उसे प्रधानमंत्री के लिए उपयुक्त कैसे माना जाए ?उल्लेखनीय है उ.प्र की अमेठी और रायबरेली लोकसभा सीट से सपा और बसपा अपना उम्मीदवार नहीं उतारते थे । सीपीआई वायनाड में अपना प्रत्याशी लड़ाने के निर्णय पर अडिग रहेगी या मान - मनौव्वल के बाद हटा लेगी ये अभी कहना कठिन है क्योंकि उसके महासचिव श्री राजा हार्ड लाइनर किस्म के वामपंथी माने जाते हैं। और जब उन्होंने अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनाया तब जाहिर है चुनाव उनके लिए भी प्रतिष्ठा का विषय बनेगा। हालांकि वायनाड में सीपीआई प्रत्याशी को उतारे जाने के बावजूद श्री गांधी की जीत में कोई संशय भले न हो किंतु इंडिया गठबंधन की मजबूती और घटक दलों में आपसी विश्वास जरूर सवालों के घेरे में आ गया है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 February 2024

अपेक्षित समर्थन न मिलने से बिखर रहा किसान आंदोलन


इस बार के किसान आंदोलन में पिछली बार जैसा तीखापन नजर नहीं आ रहा। हरियाणा सरकार के कड़े रुख के कारण पंजाब से निकले जत्थे दिल्ली पहुंचने में सफल नहीं हो सके । रास्ते बंद किए जाने से आम जनता और वाहन चालकों को  भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है । सामान की आवाजाही रुकने से व्यापार को भी नुकसान हो रहा है। पंजाब के बाहर के किसान संगठन भी मैदान में उतरने से बच रहे हैं। विपक्षी नेता लोकसभा चुनाव में व्यस्त हैं। दरअसल जिस तरह से कांग्रेस की तत्कालीन अमरिंदर सरकार ने किसानों को दिल्ली जाकर धरना देने के लिए मदद दी थी ठीक वही  पंजाब की वर्तमान आम आदमी पार्टी सरकार ने किया। इसका कारण ये है कि इस पार्टी ने विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निश्चित करने का वायदा किया था।  जब उसे लगा कि ऐसा करना असंभव होगा तब सुनियोजित तरीके से किसान नेताओं को दिल्ली जाकर आंदोलन करने की समझाइश  दे दी । लेकिन हरियाणा सरकार की सख्ती के कारण किसानों की टोलियां आगे नहीं बढ़ पा रहीं। केंद्र सरकार से जारी बातचीत में एक भी बिंदु पर सहमति नहीं बन सकी। ये बात भी जमकर प्रचारित हो रही है कि यह संपन्न किसानों द्वारा प्रायोजित है। महंगे चौपहिया वाहनों की मौजूदगी से आंदोलन के जमीन से कटे होने की अवधारणा  फैल गई है। देश भर से किसान संगठनों द्वारा दिल्ली कूच जैसा फैसला नहीं किया जा रहा । उल्लेखनीय है पिछला आंदोलन भी पंजाब , उ.प्र और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव के पहले किया गया था जबकि यह लोकसभा चुनाव के ठीक पहले हो रहा है। आम आदमी पार्टी जरूर आंदोलन को पूरी मदद कर रही है किंतु कांग्रेस और अकाली दल  दूरी बनाए हुए हैं । चूंकि आंदोलनकारी दिल्ली से काफी दूर हैं इसलिए विपक्षी राजनेता भी फोटो सेशन हेतु नहीं आ पा रहे। पिछले आंदोलन में प्रचार का काम देख रहे योगेंद्र यादव भी कटे हुए हैं। राहुल गांधी किसानों के पक्ष में  कुछ न कुछ रोजाना बोलते हैं किंतु कांग्रेस पार्टी की तरफ से आंदोलन में सक्रिय भागीदारी नहीं दिखाई दे रही। वामपंथी संगठन  छद्म रूप से भले ही किसानों के बीच घुसे हों किंतु खुलकर  सामने आने से हिचक रहे हैं। कुल मिलाकर  कहा जा सकता है कि आंदोलन का समय चयन गलत हो गया क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल या उससे जुड़े किसान संगठन इस समय उलझने की मनःस्थिति में नहीं है।  सभी नेता जानते हैं कि किसान संगठनों की  सभी मांगों को मान लेना लगभग असंभव है। जिस स्वामीनाथन रिपोर्ट की चर्चा अक्सर होती है वह डा.मनमोहन सिंह की सरकार के समय ही आ चुकी थी । लेकिन आर्थिक मामलों के बड़े जानकार होने के बाद भी वे एम.एस.पी को कानूनी दर्जा देने से बचते रहे।  मोदी सरकार भी किसानों की आय को दोगुना करने का आश्वासन देती रही किंतु उसने भी एम.एस.पी को वैधानिक स्वरूप देने की मांग को स्वीकार नहीं किया। जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकार है वे भी ऐसा करने का साहस नहीं दिखा सकी। इससे ये साबित होता है कि किसानों की जो प्रमुख मांगें हैं उनके प्रति सैद्धांतिक समर्थन तो चौतरफा है किंतु जब उन पर अमल करने की बात उठती है खजाना दिखने लगता है। केंद्र सरकार ने भी यह आकलन कर लिया है कि फसल कटाई नजदीक आने के कारण  साधारण किसान अपना खेत छोड़कर आंदोलन में शामिल होने से रहा और  किराए की भीड़ जमा करना  लंबे समय तक संभव नहीं होगा। लोकसभा चुनाव की तिथियां मार्च के प्रथम सप्ताह में घोषित होने वाली हैं और सभी पार्टियां  व्यूह रचना तैयार करने में व्यस्त हैं। पश्चिमी उ.प्र के अलावा हरियाणा और राजस्थान के जाट समुदाय द्वारा पिछले किसान आंदोलन को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया गया था । और राकेश टिकैत बड़े किसान नेता के तौर पर उभरे भी किंतु उ.प्र में भाजपा की जीत ने  टिकैत परिवार का दबदबा खत्म कर दिया। हाल ही में जयंत चौधरी के विपक्षी गठबंधन से बाहर निकलने के बाद से जाट बहुल इलाकों में  राजनीतिक समीकरण काफी बदल गए हैं। अब तक जो देखने मिल रहा है उसके मुताबिक मौजूदा आंदोलन पंजाब तक सीमित रह गया है। कुछ लोगों द्वारा जिस प्रकार की देशविरोधी बयानबाजी की गई उसके कारण पंजाब  से ही आंदोलन पर उंगलियां उठने लगी हैं। बार - बार दिल्ली कूच की तारीख आगे बढ़ाए जाने से बड़ी संख्या में आंदोलनकारी अपने ठिकाने पर लौट गए। पूरे परिदृश्य पर नजर डालने से लगता है इस बार का आंदोलन पूरी तैयारी से शुरू नहीं किया गया। इसीलिए वह भटकाव और बिखराव का शिकार हो रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी