खिरकार सुशीला कार्की नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री बन गईं। पहली महिला प्रधानमंत्री बनने के अलावा वे पहली महिला मुख्य न्यायाधीश भी रह चुकी हैं। उनका नाम एक बार सुर्खियों में आने के बाद पीछे चला गया था क्योंकि वे भारत समर्थक मानी जाती हैं। लेकिन अन्य नामों पर आम सहमति नहीं बनने की वजह से अंततः फैसला उनके पक्ष में हुआ और कल रात ही उन्होंने अकेले ही शपथ भी ले ली। मंत्रियों का चयन बाद में होगा। दरअसल सत्ता परिवर्तन के आंदोलन में शामिल विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि अंतरिम प्रधानमंत्री के नाम पर एकमत नहीं थे। लेकिन राजतंत्र की वापसी की आशंका के कारण श्रीमती कार्की के नाम पर रजामंद हो गए। वे इस बात से भी परेशान थे कि माओवादी सरकार के प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों ने तो त्यागपत्र दे दिये थे किंतु राष्ट्रपति ने न तो त्यागपत्र दिया और न ही संसद भंग की । चर्चा है कि शपथ लेने के पहले श्रीमती कार्की ने संसद भंग करने की शर्त रख दी थी। उनके दबाव में आख़िरकार राष्ट्रपति को संसद भंग कर नये चुनाव का रास्ता साफ करना पड़ा। श्रीमती कार्की के लिए लिए अपनी सरकार में मंत्रियों का चयन करना भी आसान नहीं होगा। दरअसल ओली सरकार के विरुद्ध आंदोलन गैर राजनीतिक होने से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सरकार में हिस्सा देना संभव नहीं है। अपदस्थ प्रधानमंत्री ओली के अलावा अन्य बड़े दल संसद भंग करने का विरोध कर रहे थे क्योंकि मौजूदा वातावरण में उनका जीतकर आना कठिन है। यदि सेना ने न बचाया होता तो बड़ी बात नहीं ओली के साथ ही अन्य माओवादी नेता भी हिंसा की चपेट में आ जाते। सच तो ये है कि इस आंदोलन का चूंकि कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। बीते दिनों जो हिंसा हुई उसमें कुछ ऐसी शक्तियों का हाथ बताया जा रहा है जिनका आंदोलन से कोई संबंध ही नहीं रहा। माना जाता है कि अल्पसंख्यक गुटों के अलावा असामाजिक तत्वों ने मौके का लाभ लेते हुए अपने मकसद पूरे कर लिए। भारतीय मूल के व्यापारियों के प्रतिष्ठानों को चुन - चुनकर निशाना बनाये जाने से भी कई सवाल खड़े हो गए हैं। इन हालातों में श्रीमती कार्की के लिए चुनाव करवाना आसान नहीं होगा। बड़ी बात नहीं नेपाल को भी बांग्ला देश की तरह लंबे समय तक अंतरिम व्यवस्था से काम चलाना पड़े। चूंकि युवाओं की अपेक्षाओं का पहाड़ भी बहुत बड़ा है जिनके पूरे नहीं होने पर वे फिर सड़कों पर उतर सकते हैं। और भले ही माओवादी सरकार का तख्ता पलट दिया गया हो किंतु चीन अपनी जड़ें इतनी आसानी से उखड़ने नहीं देगा। राष्ट्रपति के रूप में अभी भी उसका वफादार ही सत्ता के शिखर पर है। उन्होंने संसद भले ही भंग कर दी किंतु संविधान अभी भी जारी है। माओवादी नेताओं को सेना लंबे समय अपने संरक्षण में रख सकेगी ये भी नहीं लगता। तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि नेपाल में हुई उठापटक के पीछे जिस अमेरिका का हाथ माना जा रहा है वह माओवादियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए पूरी ताकत लगा देगा। इन दो महाशक्तियों के निहित स्वार्थों की टकराहट में देश के दूसरे अफगानिस्तान बनने का खतरा भी बढ़ गया है। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि माओवादियों द्वारा सत्ता से हटा दिया गये राजघराने की भूमिका बदली हुई स्थितियों में क्या रहेगी? कुछ माह पूर्व राजतंत्र की वापसी के साथ ही नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के लिए आंदोलन हुआ था जिसे ओली सरकार ने कुचल तो दिया किंतु माओवादी सत्ता के हटते ही राजतंत्र और हिन्दू राष्ट्र की वापसी फिर चर्चा में आ गई। ये भी कहा जा रहा है कि अंतरिम सरकार बनने के बाद नये चुनाव के पहले अमेरिका खुलकर सामने आयेगा और बड़ी बात नहीं वह राजशाही की पुनर्स्थापना का रास्ता साफ करे। दरअसल अफगानिस्तान से डेरा उठ जाने के बाद से अमेरिका को नेपाल में अपने लिए अनुकूलता दिख रही है। जहाँ से वह चीन और भारत दोनों के सिर पर बैठने में सफल हो जाएगा जो उसके लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। इन सबके कारण नेपाल में जल्द राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद करना व्यर्थ है क्योंकि युवा आंदोलन के चेहरे भले ही स्थानीय हों किंतु उनकी लगाम देश के बाहर है। राजशाही के पतन के बाद माओवादियों की सत्ता का रिमोट चीन में था। अमेरिका चाहेगा कि वह स्थिति न लौटे और नई सत्ता उसके प्रभाव में रहे। आने वाले कुछ महीने समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए उथलपुथल भरे होंगे। भारत के लिए चिंता का विषय ये है कि नेपाल चाहे चीन के नियंत्रण में रहे अथवा अमेरिका के इशारों पर चले दोनों स्थितियाँ हमारे लिए हानिकारक हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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