Tuesday, 2 September 2025

जैसे ट्रम्प वैसे ही घटिया उनके सलाहकार


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी हरकतों के कारण पूरी दुनिया में हंसी के पात्र बन गए हैं । रही - सही कसर उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो पूरी किये दे रहे हैं। गत दिवस नवारो की वह टिप्पणी चर्चा का विषय बनी कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदे जाने से वहाँ के ब्राह्मण मुनाफा  कमा रहे हैं जिसकी कीमत  पूरा देश चुका रहा है।  निश्चित रूप से इस तरह की टिप्पणी कोई मूर्ख ही कर सकता है। आज उनकी एक और प्रतिक्रिया सामने आई जिसमें उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि  नरेंद्र मोदी पुतिन और जिनपिंग जैसे साम्यवादियों के साथ क्यों खड़े हैं जबकि लोकतांत्रिक होने के नाते उन्हें अमेरिका के साथ होना चाहिए। ऐसा लगता है ट्रम्प अब हताश होने लगे हैं, उन्होंने भारत पर दबाव बनाने के लिए जितने भी दाँव चले वे अब तक तो बेअसर ही रहे। हालांकि टैरिफ बढ़ने से भारत द्वारा अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात में कमी आने का खतरा उत्पन्न हो गया है। लेकिन उसके बाद भी प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जिससे लगता कि भारत ट्रम्प  के सामने झुकने तैयार  हो। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के लिए वार्ताओं का सिलसिला रुक - रुककर जारी है। लेकिन चीन में गत दिवस संपन्न एस. सी .ओ सम्मेलन में श्री मोदी की रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग से जो नजदीकी दिखाई दी उसने मानो अमेरिका के जले पर नमक छिड़कने का काम कर दिया। मोदी और पुतिन का एक ही कार में चलना और उस दौरान की गई बातचीत ने अमेरिका को विचलित कर दिया। ये बयान भी अमेरिका की खीझ का प्रमाण है कि भारत द्वारा उस पर लगाए गए टैरिफ कम करना चाहता है किंतु अब बहुत देर हो चुकी जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये सब सुनकर प्रतीत होता है कि  ट्रम्प अपने सलाहकारों से स्तरहीन बातें कहलवाकर भारत को उत्तेजित करना चाहते हैं । लेकिन श्री मोदी ने ट्रम्प और उनके सलाहकारों  को अब तक जुबानी जंग  में हावी होने का कोई मौका ही नहीं दिया।  नवारो ने रूसी तेल की खरीद से भारत के ब्राह्मणों को मुनाफे की जो बात कही वह उनकी मूर्खता का परिचायक बन गई। उन्होंने सोचा होगा कि ऐसा कहकर वे भारत में जातीय भावनाओं को भड़काकर आंतरिक आशांति पैदा करवा देंगे किंतु ज्यादातर ने इसे अनावश्यक और अप्रासंगिक बताते हुए हवा में उड़ा दिया । जहाँ तक बात श्री मोदी के पुतिन और जिनपिंग के साथ खड़े होने की है तो एस. सी. ओ सम्मेलन में ये तीनों ही तो केंद्र बिंदु थे। लिहाजा सम्मेलन पर उनकी छाप स्वाभाविक ही थी। यदि ट्रम्प वहाँ होते तब उनको भी ऐसी ही तवज्जो मिली होती। रही बात रूस और चीन के साम्यवादी होने के कारण भारत को लोकतांत्रिक अमेरिका के नजदीक होने की तो इसके लिए ट्रम्प खुद जिम्मेदार हैं। वरना भारत ने रूस और अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों में जो संतुलन बनाये रखा उसकी पूरी दुनिया कायल है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू होने पर भी भारत का रवैया समझदारी से भरा रहा। इसीलिए उसने न तो रूस का पक्ष लिया और न ही अमेरिकी दबाव में उससे व्यापारिक रिश्ते ही खत्म किये। इसी तरह  चीन को साम्यवादी कहकर भारत को उससे दूर रहने की समझाइश का सवाल है तो अमेरिका को ऐसा कहने का नैतिक  अधिकार ही नहीं है क्योंकि आज चीन आर्थिक प्रगति के जिस शिखर पर विराजमान है उसकी वजह तो अमेरिका सहित उन सभी लोकतंत्रिक और पूंजीवादी देशों द्वारा सस्ते श्रमिकों के लालच में वहाँ किया गया अपार पूंजी निवेश है। यदि अमेरिका को लोकतंत्र से इतना ही लगाव होता तब बजाय चीन के भारत में पूंजी लगाता। ट्रम्प भारत पर तो 50 फीसदी टैरिफ लादकर उससे अपेक्षा कर रहे है कि वह उनके आगे - पीछे मंडराए लेकिन चीन पर टैरिफ बढ़ाने के बाद उन्होंने अपने पाँव पीछे खींच लिए। सही बात ये है कि खुद को अक्लमंद मानने की आपाधापी में ट्रम्प पूरी दुनिया को बेवकूफ समझने की मूर्खता कर बैठे। और ऊपर से नवारो जैसे घटिया सलाहकार रखकर अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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