Tuesday, 30 September 2025

कांग्रेस की फजीहत कर दी चिदंबरम के खुलासे ने



ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार ये आरोप लगाते रहे  हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में आकर उन्होंने लड़ाई रोकी। असल में  खुद होकर ट्रम्प ने ही ये शिगूफा छेड़ा  और बीसियों बार वे इसे दोहरा भी चुके हैं। हाल ही में संरासंघ की महासभा को संबोधित करते हुए भी उन्होंने वही डींग हाँकी । हालांकि भारत सरकार अधिकृत तौर पर  कह चुकी है कि उनका दावा असत्य है और युद्धविराम पाकिस्तान के अनुरोध  के बाद स्वीकार किया गया। संसद में भी विदेश मंत्री जयशंकर  ने इसी आशय का बयान दिया। प्रधानमंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया कि आवश्यकता पड़ने पर ऑपरेशन सिंदूर जारी रहेगा। श्री गाँधी के अलावा अन्य विपक्षी नेता भी श्री मोदी को युद्धविराम के मुद्दे पर घेरते रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा कहती आई  है कि मोदी  सरकार ने तो पहलगाम हमले के जवाब में पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा। लेकिन 2008 में 26 नवम्बर को मुंबई के होटल ताजमहल पर हुए आतँकवादी हमले के बाद उस समय की मनमोहन सरकार ने वैसा साहस नहीं दिखाया।  कांग्रेस आज तक इस बारे में कोई समुचित स्पष्टीकरण नहीं दे सकी। लेकिन उसके लिए मुसीबत खड़ी कर दी उसके  दिग्गज नेता और पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम के खुलासे ने, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि मुंबई आतंकी हमले के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार ने भारी अंतर्राष्ट्रीय दबाव  के कारण पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई नहीं की । श्री चिदंबरम के मुताबिक वे  बदला लेना चाहते थे लेकिन सरकार राजी नहीं हुई। एक चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं गृहमंत्री उस दिन बना जब आतंकवादियों को मार दिया गया । वह रविवार का दिन था, जब मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाकर कहा  कि आपको वित्त से गृह गृह मंत्री बनाया जा रहा है। उस वक्त मेरे मन में आया कि बदला लेना चाहिए। मैंने प्रधानमंत्री और बाकी  लोगों से इस मामले पर चर्चा की थी, लेकिन निष्कर्ष यह निकला  था कि हमें  सीधे प्रतिक्रिया की जगह कूटनीतिक तरीका अपनाना चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय  अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस, मेरे पद संभालने के दो-तीन दिन बाद मुझसे और प्रधानमंत्री से मिलने आई थीं  और उन्होंने कहा था कि प्रतिक्रिया नहीं दें। इस खुलासे ने भाजपा को कांग्रेस और राहुल  पर आक्रामक होने का अवसर दे दिया। श्री चिदंबरम कांग्रेस में प्रथम पंक्ति के नेता हैं। महत्वपूर्ण मंत्रालय उन्होंने संभाले हैं। उनके द्वारा उस आतँकवादी घटना के बाद मनमोहन सरकार द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध सख्त कारवाई नहीं करने के पीछे अमेरिका की विदेश मंत्री का  दबाव बताये जाने से कांग्रेस के सामने शर्म से नजरें झुकाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। अपने ही वरिष्ट नेता द्वारा मनमोहन सरकार की पोल खोलना जिसमें वे खुद ही गृह मंत्री रहे, निश्चित रूप से बड़ी बात है। प्रधानमंत्री पर ट्रम्प के दबाव में युद्धविराम करने का आरोप राहुल अब किस मुँह से लगाएंगे ये बड़ा सवाल है। श्री चिदंबरम के खुलासे ने भाजपा को ऐसा हथियार दे दिया  जिसका  सामना  करने में कांग्रेस को पसीने आ जाएंगे। उसकी अपनी  सरकार में  गृह मंत्री  रहे व्यक्ति के सार्वजनिक बयान को  गलत बताना उसके लिए असंभव होगा। राजनीति से इतर  देखें तो मनमोहन सरकार का अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान पर सैन्य कारवाई नहीं करना देश के साथ धोख़ा ही कहा जाएगा। कूटनीतिक विकल्प अपनाए जाने की जो सलाह अमेरिकी विदेश मंत्री ने डॉ. मनमोहन सिंह को दी वैसी ही माउंटबेटन ने 1948 में नेहरू जी को कश्मीर के मामले में दी  थी जिसे मानकर वे कबायली हमले का जवाब देकर पूरे  कश्मीर पर कब्जा करने के बजाय राष्ट्र संघ चले गए जिससे  मसला आज तक उलझा हुआ है। मनमोहन सिंह का  अर्थशास्त्रीय ज्ञान निश्चित तौर पर प्रशंसनीय था किंतु  उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी। उसका कारण गाँधी परिवार का दबाव ही माना जाता है। वे तो इस दुनिया में नहीं रहे किंतु उनके गृह मंत्री द्वारा जो बातें मुंबई में हुए आतँकवादी हमले के सम्बन्ध में उजागर की गईं उनके बाद कांग्रेस ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाने लायक नहीं बची। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 29 September 2025

इस जीत ने ऑपरेशन सिंदूर जारी रहने का एहसास करवा दिया


क्रिकेट का एशिया कप शुरू होने पर भारत और पाकिस्तान के लीग मैच के पहले बड़ी संख्या में लोगों ने गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा कि इससे पहलगाम में शहीद हुए लोगों के परिजनों को दुख होगा। पानी और खून एक साथ नहीं बहने की बात भी याद दिलाई गई। क्रिकेट नियंत्रण मंडल में गृह मंत्री अमित शाह के बेटे की मौजूदगी का हवाला देते हुए कटाक्ष किये गए कि पैसे की लालच में भारतीय टीम को पाकिस्तान से खेलने की शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। लेकिन इन सभी प्रतिक्रियाओं के कारण जब दोनों के बीच पहला मैच खेला गया तब दुबई के स्टेडियम में भारतीय दर्शक भी नाममात्र के थे। देश में भी टीवी पर लोगों ने मैच देखने से परहेज किया । और तो और भारतीय टीम के जीतने के बाद सड़कों पर उतरकर जश्न मनाने वाले मंजर भी नहीं दिखे। लेकिन ये खबर आने पर क्रिकेट प्रेमियों को संतोष हुआ कि भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव ने पाकिस्तानी कप्तान से हाथ नहीं मिलाया। दूसरी खबर जिसने इस प्रतियोगिता के प्रति रुचि बढ़ाई वह थी उस मैच के दौरान एक पाकिस्तानी खिलाड़ी द्वारा विमान गिरने का इशारा कर भारतीयों को चिढ़ाने का काम किया। उसका आशय ऑपरेशन सिंदूर में भारत के लड़ाकू विमान गिराए जाने से था। उस दृश्य को देखने के बाद भारत में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के विरुद्ध परंपरागत प्रतिद्वंदिता की भावना जागृत हो गई। कुछ लोगों ने ये भी कहा कि यदि मैच नहीं खेलते तो ये न देखना पड़ता। लेकिन बात यहीं नहीं रुकी और आखिर में प्रतियोगिता के फ़ायनल में भी दोनों टीमें पहुँच गईं। ऐसे में ये तंज भी सुनाई देने लगे कि यदि हमारी टीम एशिया कप जीत भी गई तब उसे पाकिस्तान क्रिकेट नियंत्रण मंडल के अध्यक्ष  मोहसिन नकवी से ट्राफी लेना पड़ेगी जो वहाँ के गृह मंत्री भी हैं और एशिया क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष भी। लेकिन भारतीय टीम  ने इस बारे में पहले ही कह दिया था कि वह नकवी से विजेता ट्राफी नहीं लेगी। इसीलिए कल हुए फायनल मुकाबले को लेकर भारत में पहले जैसा रोमांच लौटने लगा। इसमें दो राय नहीं कि मुकाबला काफी कड़ा और नजदीकी था। पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अच्छी शुरुआत की लेकिन एक बार जो विकेट गिरना शुरु हुआ तो भारतीय गेंदबाज हावी होते चले गए और 146 रनों पर पारी समेट दी। जवाब में भारत की शुरुआत बेहद खराब थी। प्रतियोगिता के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बने अभिषेक शर्मा के साथ ही शुभमन गिल और कप्तान सूर्यकुमार सस्ते में चलते बने किंतु उसके बाद तिलक वर्मा , संजू सैमसन और  शिवम दुबे की साझेदारियों ने भारत को जीत के करीब पहुंचा दिया । जिसे तिलक की नाबाद पारी ने संभव बना दिया। इसके बाद भारतीय टीम ने नकवी से ट्राफी लेने से इंकार कर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उपजी राष्ट्रीय भावना को उभार दिया। उधर नकवी भी अड़ गए कि विजेता टीम को वही एशिया कप सौंपेंगे। घंटे भर गतिरोध रहने के बाद भी जब भारतीय टीम नहीं मानी तब खिसियाए नकवी ट्राफी के अलावा भारतीय  खिलाड़ियों को दिये जाने वाले मेडल लेकर चलते बने। उधर सूर्यकुमार ने टीम के साथ मैदान में आकर जीत का उत्सव मनाते हुए भारतीय दर्शकों को हर्षित किया जो इस मैच को देखने बड़ी संख्या में पहुंचे थे। इधर देश में भी मैच को लेकर उत्सुकता बढ़ चली थी और जब आधी रात के समय रिंकू सिंह ने विजयी चौका लगाया तो वाकई ऑपरेशन सिंदूर वाला जोश छा गया। मैच के बाद सूर्यकुमार ने सधे शब्दों में पत्रकारों से बात की और प्रतियोगिता में मिली अपनी पूरी राशि भारतीय सेना को देने की घोषणा की जिसे सुनकर लोग भावुक हो उठे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी बधाई में ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र कर पाकिस्तान के जले पर नमक छिड़क दिया। हालांकि पुरस्कार समारोह का बहिष्कार करने पर पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड भारतीय टीम के विरुद्ध अनुशासन तोड़ने की शिकायत आईसीसी में कर सकता है किंतु उसके अध्यक्ष भी भारत के जय शाह ही हैं। और फिर भारत के बिना आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की कल्पना उसी तरह नहीं की जा सकती जैसे कभी वेस्ट इंडीज के साथ था। खेल में हार जीत  चला करती है किंतु पाकिस्तान टीम चूंकि सदैव विद्वेष का भाव रखती है लिहाजा उसके साथ ऐसा व्यवहार ही उचित है। नकवी से ट्राफी नहीं लेकर सूर्यकुमार ने जो साहस दिखाया उससे पूरे देश में खुशी है। इस जीत ने ऑपरेशन सिंदूर के जारी रहने का एहसास करवा दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 27 September 2025

वांगचुक की गिरफ्तारी पूरी तरह सही कदम



लद्दाख की राजधानी लेह में हुई हिंसा के बाद पूर्ण राज्य सहित अन्य मांगों के लिए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सोनम वांगचुक को गत दिवस राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया। वे कल दोपहर 2.30 बजे एक पत्रकार वार्ता करने वाले थे किंतु उसके पूर्व ही उनकी गिरफ्तारी हो गई। लद्दाख़ में बीते तीन दिन से कर्फ्यू लगा हुआ है साथ ही इंटरनेट सेवाएं भी बंद है। स्मरणीय है आंदोलन के हिंसक होने के बाद बजाय हिंसा करने वालों को रोकने के वांगचुक लेह छोड़कर अपने गाँव जाकर बैठ गए। हालांकि उन्होंने हिंसा की निंदा करते हुए ये सफाई भी दी कि जिन लोगों ने लेह में उपद्रव मचाया वे उनके लिए अनजान थे। ऐसा कहने के पीछे उनका उद्देश्य अपने आप को दूध का धुला साबित करना था किंतु लगे हाथ वे ये धमकी देने से बाज नहीं आये कि उनकी गिरफ्तारी हुई तो  हालात और बिगड़ेंगे। इस समूचे घटनाक्रम  का कारण  केन्द्र सरकार द्वारा आंदोलनकारियों से बातचीत हेतु 6 अक्टूबर की तारीख तय करना बताया जा रहा है किंतु इस तथ्य पर पर्दा डाल दिया गया कि सरकार  26 सितंबर को ही बातचीत करने तैयार हो गई थी। इसके बाद भी अचानक हिंसा और आगजनी से साफ हो गया कि कुछ लोग नहीं चाहते थे कि शांतिपूर्ण समाधान निकले। सबसे बड़ी बात ये है कि इस विवाद में वे ताकतें बिना देर किये कूद पड़ीं जिन्हें आंदोलनजीवी कहा जाता है। जेएनयू, अलीगढ़  , जादवपुर और उस्मानिया विवि, किसान आंदोलन, शाहीन बाग जैसे आंदोलनों का समर्थन करने वाला तबका जिस तत्परता से वांगचुक के पक्ष में मुखर हुआ वह देखकर कहा जा सकता है कि लेह में जो कुछ भी हुआ उसकी पटकथा पहले से तैयार थी। नेपाल में युवाओं द्वारा हिंसा के जोर पर किये सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में तमाम विपक्षी नेताओं सहित आंदोलनजीवियों के समूहों द्वारा भारत में भी वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी। वांगचुक ने भी नेपाल के जेन जी आंदोलन का जिक्र करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को चुनौती देने का दुस्साहस किया किंतु जब  हिंसा की आग में उनके ही हाथ जलने लगे तब  मुकर गए। बाद में  एक पत्रकार ने जब उक्त बयान के सबूत दिखाये तो उनकी बोलती बंद हो गई।  एक  बात  साफ तौर पर नजर आ रही है कि जो लोग जम्मू - कश्मीर में अलगाववादी ताकतों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए अफज़ल गुरु की फांसी  पर छाती पीटते रहे वही चेहरे आज वांगचुक को महात्मा गाँधी का अवतार साबित करने में जुटे हुए हैं। उनके एनजीओ को मिली विदेशी आर्थिक सहायता की जाँच पर भी उंगलियाँ उठाई जा रही हैं। वांगचुक ने भी उनको गिरफ्तार किये जाने के विरुद्ध केंद्र सरकार को उसी तरह धमकाने का प्रयास किया जैसा धारा 370 हटाये जाने के पहले फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती करते थे। ऐसे में  केन्द्र सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करने का जो कदम उठाया वह पूरी तरह सही और जरूरी था। लद्दाख कोई साधारण इलाका नहीं है। चीन और पाकिस्तान दोनों की सीमाएं इसके करीब होने से सुरक्षा संबंधी चिंता सदैव बनी रहती है।  विचारणीय बात ये भी है कि बीते कुछ सालों में लद्दाख़ में बौद्ध बाहुल्य पहले जैसा नहीं रहा और कश्मीरी मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी। ऐसे में वांगचुक के आंदोलन में  मुस्लिम घुसपैठ से भी इंकार नहीं किया जा सकता। यदि वे पाक - साफ होते तो गाँधी जी की तरह अनशन तोड़ने के बाद हिंसा ग्रस्त इलाकों में शांति मार्च निकालते और उपद्रवियों की पहचान कर उन्हें पुलिस के हवाले करवाते परंतु वे केन्द्र सरकार को ही कटघरे में खड़ा करने की जुर्रत कर बैठे। जाहिर है ऐसे व्यक्ति को खुला छोड़ना घातक होता। उनको मिलने वाले विदेशी धन की जाँच के साथ  साथ ही विदेश यात्राओं के दौरान वे किन - किन भारत विरोधी लोगों से मिले इसका ब्यौरा भी सार्वजनिक हो जिससे पता चले कि पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा क्षेत्र में किये जा रहे उनके कार्यों के पीछे का सच क्या है? उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में काफी कुछ प्रचारित हो रहा है किंतु एक सम्वेदनशील सीमावर्ती राज्य  में उपद्रव मचाकर देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने की कोशिश करने वाले के हौसले पस्त करना जरूरी है। भारत में बांग्ला देश और नेपाल जैसे सत्ता परिवर्तन  का मंसूबा पालन वालों को किसी भी प्रकार की रियायत देना बुद्धिमत्ता  नहीं होगी। वांगचुक ने लद्दाख़ में  पर्यावरण और शिक्षा के लिए जो किया वह अपनी जगह है । यदि उनकी महत्वाकांक्षा राजनीति में आने की है तो उन्हें खुलकर उसमें हाथ आजमाना चाहिये किंतु इसके लिए वे एक शांत सीमावर्ती इलाके में हिंसा की आग भड़काकर अपना दबदबा साबित करना चाहें तो फिर उनके साथ जो हुआ वही देशहित में है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 September 2025

मुआवजे से मौत का मातम कम नहीं किया जा सकता


नवरात्रि का पर्व भारत में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा - आराधना से समूचा वातावरण धर्ममय हो जाता है। जिस तरह महाराष्ट्र से शुरू होकर सार्वजनिक गणेशोत्सव देश भर में फैल गया उसी तरह बंगाल की तरह ही दुर्गा पूजा भी भव्य रूप में देश के बड़े हिस्से में आयोजित होती है। देवी प्रतिमाओं के पंडाल जन आकर्षण का केन्द्र बनते हैं। उनकी साज - सज्जा पर काफी खर्च होता है। झांकियां लगाई जाती हैं। देवी जागरण जैसे आयोजन भी होने लगे हैं। बीते कुछ दशकों से दुर्गा पूजा के साथ ही नवरात्रि पर गरबा के आयोजनों की धूम रहती है। आम जनता सपरिवार दुर्गा प्रतिमाओं के दर्शन हेतु निकलती है जिससे यह पर्व विराट रूप ले लेता है। लेकिन इस दौरान कुछ हादसे ऐसे हो जाते हैं जो हर्षोल्लास के वातावरण को शोक में बदल देते हैं। म.प्र के जबलपुर नगर में भी बीते  दिनों दुर्गा पंडालों में बिजली के करेंट से तीन लोग जान से हाथ धो बैठे जिनमें दो मासूम बच्चे भी थे।  कटे और खुले हुए  तारों के कारण पंडाल में लगे लोहे के खम्बे में करेंट प्रवाहित हो गया जिसे छूने वाले दो बच्चे और एक अन्य व्यक्ति मौत का शिकार हो गया। जाँच में बिजली विभाग ने पंडाल लगाने वाले पर अवैध कनेक्शन लेकर बिजली चोरी का आरोप लगा दिया।  हालांकि आयोजकों  द्वारा  अस्थायी कनेक्शन लेने का दावा भी किया जा रहा है किंतु वह केवल रस्म अदायगी थी और चोरी की बिजली से पंडाल रोशन था। जिस बिजली ठेकेदार अथवा डेकोरेटर ने उक्त पंडालों में विद्युत साज - सज्जा की उसकी  लापरवाही  तीन मानवीय ज़िंदगी निगल गई। उसके बाद बिजली महकमा जागा। दो दर्जन जाँच दल गठित कर दिये गए जो शहर भर के दुर्गा पंडालों में जाकर देखेंगे कि जो बिजली फ़िटिंग हुई वह नियमानुसार और सुरक्षा मानकों के अनुरूप है अथवा नहीं? दोषपूर्ण होने पर सम्बंधित ठेकेदार को उसे दुरुस्त करने कहा जायेगा अन्यथा बिजली काट दी जाएगी। सवाल ये उठता है कि ये कवायद पंडाल बनते ही क्यों नहीं की गई ?  सार्वजनिक आयोजनों में चोरी की बिजली का इस्तेमाल हमारे देश में आम बात है। पुलिस - प्रशासन, बिजली विभाग सहित क्षेत्रीय नेताओं को भी इसकी जानकारी होती है। लेकिन उससे बड़ा अपराध है घटिया  बिजली फ़िटिंग । जिस ठेकेदार अथवा डेकोरेटर के जिम्मे वह काम होता है वह तारों की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखता। उनके जोड़ खुले रहते हैं। पहले पंडालों में बाँस और बल्लियों का उपयोग होने से करेंट फैलने की संभावना कम होती थी किंतु आजकल लोहे के ढांचे खड़े होने से उसका खतरा बढ़ गया  है।  साथ ही प्लास्टिक  और थर्मोकोल भी काफी उपयोग होने लगा है जो बेहद ज्वलनशील होते हैं। समय - समय पर ऐसे आयोजनों में घटिया बिजली फ़िटिंग के कारण अग्निकांड के समाचार आते हैं जिनमें धनहानि के साथ ही जनहानि भी होती है। दुर्भाग्य से जिन  विभागों पर ऐसी अनियमितताओं को रोकने की जिम्मेदारी है वे दुर्घटना होने के बाद ही मुस्तैदी दिखाते हैं। जबलपुर की उक्त घटनाओं, को ही लें तो बिजली विभाग के लोगों ने जिन पंडालों को अस्थायी कनेक्शन दिये उनमें हुई बिजली फिटिंग की जांच क्यों नहीं की, इसका उत्तर मिलना चाहिए। जिला प्रशासन का भी दायित्व है कि जिन दुर्गा समितियों को पंडाल लगाने हेतु अनुमति दी गई उनके द्वारा अस्थायी कनेक्शन संबंधी जानकारी लेता जिससे चोरी की बिजली जलाने वाले पकड़े जाते। कुल मिलाकर इन छोटी सी कही जाने वाली घटनाओं का कारण महज लापरवाही ही है जिसमें आयोजक, ठेकेदार, बिजली विभाग और प्रशासन सभी की भूमिका है। साधारण दुर्घटना होती तब वह छोटी सी खबर मानकर भुला दी जाती। लेकिन तीन इंसानों की जान लेने वाली इस लापरवाही को कागजी जांच में उलझाकर उपेक्षित कर देना गंभीर अपराध है जिसके  सभी जिम्मेदारों को दंडित किया जाना चाहिए। साथ ही ऐसे हादसे आगे न हों इसके बारे में पूरी सतर्कता का पुख्ता इंतजाम जरूरी है क्योंकि दो - चार लाख रु. के  मुआवजे से मौत का मातम कम नहीं किया जा सकता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 25 September 2025

लद्दाख़ में हुई हिंसा बड़ी चिंता का विषय


बौद्ध  बाहुल्य  शांतिप्रिय लद्दाख़ की राजधानी लेह में गत दिवस हुई हिंसा और आगजनी की घटनाओं के बाद भले ही पूर्ण राज्य के लिए आंदोलन कर रहे  सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक  अनशन समाप्त कर अपने गाँव चले गए किंतु जाते - जाते उनका  ये कहना रहस्य खड़े कर गया कि कि कुछ अज्ञात युवाओं ने वह सब किया । पूर्ण राज्य के दर्जे के अलावा अन्य मांगों को लेकर केंद्र ने  चर्चा के लिए शीर्ष निकाय, लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के साथ 6 अक्टूबर को उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक पहले ही निर्धारित कर दी थी। वार्ता को स्थगित करने का अनुरोध मिलने पर, 25-26 सितंबर को अनौपचारिक चर्चाओं का एक दौर निर्धारित किया गया था। एबीएल के सह अध्यक्ष चेरिंग दोरजय लकरूक का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह सोनम वांगचुक के अनशन स्थल पर घोषणा कर रहे हैं कि एक प्रतिनिधिमंडल 26 सितंबर को बातचीत के लिए दिल्ली जा रहा है।ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सरकार के साथ बातचीत तय थी, तो फिर  हिंसा क्यों भड़की जिसमें 4 लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हैं।भाजपा दफ्तर के साथ ही अनेक सरकारी प्रतिष्ठान फूंक दिये गए।इस बारे में केंद्र सरकार के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि  सोनम वांगचुक, जो लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा देने जैसी मांगों को लेकर आमरण अनशन कर रहे थे, लंबे समय से लद्दाख में अरब स्प्रिंग-शैली के विरोध प्रदर्शन की इच्छा जता रहे थे और उन्होंने नेपाल में जेन जी के विरोध प्रदर्शनों का भी ज़िक्र किया था। ये देखते हुए शक की सुई उन्हीं पर आकर ठहर रही है। गत वर्ष भी वांगचुक पद यात्रा करते हुए दिल्ली गए थे जहाँ प्रधानमंत्री ने उनकी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया था। इस दौरान लद्दाख़ और कारगिल के उक्त संगठनों के साथ केंद्र ने बातचीत का समय तय किया। लगता है लद्दाख़ के कुछ राजनीतिक दलों सहित वांगचुक चाहते थे कि वार्ता में उन्हें भी शामिल किया जाए। कल जो घटना हुई उसके पीछे इसीलिए किसी षडयंत्र का संदेह मजबूत हो रहा है। सबसे अधिक चिंता का विषय ये है कि लद्दाख़ और कारगिल की भौगोलिक स्थिति बेहद सम्वेदनशील है। चीन और पाकिस्तान दोनों इस क्षेत्र पर निगाहें गड़ाए हुए हैं। कारगिल तो मुस्लिम बहुल इलाका है लेकिन जम्मू - कश्मीर का हिस्सा होने के बाद भी लद्दाख़ बौद्ध बहुल है। वहाँ के मूल निवासी शांतिप्रिय है। इसके पहले लद्दाख़ में पहले कभी इस प्रकार की स्थितियाँ नहीं देखने मिली। वांगचुक की छवि हालांकि एक पर्यावरण प्रेमी के रूप में रही किंतु  लद्दाख़ और कारगिल को जम्मू - कश्मीर से अलग कर वहाँ के लिए प्रशासनिक काउंसिल बना दी गई। धारा 370 हटने के बाद इस क्षेत्र को जब अलग हैसियत मिली तब यहाँ बुनियादी सुविधाओं का जबरदस्त विकास हुआ। जिसकी वजह से कभी मुख्यधारा से कटा यह इलाका आज देशी - विदेशी पर्यटकों से भरा पड़ा रहता है। यहाँ के जनजातीय समाज को देखते हुए आरक्षण भी 80 फीसदी करने के अलावा महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दे दिया गया। इसके बाद भी जब केंद्र से आज ही वार्ता होने का निर्णय हो गया तब अचानक तनाव उत्पन्न कर लेह को आग के हवाले करना निश्चित तौर पर इस सीमावर्ती इलाके की सुरक्षा को खतरे में डालने का प्रयास ही था। वांगचुक का एक चित्र भी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे बांग्लादेश की सरकार के सलाहकार मो. युनुस के साथ गलबहियाँ करते नजर आ रहे हैं। उन्हें मिलने वाली विदेशी सहायता पर भी अंगुलिया उठ रही हैं। गत दिवस जो कुछ भी हुआ उसके पीछे किसी साजिश से इंकार नहीं किया जा सकता। नेपाल में जेन जी के विरोध प्रदर्शन का जिक्र वांगचुक द्वारा किये जाने से भी उन पर संदेह बढ़ रहा है। जम्मू - कश्मीर के साथ रहते लद्दाख़ पिछड़ेपन का शिकार रहा।  बीते कुछ सालों में वहाँ विकास की रोशनी पहुँचने लगी है। लेकिन वांगचुक ने वहाँ अलगाववाद के बीज बोना शुरू कर दिया। वे किसी राजनीतिक दल के मोहरे हैं या कोई विदेशी शक्ति उनको आगे रखकर देश की सुरक्षा को खतरे में डालना चाह रही है ये जाँच का विषय है। केंद्र सरकार को चाहिये वह गत दिवस हुई हिंसा को गंभीरता से ले और दोषी तत्वों के विरुद्ध कड़े कदम उठाये। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 24 September 2025

12 लाख तक आयकर छूट और जीएसटी में कमी का असर दिखने लगा


जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। 22 सितंबर को जैसे ही जीएसटी की नई दरें लागू हुईं बाजार में जमकर खरीददारी हुई। चार पहिया वाहनों की बिक्री ने पिछले सभी  कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस भारतीय अर्थव्यवस्था का मृत बताकर  मजाक उड़ाया था उसने न सिर्फ अपने जीवित रहने अपितु शक्तिशाली होने का भी प्रमाण ऊँची आवाज में दे दिया। बाजार से जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार उपभोक्ताओं ने जीएसटी की दरों में किये गए बदलावों का खुलकर स्वागत करते हुए खरीददारी के रूप में अपना उत्साह प्रदर्शित किया। यह  उन आलोचकों को करारा जवाब है जिन्होंने  प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से किये गए वायदे के पूरा होने में संदेह व्यक्त किया था। इस साल के केंद्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख कर दी गई थी । लिहाजा मध्यमवर्ग के पास बचत के लिए अतिरिक्त पैसा आया। उस पर जीएसटी की दरों में किये गए सुधारों ने सोने पे सुहागा वाली कहावत चरितार्थ कर दी। यही वजह है कि ट्रम्प द्वारा छोड़े  गए टैरिफ रूपी तीरों के बाद भी अर्थव्यवस्था के पाँव मजबूती से टिके हुए हैं। विदेशी निवेशकों ने जब शेयर बाजार से अपना धन वापस निकाला तब घरेलू  निवेशकों ने अपनी पूंजी से उस झटके को बेअसर कर दिया। ट्रम्प की हरकतें  लगातार जारी हैं। और वे रोजाना कुछ न कुछ ऐसा कर जाते हैं जिससे भारत हताश  होकर घुटना टेक हो जाए। लेकिन सरकार ने साफ कर दिया कि भारत  टैरिफ के दबाव से बचने के लिए अपनी जनता के हितों को नजरंदाज नहीं करेगा। ट्रम्प अमेरिका के कृषि और दुग्ध उत्पादों के लिए भारत के बाजार खोलने के लिए टैरिफ को हथियार बना रहे थे जिसे सरकार ने कोई महत्व नहीं दिया । हालांकि  50 फीसदी टैरिफ लगने से  भारत के निर्यात पर असर हुआ है  जिससे उद्योग - व्यापार जगत के माथे पर पसीने की बूंदें झलकने लगी थीं किंतु जीएसटी में हुए  बदलाव से व्यापार जगत की चिंताएं काफी हद तक दूर हो गईं। पहले दिन ही जिस तरह की खरीददारी हुई उसने टैरिफ के दबाव को काफी हद तक घटा दिया। वह भी तब जब महीने के अंतिम सप्ताह में नौकरपेशा मध्यम वर्ग का हाथ तंग रहता है। 22 सितंबर को बाजार में जो रौनक नजर आई उसके बाद आर्थिक विशेषज्ञ भी ये मान रहे हैं कि अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में जब वेतन हाथ आएगा तब दीपावली सीजन की खरीदी और भी उत्साह से होगी। आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार को विफल बताने वाले आलोचक ये जानकर हैरान होंगे  कि ट्रम्प के ही देश की अनेक प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियों ने मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत की विकास दर के 7 फीसदी रहने की ताजा भविष्यवाणी कर दी है। इसके जो कारण बताये गए  उनमें पहली तिमाही के उत्साहवर्धक नतीजों के अलावा, आयकर छूट की सीमा में बड़ी वृद्धि और उसके बाद जीएसटी की दरों में किया गया बदलाव हैं। इन सबका समन्वित परिणाम ही बाजार में आ रही उछाल के रूप में  नजर आया। अच्छा मानसून भी अर्थव्यवस्था में मज़बूती के संकेत दे रहा है। यदि बाजार में मांग बढ़ेगी तो निश्चित तौर पर उत्पादन इकाइयों को  भी काम मिलेगा जिसका परिणाम रोजगार के अवसर बढ़ने के रूप में सामने आयेगा। कुल मिलाकर बीते छह माह में हुए दो आर्थिक सुधारों ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में गतिशीलता बने रहने की सम्भावनाएँ बढ़ा दी हैं। 12 लाख तक की आय  कर मुक्त किये जाने के बाद जीएसटी की दरों में हुए बदलाव का असर पूरी तरह आने में कुछ समय तो लगेगा । देखने वाली बात ये भी है कि दरें कम होने का प्रभाव जीएसटी की मासिक वसूली पर कितना होगा। हालांकि वित्तीय विशेषज्ञ मानकर चल रहे हैं कि बिक्री बढ़ने से जल्द ही, पुराना आंकड़ा लौट आयेगा जो बुनियादी ढांचे सहित अन्य विकास कार्यों और जन कल्याण की योजनाओं के निर्बाध संचालन के लिए अत्यावश्यक है। फिलहाल तो चारों तरफ से सकारात्मक संकेत ही मिल रहे हैं जिनसे लगता है देश का मनोबल काफी ऊंचा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 September 2025

प्रतिभा पलायन रोकने ठोस योजना जरूरी


अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वीजा नियमों में बदलाव से भारत की आई.टी कंपनियों के साथ ही उच्च शिक्षित युवाओं में चिंता व्याप्त है। कर्ज लेकर अमेरिका पढ़ने गए उन विद्यार्थियों के सामने भी संकट आ गया जिन्होंने वहीं काम करने या बसने का सपना देखा था। हालांकि जो भारतीय पहले से H-1B वीजा धारक हैं उनके लिए नियम पूर्ववत रहेंगे किंतु 21 सितंबर के बाद से जो नये आवेदन आयेंगे उन्हें 1 लाख डॉलर ( भारतीय 88 लाख रु.) का भुगतान करना होगा। अभी यह वीजा तीन साल के लिए मिलता है जिसे छह वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। लेकिन नये आवेदनों के लिए उक्त वीजा नवीनीकरण के समय दोबारा भुगतान नहीं करना होगा।  इस फैसले से भारत ही नहीं अमेरिका में भी हड़कंप है क्योंकि उसकी आई. टी कंपनियों में भारतीय पेशेवरों की भरमार है। सिलिकान वैली नामक आई. टी के गढ़ में तो लघु भारत प्रतीत होता है। यही वजह है कि ट्रम्प को 24 घंटों में ही यह स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि पुराने H-1B वीजा धारकों को नये शुल्क से मुक्त रखा जाएगा और वे पहले की तरह अमेरिका से बाहर जाकर बेरोकटोक वापस लौट सकते हैं। इस नये नियम के लागू होने से अमेरिका की आई. टी कंपनियां ही नहीं बल्कि नासा जैसा अंतरिक्ष संस्थान भी परेशानी महसूस करने लगा जिसमें भारतीय इंजीनियर और वैज्ञानिक महत्वपूर्ण पदों पर हैं। अमेरिका के वित्तीय संस्थानों में भी भारतीय विशेषज्ञ सेवाएं दे रहे हैं। नये वीजा नियमों का परिणाम ये होगा कि अमेरिका में कुशल और मेधावी युवाओं का प्रवेश तेजी से घटेगा जिसका  खामियाजा  एक - दो वर्षों बाद नजर आने लगेगा। हालांकि ट्रम्प के इस  कदम का उद्देश्य अमेरिकी युवाओं की बेरोजगारी दूर करने के अलावा भारतीय कंपनियों द्वारा भेजे गए इंजीनियरों एवं अन्य कर्मियों को अमेरिकी मानकों से कम वेतन देने से पैदा विसंगति दूर करना भी है। आज खबर आ रही है कि ट्रम्प बाहर से आने वाले नये डॉक्टरों के लिए वीजा शुल्क में कमी करते हुए उसे आधा करने जा रहे हैं क्योंकि 88 लाख रु. का भारी - भरकम शुल्क देकर अमेरिका में नौकरी करने की हिम्मत कम ही दिखा सकेंगे। सही बात ये है कि अमेरिका की स्वास्थ्य सेवाओं में भारतीय चिकित्सकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यदि उनमें से आधे वहाँ से लौट आएं तो स्थिति पूरी तरह बिगड़ जाएगी।  वैसे ट्रम्प के हालिया सभी निर्णयों के पीछे अमेरिका के नागरिकों के हितों का संरक्षण करना है। लेकिन ऐसा करते हुए वे उन जमीनी सच्चाइयों को नजरंदाज करते जा रहे हैं जो अमेरिका के साथ अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। उनके सनकीपन की प्रतिक्रिया स्वरूप चीन सहित अनेक देशों ने अपने वीजा नियमों में ढील देते हुए भारत के प्रतिभाशाली युवाओं के लिए अपने द्वार खोलने के संकेत दे दिये हैं। लेकिन ट्रम्प के फैसलों के परिप्रेक्ष्य  में  भारत से प्रतिभा पलायन को लेकर होने वाला विमर्श एक बार फिर प्रासंगिक हो चला है। सरकार और समाज दोनों को इस बारे में खुलकर सोचना चाहिए कि वे कौन से कारण हैं जिनके कारण भारत के मेधावी युवा अमेरिका या अन्य किसी विकसित देश में जाकर काम करने और फिर वहीं बस जाने के लिए लालायित रहते हैं। हालांकि बीते कुछ समय से इस प्रवृत्ति में कतिपय बदलाव देखने मिले हैं। हजारों युवा पेशेवरों ने  विदेशों से नौकरी छोड़कर भारत में काम जमाया और सफलता पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। इस सोच का विकास जरूरी है जिसमें सरकार और समाज को एक साथ प्रयास करने होंगे।  अभिभावकों को भी अपने बच्चों को इस बात के लिए प्रेरित करना चाहिए कि वे अपनी प्रतिभा का उपयोग अपने देश के लिए करें। इस बारे में तरह - तरह की शिकायतें सुनने मिल जाएंगी लेकिन प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना भी तो हमारा ही दायित्व है।  यदि मदारियों और सपेरों का देश होने के कलंक को धोकर भारत  विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बन सकता है तब अपने मेधावी युवाओं के कौशल और प्रतिभा का समुचित उपयोग करने का रास्ता भी तैयार करना समय की मांग है। भारतीय आज वैश्विक समुदाय बन चुके हैं ।  दुनिया के हर कोने में उनकी  उपस्थिति दिखाई देती है। लेकिन  हमारी प्रतिभाएं अन्य देशों के विकास में योगदान दें क्योंकि उन्हें स्वदेश में काम करने लायक परिस्थितियाँ और अवसर नहीं मिलते तो ये गंभीर चिंता का विषय है। केन्द्र सरकार को चाहिए वह प्रतिभा पलायन रोकने के लिए  ठोस और दूरगामी प्रभाव वाली योजना शुरू करे जिसमें विदेश से लौटकर आने वालों को प्रोत्साहित किया जावे। ट्रम्प के वीजा संबंधी फैसले को भी आपदा में अवसर मानकर देश में ही वैसा माहौल और कार्य संस्कृति विकसित करनी होगी जिसके आकर्षण में हमारी प्रतिभाएं विदेश चली जाती हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 22 September 2025

आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए स्वदेशी की भावना जरूरी


शारदेय नवरात्रि के शुभारंभ पर जीएसटी की नई दरें लागू होने का सुखद संयोग भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। दैनिक उपयोग की वस्तुओं के अलावा खाने - पीने की चीजें तो सस्ती हो ही रही हैं , साथ ही इलेक्ट्रानिक उपकरण तथा दोपहिया और चार पहिया वाहन के दाम भी घट गए हैं। आयकर छूट की सीमा 12 लाख होने के कारण मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं  की क्रय शक्ति में पहले से ही वृद्धि हो चुकी थी। जीएसटी दरों में कमी से अब  घरेलू खर्च में भी काफी कमी आयेगी। वैश्विक अर्थव्यवस्था में चल रही उथल-  पुथल के बीच भारत में आम जनता को महंगाई से राहत दिलवाने का जो जोखिम मोदी सरकार ने उठाया उसने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती से पूरी दुनिया को तो अवगत कराया ही , अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा बनाये जा रहे दबाव के सामने डटे रहने का हौसला भी प्रदर्शित किया। प्रधानमंत्री लगातार स्वदेशी सामान खरीदने का जो आह्वान कर रहे हैं वह केवल भावनात्मक नारा नहीं अपितु दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। भारत का विशाल बाजार पूरी दुनिया को आकर्षित कर रहा है। ट्रम्प की नाराजगी का बड़ा कारण भारत द्वारा अमेरिका के कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए भारतीय बाजार उपलब्ध करवाने से इंकार करना है। इसके अलावा सैन्य सामग्री की खरीदी अमेरिका की बजाय रूस और फ्रांस से किये जाने से भी ट्रम्प खुन्नस खाये हुए हैं। इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया कि चिप से लेकर शिप तक भारत में बनाये जाने की जरूरत है। आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वदेशी की भावना को अपना स्वभाव बनाना होगा। इस बारे में जापान का उदाहरण सामने है जहाँ की जनता महंगी होने के बावजूद भी अपने देश में बनी चीजें खरीदने को प्राथमिकता देती है ताकि जापान के उद्योग और श्रमिक को लाभ मिले। स्वाधीनता संग्राम के दौरान महात्मा गाँधी ने जब स्वदेशी का आंदोलन शुरू किया तब उसका उद्देश्य सीधे - सीधे भारतीय उद्योगों और कारीगरों को ब्रिटिश उद्योगों के मुकाबले मजबूती से खड़ा करना था। राजनीतिक टीका - टिप्पणियों से अलग हटकर देखें तो ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि आजादी के बाद के कई दशकों तक आत्मनिर्भरता की बात तो खूब हुई किंतु उस पर अपेक्षित जोर नहीं दिया गया। नतीजा ये हुआ कि आम भारतीय के मन में विदेशी सामानों का आकर्षण बढ़ता गया। खिलौने से लेकर हवाई जहाज तक के लिए हम विदेशों के मोहताज होकर रह गए। वहीं  लाइसेंस राज ने कुछ उद्योगपतियों का एकाधिकार कायम कर दिया। छोटी - छोटी वस्तुओं का आयात होने से घरेलू उद्योग पनप ही नहीं सके। लेकिन अब परिदृश्य बदला है। स्टार्ट अप के तौर पर नये उद्यमों की बाढ़ आ गई है। सरकार से मिली छूट एवं अन्य प्रोत्साहनों के कारण युवा उद्यमी आगे आ  रहे हैं। कोविड काल में देश ने अपने पैरों पर खड़े होने का जो सबक सीखा उसका सुफल सामने आ रहा है। हालांकि इस सबका पूरा लाभ मिलने में कई बरस लग जाएंगे लेकिन ये कहना गलत न होगा कि देश आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार और उद्योगों की भूमिका इस मामले में निश्चित ही निर्णायक है किंतु उपभोक्ता का समर्थन नहीं मिला तो पूरी कवायद बेअसर साबित होगी। इसीलिए श्री मोदी लगातार  स्वदेशी अपनाने पर जोर दे रहे हैं। विदेशी दबाव का सामना करने के लिए भारतीय उद्योगों की क्षमता बढ़ना जरूरी है किंतु उसके लिए उपभोक्ताओं का सहयोग भी जरूरी है। स्वदेशी की भावना को जमीनी स्तर पर  ले जाये बिना आत्मनिर्भर भारत बनाना संभव नहीं होगा। इस बारे में इलेक्ट्रिक कारों को ही लें तो विदेशी टेस्ला की बजाय भारत में बन रहे इलेक्ट्रिक वाहन खरीदकर स्वदेशी उद्योगों को सहारा दिया जा सकता है। नवरात्रि से भारत में उपभोक्ता बाजारों में खरीदी बढ़कर  दीपावली तक  उच्चतम स्तर पर पहुँच जाती है। ऐसे में इस वर्ष भारत पर जिस प्रकार का दबाव अमेरिका ने बना रखा है उसका माकूल जवाब हम दीपावली पर्व पर  केवल स्वदेश में निर्मित वस्तुओं को खरीदकर दे सकते हैं। आत्मनिर्भर भारत के निर्माण लिए भी यह जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 20 September 2025

चंदे के धंधे ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की भीड़

सभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और चुनाव आयोग के बीच चल रही रस्साकशी के बीच खबर आई कि आयोग ने बीते 2 महीनों में 800 से अधिक  गैर मान्यता प्राप्त  राजनीतिक दलों को सूची से बाहर कर दिया। इस कार्रवाई का कारण इन दलों द्वारा 2019 के बाद से 6 वर्षों तक कोई चुनाव नहीं लड़ना है जो पंजीकृत होने की एक शर्त है। इसी के साथ आयोग लगभग 350 ऐसे दलों को नोटिस देने जा रहा है जिन्होंने उक्त अवधि में चुनाव तो लड़े किंतु 2021 - 22 से 2023 - 24 तक चुनाव खर्च का विवरण जमा नहीं करवाया। स्मरणीय है कुछ दिन पूर्व इस खबर ने सनसनी मचा दी थी कि गुजरात में 10 राजनीतिक दलों को पाँच  सालों में 4300 करोड़ का चंदा प्राप्त हुआ। चौंकाने वाली बात ये रही कि आयोग को उनकी ओर से दिये गये हिसाब में चुनाव खर्च 39 लाख दिखाया गया जबकि उनकी अपनी ऑडिट रिपोर्ट में कई गुना चुनाव खर्च दर्शाया गया ।  इन दलों को जिनकी कोई पहचान नहीं थी, लगभग दो दर्जन राज्यों से चंदा मिला। सच तो ये है कि कागजों पर सक्रिय ये दल काले धन को सफेद करने के कारोबार में लिप्त हैं। हमारे देश में सभी राजनीतिक दलों का संचालन चंदे की राशि से होता है। पहले उन पर अपनी आय - व्यय का ब्यौरा चुनाव आयोग को देने का नियम नहीं था। लेकिन अब उनको मिले चंदे और चुनावी व्यय का लेखा - जोखा निर्धारित अवधि में आयोग को देना अनिवार्य है। अन्यथा  मान्यता समाप्त हो सकती है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल की मान्यता वाली  पार्टियों के बारे में तो काफी कुछ सामने आ भी जाता है। लेकिन जिन पार्टियों को पाँच वर्षों के दौरान 4300 करोड़ की राशि चंदे के तौर पर मिली उनके बारे में गुजरात  तो क्या दो - चार जिलों के लोग भी नहीं जानते होंगे। ऐसे दलों को 20 से अधिक राज्यों से आर्थिक सहयोग मिलना रहस्यमय है। चुनाव आयोग ने जिन निष्क्रिय दलों को सूची से बाहर किया उनके हिसाब - किताब की जाँच भी हो जाए तो  चौंकाने वाली बातें सामने आये बिना नहीं रहेंगी। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में काले धन की मात्रा का खुलासा भले न हो किंतु वह  बहुत ज्यादा होती है ये साधारण व्यक्ति भी बता देगा। इसीलिये कुकुरमुत्तों के रूप में हजारों पार्टियां पंजीकृत हो गईं। चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने के बजाय कागजों पर जीवित रहने वाले सैकड़ों दलों का पंजीकरण समाप्त कर सराहनीय कार्य किया है । जिन दलों ने बीते कई वर्षों  से अपना हिसाब - किताब जमा नहीं किया उन्हें सूची से बाहर किया जाना न्यायोचित होने के साथ ही  राजनीतिक दलों की भीड़ कम करने में सहायक होगा। बिहार में इन दिनों  चुनावी रणनीतिकार रहे  प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी काफी चर्चाओं में है। श्री किशोर का कहना है कि उनकी पार्टी को मिलने वाला चंदा चैक से लिया जाता है। लेकिन  उन्हें कुछ ऐसी  कंपनियों से चंदा मिलना बताया जा रहा है  जो घाटे में चल रही हैं। सौ फीसदी पारदर्शिता का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ने भी शुरुआत में काफी साफ - सुथरी राजनीति का उदाहरण पेश किया किंतु ज्योंही  राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए पाँव फैलाये उसका दामन भी दागदार होने लगा। दरअसल चंदे का धंधा और राजनीति का साथ चोली - दामन जैसा बन गया है। इससे प्रेरित होकर ही कुछ लोगों ने राजनीतिक पार्टी बनाने का व्यवसाय शुरू कर दिया जिससे वे अपने काले धन को सफेद में बदल सकें। इसके अलावा जिन लोगों से चंदा लेना दर्शाया जाता  है उन्हें कुछ राशि काटकर वापस कर दी जाती है। इस तरह चंदा लेने वाले का काला धन सफेद हो जाता है और देने वाला उस राशि को खर्च दिखाकर आयकर चोरी कर लेता है। कुल मिलाकर कहानी यही है कि राजनीतिक दलों की जो भीड़  है उसके पीछे कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर चंदे का धंधा ही है। जिन दलों ने पाँच वर्षों में चुनाव नहीं लड़ा वे सही मायनों में  काले को सफेद करने का माध्यम हैं। उनको सूची से निकाल बाहर करने का कदम पूरी तरह स्वागतयोग्य है। लेकिन उन चंदा देने वालों से भी पूछताछ की जानी चाहिए जिन्होंने उनकी तिजोरी भरी। देश में अनेक क्षेत्रीय दलों के बारे में ये सुनाई देता है कि वे उम्मीदवार बनाने के लिए मोटी रकम वसूलते हैं। राज्यसभा की टिकिट की नीलामी भी चर्चाओं में रही है। अनिल अंबानी और विजय माल्या का उच्च सदन में पहुंचना खरीद - फरोख्त का ही परिणाम था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 19 September 2025

हाइड्रोजन बम तो बच्चों के फटाखों से भी हल्का निकला


राहुल गाँधी महज कांग्रेस के नेता नहीं अपितु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं ।अनेक महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उनकी भूमिका रहती है। सरकार की खामियों के अलावा जनहित के मुद्दों पर मुखर होने की अपेक्षा उनसे की जाती है। संसद और उसके बाहर अपने आचरण से नेता प्रतिपक्ष जनमानस में अपनी छवि भावी प्रधानमंत्री के रूप में निर्मित करता है। इस बारे में सबसे आदर्श व्यक्ति के तौर पर स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लिया जाता है जिनमें देश की जनता को भविष्य का प्रधानमंत्री नजर आने लगा था। उल्लेखनीय तो ये है कि 1957 में जब वे पहली बार लोकसभा सदस्य बने तब उनके संसदीय व्यवहार से प्रभावित पं. जवाहरलाल नेहरू ने ये भविष्यवाणी कर दी कि ये नौजवान एक दिन प्रधानमंत्री बनेगा। बतौर नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी और स्व.सुषमा स्वराज ने भी अपने लिए लोगों के दिल में जगह बनाई। लेकिन अपने दो दशक के संसदीय जीवन के बावजूद राहुल यदि अपनी नेतृत्व क्षमता के प्रति देश को आश्वस्त नहीं कर पा रहे तब ये मानकर चला जा सकता है कि जनता के साथ वे अपना जुड़ाव कायम नहीं कर पा रहे। इसका कारण संभवतः  ये भी है कि उन्हें बिना जमीनी संघर्ष किये ही  विशेष हैसियत हासिल हो गई। उनकी माँ सोनिया गाँधी पार्टी की शीर्ष नेत्री होने के बाद भी जननेत्री नहीं बन सकीं जिसके कारण सर्वविदित हैं लेकिन राहुल के पास आयु और अवसर दोनों होने के बावजूद यदि दो दशक बाद भी  वे एक गंभीर नेता के तौर पर स्थापित नहीं हो सके तो इसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। एक युवा नेता से विशेष रूप से जब वह विपक्ष में हो , आक्रामकता की अपेक्षा जनता को होती है। लेकिन जिस तरह धार रहित तलवार से किया प्रहार प्रभावशाली नहीं  होता उसी तरह उसके  द्वारा सत्ता पक्ष पर किये जाने वाले  राजनीतिक हमलों में गहराई न हो तो वे हवा - हवाई होकर रह जाते हैं। श्री गाँधी भी इसी कमी का शिकार हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जितने हमले उन्होंने किये उतने आज तक शायद ही किसी अन्य विपक्षी नेता ने किसी प्रधानमंत्री पर किये हों। लेकिन उन्हें  आत्मावलोकन करना चाहिए कि उनकी आक्रामकता से जनता प्रभावित क्यों नहीं होती ? अभी तक उन्होंने प्रधानमंत्री को घेरने के लिए जितनी भी व्यूह रचना कीं वे सब छिन्न - भिन्न हो गईं। कभी वे चौकीदार चोर का शोर मचाते फिरे किंतु जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ। फिर अडानी के बारे में आई हिंडनबर्ग  रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री को घेरने में जुटे किंतु वह मुद्दा भी अपनी मौत मर गया। वीर सावरकर के बारे में उन्होंने जो निंदा अभियान चलाया वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे के विरोध के कारण ठंडा पड़ गया। बीते कुछ समय से उन्होंने चुनाव आयोग के विरुद्ध वोट चोरी का मुद्दा छेड़ रखा है। अपने आरोपों को वजनदारी देने के लिए उन्होंने उसे एटम बम का नाम दिया। बिहार में लंबी यात्रा भी निकाली। उसके बाद घोषणा की कि वे हाइड्रोजन बम लेकर आ रहे हैं जो मोदी सरकार को हिलाकर रख। देगा। पूरा देश उनके इस बम की प्रतीक्षा कर रहा था किंतु कल पत्रकार वार्ता में उन्होंने जो प्रमाण रखे वे हाइड्रोजन बम तो क्या बच्चों द्वारा दीपावली पर चलाये  जाने वाले साधारण फटाखों से भी हल्के थे । एटम और हाइड्रोजन बम नामक  दोनों पत्रकार वार्ताओं में जो बातें उन्होंने रखीं उन सबका चुनाव आयोग ने कुछ ही देर में उत्तर देते हुए उन्हें असत्य और आधारहीन निरूपित कर दिया। ये बात तो राजनीति की थोड़ी सी समझ रखने वाला भी जानता है कि चुनाव आयोग के विरुद्ध राहुल ने जो अभियान छेड़ रखा है उसके पीछे बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव हैं। वहाँ मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण से कांग्रेस और लालू यादव की पार्टी राजद परेशान है। राहुल का ये आरोप भी हास्यास्पद है कि आयोग द्वारा काटे गए मतदाता कांग्रेस समर्थक ही होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण पर रोक लगाने से इंकार किये जाने के बाद अब आयोग पूरे देश की मतदाता सूचियों की बारीकी से जाँच  शुरू करने जा रहा है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि नेता प्रतिपक्ष अपनी विश्वसनीयता कायम करने में लगातार विफल हो रहे हैं। उनके हमलों में कुंठा ज्यादा नजर आती है। बेहतर तो यही होगा कि वे निजी हमले छोड़ जनता की तकलीफों को लेकर संघर्ष करें।  वे आयु के जिस दौर में प्रविष्ट हो चुके हैं उसमें उन्हें अधिक परिपक्वता दिखानी चाहिए। आज के युग में किसी नेता द्वारा कही छोटी सी बात का भी विभिन्न स्तरों पर सूक्ष्म विश्लेषण होता है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष द्वारा उठाये गए किसी भी मुद्दे में यदि व्यापक जनहित न हो तो लोग उसका संज्ञान नहीं लेते। इसीलिये चुनाव आयोग के विरुद्ध उनकी मुहिम आगे पाट पीछे सपाट साबित हो रही है। ऐसा लगता है सैम पित्रोदा जैसे उनके सलाहकार भारतीय जनमानस को पढ़ने में असमर्थ हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 September 2025

ट्रम्प टैरिफ के दबाव से मुक्त होने के संकेत दे रहा शेयर बाजार

आगामी 22 सितंबर से जीएसटी की नई दरें लागू हो जाएंगी। इस बारे में संदेह जताया जा रहा था कि कंपनियां इसका लाभ ग्राहकों को देने के बजाय मूल्य वृद्धि कर अपनी कमाई बढ़ा लेंगी। लेकिन अभी तक जो देखने मिला  उसके मुताबिक उपभोक्ता बाजार में मौजूद लगभग सभी कंपनियों ने नई दरों के अनुसार अपने उत्पादों के मूल्य घटा दिये। स्मरणीय है भारत के बड़े हिस्से में पितृ (श्राद्ध) पक्ष के  दौरान नई चीजें नहीं खरीदी जातीं।  इसीलिये जीएसटी की संशोधित दरें  22 तारीख अर्थात शारदेय नवरात्रि के प्रारंभ से लागू होंगी क्योंकि नवरात्रि से दीपावली तक देश भर में  बाजार गुलजार रहते हैं। इस अवधि में मामूली हैसियत वाले से लेकर संपन्न वर्ग तक खरीदी करता ही है। दीपावली के उपरांत शादियों का दौर शुरू होने के कारण भी उपभोक्ता बाजार में जमकर खरीदी  होती है। दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को तो सोना - चांदी, वाहन, जमीन - जायजाद, कपड़े, इलेक्ट्रानिक उपकरण आदि की खूब बिक्री होती है। इस साल उम्मीद है कि उपभोक्ता वस्तुओं पर जीएसटी घटने से दीपावली सीजन में बाजार खरीददारों से भरे रहेंगे। अमेरिका द्वारा 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बाद भारतीय व्यापार और उद्योग जगत में चिंता व्याप्त थी जो निर्यात घटने से और बढ़ गई । विदेशी निवेशकों की बिकवाली से शेयर बाजार में गिरावट आने लगी। लेकिन भारतीय निवेशकों ने उस चुनौती का करारा जवाब देते हुए शेयर बाजार को जबरदस्त सहारा दिया जिसके कारण वह रोज नई ऊंचाइयों को छू रहा है। इस वर्ष मानसून में पर्याप्त वर्षा के कारण कृषि पैदावार अच्छी होने की उम्मीद से उपभोक्ता बाजार में उत्साह स्पष्ट नज़र आ रहा है। आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख किये जाने से मध्यमवर्गीय व्यवसायी और नौकरपेशा वर्ग की क्रयशक्ति में भी वृद्धि हुई है। बचत योजनाओं में  बीते कुछ सालों की तुलना में ज्यादा निवेश भी शुभ संकेत है। जीएसटी की दरों में हुए बदलावों से आम जनता को सीधा लाभ मिलने से घरेलू बचत के अलावा बाजार में खरीदी के आंकड़ों में वृद्धि अवश्यम्भावी मानी जा रही है। इस प्रकार अमेरिकी टैरिफ में वृद्धि के खौफ से देश उबरता जा रहा है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते हेतु वार्ताओं का क्रम जारी है । वहीं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताते हुए उनके जन्मदिन पर फोन कर बधाई दी । लेकिन दूसरी तरफ वे यूरोपीय यूनियन पर दबाव बनाने में जुटे हैं कि वह भारत पर 100 प्रतिशत की दर से टैरिफ लगाए। उल्लेखनीय है भारत और  यूरोपीय यूनियन के बीच व्यापार समझौते की बातचीत अंतिम चरण में है। वहीं ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि पहले ही हो चुकी है। ट्रम्प को डर है कि इन नये बाजारों के बल पर भारत उनके द्वारा लगाए गए 50 फीसदी  टैरिफ का दबाव झेल जायेगा जिससे उनकी जबरदस्त किरकिरी होगी। इस प्रकार भारत ने आर्थिक मोर्चे पर जिस आत्मविश्वास, का प्रदर्शन किया  उसकी वजह से वैश्विक स्तर पर हमारी धाक बढ़ी है। अमेरिका में  बैठीं दुनिया की तमाम रेटिंग एजेंसियां लगातार कह रही हैं कि ट्रम्प टैरिफ के बाद भी भारत की विकास दर 6 फीसदी से ज्यादा ही रहेगी। इस आकलन के बाद विदेशी निवेशकों द्वारा फिर से भारत का रुख किये जाने के संकेत मिल रहे हैं। बाजार में नई कंपनियों के साथ ही स्थापित उद्योगों के आईपीओ आने से निवेशकों के लिए अच्छे अवसर उपलब्ध हैं। कुछ निवेश प्रस्तावों को उम्मीद से कई गुना ज्यादा प्रतिसाद मिलने से नगदी की कमी का शोर  भी धीमा पड़ गया है। इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताये जाने संबंधी ट्रम्प की टिप्पणी का जवाब जीएसटी दरों में कमी करने के रूप में श्री मोदी ने दे दिया। जिस तत्परता के साथ भारत ने वैकल्पिक बाजारों की तलाश की उसने टैरिफ पीड़ित अन्य देशों को भी राह दिखाई है। इसीलिये शुरुआत में ऐंठ दिखा रहा अमेरिका अब  भारत से व्यापार समझौते के लिए आतुर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 17 September 2025

भाजपा के साथ ही भारत की भी जरूरत हैं मोदी



राजनीति के अपने तौर - तरीके हैं जिनमें चुनावी जीत ही सब कुछ मानी जाती है। विचारधारा के नाम पर ढोंग नेताओं की पहचान और अपना हित साधना  सिद्धांत बन गया है। लोकतंत्र के कंधों पर नव सामंतवादी सवार  हैं। आदर्शों की राजनीति करने वाले मजाक का पात्र बन रहे हैं। आजादी के बाद का एक दशक छोड़  दें किंतु उसके बाद राजनीति में गंदगी बढ़ती गई जिसका विकृत रूप सामने है। ऐसे में एक शख्स ने  सबका साथ, सबका विकास  जैसे संकल्प के साथ  बागडोर संभाली और 11 वर्षों में भारत को एक मजबूत आर्थिक और सैन्य शक्ति के तौर पर स्थापित कर दिया। इस व्यक्ति का नाम है नरेंद्र मोदी जिनका आज 75 वां जन्मदिन है। गुजरात के  मुख्यमंत्री रहते हुए विकास पुरुष के रूप में  छाप छोड़ने वाले श्री मोदी को जब भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के चेहरे के तौर पर प्रस्तुत किया तब आम भारतीय के मन में भी उत्साह नजर आया जिसके कारण भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। 1984 के बाद पहली बार किसी पार्टी को स्पष्ट जनादेश मिलने का कारण मतदाताओं के मन में श्री मोदी के प्रति जबरदस्त विश्वास था। 11 वर्षों के कार्यकाल में एक भी अवकाश नहीं लेने वाले प्रधानमंत्री ने जन आकांक्षाओं  को पूरा करने का अभियान पहले दिन से ही प्रारंभ कर दिया था। जनहित की योजनाओं में घुसे बिचौलियों और दलालों को हटाने के लिए जब जनधन खाते खुलवाये तब उनकी उपयोगिता पर खूब सवाल उठे।  स्वच्छता अभियान और शौचालय योजना का भी मजाक उड़ाया गया। उज्ज्वला तथा  प्रधानमंत्री आवास योजना की सफलता पर भी संदेह व्यक्त किये गए। लेकिन इन सबसे आम जन के जीवन स्तर में जो सुधार हुआ वह एक तरह की  सामाजिक क्रांति ही है। इसीलिये 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी को और ज्यादा जन समर्थन मिला। उसके बाद के पाँच वर्ष बेहद कठिनाइयों से भरे रहे। कोरोना महामारी ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया।  बड़ी - बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देश अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ साबित हुए। तब भारत में कोरोना का टीकाकरण अभियान जिस तरह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ उसने  देश की क्षमता से  विश्व को परिचित करवाया। संकट के उस दौर में करोड़ों लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न  के साथ ही गरीबों के खातों में नगदी  ट्रांसफर जैसी व्यवस्थाओं ने देश को अराजकता से बचा लिया। वरना भूख के वशीभूत लोग श्रीलंका और नेपाल जैसे हालात उत्पन्न कर  सकते थे। लॉक डाउन के  दौरान अधो संरचना के बड़े - बड़े काम संचालित कर विकास के पहियों को चलायमान रखने की सोच श्री मोदी की दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है। विश्व के अनेक छोटे  देशों को भी उपहार में वैक्सीन देने के निर्णय ने उनकी छवि वैश्विक नेता की बना दी। वहीं आपदा में अवसर खोजने की सोच ने देश को दवा उत्पादन में अग्रणी बना दिया। सैन्य सामग्री के मामले में आत्मनिर्भर बनने उठाये गए कदमों का ही सुपरिणाम है कि भारत इस क्षेत्र में निर्यातक के तौर पर उभर सका। 2024 में भले ही उन्हें स्पष्ट बहुमत न मिला हो किंतु जनता की भावनाएं  पक्ष में होने से वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। खास बात ये है कि सत्ता में आने के बाद भी वे  सैद्धांतिक प्रतिबद्धता नहीं भूले और भाजपा की मूलभूत नीतियों को लगातार लागू करते जा रहे हैं। राम मंदिर, तीन तलाक़, धारा 370 , वक्फ संशोधन , और शिक्षा नीति के बारे में लिए   फैसले प्रधानमंत्री की दृढ़ता का प्रमाण हैं। एक देश एक चुनाव और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर भी सरकार आगे बढ़ रही है। उत्तर पूर्वी राज्यों में विकास की गंगा बहाने से वे मुख्य धारा से जुड़ने लगे हैं। कश्मीर घाटी तक भी रेल पहुँच गई है। सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी दुनिया ने देखी। आज का भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाओं को टक्कर देने में समर्थ है। अमेरिका द्वारा थोपे गए टैरिफ का जिस मजबूती से जवाब दिया गया वह प्रधानमंत्री के कूटनीतिक कौशल को दर्शाता है। उनके कार्यकाल में देश ने जो अर्जित किया उसकी सूची बहुत लंबी है। कुछ विफलताएं भी इस दौरान देखने मिलीं किंतु ये कहना गलत नहीं है कि श्री मोदी  ने हर भारतीय में अभूतपूर्व आत्मविश्वास भर दिया। दुनिया में भारत का जो सम्मान है उसमें उनके योगदान को नकारना असंभव है। हालांकि आज भी गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं हैं और  देश के अनेक इलाके पिछड़ेपन का शिकार हैं। लेकिन प्रधानमंत्री  जिस ईमानदारी और समर्पण भाव से जुटे हुए हैं उससे लगता है सबका विकास रूपी  नारा हकीकत में बदलकर रहेगा। 75 बरस की उम्र में उनमें किसी युवक से ज्यादा ऊर्जा है । उनके नेतृत्व में भाजपा का जो विस्तार हुआ वह बड़ी उपलब्धि है। लेकिन आज श्री मोदी भाजपा के साथ ही भारत की जरूरत बन गए हैं। वे दीर्घायु हों और देश को विकास के उच्चतम शिखर तक ले जाएं यही शुभकामना है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 16 September 2025

सर्वोच्च न्यायालय ने वक़्फ़ संशोधन के विरोधियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया

 जब वक्फ संशोधन पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया तब शुरुआत में कथित सेकुलर जमात ने जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया। लेकिन फैसले को पूरा पढ़ने के बाद उनकी खुशी पर पानी फिर गया। मुख्य न्यायाधीश बी.आर .गवई और न्यायमूर्ति ए.जी मसीह की पीठ ने कहा कि पूरे कानून पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता, लेकिन कुछ धाराओं को संरक्षण दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने साफ किया कि संशोधित वक्फ कानून की वैधता पर यह फैसला नहीं है। वक्फ संशोधन के विरोधियों को निराश करते हुए  फैसले में कहा गया कि  बेहद दुर्लभ मामलों में ही पूरे कानून पर रोक लगाई जा सकती है। उल्लेखनीय है  वक्फ संशोधन के विरुद्ध  याचिकाकर्ताओं ने पूरे कानून को ही रद्द करने की मांग की थी परंतु सर्वोच्च न्यायालय  उनके तर्कों से  सहमत नहीं हुआ। इसीलिये कहा जा रहा है कि  इस फैसले से पुराने वक्फ का अंत हो गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागर हाथ मलने को बाध्य हो गए हैं। फैसले में कहा गया गया है  कि वक्फ संशोधन कानून में यह प्रावधान सुरक्षित रहेगा जो सरकार की ओर से नियुक्त अधिकारी को यह निर्धारित करने का अधिकार देता है कि क्या वक्फ संपत्ति ने सरकारी संपत्ति में अतिक्रमण किया है। रोचक बात ये रही कि न्यायालय  ने वक्फ बोर्ड में गैरमुस्लिम को सीईओ नियुक्त करने संबंधी संशोधन पर रोक लगाने से मना कर दिया हालांकि ये समझाईश दी कि जहां तक संभव हो वक्फ बोर्ड का सीईओ मुस्लिम होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश श्री गवई  का ये कहना महत्वपूर्ण है कि याचिका में पंजीकरण सम्बन्धी आपत्ति उचित नहीं है क्योंकि यह प्रावधान 1995 से 2013 तक अस्तित्व में रहा और अब फिर से है और पंजीकरण कोई नया प्रावधान नहीं है। यद्यपि श्री गवई ने माना कि कि कलेक्टर को व्यक्तिगत नागरिकों के अधिकारों का निर्णय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। इसलिए जब तक  ट्रिब्यूनल का निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी पक्ष के विरुद्ध किसी तीसरे पक्ष का अधिकार निर्मित नहीं किया जा सकता।  अदालत ने  यह भी माना  कि वक्फ बोर्ड में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं हो सकते और कुल मिलाकर 4 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होंगे। इस प्रकार ये फैसला मुस्लिम समाज के कट्टरपंथियों के लिए बड़ा धक्का है लेकिन इससे गरीब और बेसहारा मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी जिनके कल्याण के लिए  वक़्फ़ नामक व्यवस्था बनाई गई । वक़्फ़ की अंतर्निहित भावना बहुत ही पवित्र है। समाज में दानशीलता का संस्कार मानवीय संवेदनाओं का परिचायक है। भारत में मुस्लिम समुदाय अशिक्षा के कारण सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से मुख्य धारा से दूर रह गया। इसका लाभ उठाकर इस्लामिक धर्मगुरुओं ने  भावनात्मक शोषण करते हुए उन्हें कट्टरता में बांधकर रखा । वक़्फ़ में निहित संपत्तियों में भारी भ्रष्टाचार हुआ। बेशकीमती  संपत्ति  को समाज के प्रभावशाली लोगों ने मिट्टी के मोल हथिया लिया या मामूली किराया देकर कब्जा लिया। यही कारण है कि मुस्लिम समाज के निचले वर्ग में दुष्प्रचार किया गया कि वक़्फ़ संशोधन लागू होते ही मस्जिद जैसे धार्मिक स्थल भी हाथ से निकल जाएंगे किंतु ओवैसी सहित मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बड़बोले सदस्यों के उकसाने के बाद भी आम मुसलमान शांत बना हुआ है क्योंकि उसे वक़्फ़ की अब तक प्रचलित व्यवस्था से उम्मीद के मुताबिक  सहायता नहीं मिली ।  तलाकशुदा हजारों मुस्लिम महिलाएं अपने बच्चों के साथ बदहाली में जी रही हैं। लेकिन वक़्फ़ बोर्ड ने उनके पुनर्वास और राहत पर समुचित  ध्यान नहीं दिया। अशिक्षित युवाओं की शिक्षा और कौशल विकास की दिशा में भी वक़्फ़ बोर्ड ऐसा कुछ विशेष नहीं कर सके । 2013 तक वक़्फ़ की जो व्यवस्था थी उसे तत्कालीन  मनमोहन सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने बदल दिया। अब जाकर उसमें जो सुधार हुआ उसके कारण अब किसी भी संपत्ति को वक्फ की बताकर जबरिया कब्जा करने के षडयंत्रों पर जो लगाम लगेगी उसी से मुल्ला - मौलवी और तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों के पेट में मरोड़ हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जिन प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई उन पर बहस के बाद हो सकता है वे भी मान्य हो जाएं। लेकिन गत दिवस उसने जो फैसला दिया उसमें वक्फ संशोधन के आधार को मंजूरी देकर नये कानून को किसी भी कीमत पर मंजूर न करने की डींग हांकने वालों के मुँह बन्द कर दिये।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 15 September 2025

मतदाता सूचियाँ नहीं सुधरीं तो घुसपैठियों के सांसद - विधायक बनने का खतरा


चुनाव आयोग द्वारा पूरे देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (S.I.R) का निर्णय लिए जाने के बाद  शीघ्र ही राज्यवार काम शुरू हो जाएगा। उल्लेखनीय है बिहार में किये गए विशेष गहन पुनरीक्षण का विरोध सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा जिसने अनेक याचिकाओं की सुनवाई करने के उपरांत चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं की पहचान हेतु निर्धारित दस्तावेजों में आधार कार्ड को शामिल करने के साथ ही  काटे गए नामों की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया ।  इसे विपक्ष अपनी जीत मान बैठा लेकिन उसकी उम्मीदों पर तब पानी फिर गया जब न्यायालय ने पुनरीक्षण पर रोक लगाने से स्पष्ट इंकार कर दिया।  पुनरीक्षण का विरोध कर रही पार्टियों को इससे भी निराशा हुई कि जिन 65 लाख मतदाताओं के नाम चुनाव आयोग ने काट दिये थे उनमें से बहुत कम आपत्ति दर्ज करवाने आयोग के पास पहुंचे। इस कारण ये आरोप गंभीरता खो बैठा कि आयोग ने सरकार के दबाव पर भाजपा विरोधी मतदाताओं के नाम कटवा दिये। हालांकि पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतरिम मतदाता सूचियों में भी गड़बड़ियां सामने आईं किंतु इसके लिए राजनीतिक दल भी दोषी है जो मतदाता सूचियाँ तैयार करने के दौरान शासकीय मशीनरी के साथ सामंजस्य नहीं बिठाते जो कि उनका अधिकार और कर्तव्य दोनों हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूचियों का विशेष गहन परीक्षण बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले करना गलत है क्योंकि इसके जरिये सत्तारूढ़ पार्टी उन मतदाताओं के नाम कटवा देगी जिनका झुकाव विपक्ष की तरफ है। यद्यपि इस समूची प्रक्रिया का उद्देश्य विदेशी नागरिकों ( बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों) को मताधिकार से वंचित करना है जो फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मतदाता बन बैठे। चूंकि इनमें ज्यादातर  मुस्लिम हैं इसलिए गैर भाजपा दलों को लगता है कि उनके नाम कट जाने से उन्हें नुकसान होगा। ये बात पूरी तरह प्रमाणित है कि चूंकि भाजपा इन घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिए प्रयासरत है इसलिए ये उसकी विरोधी पार्टी के पक्ष में गोलबंद हो जाते हैं। स्मरणीय है कि भाजपा विरोधी सभी दल नागरिकता संशोधन कानून (सी. ए. ए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर ( एन. आर. सी) का विरोध भी इसी कारण से कर रहे थे। आधार कार्ड और राशन कार्ड हासिल कर सरकारी कल्याण योजनाओं का लाभ उठाकर ये घुसपैठिए देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बने हुए हैं। लेकिन मतदाता सूची में नाम दर्ज होने के कारण इनको केंद्र और राज्य की सरकार को चुनने का जो अधिकार मिल जाता है वह राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने वाला है। जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने से कुछ इलाकों में गैर मुस्लिम उम्मीदवार का  जीतना असंभव हो गया है। ऐसे में यदि मतदाता सूचियों का बारीकी से पुनरीक्षण कर घुसपैठियों के नाम नहीं काटे जाते तो वह दिन दूर नहीं जब संसद और विधानसभाओं में बांग्ला देशी और रोहिंग्या मूल के लोग बतौर सांसद और विधायक नजर आयेंगे। इस बारे में हमें ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों में उत्पन्न स्थिति से सबक लेना चाहिए जो शरणार्थियों को अपने यहाँ बसाने का दंश भोग रहे हैं। ब्रिटेन तो पूरी तरह मुस्लिम अतिवाद के शिकंजे में आ गया है , वहीं फ़्रांस में भी मुस्लिम आबादी  अराजक वातावरण बनाने में जुटी है। यूरोप के तमाम छोटे - देश  मुस्लिम शरणार्थियों को पनाह देकर खून के आँसू रो रहे हैं। अब तो अमेरिका भी इसी गलती पर पछता रहा है। इन सब बातों के परिप्रेक्ष्य में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का विशेष गहन परीक्षण करने का फैसला देश के हित में है। मानवीय आधार पर शरण देना गलत नहीं है किंतु उसको हमारी नीति निर्धारण प्रक्रिया को नियंत्रित करने का अधिकार देना आत्मघाती होगा। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि विदेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें मतदाता सूची से बाहर किया जाए और ऐसा करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण सबसे कारगर उपाय है। आश्चर्य इस बात का है कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अभी से पुनरीक्षण के विरोध में उतर आई हैं जबकि वहाँ विधानसभा चुनाव 2026 की गर्मियों में होना है। इससे साबित होता है कि उनके राज्य में बांग्ला देशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में होने का आरोप सही है। विपक्षी दल इस मुद्दे पर जनता का समर्थन बटोरना चाह रहे हैं किंतु बिहार से जो संकेत मिले उनसे स्पष्ट है कि कांग्रेस और राजद द्वारा  मचाये हो-हल्ले का जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 September 2025

चीन और अमेरिका की रस्साकशी में नेपाल बन सकता है दूसरा अफ़ग़ानिस्तान

खिरकार सुशीला कार्की नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री बन गईं। पहली महिला प्रधानमंत्री बनने के  अलावा वे पहली महिला मुख्य न्यायाधीश भी रह चुकी हैं।  उनका नाम एक बार सुर्खियों में आने के बाद पीछे चला गया था क्योंकि वे भारत समर्थक मानी जाती हैं। लेकिन अन्य  नामों पर आम सहमति नहीं बनने की वजह से अंततः फैसला उनके पक्ष में हुआ और कल रात ही उन्होंने अकेले ही शपथ भी ले ली। मंत्रियों का चयन बाद में होगा। दरअसल सत्ता परिवर्तन के  आंदोलन में शामिल विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि अंतरिम प्रधानमंत्री के नाम पर एकमत नहीं थे। लेकिन राजतंत्र की वापसी की आशंका के कारण श्रीमती कार्की के नाम पर रजामंद हो गए। वे इस  बात से भी परेशान थे  कि माओवादी सरकार के प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों ने तो त्यागपत्र दे दिये थे किंतु राष्ट्रपति ने  न तो त्यागपत्र दिया और न ही संसद भंग की । चर्चा है कि शपथ लेने के पहले श्रीमती कार्की ने संसद भंग करने की शर्त रख दी थी। उनके दबाव में आख़िरकार राष्ट्रपति को संसद भंग कर नये चुनाव का रास्ता साफ करना पड़ा। श्रीमती कार्की के लिए  लिए अपनी सरकार में मंत्रियों का चयन करना भी आसान नहीं होगा। दरअसल ओली सरकार के विरुद्ध आंदोलन गैर राजनीतिक होने से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सरकार में हिस्सा देना संभव नहीं है। अपदस्थ प्रधानमंत्री ओली के अलावा अन्य बड़े दल संसद भंग करने का विरोध कर रहे थे क्योंकि मौजूदा वातावरण में उनका जीतकर आना कठिन है। यदि सेना ने न बचाया होता तो बड़ी बात नहीं ओली के साथ ही अन्य माओवादी नेता भी हिंसा की चपेट में आ जाते। सच तो ये है कि इस आंदोलन का चूंकि कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। बीते दिनों जो  हिंसा हुई उसमें कुछ ऐसी शक्तियों का हाथ बताया जा रहा है जिनका आंदोलन से कोई संबंध ही नहीं रहा। माना जाता है  कि अल्पसंख्यक गुटों के अलावा असामाजिक तत्वों ने मौके का लाभ लेते हुए अपने मकसद पूरे कर लिए। भारतीय मूल के व्यापारियों के प्रतिष्ठानों को चुन - चुनकर निशाना बनाये जाने से भी   कई  सवाल खड़े हो गए हैं। इन हालातों में श्रीमती कार्की के लिए चुनाव करवाना आसान नहीं होगा। बड़ी बात नहीं नेपाल को भी बांग्ला देश की तरह लंबे समय तक अंतरिम व्यवस्था से  काम चलाना पड़े। चूंकि युवाओं की अपेक्षाओं का पहाड़ भी बहुत बड़ा है जिनके पूरे नहीं होने पर वे फिर सड़कों पर उतर सकते हैं। और भले ही माओवादी सरकार का तख्ता पलट दिया गया हो किंतु चीन अपनी जड़ें इतनी आसानी से उखड़ने नहीं देगा। राष्ट्रपति के रूप में अभी भी उसका वफादार  ही सत्ता के शिखर पर है। उन्होंने संसद भले ही भंग कर दी किंतु  संविधान अभी भी जारी है। माओवादी नेताओं को  सेना लंबे समय अपने संरक्षण में  रख सकेगी ये भी नहीं लगता। तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि नेपाल में हुई उठापटक के पीछे जिस अमेरिका का हाथ माना जा रहा है वह माओवादियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए पूरी ताकत लगा देगा। इन दो महाशक्तियों के निहित स्वार्थों की टकराहट में देश के दूसरे अफगानिस्तान बनने का खतरा भी बढ़ गया है। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि माओवादियों द्वारा सत्ता से हटा दिया गये राजघराने की भूमिका बदली हुई स्थितियों में क्या रहेगी?  कुछ माह पूर्व राजतंत्र की वापसी के साथ ही नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के लिए आंदोलन हुआ था जिसे ओली सरकार ने कुचल तो दिया किंतु माओवादी सत्ता के हटते ही  राजतंत्र और हिन्दू राष्ट्र की वापसी फिर चर्चा में आ गई। ये भी कहा जा रहा है कि अंतरिम सरकार बनने के बाद नये चुनाव के पहले अमेरिका खुलकर सामने आयेगा और बड़ी बात नहीं वह राजशाही की पुनर्स्थापना का रास्ता साफ करे। दरअसल अफगानिस्तान से डेरा उठ जाने के बाद से अमेरिका को नेपाल में अपने लिए अनुकूलता दिख रही है। जहाँ  से वह चीन और भारत दोनों के सिर पर बैठने में सफल हो जाएगा जो  उसके लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। इन सबके कारण नेपाल में जल्द राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद करना व्यर्थ है क्योंकि युवा आंदोलन के चेहरे भले ही स्थानीय हों किंतु उनकी लगाम देश के बाहर है। राजशाही के पतन के बाद माओवादियों की सत्ता का रिमोट चीन में था। अमेरिका चाहेगा कि वह स्थिति न लौटे और  नई सत्ता उसके प्रभाव में रहे। आने वाले कुछ महीने  समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए उथलपुथल भरे होंगे। भारत के लिए चिंता का विषय ये है कि नेपाल  चाहे चीन के नियंत्रण में रहे अथवा अमेरिका के इशारों पर चले दोनों स्थितियाँ हमारे लिए हानिकारक हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 September 2025

सुरक्षा एजेंसियों की शिकायत को गंभीरता से लें राहुल

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की विदेश यात्राएँ राजनीतिक जगत में चर्चा के साथ ही बहस का मुद्दा बनती रही हैं। अनेक बार वे किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए भी  विदेश जाते हैं जो सामान्य बात है। लेकिन जब वे इन यात्राओं को गोपनीय रखते हैं तब जो सवाल उठते हैं वे स्वाभाविक हैं। वैसे किसी व्यक्ति की निजता में दखलंदाजी अनुचित है किंतु  ये बात भी विचारणीय है कि श्री गाँधी अति विशिष्ट श्रेणी में आते हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तो वे 2024 के चुनाव उपरांत बने किंतु उसके पहले वे कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे । सबसे महत्वपूर्ण ये है कि उनके पिता स्व. राजीव गाँधी की हत्या के बाद से पूरे गाँधी परिवार को उच्चस्तरीय सुरक्षा प्रदान की गई। नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होने से वे वैसे भी वीआईपी हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन केवल विशिष्ट व्यक्ति के नाते ही नहीं बल्कि उनके परिवार को आतंकवादियों से खतरे के परिप्रेक्ष्य में सुरक्षा घेरा दिया गया है। सर्वविदित है राहुल की दादी इंदिरा गाँधी और पिता राजीव गाँधी  आतंकवाद का शिकार होकर प्राणों से हाथ धो बैठे। इंदिरा जी को तो उनके सुरक्षा कर्मियों ने ही गोलियों से भून दिया था। उल्लेखनीय है अमृतसर के सुप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सिख समुदाय की नाराजगी के चलते श्रीमती गाँधी को सलाह दी गई थी कि वे सिख अंगरक्षकों की सेवाएं न लें किंतु उन्होंने उसे हल्के में लिया जिसका दुष्परिणाम उनकी नृशंस हत्या के रूप में देखने मिला। इसी तरह राजीव गाँधी की सरकार द्वारा श्रीलंका में सेना भेजने के निर्णय से नाराज लिट्टे नामक संगठन ने एक महिला आतंकवादी के जरिये आत्मघाती हमले में उनको विस्फोट का शिकार बनाया । उसके बाद सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पूरे गाँधी परिवार को अति विशिष्ट श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करवाई गई । उन घटनाओं के बाद से केंद्र में सरकारें बदलती गईं किंतु गाँधी परिवार की सुरक्षा यथावत रही। यद्यपि श्रेणी में कुछ बदलाव हुए किंतु श्री गाँधी ,उनकी माँ सोनिया गाँधी और बहन प्रियंका वाड्रा के परिजनों को सुरक्षा घेरा उपलब्ध  है। सुरक्षा कर्मी तो अपने कर्तव्य का निर्वहन करते ही हैं किंतु  सुरक्षा प्राप्त हस्तियों का भी फर्ज है कि वे सुरक्षा एजेंसियों की व्यवस्था में पूर्ण सहयोग दें। श्री गाँधी देश के मुख्य विपक्षी दल के शीर्ष नेता हैं। उन्हें आये दिन जनता के बीच जाना पड़ता है। विशेष रूप से चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा करना  जरूरी होता है किंतु ऐसे अवसरों पर सुरक्षा कर्मियों को जो दिक्कत आती है उसका ध्यान भी नेताओं को रखना चाहिए। वर्तमान संदर्भ श्री गाँधी की विदेश यात्राओं को लेकर सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उठाई गई आपत्ति का  है। उल्लेखनीय है वे हाल ही में मलेशिया की यात्रा पर गए थे जिसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं  थी। लेकिन अचानक सोशल मीडिया पर उनका एक चित्र प्रसारित हो गया जिसमें वे  एक पर्यटन स्थल पर दिखाई दिये। उसके बाद भाजपा ने उनकी विदेश यात्राओं पर तंज कसना शुरू कर दिया। श्री गाँधी के समर्थन में  ये कहा गया कि उन्हें भी  छुट्टी मनाने का अधिकार है। इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता कि उनको अपनी निजता बनाए रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ ही श्री गाँधी को भी पत्र लिखकर शिकायत की है कि वे उन्हें सूचित किये बिना विदेश चले जाते हैं जिससे उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि श्री खरगे और श्री गाँधी ने उन पत्रों का क्या जवाब दिया किंतु उनमें व्यक्त चिन्ता पूरी तरह वाजिब है क्योंकि श्री गाँधी की सुरक्षा में किसी भी चूक का ठीकरा तो आखिर एजेंसियों  पर ही फूटेगा। बेहतर हो श्री गाँधी उनकी शिकायत पर सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचय दें। उन्हें  निजी कार्य से विदेश जाने का पूरा अधिकार है किंतु उसकी जानकारी रहे तो सुरक्षा एजेंसियां विदेशों में भी उनकी हिफ़ाजत का जिम्मा उठा  सकेंगी। श्री गाँधी को ये याद रखना चाहिए कि आतंकवादियों का जाल देश ही नहीं अपितु अन्य देशों में भी फैला हुआ है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 September 2025

नेपाल की वर्तमान स्थिति से भारत को लाभ उठाना चाहिए


दो दिन पहले हुए हिंसक घटनाक्रम के बाद नेपाल   सेना के नियंत्रण में है। प्रधानमंत्री ओली के त्यागपत्र  के बाद आंदोलन तो शांत हुआ किंतु कर्फ्यू जारी है। सेना की मध्यस्थता में नई सरकार के गठन की कवायद चल रही  है। पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने  के संकेत मिले थे किंतु अब कुलमान घीसिंग का नाम तेजी से उछला है। यद्यपि आंदोलन के  कुछ नेता इस बात से नाराज हैं कि सेनाध्यक्ष  अशोक राज सिंगडेल द्वारा  देश को संबोधित करते समय उनके पीछे नेपाल के पूर्व महाराजा का चित्र लगा था। इसका आशय ये लगाया गया कि  राजतंत्र की वापसी का प्रयास किया जा रहा है। सेनाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल कुछ लोगों ने  नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग भी की ।  जिस बड़े पैमाने पर हिंसा , आगजनी, मारपीट हुई उससे  स्पष्ट है  कि आंदोलन में अराजक तत्व भी घुस आये थे। सर्वोच्च न्यायालय जलाये जाने से न्याय प्रक्रिया पूरी तरह तहस - नहस हो चुकी है। जेलों के ताले टूटने से हजारों कैदी  बाहर आकर फरार हो गए जिनमें कुख्यात अपराधी भी हैं। सैकड़ों  सरकारी दफ्तर फूंक दिये गए। कुल मिलाकर महज दो - तीन दिनों के भीतर इस देश में शासन - प्रशासन, परिवहन, पर्यटन तबाह हो गए। पहले से ही  चौपट अर्थव्यवस्था और भी बुरी स्थिति में आ गई। संभवतः एक - दो दिनों में अंतरिम सरकार की तस्वीर साफ हो जाएगी।लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि जिस तरह से माओवादियों  को सत्ता से उखाड़ फेंका गया वह महज राजनीतिक व्यूहरचना न  होकर किसी अंतर्राष्ट्रीय कार्य योजना का हिस्सा है। चूंकि सत्ता में बैठे लोग चीन के पिट्ठू रहे इसलिए संदेह की सुई घूम - फिरकर अमेरिका पर जाकर टिकती है जो नेपाल को चीन के प्रभावक्षेत्र से निकालना चाहता था। आंदोलन से जुड़े कुछ नेताओं का अमेरिका से जुड़ाव सामने आया है। लेकिन ओली सरकार के पतन के बाद सड़कों पर खुशी मना  रहे अनेक युवाओं द्वारा नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री होने की बात कही जो नेपाल को बदहाली से निकाल सके। वैसे भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में खटास तो महाराजा के समय ही आ चुकी थी किंतु जबसे माओवादी सत्ता पर काबिज हुए तबसे तो नौबत सीमा विवाद को लेकर सैन्य टकराव तक आ गई। लेकिन जिस हिंसा के सहारे माओवादियों ने  राजशाही को उखाड़ फेंका उसी शैली में उनको बेदखल किये जाने से साम्यवादी शासन व्यवस्था की विफलता भी सामने आ चुकी है। चीन जैसा शातिर देश तक नेपाल में सत्ता विरोधी ज्वार का अनुमान नहीं लगा सका। ऐसे में वहाँ के भावी राजनीतिक स्वरूप का अंदाजा लगाना फिलहाल मुश्किल है। अंतरिम सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार है। जिन युवाओं ने हिंसा के जरिये सत्ता पलट दी , वे अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए नये चुनाव तक शांत रहेंगे ये बड़ा सवाल है। माओवादियों के विकल्प के तौर पर किसी नये राजनीतिक समीकरण की संभावना भी अधर में है। यदि सेनाध्यक्ष पुराने राजपरिवार को आगे लाकर नेपाल को दोबारा हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में मददगार बनते हैं तब अलग स्थिति बनेगी। भारत के लिहाज से देखें तो इस पड़ोसी देश में उत्पन्न अस्थिरता हमारे लिए अनेक समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं। रोजगार की तलाश में भारत आने वाले युवाओं की संख्या बढ़ने के साथ ही जेलों से फरार अपराधियों के भी आने का खतरा बढ़ा है। इसीलिए नेपाल से सटी सीमा वाले राज्यों में सतर्कता बढ़ाई गई है। सेना भी स्थिति पर निगाह रख रही है।  आज की स्थिति में नेपाल में जो भी सरकार बने वह माओवादियों की विरोधी ही होगी। जाहिर है उसे भारत से सहयोग लेना पड़ेगा क्योंकि इस देश को होने वाली आपूर्ति भारत के रास्ते से ही होती है। ऐसे में भारत को नई सरकार के साथ  बजाय भावनात्मक बातें करने के स्पष्ट रूप से बता  देना चाहिए कि यदि सहयोग और संरक्षण चाहिए तो भारत विरोध की मानसिकता से निकलना होगा। श्रीलंका और मालदीव भी चीन के दबाव से निकलकर भारत के महत्व को स्वीकार करने लगे हैं। अफ़ग़ानिस्तान की तालिबानी सत्ता भी पाकिस्तान को छोड़ भारत से रिश्ते बना रही है। नेपाल की  जनता द्वारा माओवादी कुशासन के विरुद्ध विद्रोह किये जाने से वहाँ चीन का प्रभाव घटा है। भारत को इस स्थिति का लाभ उठाना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 September 2025

राधाकृष्णन की जीत से कांग्रेस की वजनदारी घटी : राहुल की क्षमता सवालों के घेरे में

पराष्ट्रपति के चुनाव में आखिर वही हुआ जिसकी उम्मीद थी। भाजपा से जुड़े  एनडीए प्रत्याशी सी.पी राधाकृष्णन ने इंडिया गठबंधन उम्मीदवार पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी को 152 मतों के भारी अंतर से पटकनी दे दी। सत्ता पक्ष ने  मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए कुछ विपक्षी दलों को साथ आने  के लिए भी मना लिया वहीं कुछ ने मतदान में अनुपस्थित रहकर परोक्ष समर्थन दिया। नतीजे के बाद विपक्ष इस बात से भौचक रह गया कि 15 मत जहाँ अवैध हो गए वहीं कुछ विपक्षी सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की। कांग्रेस की ओर से ये कहा जा रहा है कि इस बार विपक्षी प्रत्याशी को पिछले चुनाव से ज्यादा मत मिले जो विपक्ष की नैतिक विजय है। लेकिन वह भूल रही हैं कि तब तृणमूल कांग्रेस अनुपस्थित रही थी। वहीं लोकसभा में भाजपा के 300 से ज्यादा सदस्य थे जो आज घटकर 240 रह गए। यद्यपि इंडिया गठबंधन ने अपनी एकजुटता काफी हद तक बनाये रखी जिसके बल पर वह अंतिम क्षणों तक हवा उड़ाता रहा कि श्री रेड्डी के तेलुगु  भाषी होने से  चंद्राबाबू नायडू उनकी तरफ झुक सकते हैं। जदयू की भी  भाजपा से नाराजगी का प्रचार किया गया। बिहार चुनाव को लेकर चिराग पासवान और भाजपा के बीच मतभेदों को लेकर भी विपक्ष को काफी उम्मीद थी। श्री धनखड़ द्वारा पर्दे के पीछे रहकर एनडीए उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने की अटकलें भी लगाई गईं।  मोदी विरोधी कुछ यू ट्यूबर तो केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी द्वारा भीतरघात की खबर भी चलाते रहे। लेकिन जब परिणाम आये तो पूरा विमर्श विपक्ष की कमजोरी पर केंद्रित हो गया। भाजपा ने जहाँ तयशुदा जीत को और वजनदार बनाने के लिये सार्थक प्रयास किये वहीं इंडिया गठबंधन की अगुआई करने वाली कांग्रेस जो कि संसद के दोनों सदनों में मुख्य विपक्षी दल है, हवाबाजी करती रही। भाजपा ने अपने सांसदों को दिल्ली में एकत्र कर उन्हें मतदान प्रक्रिया का समुचित प्रशिक्षण देने के साथ ही पार्टी की एकता को सुनिश्चित किया। दूसरी तरफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बिहार में निकाली गई यात्रा के बाद थकान उतारने गोपनीय तरीके से मलेशिया जा पहुंचे और  मतदान की पूर्व संध्या पर ही वापस आये जिससे विपक्ष की कोई  रणनीति नहीं बन पायी। जिन पार्टियों ने  मतदान से दूर रहने का फैसला किया उन्हें मनाने के प्रयास हुए हों , ऐसा भी नजर नहीं आया जबकि बीजद, बीआरएस और अकाली दल की भाजपा से दूरियाँ जगजाहिर हैं। हालांकि श्री राधाकृष्णन के तमिल होने के बाद भी सत्तारूढ़ द्रमुक ने उन्हें समर्थन नहीं दिया क्योंकि वे भाजपा और रास्वसंघ से सीधे जुड़े रहे । विपक्ष का सोचना था कि श्री रेड्डी पूर्व न्यायाधीश होने से गैर राजनीतिक शख्सियत हैं लिहाजा चंद्रबाबू नायडू, जगन मोहन रेड्डी और के .सी रेड्डी तेलुगू होने से उनके पक्ष में खड़े हो जाएंगे किंतु श्री नायडू  एनडीए के साथ बने रहे जबकि तेलुगु देशम  के साथ खुले मतभेद के बाद भी जगन मोहन ने श्री राधाकृष्णन के साथ जाने का फैसला किया । वहीं केसीआर ने मतदान में हिस्सा नहीं लेकर विपक्ष को झटका दे दिया। इसके बाद भी  भाजपा ने अतिविश्वास से बचते हुए अतिरिक्त मत जुटाने के प्रयास जारी रखे जिससे विपक्ष के लगभग 15 सांसदों ने श्री रेड्डी के विरोध में मतदान किया वहीं 15  मत रद्द होने से श्री राधाकृष्णन की जीत का अंतर  बढ़ गया। इस प्रकार श्री धनखड़ के अचानक त्यागपत्र देने से उत्पन्न राजनीतिक संकट से एनडीए सफलतापूर्वक बाहर आ गया। वहीं महीने भर से भाजपा पर दबाव बना रहे राहुल गाँधी बुरी तरह विफल साबित हुए। उनकी नेतृत्व क्षमता और रणनीति बनाने की काबलियत एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई। सत्ता पक्ष के पास  पर्याप्त संख्याबल होने के बाद भी उसके रणनीतिकार खुशफहमी में नहीं रहे। लेकिन श्री गाँधी  व्यूह रचना बनाने की बजाय छुट्टियां मनाने विदेश चले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर तंज कसने वाले विपक्षी नेता श्री गाँधी की रहस्यमयी विदेश यात्राओं पर चुप क्यों रहते हैं ये भी बड़ा सवाल है।  बिहार विधानसभा चुनाव के एन पहले अपनी ताकत से ज्यादा मत हासिल होने से एनडीए का हौसला जहाँ बुलंद हुआ वहीं कांग्रेस के साथ जुड़े विपक्षी दलों में निराशा आई है। भाजपा ने विपक्ष में जो सेंध लगाई उससे इंडिया गठबंधन में आपसी अविश्वास बढ़ेगा।  जिसका प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से ही सही बिहार में देखने मिलेगा। श्री राधाकृष्णन को मिली बड़ी जीत ने कांग्रेस की वजनदारी भी कम कर दी जिसके लिए राहुल गाँधी की लापरवाही को पूरी तरह से जिम्मेदार माना जाएगा। 

Tuesday, 9 September 2025

नेपाल की आग से हमारे हाथ झुलसने का खतरा

पड़ोसी देश में होने वाली अशांति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे लिए भी समस्या उत्पन्न कर देती है। आजादी के बाद जब चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा किया तब दलाई लामा सहित हजारों तिब्बती भारत आ गये । अब तो उनकी तीसरी - चौथी पीढ़ी भी यहीं की होकर रह गई। म्यांमार (बर्मा) से भी राजनीतिक अस्थिरता के चलते अवैध रूप से आये प्रवासी उत्तर पूर्वी राज्यों में बसते गए। रोहिंग्या मुसलमानों की बढ़ती संख्या हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। बांग्ला देश से  आये करोड़ों शरणार्थी भी प. बंगाल और असम सहित अनेक उत्तर पूर्वी राज्यों के चुनाव में निर्णायक बन गए हैं। श्रीलंका में तमिल आंदोलन के दौरान गृहयुद्ध के दौर में भी तमिल मूल के हजारों श्रीलंकाई  तमिलनाडु में आ गये । इस प्रकार भारत अवैध रूप से आये विदेशी नागरिकों की सराय बनता चला गया। जनसंख्या असंतुलन का जो मुद्दा रा.स्व.संघ एवं कुछ अन्य राष्ट्रवादी संगठन उठाया करते हैं उसके पीछे घुसपैठिये भी हैं। आम तौर पर घुसपैठिये अपने देश में असामान्य स्थितियां उत्पन्न होने पर ही आते हैं। लेकिन उनके अलावा भी लगातार अवैध रूप से पड़ोसी देशों से लोगों की आवक जारी रहती है। बिहार में  मतदाता सूचियों का सघन  पुनरीक्षण किये जाने के पीछे भी विदेशी नागरिकों द्वारा अवैध रूप से नागरिकता हासिल करना ही है। इस संदर्भ में ताजा खतरा नेपाल में सरकार विरोधी छात्र आंदोलन के कारण राजनीतिक अस्थिरता के कारण पैदा हो गया है। पड़ोसी देशों में श्री लंका के बाद बांग्ला देश में हुए जनांदोलन के कारण सत्ता परिवर्तन हुआ। सत्ता में बैठे नेताओं को देश छोड़कर भागना पड़ा। जनता ने राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास जैसे सुरक्षित स्थानों में घुसकर लूटपाट और तोडफोड़ की वह चौंकाने वाला था। गत दिवस नेपाल में भी ऐसे ही नजारे दिखाई दिये जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे छात्र संसद भवन की दीवार तक पहुँच गए। नेपाल के अंदरूनी हालात अचानक खराब नहीं हुए। जब राजशाही को हटाकर माओवादी सत्ता में आये तब उसमें चीन का हाथ स्पष्ट था किंतु उनके बीच भी सत्ता के लिए टकराहट होने से राजनीतिक अस्थिरता ने इस पहाड़ी देश को घेर लिया । कभी यह एकमात्र हिन्दू देश था किंतु चीन ने रणनीति बनाकर राजतंत्र के विरुद्ध माओवादी आंदोलन के जरिये  अपनी पिट्ठू सरकार बनवाकर भारत और नेपाल के सदियों पुराने संबंधों में दरार उत्पन्न कर दी। हाल ही के वर्षों में सीमा विवाद  सैन्य संघर्ष के कगार तक जा पहुंचा।  भारत ने भी नाकेबंदी करते हुए नेपाल की आपूर्ति रोक दी जिससे वहाँ आर्थिक संकट हो गया। लेकिन इस दौरान भी दोनों देशों के बीच मुक्त आवजाही जारी रही। भारत के व्यापारी बड़ी संख्या में नेपाल में व्यवसाय करते हैं। बीच - बीच में उन पर हमले भी होते रहे। वहीं भारत में बसे नेपालियों की संख्या तो लाखों में हैं। देश के हर हिस्से में नेपाली मिल जाएंगे। यहाँ तक कि सेना में भी उन्हें भर्ती किया जाता है। उ.प्र  और बिहार से गए हजारों परिवार नेपाल की तराई में बसे हुए हैं जिन्हें मधेसी कहा जाता है। इन लोगों के अपने मूल राज्यों में शादी - विवाह के सम्बन्ध आज भी हैं। नेपाल के मूल नागरिक इन्हें दोयम दर्जे का समझते हैं। सत्ता में समुचित भागीदारी के लिए मधेसी समुदाय भी आंदोलन करता रहता है। वर्तमान आंदोलन के मास्टर माइंड के तौर पर काठमांडू के जिस महापौर को जिम्मेदार माना जा  रहा है वह भी मधेसी बताया जाता है। इस आंदोलन के कारण नेपाल में अराजक परिस्थितियाँ बन गई हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घरों में तोडफोड़ के अलावा अतीत में सत्ता में रहे नेताओं के घरों पर भी हमले हो रहे हैं। जिन मंत्रियों ने त्यागपत्र दे दिया उन पर भी गुस्सा उतर रहा है। उल्लेखनीय है हाल ही में नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए भी आंदोलन हुए थे। सरकार विरोधी युवाओं के पीछे पूर्व राजघराने का हाथ होने की आशंका से इंकार नहीं किया  जा सकता। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही। लेकिन सत्ता पर बैठे लोग चूंकि वामपंथी हैं और चीन के इशारे पर भारत से लड़ने का दुस्साहस तक कर बैठते हैं इसलिए चीन की भूमिका पर भी नजर रखनी होगी। लेकिन नेपाल में गृहयुद्ध जैसी इस स्थिति में वहाँ से लोगों का पलायन हुआ हुआ तब भारत के सामने बड़ी समस्या आ खड़ी होगी  जो पहले से ही शरणार्थियों के बोझ से त्रस्त है। सरकार को चाहिए नेपाल के हालात पर पैनी नजर रखे जिससे वहाँ लगी आग में हमारे हाथ न झुलसें। भारत के वामपंथियों की भी निगरानी जरूरी है जिनके नेपाल के माओवादियों से गहरे सम्बन्ध हैं।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 September 2025

ट्रम्प की समझ में आने लगे भारत से पंगा लेने के नुकसान




अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने का अब तक किसी भी महत्वपूर्ण देश ने समर्थन नहीं। किया। ट्रम्प ने रूस से कच्चे तेल की खरीदी बंद करने का जो  दबाव बनाया उसके जवाब में उन्हें साफ शब्दों में बता दिया गया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए  रूस सहित किसी भी देश से कच्चे तेल के सौदे करता रहेगा। ट्रम्प  को इसकी उम्मीद नहीं थी। लिहाजा उन्होंने ये राग अलापना शुरू कर दिया कि भारत की तेल खरीदी के कारण ही रूस यूक्रेन युद्ध को लम्बा खींच रहा है। वे यहाँ तक बोल गए कि यह लड़ाई नरेंद्र मोदी ही लड़ रहे हैं। चीन में हुए एस.सी.ओ सम्मेलन में जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ को अनुचित बताया तो ट्रम्प को अपने विरुद्ध दुनिया के तीन बड़े देशों के साथ आने से चिंता हुई। हालांकि पहले तो उन्होंने कहा कि  श्री मोदी को पुतिन और जिनपिंग के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए किंतु अगले ही दिन वे उनको महान नेता और पुराना दोस्त बताते हुए सम्बन्धों को सुधारने की उम्मीद जताने लगे। अमेरिकी विदेश मंत्री ने भी ऐसा ही बयान जारी किया। इधर श्री मोदी ने भी ट्रम्प के बयान का उसी सौजन्यता से उत्तर दे दिया। इन बयानों से लगा कि रिश्ते सुधरने का रास्ता खुल गया है। लेकिन ट्रम्प के बयानों में कड़वाहट की जगह मिठास की वजह हृदय परिवर्तन न होकर अंतर्राष्ट्रीय दबाव है। उल्लेखनीय है चीन के पहले श्री मोदी  जापान गए थे। जिसके बाद जापान ने ट्रम्प के दबाव को ठुकराते हुए अमेरिकी चावल खरीदने से इंकार कर दिया। इससे उन्हें लगा कि भारत के कारण अमेरिका के निकट सहयोगी भी दूर जाने लगे। इसीलिये ट्रम्प ने जापान पर टैरिफ को 25 से घटाकर 15 फीसदी कर दिया। उनको लगता था कि  भारत भी उनसे ऐसा ही करने का आग्रह करेगा। सं.रा.संघ की वार्षिक आमसभा में श्री मोदी की संभावित न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान उनसे मुलाकात की उम्मीद भी  उन्होंने लगा रखी थी। लेकिन भारत ने  विदेश मंत्री जयशंकर को सं.रा.संघ  महासभा में भेजने का ऐलान कर दिया। स्मरणीय है कैनेडा में हुए जी 7 देशों के सम्मेलन के दौरान भी ट्रम्प ने फोन पर श्री मोदी को अमेरिका आने का  निमंत्रण दिया। लेकिन प्रधानमंत्री ने मना कर दिया क्योंकि उसी समय पाकिस्तान के सेना प्रमुख  मुनीर भी वाॅशिंगटन में थे। ट्रम्प दोनों को साथ बिठाकर शांतिदूत बनना चाहते थे। उनकी चाल भांपकर श्री मोदी  ने वह आमंत्रण ठुकरा दिया। इसके बाद खबर आई कि ट्रम्प ने चार बार फोन लगाया किंतु उन्होंने उठाया ही नहीं जिससे उनकी नाराजगी और बढ़ गई। फिर भी जब भारत नहीं झुका और रूस तथा चीन उसके साथ खड़े हो गए  तब ट्रम्प के कान खड़े हुए। इधर जर्मनी ने भी भारत से व्यापार बढ़ाने की घोषणा कर अमेरिका को बड़ा झटका दे दिया। ट्रम्प को बड़ा धक्का तब लगा जब उनके दोस्त  फिनलैंड के राष्ट्रपति ने भारत के साथ असहयोग से होने वाले नुकसान के प्रति अमेरिका को  आगाह किया। इस प्रकार भारत के प्रति बढ़ते वैश्विक समर्थन ने तो उनकी चिंता बढ़ाई ही उनके पूर्व सुरक्षा सलाहकार ने भी आरोप लगा दिया कि ट्रम्प ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए बीते 25 वर्षों में किये गए प्रयासों पर पानी फेर दिया। उसी के बाद चीन के हाथ भारत को खो देने जैसी टिप्पणी कर चुके ट्रम्प  श्री मोदी के साथ बेहतर तालमेल होने की कहने लगे। सही बात ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर 50 टैरिफ थोपकर अपने पाँव में ही कुल्हाड़ी मार ली। और गलती का एहसास होते ही उन्होंने श्री मोदी को महान प्रधानमंत्री बताते हुए हमेशा उनसे दोस्ती का राग अलापना शुरू कर दिया। टैरिफ विवाद में कूटनीतिक मोर्चे पर भारत ने जो दृढ़ता दिखाई उसके कारण ट्रम्प के गुब्बारे की हवा निकल चुकी है। हालांकि उनका अस्थिर दिमाग कब क्या कर बैठे ये कहना कठिन है किंतु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि वे श्री मोदी की तारीफ करने के बहाने रिश्तों में आई दरार पाटने की कोशिश करने लगे हैं।  उन्हें लगता था कि वे भारत को घुटना टेक करवा लेंगे किंतु उनका दबाव कारगर साबित नहीं हुआ ।  ट्रम्प की चिंता तब और बढ़ी जब  अनेक बड़े  देश भारत के पक्ष में खुलकर सामने आ गए। ये देखते हुए आगामी कुछ दिन काफी महत्वपूर्ण साबित होंगे क्योंकि भारत ने तो अमेरिका को किनारे करते हुए नये विकल्प तलाशने शुरू कर दिये हैं जबकि अमेरिका के पास भारत का कोई विकल्प नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 September 2025

पहाड़ों के बाद मैदानी इलाकों पर भी उतर रहा प्रकृति का गुस्सा


इस वर्ष मानसून की वर्षा ने पहाड़ों पर ही तबाही नहीं मचाई बल्कि मैदानी इलाकों को भी जल प्रलय का एहसास करवा दिया। पंजाब का समूचा ग्रामीण क्षेत्र डूबा हुआ है। हिमाचल प्रदेश , जम्मू - कश्मीर और उत्तराखंड में बादल फटने से आई बाढ़ और पहाड़ों के धसकने की घटनाएं  जिस बड़े पैमाने पर हुईं उससे हुए नुकसान को केवल आर्थिक पैमाने पर नहीं बल्कि प्रकृति और पर्यावरण  संरक्षण के लिहाज से देखना बुद्धिमत्ता होगी। अनेक स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं भी पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते शहरीकरण का दुष्परिणाम है। हालांकि इन प्राकृतिक आपदाओं के मूलभूत कारणों से लोग परिचित हैं किंतु  उन्हें दूर करने के बारे में जो उदासीनता है वह अब आपराधिक लापरवाही का रूप ले चुकी है। इस साल वर्षा के कारण मैदानी इलाकों में भी जिस प्रकार का जल तांडव देखने मिल रहा है वह भविष्य में उत्पन्न होने वाले खतरे का पूर्वाभास है। देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई और सूचना तकनीक के केंद्र बेंगुलूरु में कुछ घंटों की बरसात में ही जल प्लावन का नजारा दिख जाता है।  लेकिन देश की राजधानी दिल्ली भी बीते कुछ दिनों से बाढ़ की विभीषिका झेल रही है। बढ़ती आबादी के कारण दिल्ली के समीप बसे गाजियाबाद, नोएडा, गुडगाँव ,  फरीदाबाद सहित उ.प्र, हरियाणा और राजस्थान के अनेक शहरों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन. सी. आर ) में शामिल कर लिया गया और इनका विकास भी दिल्ली की तर्ज पर महानगरीय शैली में होने लगा। जमीनें महंगी होने से कृषि भूमि  शहरीकरण के शिकंजे में आ गई। खेतों में अट्टालिकाएं तान दी गईं और शॉपिंग माल बनने लगे। नतीजा वही हुआ जिसकी आशंका थी। पानी निकासी के रास्ते या तो रोक दिये गए या संकरे कर दिये गए। इसीलिए जो गलती पहाड़ों में जलप्लावन के लिए जिम्मेदार है वही मैदानी इलाकों में जल प्रलय का कारण बनती जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बीते कुछ दिनों से जो हालात बने हुए हैं उसका  कारण यमुना में आई बाढ़ को बताया जा रहा  है। लेकिन यमुना तो सदियों से बह रही है। सही बात ये है कि यमुना की बाढ़ का पानी जिन खाली क्षेत्रों में भरता रहा उनमें कांक्रीट के जंगल खड़े हो गए। हिमाचल प्रदेश में नदियों के किनारों पर बनाये गये होटल और रिसार्ट इस वर्ष जल प्रलय में अपना अस्तित्व गँवा बैठे। दिल्ली और उसके समीपवर्ती इलाकों को भी यही गलती दंडित कर रही है। बढ़ती आबादी को बसाने के लिए शहरी सीमाओं को बढ़ाने की सोच ऐसी समस्या बन गई जिसका  इलाज किसी के पास नहीं है। समुद्र के किनारे बसे मुंबई में जल भरता है क्योंकि जब सागर की लहरें उफान मारती हैं तो उसका पानी उछाल मारकर जिन खाली क्षेत्रों में भरा करता था उन सभी में इमारतें बन गईं। दिल्ली में देश की सरकार बैठी है किंतु उसके बावजूद भी आपदा प्रबंधन के तमाम संसाधन अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। इस बारे में राजनीति से ऊपर उठकर सोचना जरूरी है। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में घूमकर दिल्ली सरकार पर राहत कार्यों में विफलता का जो आरोप लगाया वह गलत नहीं है । लेकिन अपने दस वर्षीय शासनकाल में आम आदमी पार्टी की सरकार भी मुफ्त बिजली और पानी बाँटकर ही आत्ममुग्ध होती रही। लेकिन दिल्ली में जल प्लावन की समस्या से निपटने के लिए समुचित इंतजाम करने के बजाय आग लगने पर कुआ खोदने की मानसिकता ही कार्यशैली पर हावी बनी रही। ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि शासन - प्रशासन में बैठे लोग चाहे किसी भी विचारधारा से जुड़े हों किंतु   आज में जीने की प्रवृत्ति के चलते दूरदृष्टि का अभाव नजर आता है। चुनाव जीतने के लिए तात्कालिक लाभ देने वाले उपायों को ही सब कुछ मान लिया गया  है।  जल प्लावन पहाड़ों से उतरकर जिस प्रकार अब मैदानी क्षेत्रों में भी तांडव कर रहा है उसे भविष्य के बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। बुद्धिमत्ता इसी में है कि इसके बचाव के प्रति अभी से कार्ययोजना बनाकर समुचित व्यवस्था की जाए। एक दूसरे को कोसने के बजाय सभी को मिलकर प्रयास करना होंगे क्योंकि प्राकृतिक विपदाएं राजनीति नहीं जानतीं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 September 2025

पेट्रोल - डीजल को जीएसटी में लाये बिना सुधार अधूरे


जीएसटी की दरों में बदलाव करने से आम जनता के उपभोग की अधिकांश वस्तुएँ सस्ती होने का रास्ता साफ हो गया। कुछ चीजों पर जीएसटी समाप्त करने की भी जनमानस में अनुकूल प्रतिक्रिया हुई। इस फैसले की लंबे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी। वैसे इन सुधारों को 2021 में ही लागू किये जाने की योजना थी किंतु कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पर जो दबाव आया उसकी वजह से इसमें विलंब हो गया। बहरहाल जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर इस फैसले का स्वागत हो रहा है। आम जनता 22 सितंबर का बेसब्री से इंतजार कर रही है जिस दिन से  नई दरें लागू होंगी। यद्यपि जीएसटी में किये गए इन सुधारों को लेकर भी आलोचनाओं का सिलसिला जारी है किंतु राजनीति से  इतर हटकर देखें तो प्रधानमंत्री ने जन आकांक्षाओं की पूर्ति की दिशा में जो  कदम उठाया उसकी सार्थकता और आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन राहत भरे इस  फैसले के बाद अब पेट्रोल - डीजल की कीमतों में कमी का इंतजार पूरे देश को है। इस बारे में ये स्पष्ट है कि  जीएसटी काउंसिल में शामिल अधिकतर राज्य  पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का विरोध करते रहे क्योंकि इस पर मनमर्जी  टैक्स लगाकर वे अपना खजाना भरते हैं। चूंकि  भारत को अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल का आयात करना होता है इसलिए इसके दाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही तय होते हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में कीमतों में कमी के बावजूद  पेट्रोल -  डीजल की कीमतों  में कोई बदलाव नहीं हुआ। यूक्रेन संकट के बाद भारत ने रूस से बेहद किफ़ायती दामों पर कच्चा तेल खरीदने की बुद्धिमत्ता दिखाई किंतु उसका लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने से आम जनता में रोष है। ये आरोप भी लगता है कि सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भी सस्ते रूसी तेल को पेट्रोल - डीजल में परिवर्तित कर उसका निर्यात करते हुए मोटी कमाई की। ऐसा ही आरोप रिलायंस पर लगता है। सरकारी तेल कंपनियां मौके का लाभ उठाकर कमाई करें इसमें किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन अपने पुराने घाटे का रोना वे कब तक रोएंगी ये बड़ा सवाल है। जहाँ तक बात निजी क्षेत्र की तेल कंपनियों की है तो उनकी सोच विशुद्ध व्यवसायिक होना अपेक्षित  है लेकिन सरकारी क्षेत्र की कंपनियां केवल मुनाफे के पीछे भागती फिरें ये लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के सर्वथा विरुद्ध है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम घाटे में चलें ये भी व्यवहारिक नहीं होता क्योंकि उनके घाटे की भरपाई भी अंततः जनता को ही करनी पड़ती है। लेकिन तेल कंपनियों को यदि भरपूर कमाई हो रही है तो उन्हें पिछले घाटे की भरपाई के साथ - साथ जनता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के अंतर्गत लाकर उन पर राज्य दर राज्य लगने वाले करों में एकरूपता लाई जाए। एक देश एक कर का जो सिद्धांत जीएसटी लागू करते समय प्रचारित किया गया उसके लिए पेट्रोल - डीजल को राज्यों के क्षेत्राधिकार से बाहर निकालना जरूरी हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह कुलांचे भर रही है उसे देखते हुए प्रधानमंत्री को चाहिए वे इस दिशा में भी आगे बढ़ें। इस बारे में  रोचक तथ्य ये है कि पेट्रोल - डीजल की सबसे बड़ी खरीददार सरकार ही है। ऐसे में यदि इन्हें जीएसटी के दायरे में भी ले आया जाए तो सरकार का खर्च भी बचेगा। परिवहन लागत कम होने से महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जीएसटी में जो ताजा सुधार किये गए वे तब तक अधूरे रहेंगे जब तक पेट्रोल - डीजल भी उसके दायरे में नहीं  लाये जाते। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 September 2025

जीएसटी में राहत अर्थव्यवस्था की मज़बूती का प्रमाण


15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  जीएसटी  में सुधार करते हुए जनता को दीपावली उपहार देने का जो वायदा किया था वह  पूरा हो गया। गत दिवस जीएसटी काउंसिल की बैठक में  12 और 28 फीसदी वाली दर खत्म करते हुए केवल 18 और 5 दो दरें तय हो गईं। विलासिता की वस्तुओं के साथ ही  तंबाखू उत्पाद तथा महंगे दो और चार पहिया वाहनों के लिए 40 प्रतिशत की दर निर्धारित की गई। दरों के अलावा अन्य  बदलाव आगामी 22 सितंबर से लागू होंगे । इसी तिथि से शारदेय नवरात्रि के साथ दीपावली सीजन शुरू होने से बाजारों में रौनक आ जाती है। दीपावली के बाद विवाहों का सिलसिला प्रारंभ होता है जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस साल अच्छे मानसून के कारण फसल  भी अच्छी आने की उम्मीद बाजार लगाए बैठा है। जीएसटी दरों में किये गए परिवर्तनों का सीधा असर उपभोक्ता बाजार पर होना सुनिश्चित है। हालांकि इस बारे में  काफी समय से विमर्श चल रहा था। जीएसटी  में हर माह हो रही वृद्धि से सरकार का हौसला भी मजबूत था। लेकिन अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाकर भारतीय उद्योग - व्यापार जगत को जो झटका दिया उससे उबरने के लिए भी ये फैसला लेने में तत्परता दिखाई गई। चूंकि हमारे देश में आर्थिक नीतियों पर चुनावों का दबाव रहता है इसलिए ये कहना भी गलत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दीपावली के बाद होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर जीएसटी सुधार रूपी अस्त्र छोड़ दिया।  सोशल मीडिया पर इस तरह की टिप्पणियां भी देखने मिल रही हैं कि इस फैसले से सरकार ने खुद स्वीकार  कर लिया कि जनता पर जीएसटी का भार ज्यादा था। लोगों को ये आशंका  भी है कि कंपनियां घटे हुए जीएसटी का लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने देंगी और मूल्य बढ़ाकर अपनी तिजोरी भरेंगी। हालांकि ऐसा सोचना निराधार नहीं है किंतु सरकार ने जो राहत दी है उसका स्वागत होना ही चाहिए क्योंकि यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही परिस्थियों में जरूरी हो गई थी। रोजमर्रे की अनेक वस्तुओं को जीएसटी से मुक्त रखना और ज्यादातर को 5 फीसदी के दायरे में ले आना निश्चित तौर पर आम जनता की  क्रय शक्ति को बढ़ायेगा। 28 फीसदी वाली अनेक चीजों पर 18 फीसदी जीएसटी भी उपभोक्ता और उत्पादक दोनों के लिए मददगार होगा। कैंसर सहित जीवन रक्षक अनेक दवाओं के अलावा चिकित्सा सामग्री को 5 प्रतिशत की सूची में लाने का फैसला भी उत्साहजनक है। गत वर्ष परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने स्वास्थ्य बीमा को जीएसटी मुक्त करने संबंधी पत्र लिखकर सार्वजनिक कर दिया था।  उसका संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य के साथ ही जीवन बीमा पर जीएसटी पूरी तरह समाप्त करने का फैसला वाकई संवेदनशीलता की कसौटी पर  खरा है। इसी साल बजट में  आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख करने के अलावा 70 वर्ष की आयु पूरी कर चुके सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख तक कि आयुष्मान भारत योजना का लाभ देकर केंद्र सरकार ने जनकल्याण की दिशा में जो कदम बढ़ाये उसी का विस्तार जीएसटी में किये गए ताजा बदलाव हैं। इनके प्रभावस्वरूप आम उपभोक्ता  को जो  लाभ होगा  वह या तो बचत के रूप में राष्ट्रीय विकास में सहायक होगा या फिर बाजार में आयेगा। अनेक राज्यों ने जीएसटी घटने से राजस्व हानि की आशंका व्यक्त करते हुए केंद्र से मुआवजे की जो मांग रखी वह औचित्यपूर्ण है। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो दाम गिरने  से बढ़ने वाली मांग आने वाले कुछ महीनों बाद जीएसटी की मासिक वसूली के आंकड़े को फिर उसी स्तर पर पहुँचा देगी। यद्यपि सरकार को इस बात के लिए सजग रहना होगा कि कंपनियां कीमतों में वृद्धि कर जनता को इस राहत से वंचित न कर सकें । प्रधानमंत्री मोदी वर्तमान में मजबूत वैश्विक नेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ रूपी दबाव के समक्ष झुकने के बजाय उसका मुस्तैदी से प्रतिकार कर उन्होंने भारत के महाशक्ति बन जाने का परिचय दिया। ट्रम्प द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताकर जो घमंड दिखाया उसका माकूल जवाब है जीएसटी में किया गया बदलाव। वरना कमजोर आर्थिक स्थिति वाला देश जनता को राहत देने का खतरा कतई मोल नहीं लेता।  इस फैसले के पीछे आर्थिक, राजनीतिक या कूटनीतिक जो भी कारण हो किंतु ये जनहित में उठाया गया बहुप्रतीक्षित कदम है जिसके जरिये दुनिया को आर्थिक क्षेत्र में भारत की मजबूती का संदेश दिया गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 September 2025

परिवारवाद को रोकने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का फैसला स्वागतयोग्य


ये कहना गलत नहीं होगा कि म.प्र भाजपा के नये अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल राजनीतिक विरासत के कारण ही इस पद तक पहुँच सके। उनके स्वर्गीय पिता बैतूल से लोकसभा सदस्य रहे। हेमंत वर्तमान में विधायक हैं। पार्टी के संगठन में पर्दे के पीछे काम करते रहने की वजह से उनका नाम अन्य प्रादेशिक नेताओं की अपेक्षा कम चर्चित था। लेकिन उनका चयन जिस प्रकार सर्वसम्मति से हुआ उससे उनकी जमीनी पकड़ उजागर हो गई। पदभार संभालते ही उन्होंने जिस प्रकार प्रदेश के प्रमुख शहरों का दौरा किया उसके बाद से उनके बारे में लोग जानने लगे। अपने सादगी भरे रहन - सहन के साथ ही दिखावे से परहेज जताने वाले श्री खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों को मर्यादा में रहने की नसीहत देकर अपनी कार्यशैली से परिचित करवा  दिया। भिंड के भाजपा विधायक द्वारा वहाँ के जिलाधीश से किये गये दुर्व्यवहार पर भोपाल बुलवाकर उनकी खिंचाई से अन्य सांसदों - विधायकों को संकेत दे दिया गया। इसके साथ ही  भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के नये फैसले ने पार्टी में हलचल मचा दी जिसके अनुसार किसी भी सांसद, विधायक या मंत्री के परिवार से किसी अन्य सदस्य को जिला अथवा प्रदेश कार्यकारिणी में जगह नहीं दी जायेगी। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के बेटे को मऊगंज की जिला कार्यकारिणी में पदाधिकारी बनाया गया था किंतु एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले के ऐलान के बाद उनसे त्यागपत्र ले लिया गया। दरअसल कांग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दलों पर  परिवारवाद का आरोप लगाने वाली भाजपा भी धीरे - धीरे उसी बुराई को अपनाने लगी है। भले ही शीर्ष पदों का उत्तराधिकार परिवार के भीतर  देने की स्थिति अभी नहीं है लेकिन ये बात सौ फीसदी सच है कि चंद अपवादों को छोड़कर अब भाजपा के ज्यादातर नेता पत्नी और बेटे - बेटी  को सत्ता या संगठन के पद पर बिठाने का प्रयास करते हैं ताकि वे  उनके जीते जी उनकी  राजनीतिक विरासत संभालने लगे। इसकी वजह से पार्टी में ईमानदारी से मेहनत करने वाले नेता और कार्यकर्ता दरी - फट्टा उठाते ही रह जाते हैं। चुनावी टिकिट के मामले में भी परिवारवाद ने भाजपा में जगह बना ली है। प्रदेश में जनसंघ के जमाने के जो दिग्गज थे उनमें सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और कैलाश जोशी के राजनीतिक वारिस उन्हीं के भतीजे और बेटे बने। बाबूलाल गौर की सीट उनकी पुत्रवधु के पास है। कैलाश सारंग के पुत्र मंत्री हैं। नारायण कृष्ण शेजवलकर के बेटे महापौर - सांसद बने। ग्वालियर के सिंधिया परिवार के सभी सदस्य महिमामंडित होते रहे। संगठन में भी यही परिपाटी चल पड़ी। वैसे किसी परिवार के सदस्य यदि एक ही पार्टी में सक्रिय हों तो गलत कुछ भी नहीं किंतु राजनीति विचारधारा पर आधारित होती है। इसलिए उसमें पारिवारिक विरासत को प्राथमिकता देना दूरगामी दृष्टि से नुकसानदेह होता है। नेतागण अक्सर ये सफाई देते हैं कि डॉक्टर और वकील का बेटा जब उसी पेशे में आता है तब उस पर आपत्ति नहीं होती तो नेता के परिजनों पर सवाल क्यों उठते हैं ? लेकिन ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि डॉक्टर और वकील बनने के लिए परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी योग्यता साबित करनी होती है। जबकि राजनीति में परीक्षा के पहले ही चयन हो जाता है। उस दृष्टि से श्री खंडेलवाल ने सांसद , विधायकों और मंत्रियों के परिजनों को जिला और प्रदेश कार्यकारिणी से दूर रखने का जो दुस्साहसिक फैसला किया यदि उस पर वे कायम रह सके तो ये बड़ी सफलता होगी। साथ ही इससे पार्टी में उन कार्यकर्ताओं को आगे आने का अवसर मिलेगा जिनके पास पारिवारिक विरासत जैसा कुछ नहीं है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष को एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले को अमल में लाने में पार्टी के स्थापित छत्रपों का विरोध झेलना पड़ सकता है। हो सकता है राष्ट्रीय नेतृत्व उनके निर्णय पर बंदिश लगा दे क्योंकि म.प्र की हवा यदि बाकी राज्यों में भी फैली तो पार्टी के बड़े नेताओं को अपनी संतानों का भविष्य खतरे में दिखने लगेगा। राजनीति में महिलाओं के लिए बढ़ते अवसरों के कारण आजकल बेटी, पत्नी और पुत्रवधू को भी आगे लाने का चलन बढ़ा है। ये भी सच है कि बिना किसी पद के नेतागिरी चमकाना कठिन होता है। बहरहाल म.प्र के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राजनीति में जो नवाचार किया वह स्वागतयोग्य है। लालकृष्ण आडवाणी ने कभी भाजपा को पार्टी विथ डिफरेंस कहा था। लेकिन सत्ता की दौड़ में वह दावा पीछे छूट गया। श्री खंडेलवाल यदि अपने प्रयास में सफल हो गए तो वह कुछ नेताओं के लिए जरूर पीड़ादायक होगा किंतु पार्टी में उससे नये  उत्साह का संचार होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 September 2025

जैसे ट्रम्प वैसे ही घटिया उनके सलाहकार


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी हरकतों के कारण पूरी दुनिया में हंसी के पात्र बन गए हैं । रही - सही कसर उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो पूरी किये दे रहे हैं। गत दिवस नवारो की वह टिप्पणी चर्चा का विषय बनी कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदे जाने से वहाँ के ब्राह्मण मुनाफा  कमा रहे हैं जिसकी कीमत  पूरा देश चुका रहा है।  निश्चित रूप से इस तरह की टिप्पणी कोई मूर्ख ही कर सकता है। आज उनकी एक और प्रतिक्रिया सामने आई जिसमें उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि  नरेंद्र मोदी पुतिन और जिनपिंग जैसे साम्यवादियों के साथ क्यों खड़े हैं जबकि लोकतांत्रिक होने के नाते उन्हें अमेरिका के साथ होना चाहिए। ऐसा लगता है ट्रम्प अब हताश होने लगे हैं, उन्होंने भारत पर दबाव बनाने के लिए जितने भी दाँव चले वे अब तक तो बेअसर ही रहे। हालांकि टैरिफ बढ़ने से भारत द्वारा अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात में कमी आने का खतरा उत्पन्न हो गया है। लेकिन उसके बाद भी प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जिससे लगता कि भारत ट्रम्प  के सामने झुकने तैयार  हो। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के लिए वार्ताओं का सिलसिला रुक - रुककर जारी है। लेकिन चीन में गत दिवस संपन्न एस. सी .ओ सम्मेलन में श्री मोदी की रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग से जो नजदीकी दिखाई दी उसने मानो अमेरिका के जले पर नमक छिड़कने का काम कर दिया। मोदी और पुतिन का एक ही कार में चलना और उस दौरान की गई बातचीत ने अमेरिका को विचलित कर दिया। ये बयान भी अमेरिका की खीझ का प्रमाण है कि भारत द्वारा उस पर लगाए गए टैरिफ कम करना चाहता है किंतु अब बहुत देर हो चुकी जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये सब सुनकर प्रतीत होता है कि  ट्रम्प अपने सलाहकारों से स्तरहीन बातें कहलवाकर भारत को उत्तेजित करना चाहते हैं । लेकिन श्री मोदी ने ट्रम्प और उनके सलाहकारों  को अब तक जुबानी जंग  में हावी होने का कोई मौका ही नहीं दिया।  नवारो ने रूसी तेल की खरीद से भारत के ब्राह्मणों को मुनाफे की जो बात कही वह उनकी मूर्खता का परिचायक बन गई। उन्होंने सोचा होगा कि ऐसा कहकर वे भारत में जातीय भावनाओं को भड़काकर आंतरिक आशांति पैदा करवा देंगे किंतु ज्यादातर ने इसे अनावश्यक और अप्रासंगिक बताते हुए हवा में उड़ा दिया । जहाँ तक बात श्री मोदी के पुतिन और जिनपिंग के साथ खड़े होने की है तो एस. सी. ओ सम्मेलन में ये तीनों ही तो केंद्र बिंदु थे। लिहाजा सम्मेलन पर उनकी छाप स्वाभाविक ही थी। यदि ट्रम्प वहाँ होते तब उनको भी ऐसी ही तवज्जो मिली होती। रही बात रूस और चीन के साम्यवादी होने के कारण भारत को लोकतांत्रिक अमेरिका के नजदीक होने की तो इसके लिए ट्रम्प खुद जिम्मेदार हैं। वरना भारत ने रूस और अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों में जो संतुलन बनाये रखा उसकी पूरी दुनिया कायल है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू होने पर भी भारत का रवैया समझदारी से भरा रहा। इसीलिए उसने न तो रूस का पक्ष लिया और न ही अमेरिकी दबाव में उससे व्यापारिक रिश्ते ही खत्म किये। इसी तरह  चीन को साम्यवादी कहकर भारत को उससे दूर रहने की समझाइश का सवाल है तो अमेरिका को ऐसा कहने का नैतिक  अधिकार ही नहीं है क्योंकि आज चीन आर्थिक प्रगति के जिस शिखर पर विराजमान है उसकी वजह तो अमेरिका सहित उन सभी लोकतंत्रिक और पूंजीवादी देशों द्वारा सस्ते श्रमिकों के लालच में वहाँ किया गया अपार पूंजी निवेश है। यदि अमेरिका को लोकतंत्र से इतना ही लगाव होता तब बजाय चीन के भारत में पूंजी लगाता। ट्रम्प भारत पर तो 50 फीसदी टैरिफ लादकर उससे अपेक्षा कर रहे है कि वह उनके आगे - पीछे मंडराए लेकिन चीन पर टैरिफ बढ़ाने के बाद उन्होंने अपने पाँव पीछे खींच लिए। सही बात ये है कि खुद को अक्लमंद मानने की आपाधापी में ट्रम्प पूरी दुनिया को बेवकूफ समझने की मूर्खता कर बैठे। और ऊपर से नवारो जैसे घटिया सलाहकार रखकर अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 September 2025

मोदी, पुतिन और जिनपिंग तय करेंगे विश्व राजनीति की नई दिशा


चीन में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन (एस. सी.ओ) के सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा  रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर सबसे ज्यादा निगाहें टिकी हुई हैं। चीन तो चूंकि मेजबान है इसलिए  शी जिनपिंग तो केंद्र बिंदु हैं ही। एससीओ  दस देशों का एक यूरेशियाई राजनीतिक , आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संगठन है। इसकी स्थापना 2001 में चीन, रूस , कजाकिस्तान , किर्गिस्तान , ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान द्वारा की गई थी। जून 2017 में भारत और पाकिस्तान के साथ इसका विस्तार आठ देशों तक हो गया।बाद में ईरान और बेलारूस भी शामिल हो गये।  इन सबकी आबादी , जमीन और आर्थिक संसाधनों को मिलाने पर दुनिया की बड़ी शक्ति बन जाती है। मौजूदा वैश्विक हालात में इसका महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिन तीन प्रमुख देशों को अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लिया उनके राष्ट्रप्रमुख सर्वश्री नरेंद्र मोदी, व्लाडीमीर पुतिन और शी जिनपिंग इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। यद्यपि एससीओ का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत  करना है। लेकिन ट्रम्प के सनकीपन से जो परिस्थितियाँ पैदा हो गईं उनकी वजह से रूस, चीन और भारत के नेताओं की उपस्थिति के कारण सम्मेलन में  विषय सूची से हटकर भी बहुत कुछ ऐसा होगा जो अमेरिका के लिए परेशानी का कारण बनेगा। हालांकि श्री मोदी की कल जिनपिंग से जो आपसी बातचीत हुई उसे दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के निपटारे के अलावा व्यापार एवं आवागमन को सुलभ बनाने से जुड़ा प्रचारित किया गया किंतु ट्रम्प के टैरिफ हमले के शिकार दोनों बड़े देशों के शीर्ष नेताओं की अंतरंग वार्ता में टैरिफ संकट पर विमर्श न हुआ हो ये मानना नादानी होगी। इसी तरह आज पुतिन के साथ मोदी जी की बातचीत में यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को रोकने तक सीमित न रहकर अमेरिका द्वारा रूस के साथ ही भारत पर बनाये जा रहे दबाव पर भी विचारों का आदान - प्रदान हुआ  होगा। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले अमेरिका ने भारत और चीन पर रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाया। लेकिन दोनों ने उसे अनसुना कर दिया तब दूसरी बार जीतकर आये डोनॉल्ड ट्रम्प ने दोनों पर टैरिफ रूपी मिसाइलें दाग दीं। ट्रम्प का खुल्लमखुल्ला कहना है कि रूस को भारत और चीन को बेचे गए  कच्चे तेल से जो राशि मिलती है उसी के बल पर वह लंबी लड़ाई लड़ने का साहस जुटा सका। इस प्रकार रूस से व्यापारिक रिश्ते रखने के कारण भारत और चीन पर अमेरिकी टैरिफ का भार आया। ऐसे में तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की एससीओ सम्मेलन में उपस्थिति को महज कूटनीतिक औपचरिकताओं और फोटो सेशन में बांधना उचित नहीं है। वैसे भी कूटनीति में जो दिखाया जाता है उससे अधिक छिपा लिया जाता है। और फिर मोदी, पुतिन तथा जिनपिंग तीनों बेहद अनुभवी और दिग्गज राजनेता हैं जिनकी विश्व राजनीति पर गहरी पकड़ है। हालांकि चीन और भारत के बीच अविश्वास की मौजूदगी से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन वर्तमान हालात में दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त वाला सिद्धांत दोनों को नजदीक आने मजबूर कर रहा है। पुतिन की मौजूदगी में तीनों देशों की जुगलबन्दी किसी नये वैश्विक गठजोड़ को जन्म दे सकता है। स्मरणीय है चीन आने से पूर्व श्री मोदी ने जापान का दौरा किया जो अमेरिका के बेहद करीब होने के बावजूद ट्रम्प के टैरिफ हमले से त्रस्त होकर दूरी बनाने की हिम्मत जुटा सका। जिसकी बानगी के तौर पर उसने अमेरिकी चावल खरीदने के ट्रम्प के दबाव को ठुकराने का साहस दिखा दिया । यद्यपि एससीओ सम्मेलन से भारत - चीन के बीच का सीमा विवाद सुलझ जायेगा और जिनपिंग पाकिस्तान की पीठ से हाथ उठा लेंगे ये सोचना बेमानी है किंतु सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री मोदी की पहले जिनपिंग और आज पुतिन से जो बातचीत हुई उससे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जरूर चिंतित होंगे क्योंकि जिस वैश्विक वातावरण में रूस, चीन और भारत के राष्ट्रप्रमुख एक ही जगह  जमा हैं  वहाँ कोई न कोई बड़ी  रणनीति अमेरिका की दादागिरी खत्म करने  जरूर तैयार होगी। इस बारे में गौरतलब है कि मोदी  , पुतिन और जिनपिंग तीनों अपनी दृढ़ता के लिए जाने जाते हैं। इसलिए ट्रम्प के हरसंभव प्रयास के बाद भी अभी तक तीनों ने झुकने से मना कर दिया है। इसे देखते हुए एससीओ का यह सम्मेलन विश्व राजनीति को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी