Saturday, 20 September 2025

चंदे के धंधे ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की भीड़

सभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और चुनाव आयोग के बीच चल रही रस्साकशी के बीच खबर आई कि आयोग ने बीते 2 महीनों में 800 से अधिक  गैर मान्यता प्राप्त  राजनीतिक दलों को सूची से बाहर कर दिया। इस कार्रवाई का कारण इन दलों द्वारा 2019 के बाद से 6 वर्षों तक कोई चुनाव नहीं लड़ना है जो पंजीकृत होने की एक शर्त है। इसी के साथ आयोग लगभग 350 ऐसे दलों को नोटिस देने जा रहा है जिन्होंने उक्त अवधि में चुनाव तो लड़े किंतु 2021 - 22 से 2023 - 24 तक चुनाव खर्च का विवरण जमा नहीं करवाया। स्मरणीय है कुछ दिन पूर्व इस खबर ने सनसनी मचा दी थी कि गुजरात में 10 राजनीतिक दलों को पाँच  सालों में 4300 करोड़ का चंदा प्राप्त हुआ। चौंकाने वाली बात ये रही कि आयोग को उनकी ओर से दिये गये हिसाब में चुनाव खर्च 39 लाख दिखाया गया जबकि उनकी अपनी ऑडिट रिपोर्ट में कई गुना चुनाव खर्च दर्शाया गया ।  इन दलों को जिनकी कोई पहचान नहीं थी, लगभग दो दर्जन राज्यों से चंदा मिला। सच तो ये है कि कागजों पर सक्रिय ये दल काले धन को सफेद करने के कारोबार में लिप्त हैं। हमारे देश में सभी राजनीतिक दलों का संचालन चंदे की राशि से होता है। पहले उन पर अपनी आय - व्यय का ब्यौरा चुनाव आयोग को देने का नियम नहीं था। लेकिन अब उनको मिले चंदे और चुनावी व्यय का लेखा - जोखा निर्धारित अवधि में आयोग को देना अनिवार्य है। अन्यथा  मान्यता समाप्त हो सकती है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल की मान्यता वाली  पार्टियों के बारे में तो काफी कुछ सामने आ भी जाता है। लेकिन जिन पार्टियों को पाँच वर्षों के दौरान 4300 करोड़ की राशि चंदे के तौर पर मिली उनके बारे में गुजरात  तो क्या दो - चार जिलों के लोग भी नहीं जानते होंगे। ऐसे दलों को 20 से अधिक राज्यों से आर्थिक सहयोग मिलना रहस्यमय है। चुनाव आयोग ने जिन निष्क्रिय दलों को सूची से बाहर किया उनके हिसाब - किताब की जाँच भी हो जाए तो  चौंकाने वाली बातें सामने आये बिना नहीं रहेंगी। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में काले धन की मात्रा का खुलासा भले न हो किंतु वह  बहुत ज्यादा होती है ये साधारण व्यक्ति भी बता देगा। इसीलिये कुकुरमुत्तों के रूप में हजारों पार्टियां पंजीकृत हो गईं। चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने के बजाय कागजों पर जीवित रहने वाले सैकड़ों दलों का पंजीकरण समाप्त कर सराहनीय कार्य किया है । जिन दलों ने बीते कई वर्षों  से अपना हिसाब - किताब जमा नहीं किया उन्हें सूची से बाहर किया जाना न्यायोचित होने के साथ ही  राजनीतिक दलों की भीड़ कम करने में सहायक होगा। बिहार में इन दिनों  चुनावी रणनीतिकार रहे  प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी काफी चर्चाओं में है। श्री किशोर का कहना है कि उनकी पार्टी को मिलने वाला चंदा चैक से लिया जाता है। लेकिन  उन्हें कुछ ऐसी  कंपनियों से चंदा मिलना बताया जा रहा है  जो घाटे में चल रही हैं। सौ फीसदी पारदर्शिता का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ने भी शुरुआत में काफी साफ - सुथरी राजनीति का उदाहरण पेश किया किंतु ज्योंही  राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए पाँव फैलाये उसका दामन भी दागदार होने लगा। दरअसल चंदे का धंधा और राजनीति का साथ चोली - दामन जैसा बन गया है। इससे प्रेरित होकर ही कुछ लोगों ने राजनीतिक पार्टी बनाने का व्यवसाय शुरू कर दिया जिससे वे अपने काले धन को सफेद में बदल सकें। इसके अलावा जिन लोगों से चंदा लेना दर्शाया जाता  है उन्हें कुछ राशि काटकर वापस कर दी जाती है। इस तरह चंदा लेने वाले का काला धन सफेद हो जाता है और देने वाला उस राशि को खर्च दिखाकर आयकर चोरी कर लेता है। कुल मिलाकर कहानी यही है कि राजनीतिक दलों की जो भीड़  है उसके पीछे कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर चंदे का धंधा ही है। जिन दलों ने पाँच वर्षों में चुनाव नहीं लड़ा वे सही मायनों में  काले को सफेद करने का माध्यम हैं। उनको सूची से निकाल बाहर करने का कदम पूरी तरह स्वागतयोग्य है। लेकिन उन चंदा देने वालों से भी पूछताछ की जानी चाहिए जिन्होंने उनकी तिजोरी भरी। देश में अनेक क्षेत्रीय दलों के बारे में ये सुनाई देता है कि वे उम्मीदवार बनाने के लिए मोटी रकम वसूलते हैं। राज्यसभा की टिकिट की नीलामी भी चर्चाओं में रही है। अनिल अंबानी और विजय माल्या का उच्च सदन में पहुंचना खरीद - फरोख्त का ही परिणाम था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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