Wednesday, 3 September 2025

परिवारवाद को रोकने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का फैसला स्वागतयोग्य


ये कहना गलत नहीं होगा कि म.प्र भाजपा के नये अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल राजनीतिक विरासत के कारण ही इस पद तक पहुँच सके। उनके स्वर्गीय पिता बैतूल से लोकसभा सदस्य रहे। हेमंत वर्तमान में विधायक हैं। पार्टी के संगठन में पर्दे के पीछे काम करते रहने की वजह से उनका नाम अन्य प्रादेशिक नेताओं की अपेक्षा कम चर्चित था। लेकिन उनका चयन जिस प्रकार सर्वसम्मति से हुआ उससे उनकी जमीनी पकड़ उजागर हो गई। पदभार संभालते ही उन्होंने जिस प्रकार प्रदेश के प्रमुख शहरों का दौरा किया उसके बाद से उनके बारे में लोग जानने लगे। अपने सादगी भरे रहन - सहन के साथ ही दिखावे से परहेज जताने वाले श्री खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों को मर्यादा में रहने की नसीहत देकर अपनी कार्यशैली से परिचित करवा  दिया। भिंड के भाजपा विधायक द्वारा वहाँ के जिलाधीश से किये गये दुर्व्यवहार पर भोपाल बुलवाकर उनकी खिंचाई से अन्य सांसदों - विधायकों को संकेत दे दिया गया। इसके साथ ही  भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के नये फैसले ने पार्टी में हलचल मचा दी जिसके अनुसार किसी भी सांसद, विधायक या मंत्री के परिवार से किसी अन्य सदस्य को जिला अथवा प्रदेश कार्यकारिणी में जगह नहीं दी जायेगी। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के बेटे को मऊगंज की जिला कार्यकारिणी में पदाधिकारी बनाया गया था किंतु एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले के ऐलान के बाद उनसे त्यागपत्र ले लिया गया। दरअसल कांग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दलों पर  परिवारवाद का आरोप लगाने वाली भाजपा भी धीरे - धीरे उसी बुराई को अपनाने लगी है। भले ही शीर्ष पदों का उत्तराधिकार परिवार के भीतर  देने की स्थिति अभी नहीं है लेकिन ये बात सौ फीसदी सच है कि चंद अपवादों को छोड़कर अब भाजपा के ज्यादातर नेता पत्नी और बेटे - बेटी  को सत्ता या संगठन के पद पर बिठाने का प्रयास करते हैं ताकि वे  उनके जीते जी उनकी  राजनीतिक विरासत संभालने लगे। इसकी वजह से पार्टी में ईमानदारी से मेहनत करने वाले नेता और कार्यकर्ता दरी - फट्टा उठाते ही रह जाते हैं। चुनावी टिकिट के मामले में भी परिवारवाद ने भाजपा में जगह बना ली है। प्रदेश में जनसंघ के जमाने के जो दिग्गज थे उनमें सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और कैलाश जोशी के राजनीतिक वारिस उन्हीं के भतीजे और बेटे बने। बाबूलाल गौर की सीट उनकी पुत्रवधु के पास है। कैलाश सारंग के पुत्र मंत्री हैं। नारायण कृष्ण शेजवलकर के बेटे महापौर - सांसद बने। ग्वालियर के सिंधिया परिवार के सभी सदस्य महिमामंडित होते रहे। संगठन में भी यही परिपाटी चल पड़ी। वैसे किसी परिवार के सदस्य यदि एक ही पार्टी में सक्रिय हों तो गलत कुछ भी नहीं किंतु राजनीति विचारधारा पर आधारित होती है। इसलिए उसमें पारिवारिक विरासत को प्राथमिकता देना दूरगामी दृष्टि से नुकसानदेह होता है। नेतागण अक्सर ये सफाई देते हैं कि डॉक्टर और वकील का बेटा जब उसी पेशे में आता है तब उस पर आपत्ति नहीं होती तो नेता के परिजनों पर सवाल क्यों उठते हैं ? लेकिन ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि डॉक्टर और वकील बनने के लिए परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी योग्यता साबित करनी होती है। जबकि राजनीति में परीक्षा के पहले ही चयन हो जाता है। उस दृष्टि से श्री खंडेलवाल ने सांसद , विधायकों और मंत्रियों के परिजनों को जिला और प्रदेश कार्यकारिणी से दूर रखने का जो दुस्साहसिक फैसला किया यदि उस पर वे कायम रह सके तो ये बड़ी सफलता होगी। साथ ही इससे पार्टी में उन कार्यकर्ताओं को आगे आने का अवसर मिलेगा जिनके पास पारिवारिक विरासत जैसा कुछ नहीं है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष को एक परिवार - एक पद के फॉर्मूले को अमल में लाने में पार्टी के स्थापित छत्रपों का विरोध झेलना पड़ सकता है। हो सकता है राष्ट्रीय नेतृत्व उनके निर्णय पर बंदिश लगा दे क्योंकि म.प्र की हवा यदि बाकी राज्यों में भी फैली तो पार्टी के बड़े नेताओं को अपनी संतानों का भविष्य खतरे में दिखने लगेगा। राजनीति में महिलाओं के लिए बढ़ते अवसरों के कारण आजकल बेटी, पत्नी और पुत्रवधू को भी आगे लाने का चलन बढ़ा है। ये भी सच है कि बिना किसी पद के नेतागिरी चमकाना कठिन होता है। बहरहाल म.प्र के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राजनीति में जो नवाचार किया वह स्वागतयोग्य है। लालकृष्ण आडवाणी ने कभी भाजपा को पार्टी विथ डिफरेंस कहा था। लेकिन सत्ता की दौड़ में वह दावा पीछे छूट गया। श्री खंडेलवाल यदि अपने प्रयास में सफल हो गए तो वह कुछ नेताओं के लिए जरूर पीड़ादायक होगा किंतु पार्टी में उससे नये  उत्साह का संचार होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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