Friday, 26 September 2025

मुआवजे से मौत का मातम कम नहीं किया जा सकता


नवरात्रि का पर्व भारत में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा - आराधना से समूचा वातावरण धर्ममय हो जाता है। जिस तरह महाराष्ट्र से शुरू होकर सार्वजनिक गणेशोत्सव देश भर में फैल गया उसी तरह बंगाल की तरह ही दुर्गा पूजा भी भव्य रूप में देश के बड़े हिस्से में आयोजित होती है। देवी प्रतिमाओं के पंडाल जन आकर्षण का केन्द्र बनते हैं। उनकी साज - सज्जा पर काफी खर्च होता है। झांकियां लगाई जाती हैं। देवी जागरण जैसे आयोजन भी होने लगे हैं। बीते कुछ दशकों से दुर्गा पूजा के साथ ही नवरात्रि पर गरबा के आयोजनों की धूम रहती है। आम जनता सपरिवार दुर्गा प्रतिमाओं के दर्शन हेतु निकलती है जिससे यह पर्व विराट रूप ले लेता है। लेकिन इस दौरान कुछ हादसे ऐसे हो जाते हैं जो हर्षोल्लास के वातावरण को शोक में बदल देते हैं। म.प्र के जबलपुर नगर में भी बीते  दिनों दुर्गा पंडालों में बिजली के करेंट से तीन लोग जान से हाथ धो बैठे जिनमें दो मासूम बच्चे भी थे।  कटे और खुले हुए  तारों के कारण पंडाल में लगे लोहे के खम्बे में करेंट प्रवाहित हो गया जिसे छूने वाले दो बच्चे और एक अन्य व्यक्ति मौत का शिकार हो गया। जाँच में बिजली विभाग ने पंडाल लगाने वाले पर अवैध कनेक्शन लेकर बिजली चोरी का आरोप लगा दिया।  हालांकि आयोजकों  द्वारा  अस्थायी कनेक्शन लेने का दावा भी किया जा रहा है किंतु वह केवल रस्म अदायगी थी और चोरी की बिजली से पंडाल रोशन था। जिस बिजली ठेकेदार अथवा डेकोरेटर ने उक्त पंडालों में विद्युत साज - सज्जा की उसकी  लापरवाही  तीन मानवीय ज़िंदगी निगल गई। उसके बाद बिजली महकमा जागा। दो दर्जन जाँच दल गठित कर दिये गए जो शहर भर के दुर्गा पंडालों में जाकर देखेंगे कि जो बिजली फ़िटिंग हुई वह नियमानुसार और सुरक्षा मानकों के अनुरूप है अथवा नहीं? दोषपूर्ण होने पर सम्बंधित ठेकेदार को उसे दुरुस्त करने कहा जायेगा अन्यथा बिजली काट दी जाएगी। सवाल ये उठता है कि ये कवायद पंडाल बनते ही क्यों नहीं की गई ?  सार्वजनिक आयोजनों में चोरी की बिजली का इस्तेमाल हमारे देश में आम बात है। पुलिस - प्रशासन, बिजली विभाग सहित क्षेत्रीय नेताओं को भी इसकी जानकारी होती है। लेकिन उससे बड़ा अपराध है घटिया  बिजली फ़िटिंग । जिस ठेकेदार अथवा डेकोरेटर के जिम्मे वह काम होता है वह तारों की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखता। उनके जोड़ खुले रहते हैं। पहले पंडालों में बाँस और बल्लियों का उपयोग होने से करेंट फैलने की संभावना कम होती थी किंतु आजकल लोहे के ढांचे खड़े होने से उसका खतरा बढ़ गया  है।  साथ ही प्लास्टिक  और थर्मोकोल भी काफी उपयोग होने लगा है जो बेहद ज्वलनशील होते हैं। समय - समय पर ऐसे आयोजनों में घटिया बिजली फ़िटिंग के कारण अग्निकांड के समाचार आते हैं जिनमें धनहानि के साथ ही जनहानि भी होती है। दुर्भाग्य से जिन  विभागों पर ऐसी अनियमितताओं को रोकने की जिम्मेदारी है वे दुर्घटना होने के बाद ही मुस्तैदी दिखाते हैं। जबलपुर की उक्त घटनाओं, को ही लें तो बिजली विभाग के लोगों ने जिन पंडालों को अस्थायी कनेक्शन दिये उनमें हुई बिजली फिटिंग की जांच क्यों नहीं की, इसका उत्तर मिलना चाहिए। जिला प्रशासन का भी दायित्व है कि जिन दुर्गा समितियों को पंडाल लगाने हेतु अनुमति दी गई उनके द्वारा अस्थायी कनेक्शन संबंधी जानकारी लेता जिससे चोरी की बिजली जलाने वाले पकड़े जाते। कुल मिलाकर इन छोटी सी कही जाने वाली घटनाओं का कारण महज लापरवाही ही है जिसमें आयोजक, ठेकेदार, बिजली विभाग और प्रशासन सभी की भूमिका है। साधारण दुर्घटना होती तब वह छोटी सी खबर मानकर भुला दी जाती। लेकिन तीन इंसानों की जान लेने वाली इस लापरवाही को कागजी जांच में उलझाकर उपेक्षित कर देना गंभीर अपराध है जिसके  सभी जिम्मेदारों को दंडित किया जाना चाहिए। साथ ही ऐसे हादसे आगे न हों इसके बारे में पूरी सतर्कता का पुख्ता इंतजाम जरूरी है क्योंकि दो - चार लाख रु. के  मुआवजे से मौत का मातम कम नहीं किया जा सकता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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