लद्दाख की राजधानी लेह में हुई हिंसा के बाद पूर्ण राज्य सहित अन्य मांगों के लिए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सोनम वांगचुक को गत दिवस राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया। वे कल दोपहर 2.30 बजे एक पत्रकार वार्ता करने वाले थे किंतु उसके पूर्व ही उनकी गिरफ्तारी हो गई। लद्दाख़ में बीते तीन दिन से कर्फ्यू लगा हुआ है साथ ही इंटरनेट सेवाएं भी बंद है। स्मरणीय है आंदोलन के हिंसक होने के बाद बजाय हिंसा करने वालों को रोकने के वांगचुक लेह छोड़कर अपने गाँव जाकर बैठ गए। हालांकि उन्होंने हिंसा की निंदा करते हुए ये सफाई भी दी कि जिन लोगों ने लेह में उपद्रव मचाया वे उनके लिए अनजान थे। ऐसा कहने के पीछे उनका उद्देश्य अपने आप को दूध का धुला साबित करना था किंतु लगे हाथ वे ये धमकी देने से बाज नहीं आये कि उनकी गिरफ्तारी हुई तो हालात और बिगड़ेंगे। इस समूचे घटनाक्रम का कारण केन्द्र सरकार द्वारा आंदोलनकारियों से बातचीत हेतु 6 अक्टूबर की तारीख तय करना बताया जा रहा है किंतु इस तथ्य पर पर्दा डाल दिया गया कि सरकार 26 सितंबर को ही बातचीत करने तैयार हो गई थी। इसके बाद भी अचानक हिंसा और आगजनी से साफ हो गया कि कुछ लोग नहीं चाहते थे कि शांतिपूर्ण समाधान निकले। सबसे बड़ी बात ये है कि इस विवाद में वे ताकतें बिना देर किये कूद पड़ीं जिन्हें आंदोलनजीवी कहा जाता है। जेएनयू, अलीगढ़ , जादवपुर और उस्मानिया विवि, किसान आंदोलन, शाहीन बाग जैसे आंदोलनों का समर्थन करने वाला तबका जिस तत्परता से वांगचुक के पक्ष में मुखर हुआ वह देखकर कहा जा सकता है कि लेह में जो कुछ भी हुआ उसकी पटकथा पहले से तैयार थी। नेपाल में युवाओं द्वारा हिंसा के जोर पर किये सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में तमाम विपक्षी नेताओं सहित आंदोलनजीवियों के समूहों द्वारा भारत में भी वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी। वांगचुक ने भी नेपाल के जेन जी आंदोलन का जिक्र करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को चुनौती देने का दुस्साहस किया किंतु जब हिंसा की आग में उनके ही हाथ जलने लगे तब मुकर गए। बाद में एक पत्रकार ने जब उक्त बयान के सबूत दिखाये तो उनकी बोलती बंद हो गई। एक बात साफ तौर पर नजर आ रही है कि जो लोग जम्मू - कश्मीर में अलगाववादी ताकतों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए अफज़ल गुरु की फांसी पर छाती पीटते रहे वही चेहरे आज वांगचुक को महात्मा गाँधी का अवतार साबित करने में जुटे हुए हैं। उनके एनजीओ को मिली विदेशी आर्थिक सहायता की जाँच पर भी उंगलियाँ उठाई जा रही हैं। वांगचुक ने भी उनको गिरफ्तार किये जाने के विरुद्ध केंद्र सरकार को उसी तरह धमकाने का प्रयास किया जैसा धारा 370 हटाये जाने के पहले फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती करते थे। ऐसे में केन्द्र सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करने का जो कदम उठाया वह पूरी तरह सही और जरूरी था। लद्दाख कोई साधारण इलाका नहीं है। चीन और पाकिस्तान दोनों की सीमाएं इसके करीब होने से सुरक्षा संबंधी चिंता सदैव बनी रहती है। विचारणीय बात ये भी है कि बीते कुछ सालों में लद्दाख़ में बौद्ध बाहुल्य पहले जैसा नहीं रहा और कश्मीरी मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी। ऐसे में वांगचुक के आंदोलन में मुस्लिम घुसपैठ से भी इंकार नहीं किया जा सकता। यदि वे पाक - साफ होते तो गाँधी जी की तरह अनशन तोड़ने के बाद हिंसा ग्रस्त इलाकों में शांति मार्च निकालते और उपद्रवियों की पहचान कर उन्हें पुलिस के हवाले करवाते परंतु वे केन्द्र सरकार को ही कटघरे में खड़ा करने की जुर्रत कर बैठे। जाहिर है ऐसे व्यक्ति को खुला छोड़ना घातक होता। उनको मिलने वाले विदेशी धन की जाँच के साथ साथ ही विदेश यात्राओं के दौरान वे किन - किन भारत विरोधी लोगों से मिले इसका ब्यौरा भी सार्वजनिक हो जिससे पता चले कि पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा क्षेत्र में किये जा रहे उनके कार्यों के पीछे का सच क्या है? उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में काफी कुछ प्रचारित हो रहा है किंतु एक सम्वेदनशील सीमावर्ती राज्य में उपद्रव मचाकर देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने की कोशिश करने वाले के हौसले पस्त करना जरूरी है। भारत में बांग्ला देश और नेपाल जैसे सत्ता परिवर्तन का मंसूबा पालन वालों को किसी भी प्रकार की रियायत देना बुद्धिमत्ता नहीं होगी। वांगचुक ने लद्दाख़ में पर्यावरण और शिक्षा के लिए जो किया वह अपनी जगह है । यदि उनकी महत्वाकांक्षा राजनीति में आने की है तो उन्हें खुलकर उसमें हाथ आजमाना चाहिये किंतु इसके लिए वे एक शांत सीमावर्ती इलाके में हिंसा की आग भड़काकर अपना दबदबा साबित करना चाहें तो फिर उनके साथ जो हुआ वही देशहित में है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment