Tuesday, 9 September 2025

नेपाल की आग से हमारे हाथ झुलसने का खतरा

पड़ोसी देश में होने वाली अशांति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे लिए भी समस्या उत्पन्न कर देती है। आजादी के बाद जब चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा किया तब दलाई लामा सहित हजारों तिब्बती भारत आ गये । अब तो उनकी तीसरी - चौथी पीढ़ी भी यहीं की होकर रह गई। म्यांमार (बर्मा) से भी राजनीतिक अस्थिरता के चलते अवैध रूप से आये प्रवासी उत्तर पूर्वी राज्यों में बसते गए। रोहिंग्या मुसलमानों की बढ़ती संख्या हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। बांग्ला देश से  आये करोड़ों शरणार्थी भी प. बंगाल और असम सहित अनेक उत्तर पूर्वी राज्यों के चुनाव में निर्णायक बन गए हैं। श्रीलंका में तमिल आंदोलन के दौरान गृहयुद्ध के दौर में भी तमिल मूल के हजारों श्रीलंकाई  तमिलनाडु में आ गये । इस प्रकार भारत अवैध रूप से आये विदेशी नागरिकों की सराय बनता चला गया। जनसंख्या असंतुलन का जो मुद्दा रा.स्व.संघ एवं कुछ अन्य राष्ट्रवादी संगठन उठाया करते हैं उसके पीछे घुसपैठिये भी हैं। आम तौर पर घुसपैठिये अपने देश में असामान्य स्थितियां उत्पन्न होने पर ही आते हैं। लेकिन उनके अलावा भी लगातार अवैध रूप से पड़ोसी देशों से लोगों की आवक जारी रहती है। बिहार में  मतदाता सूचियों का सघन  पुनरीक्षण किये जाने के पीछे भी विदेशी नागरिकों द्वारा अवैध रूप से नागरिकता हासिल करना ही है। इस संदर्भ में ताजा खतरा नेपाल में सरकार विरोधी छात्र आंदोलन के कारण राजनीतिक अस्थिरता के कारण पैदा हो गया है। पड़ोसी देशों में श्री लंका के बाद बांग्ला देश में हुए जनांदोलन के कारण सत्ता परिवर्तन हुआ। सत्ता में बैठे नेताओं को देश छोड़कर भागना पड़ा। जनता ने राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास जैसे सुरक्षित स्थानों में घुसकर लूटपाट और तोडफोड़ की वह चौंकाने वाला था। गत दिवस नेपाल में भी ऐसे ही नजारे दिखाई दिये जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे छात्र संसद भवन की दीवार तक पहुँच गए। नेपाल के अंदरूनी हालात अचानक खराब नहीं हुए। जब राजशाही को हटाकर माओवादी सत्ता में आये तब उसमें चीन का हाथ स्पष्ट था किंतु उनके बीच भी सत्ता के लिए टकराहट होने से राजनीतिक अस्थिरता ने इस पहाड़ी देश को घेर लिया । कभी यह एकमात्र हिन्दू देश था किंतु चीन ने रणनीति बनाकर राजतंत्र के विरुद्ध माओवादी आंदोलन के जरिये  अपनी पिट्ठू सरकार बनवाकर भारत और नेपाल के सदियों पुराने संबंधों में दरार उत्पन्न कर दी। हाल ही के वर्षों में सीमा विवाद  सैन्य संघर्ष के कगार तक जा पहुंचा।  भारत ने भी नाकेबंदी करते हुए नेपाल की आपूर्ति रोक दी जिससे वहाँ आर्थिक संकट हो गया। लेकिन इस दौरान भी दोनों देशों के बीच मुक्त आवजाही जारी रही। भारत के व्यापारी बड़ी संख्या में नेपाल में व्यवसाय करते हैं। बीच - बीच में उन पर हमले भी होते रहे। वहीं भारत में बसे नेपालियों की संख्या तो लाखों में हैं। देश के हर हिस्से में नेपाली मिल जाएंगे। यहाँ तक कि सेना में भी उन्हें भर्ती किया जाता है। उ.प्र  और बिहार से गए हजारों परिवार नेपाल की तराई में बसे हुए हैं जिन्हें मधेसी कहा जाता है। इन लोगों के अपने मूल राज्यों में शादी - विवाह के सम्बन्ध आज भी हैं। नेपाल के मूल नागरिक इन्हें दोयम दर्जे का समझते हैं। सत्ता में समुचित भागीदारी के लिए मधेसी समुदाय भी आंदोलन करता रहता है। वर्तमान आंदोलन के मास्टर माइंड के तौर पर काठमांडू के जिस महापौर को जिम्मेदार माना जा  रहा है वह भी मधेसी बताया जाता है। इस आंदोलन के कारण नेपाल में अराजक परिस्थितियाँ बन गई हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घरों में तोडफोड़ के अलावा अतीत में सत्ता में रहे नेताओं के घरों पर भी हमले हो रहे हैं। जिन मंत्रियों ने त्यागपत्र दे दिया उन पर भी गुस्सा उतर रहा है। उल्लेखनीय है हाल ही में नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए भी आंदोलन हुए थे। सरकार विरोधी युवाओं के पीछे पूर्व राजघराने का हाथ होने की आशंका से इंकार नहीं किया  जा सकता। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही। लेकिन सत्ता पर बैठे लोग चूंकि वामपंथी हैं और चीन के इशारे पर भारत से लड़ने का दुस्साहस तक कर बैठते हैं इसलिए चीन की भूमिका पर भी नजर रखनी होगी। लेकिन नेपाल में गृहयुद्ध जैसी इस स्थिति में वहाँ से लोगों का पलायन हुआ हुआ तब भारत के सामने बड़ी समस्या आ खड़ी होगी  जो पहले से ही शरणार्थियों के बोझ से त्रस्त है। सरकार को चाहिए नेपाल के हालात पर पैनी नजर रखे जिससे वहाँ लगी आग में हमारे हाथ न झुलसें। भारत के वामपंथियों की भी निगरानी जरूरी है जिनके नेपाल के माओवादियों से गहरे सम्बन्ध हैं।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

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