Tuesday, 2 April 2024

एक सुंदर सपना टूट गया : अब कहने को बचा ही क्या है

छ दशक पूर्व भारतीय फिल्मों में  एक ऐसे नायक का उदय हुआ जो व्यवस्था से विद्रोह करता हुआ धारा के विरुद्ध तैरने का दुस्साहस कर बैठता है। उसके क्रिया - कलापों में स्थापित मान्यताओं को तोड़ने की प्रवृत्ति होने के बावजूद दर्शक उसे भरपूर प्यार देते हैं और फिल्म समीक्षक उसे एंग्री यंग मैन नामक संबोधन देकर ये साबित करने का प्रयास करते हैं कि वह समाज के उस वर्ग की आवाज है जिसे उपेक्षित और शोषित समझा जाता था। वह एंग्री यंग मैन अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने के लिए कुछ भी कर गुजरने पर आमादा था। इसलिए समाज के एक बड़े वर्ग में उसकी स्वीकार्यता कायम हुई। जावेद - अख्तर की पटकथाओं से जन्मा वह नायक एक काल्पनिक वास्तविकता बन गया। दरअसल वह हिन्दी फिल्मों के उस भोले - भाले नायक का आधुनिक संस्करण था जो व्यवस्था की बुराइयों को देखता भी था और झेलता भी।  वह धक्का देने की बजाय धक्के खाकर समाज को झकझोरता था किंतु एंग्री यंग मैन पिटने की जगह पीटने वाला बन गया। उसके कंधे पर टंगे झोले को कोई छीनकर भागे तो वह उसके लिए कानून की शरण नहीं लेता बल्कि खुद का कानून लागू कर सुर्खियां बटोर लेता । भारतीय राजनीति में भी 13 साल पहले  आंदोलन की कोख से एक एंग्री यंग मैन का जन्म हुआ जो व्यवस्था बदलने की राह छोड़कर सत्ता के खेल का हिस्सा बन गया। उसके कंधो पर आदर्शों के झोले टंगे थे। वह धारा के विपरीत तैरने के जुनून से भरा हुआ था। कानून तोड़ने में उसे संकोच न था। वह जनता के लिए लड़ने के लिए विख्यात हो गया। जल्द ही उसका अंदाज लोगों के सिर पर चढ़कर बोलने लगा। उसे गरीबों के नये मसीहा के तौर पर पहिचान मिली और अपार जनसमर्थन भी। देश की राजधानी में भारी बहुमत के साथ उसकी सरकार बन गई।  लोगों को मुफ्त बिजली - पानी का उसका वायदा रास आ गया। सरकारी शालाओं के साथ मोहल्ला क्लीनिक जैसी सुविधा देकर वह जनता का लाड़ला बन बैठा। सफलता का कारनामा उसने दूसरी मर्तबा भी दोहराया किंतु इसके कारण उसके मन में पहले महत्वाकांक्षा और फिर अभिमान जागा। उसे लगने लगा वह सर्वशक्तिमान है । बस यहीं से उसके पैर फिसलन भरे रास्ते पर मुड़ गए और अंततः गत दिवस वह उसी तिहाड़ जेल में जा पहुंचा जहाँ देश के तमाम नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोप में वह भेजना चाहता था। जी हाँ, वह अरविंद केजरीवाल ही हैं। उनकी सरकार की शराब नीति में हुए कथित घोटाले में आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं के जेल में बन्द होने के बाद अंततः उन्हें भी वहीं जाना पड़ा। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिन लोगों को वह भ्रष्टाचार का सरगना बताते नहीं  थकता था , कुछ दिनों से उन्हीं से समर्थन मांग रहा है। आंदोलन से निकली नई राजनीति, ढर्रे का शिकार होकर रह गई।  तमाम बुराइयाँ जिनसे लड़ने वह मैदान में उतरा था आज उसके चारों तरफ मंडरा रही हैं। इस शख्ख का भविष्य तो अदालत ही तय करेगी किंतु जिन उम्मीदों के साथ अन्ना का यह शिष्य राजनीति में आया था वे सब निराशा के अंधे कुए  में खोकर रह गई हैं। सत्ता से दूर रहने की कसम खाने वाले इस भूतपूर्व एंग्री यंग मैन को सत्ता छोड़ने में डर लग रहा है। देश को साफ - सुथरी राजनीति का स्वाद चखाने वाले इस व्यक्ति ने अपने चाहने वालों के मुँह में कड़वाहट भर दी है। उसका जेल जाना किसी की जय - पराजय न होकर एक सुंदर सपने के टूटने जैसा है। वह खुद को निर्दोष मानते हुए दावा करता है कि विवाद का जड़ बनी शराब नीति सही और लाभदायक थी। लेकिन अपने हर फैसले पर डटे रहने वाले इस नेता के पास इस सवाल का कोई उत्तर नहीं कि यदि सब सही था तो वह नीति वापस क्यों ली गई ? सवाल ये भी है कि जिन नेताओं को वह भ्रष्टाचार की प्रतिमूर्ति बताते नहीं थकता था, आज उन्हीं से ईमानदारी का प्रमाण पत्र मांगने में उसे तनिक भी शर्म क्यों नहीं आ रही ? उसके जेल जाने से उसके समर्थक और अनुयायी तो दुखी हैं ही किंतु उनसे ज्यादा झटका उन लोगों को लगा जिन्हें केजरीवाल में एक मसीहा नजर आता था। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन से उत्पन्न पार्टी का सर्वोच्च नेता जब खुद ही कठघरे में खड़ा हो गया तो अब कहने को बचता ही क्या है? 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 April 2024

आक्रामक तेवर के बजाय लाचारी का प्रदर्शन विपक्ष के लिए नुकसानदेह होगा


गत दिवस दिल्ली  में इंडिया गठबंधन की जो रैली हुई उसका आयोजन आम आदमी पार्टी द्वारा अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी  के विरोध में किया गया था। चूंकि पार्टी अपने बल पर इतना बड़ा जमावड़ा नहीं कर सकती थी इसलिए    उसने इसे सर्वदलीय रूप दे दिया। संयोगवश कांग्रेस पर भी आयकर विभाग का शिकंजा कस गया। इसलिए उसने भी इसके प्रति रजामंदी दे दी। लेकिन दोनों मिलकर भी यदि रैली करते तो  उसका प्रभाव दिल्ली तक सीमित होकर रह जाता। इसलिए गठबंधन के सभी नेताओं को बुलाया गया। लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को होने वाला है। उस दृष्टि से यह रैली विपक्ष के लिए काफी उपयोगी हो सकती थी लेकिन वह श्री केजरीवाल और हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के अलावा कांग्रेस को आयकर विभाग द्वारा दिये वसूली नोटिस तक सिमटकर रह गई। यदि रैली में ऐसी कुछ घोषणाएं की जातीं  जिनसे आम जनता में उत्साह जाग्रत होता तब वह अपने उद्देश्य में सफल मानी जाती। कुल मिलाकर विभिन्न दलों के नेताओं ने वही सब बातें दोहराईं जो मुंबई रैली में सुनने मिलीं। दूसरी तरफ कल ही एनडीए ने भी मेरठ में रैली की जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष पर हमला किया। इस रैली में लोकदल सहित उप्र में भाजपा के सहयोगी दलों के नेता शामिल हुए। एनडीए में तो चूंकि श्री मोदी का नेतृत्व सर्वमान्य है प्रधानमंत्री को लेकर कोई अनिश्चितता नहीं है। एक जमाने में कांग्रेस भी इसी सुविधाजनक स्थिति में हुआ करती थी और तब उसके नेता विपक्ष को प्रधानमंत्री का चेहरा बताने की चुनौती देने से नहीं चूकते थे। लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। विपक्ष वैचारिक तौर पर एकजुट होने की बजाय केवल श्री मोदी को सत्ता से हटाये जाने के लिए एकजुट हुआ है। कल दिल्ली की रैली में आम आदमी पार्टी की ओर से श्री केजरीवाल की धर्मपत्नी सुनीता केजरीवाल ने मंच पर बैठ कर अपने पति का संदेश पढ़ा। अन्य जो नेता उपस्थित हुए वे सब परिवार द्वारा संचालित दल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। केवल सीपीएम के सीताराम येचुरी ही अपवाद कहे जाएंगे। लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब  नई राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ने श्री केजरीवाल की अनुपस्थिति में बजाय किसी और नेता के श्रीमती केजरीवाल को भेज दिया। हालांकि पति के गिरफ्तार होने के बाद से वे ही उनके संदेश प्रसारित करते हुए सार्वजनिक तौर पर सक्रिय हुईं जिससे ये अवधारणा मजबूत होने लगी कि यदि श्री केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा तब वे अपनी पत्नी को ही उत्तराधिकारी बनाएंगे। यद्यपि आम आदमी पार्टी की सरकार में गोपाल रॉय, सौरभ भरद्वाज और आतिशी जैसे मंत्री  हैं जिन्हें श्री केजरीवाल का विश्वासपात्र माना जाता है किंतु उनमें से किसी के भी नाम की चर्चा नहीं होने से इस संभावना को बल मिलने लगा कि श्रीमती केजरीवाल ही अगली मुख्यमंत्री बनेंगी। कल हुई सभा में उनके मंचासीन होने से राजनीतिक  विश्लेषक भी ये मानने लगे हैं कि आम आदमी पार्टी भी अब परिवारवाद के शिकंजे में फंसने लगी है। सही बात ये है इस पार्टी के जो आधारस्तंभ थे उनमें से ज्यादातर को श्री केजरीवाल ने  धकिया कर बाहर निकाल दिया। और उनके स्थान पर जी हुजूरी करने वाले जनाधारविहीन लोगों को भर लिया। मनीष सिसौदिया जरूर श्री केजरीवाल के बाद दूसरे स्थान पर थे किंतु उनके जेल जाने के उपरांत कोई ऐसा चेहरा नजर नहीं आ रहा जो उनकी अनुपस्थिति में पार्टी और सरकार की बागडोर संभाल सके। हालांकि इस स्थिति तक पार्टी को पहुंचाने के लिए श्री केजरीवाल ही जिम्मेदार कहे जाएंगे जिन्होंने दूसरी पंक्ति का नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया। चूंकि इंडिया समूह की लगभग सभी पार्टियां परिवारवाद की पोषक हैं लिहाजा किसी को भी मंच पर श्रीमती केजरीवाल की मौजूदगी असहज नहीं लगी। इंडिया की सबसे बड़ी कमजोरी यही परिवारवाद बनती जा रही है। वामपंथियों को छोड़ भी दें किंतु उसके पास भी ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर अपील हो। इस तरह के अनेक  बेमेल गठबंधन कांग्रेस के विरुद्ध अतीत में भी बने किंतु उनमें कुछ नेता ऐसे होते थे जिनकी राष्ट्रीय पहिचान हुआ करती थी। दुर्भाग्य से इंडिया समूह में  सोनिया गाँधी और राहुल को छोड़कर किसी की भी राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदगी नहीं है  । श्रीमती गाँधी की अस्वस्थता से उनकी सक्रियता घटती जा रही है। कल भी उनका भाषण नहीं हुआ। बचे राहुल तो चूंकि गठबंधन में ही उनके नेतृत्व को लेकर उत्साह नहीं है इसलिए वे जम नहीं पा रहे। यही वजह रही की कल की बहुप्रचारित रैली  आक्रामक तेवर दिखाने के बजाय अपनी लाचारी का  ढोल पीटती रही। यदि आने वाले कुछ दिनों में  यह गठबंधन धुंआधार तरीके से नहीं खेला तब बाजी उसके हाथ से खिसकती चली जायेगी। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार के आरोप में बंद नेताओं को अदालत से जमानत नहीं मिलने से वह सहानुभूति नहीं मिलेगी जिसकी वे उम्मीद लगाए हुए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 31 March 2024

आम आदमी पार्टी से हिसाब चुकता करने का अवसर गँवा दिया कांग्रेस ने




दिल्ली में आज लोकतंत्र बचाओ रैली हो रही है। राहुल गाँधी की न्याय यात्रा के समापन पर मुंबई में आयोजित रैली के बाद विपक्ष का यह दूसरा बड़ा शक्ति प्रदर्शन है।  इंडिया नामक गठजोड़ में शामिल नेता चुनाव के मौसम में इतनी जल्दी दोबारा एक मंच पर जमा होने राजी न हुए होते किंतु दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के गिरफ्तार होने और आयकर विभाग द्वारा कांग्रेस को 1800 करोड़ के कर और जुर्माने का भुगतान करने की कारवाई ने उन्हें इस हेतु मजबूर कर दिया।

सही बात ये है कि कानूनी प्रक्रिया को इकतरफा बताकर विपक्ष जनता के मन में ये बात बिठाने का प्रयास कर रहा है कि भाजपा सत्ता का दुरूपयोग करते हुए उसको चुनाव मैदान में निहत्था और साधनविहीन करने में जुटी है। श्री केजरीवाल  की गिरफ्तारी और कांग्रेस के बैंक खातों के संचालन पर लगी रोक पर जिस तरह से अमेरिका, जर्मनी और संरासंघ से प्रतिक्रियाएं आईं उनसे विपक्ष का हौसला मजबूत हुआ किंतु भारत सरकार द्वारा जिस  कड़ाई से उनका जवाब दिया गया उससे ये लगा कि भाजपा को उनसे कोई  तकलीफ नहीं है।

      उक्त दोनों मामले अदालत के समक्ष आ चुके थे ।  दिल्ली के मुख्यमंत्री को अचानक नहीं पकड़ा गया । ईडी लंबे समय से उनको समन भेज रही थी जिनकी उन्होंने कोई परवाह नहीं की। और तो और संभावित गिरफ्तारी से बचने उच्च न्यायालय जा पहुंचे। उनको उम्मीद थी कि ईडी द्वारा भेजे गए समन की वैधानिकता पर सवाल उठाकर वे उसके बुलावे से बचते रहेंगे किंतु उच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी पर रोक लगाने से मना करते हुए ईडी का हौसला बुलंद कर दिया। वरना एन चुनाव के समय वह उनको नहीं पकड़ती। इसी तरह काँग्रेस को ये मुगालता था कि आयकर विभाग की कारवाई को वह राजनीतिक प्रतिशोध का नाम देकर चुनाव तक बची रहेगी। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गाँधी ने पत्रकार वार्ता के जरिये ये रोना भी रोया कि  पार्टी के पास खर्च चलाने पैसे नहीं हैं। उसके बाद पार्टी उच्च न्यायालय भी गई किंतु वहाँ से भी राहत नहीं मिली।

     यदि मामला केवल श्री केजरीवाल की गिरफ्तारी तक सीमित रहता तब शायद कांग्रेस इस रैली हेतु राजी न  होती  किंतु आयकर विभाग द्वारा 1800 करोड़ की मांग भेजे जाने के बाद वह मजबूर नजर आई । हालांकि उच्चस्तरीय नेतृत्व भले ही आम आदमी पार्टी के संकट में साथ देने की सौजन्यता दिखा रहा हो किंतु निचले स्तर पर कांग्रेसी श्री केजरीवाल की गिरफ्तारी से मन ही मन प्रसन्न हैं। इसका कारण ये है कि दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस  की दुर्गति का कारण यही पार्टी है।

      इन दिनों श्री केजरीवाल के पुराने भाषण का एक  वीडियो जमकर प्रसारित हो रहा है जिसमें वे केंद्र सरकार को ललकारते हुए कहते रहे हैं कि दम है तो सोनिया गाँधी को गिरफ्तार कर पूछताछ करो और  वैसा न करने पर ईडी और सीबीआई को भंग करने का उलाहना भी  दे रहे हैं। कांग्रेस के प्रति आम आदमी पार्टी का रवैया  दरअसल शराब नीति घोटाले के उजागर होने के बाद उदार हुआ। इसका एक कारण ये भी है कि उक्त घोटाला कांग्रेस की शिकायत पर ही चर्चा में आया। जब मनीष सिसौदिया को ईडी ने गिरफ्तार किया तब कांग्रेस उसका स्वागत करने में आगे - आगे रही।

     ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए आम आदमी से हिसाब चुकता करने का ये सुनहरा अवसर था। पंजाब में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली और दिल्ली में मात्र तीन। यदि कांग्रेस अकड़ जाती तब दोनों राज्यों में आम आदमी पार्टी को भारी घाटा होना तय था। गाँधी परिवार और स्व. शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पर कब्जा जमाया था। आज भी उसने उन आरोपों को न तो वापस लिया और न ही खेद व्यक्त किया। उसका जो रवैया है उसे देखते हुए यह पार्टी आगे भी कांग्रेस को  बख्श देगी ये सोचना निरी मूर्खता है। कांग्रेस का आयकर का मसला पूरी तरह तकनीकी है जिसमें उसे कर और दंड राशि देनी ही होगी। ऐसे में विपक्ष की रैली से उसे राहत मिलने वाली नहीं है। लेकिन पूरे विपक्ष को साथ लाकर आम आदमी पार्टी अपने भ्रष्टाचार के प्रति सहानुभूति अर्जित करने का दांव खेल रही है।

कांग्रेस के रणनीतिकार श्री केजरीवाल के मकड़जाल में इतनी आसानी से फंस गए ये देखकर आश्चर्य होता है। ऐसा लगता है गाँधी परिवार सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं का आत्मविश्वास जवाब दे चुका है। इसीलिए आम आदमी पार्टी, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और लालू प्रसाद यादव आदि कांग्रेस पर हावी होने का साहस दिखा सके। ममता बैनर्जी ने तो उसे एक सीट तक नहीं दी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 March 2024

अर्थव्यवस्था को लेकर दो दिग्गजों के विरोधाभासी निष्कर्ष

भारत की आर्थिक प्रगति को लेकर दो भिन्न दृष्टिकोण सामने आए हैं। पहला रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का है जिसमें उन्होंने 2047 को लक्ष्य बनाकर  अर्थव्यवस्था के मजबूत होने के मोदी सरकार के दावों को अवास्तविक बताते हुए कहा कि 7 प्रतिशत की विकास दर और रोजगार सृजन दोनों के बारे में मौजूदा केंद्र सरकार की सोच सच्चाई  से दूर है। दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष  ( आई.एम.एफ) में भारत के कार्यकारी निदेशक कृष्णमूर्ति वेंकट सुब्रमण्यम का मानना है कि बीते 10 वर्षों में लागू आर्थिक नीतियों को दोगुना करते हुए आर्थिक  सुधारों में तेजी लाई जाए  तो हमारी अर्थव्यवस्था 2047 तक आठ प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। हालांकि उन्होंने  इसे बेहद महत्वाकांक्षी बताया किंतु श्री राजन की तरह असंभव बताने से भी बचे। जाहिर बात ये है कि श्री राजन घोषित तौर पर नरेंद्र मोदी के विरोधी हैं। ऐसे में उनका आलोचनात्मक होना लाजमी है। लेकिन उन्होंने कुछ बुनियादी मुद्दे उठाये हैं जिनसे भले ही असहमति हो किंतु उन पर विमर्श अवश्य होना चाहिए। मसलन आधी आबादी की आयु 30 वर्ष  से कम है किंतु इतनी बड़ी जनशक्ति को रोजगार नहीं मिल पाने के कारण मानव पूंजी नहीं बनाया जा सका। कोरोना काल के बाद विद्यार्थियों की शिक्षा बीच में छूट जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सुशिक्षित युवा पीढ़ी के बिना 2047 में विकसित भारत का सपना ख्याली पुलाव जैसा है। यद्यपि ये पहला अवसर नहीं है जब रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर द्वारा केंद्र सरकार की  आर्थिक नीतियों की खिल्ली उड़ाई गई हो। कांग्रेस से उनकी नजदीकी  किसी से छिपी नहीं है। राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा में शिरकत कर चुके श्री राजन उनको एक होशियार व्यक्ति बताकर उनकी प्रशंसा करने में भी आगे रहे। सितंबर 2013 से अगले तीन साल तक वे रिजर्व बैंक के गवर्नर थे। चूंकि उनका ज्यादातर कार्यकाल मोदी सरकार के साथ बीता इसलिए उस दौरान मिले अनुभवों  के आधार पर वे उसके प्रति दुराग्रहों से भर उठे। तत्कालीन वित्तमंत्री स्व.अरुण जेटली से जब भी  श्री राजन के साथ मतभेद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने हँसकर टाल दिया। लेकिन जब उन्हें बतौर गवर्नर दूसरा कार्यकाल नहीं मिला तो उसके बाद से वे इस सरकार की आर्थिक नीतियों के कटु आलोचक के रूप में सामने आ गए ।  और इसी वजह से विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस को  रास आने लगे। उन्होंने  खुद भी स्वीकार किया कि एक दशक से वे राहुल से जुड़े हुए हैं। हो सकता है मनमोहन सरकार के अंतिम वर्ष में उन्हें रिजर्व बैंक की गवर्नरी उसी वजह से मिली थी। बहरहाल जबसे वे उस पद से हटे तभी से मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां उनके निशाने पर रही हैं और वे सदैव उनको लेकर निराशाजनक निष्कर्ष ही निकालते रहे। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों एवं रेटिंग एजेंसियों द्वारा देश की विकास दर के बारे में जो उत्साहवर्धक आकलन किया जाता रहा वह भी श्री राजन के गले नहीं उतरा। लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने 2047 तक देश की आर्थिक उड़ान पर जिस तरह का नकारात्मक रवैया दिखाया वह विपक्ष को निश्चित ही रास आयेगा। यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में कार्यकारी निदेशक के तौर पर कार्यरत श्री सुब्रमण्यम ने  श्री राजन के सर्वथा विपरीत 2047 तक 8 प्रतिशत की वार्षिक  दर से विकास होने की बात कहकर उम्मीदों को जिंदा रखा है। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक द्वारा किये गए आकलन  ही विदेशी निवेशकों को आकर्षित करते हैं।  हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार हमारा शेयर बाजार अब विदेशी पूंजी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा। बीच में कई मर्तबा देखने में आया कि विदेशी निवेशकों ने जब भी बड़ी मात्रा में अपना निवेश निकाला तब घरेलू निवेशकों ने अर्थव्यवस्था में भरोसा जताते हुए शेयर बाजार को गिरने से बचाया।   इसके कारण  भारत के प्रति वैश्विक अवधारणा में जो सकारात्मक बदलाव आया वह श्री राजन के आकलन पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे श्री सुब्रमण्यम द्वारा जो बात कही गई वह इस लिहाज से काबिले गौर है कि केंद्र सरकार ने अपने दो कार्यकाल में जिन आर्थिक नीतियों को लागू किया उनको दोगुना किये जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री भी  तीसरी बार सत्ता में लौटने पर बड़े और कड़े निर्णय करने की बात कह चुके हैं। यदि लोकसभा चुनाव में उनको फिर जनादेश मिला तो उसमें राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के साथ आर्थिक नीतियों के सफल क्रियान्वयन का भी योगदान होगा। गरीब कल्याण योजनाएं इस बारे में उल्लेखनीय हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 March 2024

गलतियों पर गलतियाँ करते जा रहे केजरीवाल


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उच्च न्यायालय से भी राहत न मिलने के बाद वे लंबे समय तक रिहाई से वंचित रहेंगे। गत दिवस श्री केजरीवाल के वकील द्वारा प्रस्तुत याचिका पर जवाब देने के लिए ईडी को 3 अप्रैल तक का समय दिया गया है। आज  रिमांड यदि अदालत ने नहीं बढ़ाया तब उनको जेल जाना पड़ेगा। इस मामले  में अब तक  गिरफ्तार किये गए एक - दो को ही जमानत मिली, वह भी सरकारी गवाह बनने के बाद। मनीष सिसौदिया और संजय सिंह की जमानत अर्जियां लगातार जिस प्रकार से रद्द होती रहीं उसके आधार पर ये कयास लग रहे हैं कि श्री केजरीवाल को जमानत मिलना  आसान नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि दिल्ली की सरकार कैसे चलेगी? अब तक की परंपरानुसार सत्ता में बैठे नेता की गिरफ्तारी होने पर या तो वह स्वयं पद से इस्तीफा दे देता था या उसे बर्खास्त किया जाता रहा। गिरफ्तारी की संभावना होते ही पद त्यागने की परिपाटी का पालन करते हुए ही झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस्तीफा दे दिया था। हालांकि दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री श्री सिसौदिया और मंत्री सत्येंद्र जैन ने गिरफ्तार होने के बाद लंबे समय तक कुर्सी नहीं छोड़ी। लेकिन जब ये लगा कि अदालत उनको राहत नहीं दे रही तब इस्तीफा दिया ताकि दो नये मंत्री बनाये जा सकें और उनके विभागों का काम चल सके। उल्लेखनीय हैं श्री केजरीवाल ने अपने पास कोई विभाग नहीं रखा और श्री सिसौदिया के पास ज्यादातर बड़े महकमे थे। उक्त दोनों को जेल में रहते  हुए मंत्री के दायित्व निर्वहन की छूट  मुख्यमंत्री द्वारा क्यों नहीं दी गई, ये बड़ा सवाल है। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल भी इस सच्चाई से अवगत हैं कि जेल से सरकारी कामकाज संभव नहीं क्योंकि वहाँ कार्यालायीन व्यवस्था मुश्किल है। गिरफ्तारी के समय हो सकता है उनको उम्मीद रही होगी कि अगले दिन जमानत मिल जायेगी किंतु ऐसा नहीं हुआ। ऐसे में  जेल से सरकार चलाने की  ज़िद सिवाय हेकड़ी के और कुछ भी नहीं। सही बात ये है कि  आम आदमी पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जो सरकार चलाने में सक्षम हो। दूसरा मुख्यमंत्री इस बात के प्रति सशंकित हैं कि  उनके समानांतर कोई और नेता ताकतवर न बन जाए। उनके गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा भी चली किन्तु पार्टी के भीतर बगावत की आशंका को देखते हुए उन्होंने फिलहाल तो उस निर्णय को लंबित कर दिया किंतु जिस तरह से वे पत्नी के जरिये अपने संदेश प्रसारित करवा रहे हैं उनमें भविष्य के संकेत छिपे हुए हैं। उधर उपराज्यपाल ने जेल से सरकार चलाने के श्री केजरीवाल के फैसले की संवैधानिकता पर जो सवाल उठाए हैं उनसे लगता है कि दिल्ली राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रही है। मुख्यमंत्री भी इस बात को जानते हैं और इसीलिए वे इस्तीफा न देकर सहानुभूति बटोरना चाह रहे हैं ।  लेकिन इस पेचीदा स्थिति  के लिए श्री केजरीवाल ही उत्तरदायी हैं। ईडी के समन को वे जिस प्रकार ठुकराते रहे उससे उनकी गिरफ्तारी का रास्ता पुख्ता होता गया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ईडी द्वारा पेश किये गए प्रमाण देखने के बाद ही उनको गिरफ्तारी से राहत  न देने का निर्णय सुनाया था। ऐसे में आम आदमी पार्टी द्वारा ईडी और केंद्र सरकार के विरुद्ध किए जा रहे आंदोलन का कोई नैतिक आधार नहीं बचा। और जो कांग्रेस इस गिरफ्तारी को लेकर मुखर है वह भूल जाती है कि श्री केजरीवाल को इस हालत तक पहुंचाने में भाजपा के साथ वह भी जिम्मेदार है। जिस शराब नीति को लेकर ये मामला बना उसमें भ्रष्टाचार की शिकायत कांग्रेस ने भी करते हुए श्री केजरीवाल पर जोरदार हमले किये थे। बाद में इंडिया गठबन्धन में उनके शामिल होने के बाद उसने अपना मुँह बंद कर लिया। सही बात ये भी है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए राजी भी शराब घोटाले पर चुप रहने की शर्त पर हुई थी। उसके एवज में दिल्ली में तीन लोकसभा सीटें उसके लिए छोड़ दीं। कुल मिलाकर मामला ये है कि श्री केजरीवाल ज्यादा होशियारी के फेर में मूर्खता कर बैठे। ईडी के पहले बुलावे पर वे चले गए होते तो शराब घोटाले की जाँच  अंजाम तक पहुँच जाती ।  और हो सकता है जेल में बंद उनके नेता जमानत पर छूट जाते। गिरफ्तारी के बाद इस्तीफा न देकर वे और भी बड़ी गलती कर रहे हैं। यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया तब श्री केजरीवाल की  वजनदारी भी जाती रहेगी। जो काँग्रेस आज उनके गम में आँसू बहा रही है वह  पल्ला झाड़ने में देर नहीं करेगी क्योंकि मन ही मन वह भी आम आदमी पार्टी से खार खाए बैठी है। पंजाब के एक सांसद और विधायक के पार्टी छोड़ने से श्री केजरीवाल को सतर्क हो जाना चाहिए। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 March 2024

महाराष्ट्र में जंग शुरु होने के पहले ही बिखरने लगा विपक्षी खेमा



विपक्षी गठबंधन इंडिया जिन दो राज्यों में सबसे अधिक मजबूत माना जा रहा था वे तमिलनाडु और महाराष्ट्र हैं। तमिलनाडु में तो द्रमुक की सरकार और संगठन दोनों बेहद मजबूत हैं। इसीलिए सभी चुनाव पूर्ण सर्वेक्षण वहाँ इंडिया की जबर्दस्त जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। शुरुआत में लग रहा था कि महाराष्ट्र  भाजपा की राह में बड़ी बाधा बनेगा। कांग्रेस, एनसीपी और उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना  के अलावा प्रकाश आंबेडकर जैसे कद्दावर दलित नेता के भी गठबंधन के साथ आ जाने से उसकी ताकत बढ़ी हुई नजर आ रही थी। राहुल गाँधी की न्याय यात्रा का समापन मुंबई में जिस विशाल रैली में हुआ उससे पूरा विपक्ष उत्साहित था। गठबंधन के बड़े चेहरे भी इसी राज्य से हैं। शिवसेना और एनसीपी में हुई टूटन और कांग्रेस से अशोक चव्हाण और मिलिंद देवड़ा के निकलने के कारण राजनीतिक खींचातानी काफी बढ़ गई थी। ये बात भी तेजी से उठी कि एकनाथ शिंदे और अजीत पवार को सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी देने से भाजपा में अंदरूनी असंतोष है। अशोक चव्हाण को पार्टी में आते ही राज्यसभा सीट मिलने की भी चर्चा रही। विपक्षी गठबंधन भाजपा में आये नेताओं के भ्रष्टाचार में लिप्त होने का मुद्दा भी गरमा रहा था। इंडिया में शामिल पार्टियों में सीटों का बंटवारा भी सौजन्यता के साथ होने की बात प्रचारित की जाती रही। शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे बड़े नेताओं के रहते किसी भी मतभेद को सुलझाने की उम्मीद भी जताई जा रही थी। लेकिन न्याय यात्रा की समाप्ति के पहले तक इंडिया की जो एकजुटता सतह पर तैरती लग रही थी वह कुछ दिनों में ही बिखरती लगने लगी। जैसे ही चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम घोषित किया और सीटों के चयन का कार्य शुरू हुआ, मतभेद सामने आने लगे। उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने बिना कांग्रेस को विश्वास में लिए 17 प्रत्याशी घोषित कर दिये। मुंबई में संजय निरुपम जैसे नेता जिस सीट पर नजरें टिकाए थे वहाँ उद्धव द्वारा अपना उम्मीदवार उतारे जाने से कांग्रेस नाराज है। श्री आंबेडकर की  वंचित बहुजन अगाड़ी ने 8 प्रत्याशी घोषित कर गठबंधन को झटका दे दिया  वहीं स्वाभिमानी शेतकरी संगठन ने भी महा विकास अगाड़ी को ठेंगा दिखा दिया। पार्टी हाथ से चली जाने के बाद शरद पवार बूढ़े शेर की तरह लाचार नजर आने लगे हैं। बारामती में उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध अजीत पवार की पत्नी के कूद जाने से श्री पवार को अपनी विरासत के खत्म होने की चिंता सताने लगी है। इसी तरह उद्धव भी अपने परिवार के भविष्य को लेकर परेशान हैं। एकनाथ शिंदे उनके प्रभाव क्षेत्र में निरंतर सेंध लगाते जा रहे हैं। कांग्रेस भी श्री ठाकरे को ज्यादा ताकत देने में झिझक रही है। इस सबके विपरीत  एनडीए में सीटों का बंटवारा अपेक्षाकृत शांति से निपट गया। चूंकि भाजपा दबाव बनाने की स्थिति में है इसलिए उसके सहयोगी दल कड़ी सौदेबाजी से बचते दिखे। बीते दो - तीन दिनों के भीतर ही महाराष्ट्र में इंडिया के घटक दलों में जो खींचातानी देखने मिल रही है वह विपक्ष के लिए अच्छा संकेत नहीं है जहाँ उसके लिए अच्छी संभावनाएं बताई जा रही थीं। समस्या एनडीए में न हों ये कहना गलत होगा किंतु उसके सबसे बड़े दल भाजपा का प्रबंधन, आपसी संवाद और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता के कारण छोटी - बड़ी समस्याओं का हल समय रहते हो जाता है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने गठबंधन बनाने में इंडिया से पिछड़ने के बाद जिस तेजी से कदम बढ़ाये उसके कारण वह विभिन्न राज्यों में मजबूती के साथ खड़े होने की स्थिति में आ गई। बिहार के बाद महाराष्ट्र में एनडीए की शुरुआत धीमी रही किंतु अब वह आगे है। महाराष्ट्र में यदि इंडिया के सदस्यों में तालमेल बिगड़ा तो उसका प्रभाव अन्य राज्यों में भी दिखाई देगा। संजय निरुपम ने कांग्रेस नेतृत्व से मांग की है कि पार्टी बचाने वह उद्धव ठाकरे के साथ गठबंधन से बाहर आये। कुल मिलाकर विपक्षी गठबंधन के आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे। भाजपा ने महाराष्ट्र में जिस प्रकार से विपक्ष में सेंध लगाई उसके कारण इंडिया की एकता खतरे में पड़ रही है। शरद पवार और उद्धव ठाकरे भी अपनी वजनदारी खोते जा रहे हैं। आने वाले दिन महाराष्ट्र की राजनीति में उठापटक भरे होना तय है जिसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 24 March 2024

म.प्र में सूपड़ा साफ होने से बचाने में लगी कांग्रेस दिग्विजय को लड़वाकर कमलनाथ को दिया संदेश




    विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भाजपा पर ये तंज कसती थी कि उसके पास मजबूत प्रत्याशी नहीं होने से उसने 6 सांसदों को उम्मीदवार बनाया जिनमें 3 तो केंद्र सरकार में मंत्री थे। राष्ट्रीय महामंत्री रहे कैलाश विजयवर्गीय को इंदौर से उतारा गया। कांग्रेस के उस व्यंग्य में कुछ हद तक सच्चाई भी थी क्योंकि सारे विश्लेषण म.प्र में भाजपा और कांग्रेस के बीच करीबी संघर्ष बता रहे थे। लेकिन जब परिणाम आये तब भाजपा हाईकमान की रणनीति सटीक साबित हो गई। हालांकि केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते मंडला जिले की निवास और सांसद गणेश सिंह सतना सीट से हार गए किंतु नरेंद्र सिंह तोमर - दिमनी, प्रहलाद सिंह पटेल- नरसिंहपुर, कैलाश विजयवर्गीय - इंदौर, रीति पाठक - सिंगरौली और उदय प्रताप सिंह गाडरवारा से बड़े अंतर से जीते।
      भाजपा ने उक्त प्रयोग अन्य राज्यों में भी अपनाया और उसे अपेक्षित सफलता मिली।  ये बात सही है कि बड़े चेहरों को छोटे चुनाव में उतारने से एक तो पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा वहीं दूसरी तरफ विपक्षी उम्मीदवार और उसकी पार्टी मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गई। उस प्रयोग की सफलता ने कांग्रेस को भी उसका अनुसरण करने प्रेरित किया जिसका प्रमाण उसके द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को राजगढ़ और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को रतलाम से प्रत्याशी बनाए जाने से मिला।   विधानसभा चुनाव में मिली करारी पराजय के बाद  मनोबल पूरी तरह टूटने से  उसके पास प्रत्याशियों का टोटा हो चला था। बड़े नेता सुनिश्चित पराजय की वजह से  मुँह चुराते फिर रहे थे। मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में मात खाने के बाद कमलनाथ के जबलपुर से लड़ने की चर्चा चली तो उन्होंने छिंदवाड़ा से बाहर जाने की बात को नकार दिया। वैसे भी भाजपा में उनके और बेटे के आने की अटकलबाजियों ने उनकी साख पार्टी के भीतर काफी कम कर दी। यहाँ तक कि छिंदवाड़ा में उनके अति विश्वस्त दीपक सक्सेना तक ने उनका साथ छोड़ दिया। कांग्रेस से जिस बड़ी संख्या में नेताओं की भगदड़ मची हुई है उसने भी  हौसले ठंडे कर रखे हैं।

    सबसे बड़ी बात ये देखने मिल रही है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार को नियुक्त किये जाने के हायकमान के फैसले को भी कांग्रेसजन  पचा नहीं पा रहे। कमलनाथ भी उन्हें हटाये जाने के तरीके से अपमानित महसूस कर रहे हैं। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस में बड़ा शून्य पैदा हो गया था। इसीलिए दिग्विजय सिंह और कांतिलाल भूरिया को मैदान में उतारा गया है। दरअसल पार्टी ये संदेश देना चाहती है कि उसके पास अभी भी कुछ योद्धा शेष हैं। इसके अलावा  कमलनाथ को भी ये एहसास करवाया जा रहा है कि उनके छिंदवाड़ा में बैठ जाने के बावजूद कांग्रेस पूरे प्रदेश में लड़ने का माद्दा रखती है।

       राजगढ़ दिग्विजय सिंह की पुरानी सीट है। हालांकि उनकी जीत सुनिश्चित नहीं है क्योंकि ज्यादातर विधायक भाजपा के हैं। लेकिन उनके पास खोने को कुछ नहीं है। हारने पर  भी राज्यसभा सदस्य तो वे रहेंगे ही। इस दांव से वे फिर से कांग्रेस हायकमान के चहेते हो गए।सही बात तो ये है कि उनको अपने पुत्र जयवर्धन की फिक्र सता रही है। उसी वजह से उनका भाई लक्षमण सिंह नाराज हो उठे हैं।
      कांग्रेस द्वारा दो दिग्गजों को लोकसभा चुनाव लड़वाने का क्या लाभ होगा ये तो परिणाम के दिन ही पता चलेगा किंतु इस कदम के जरिये हायकमान ने दिग्विजय को विवादास्पद बयान देने से भी रोक दिया है जिनकी वजह  से उसको जबर्दस्त नुकसान उठाना पड़ता है। चूंकि वे खुद उम्मीदवार बन गए इसलिए जुबान पर नियंत्रण रखेंगे।

     हालांकि दो वरिष्टों को लड़वाने के बाद भी कांग्रेस चुनौती देती नहीं दिख रही। उसके कुछ प्रत्याशी दबाववश तो कुछ प्रचारित होने के लिए लड़ रहे हैं। सही बात तो ये है कि कांग्रेस का लक्ष्य भाजपा को सभी 29 सीटें जीतने से रोकना मात्र रह गया है। छिंदवाड़ा में नकुलनाथ बुरी तरह घिर चुके हैं जिस वजह से उनके पिताश्री वहीं फंसे हैं। खुद कांग्रेसी कह रहे हैं कि यदि पांच सीटें भी मिल गईं तो वह बड़ी उपलब्धि होगी। 


रवीन्द्र वाजपेयी