दो दिन पहले हुए हिंसक घटनाक्रम के बाद नेपाल सेना के नियंत्रण में है। प्रधानमंत्री ओली के त्यागपत्र के बाद आंदोलन तो शांत हुआ किंतु कर्फ्यू जारी है। सेना की मध्यस्थता में नई सरकार के गठन की कवायद चल रही है। पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने के संकेत मिले थे किंतु अब कुलमान घीसिंग का नाम तेजी से उछला है। यद्यपि आंदोलन के कुछ नेता इस बात से नाराज हैं कि सेनाध्यक्ष अशोक राज सिंगडेल द्वारा देश को संबोधित करते समय उनके पीछे नेपाल के पूर्व महाराजा का चित्र लगा था। इसका आशय ये लगाया गया कि राजतंत्र की वापसी का प्रयास किया जा रहा है। सेनाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल कुछ लोगों ने नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग भी की । जिस बड़े पैमाने पर हिंसा , आगजनी, मारपीट हुई उससे स्पष्ट है कि आंदोलन में अराजक तत्व भी घुस आये थे। सर्वोच्च न्यायालय जलाये जाने से न्याय प्रक्रिया पूरी तरह तहस - नहस हो चुकी है। जेलों के ताले टूटने से हजारों कैदी बाहर आकर फरार हो गए जिनमें कुख्यात अपराधी भी हैं। सैकड़ों सरकारी दफ्तर फूंक दिये गए। कुल मिलाकर महज दो - तीन दिनों के भीतर इस देश में शासन - प्रशासन, परिवहन, पर्यटन तबाह हो गए। पहले से ही चौपट अर्थव्यवस्था और भी बुरी स्थिति में आ गई। संभवतः एक - दो दिनों में अंतरिम सरकार की तस्वीर साफ हो जाएगी।लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि जिस तरह से माओवादियों को सत्ता से उखाड़ फेंका गया वह महज राजनीतिक व्यूहरचना न होकर किसी अंतर्राष्ट्रीय कार्य योजना का हिस्सा है। चूंकि सत्ता में बैठे लोग चीन के पिट्ठू रहे इसलिए संदेह की सुई घूम - फिरकर अमेरिका पर जाकर टिकती है जो नेपाल को चीन के प्रभावक्षेत्र से निकालना चाहता था। आंदोलन से जुड़े कुछ नेताओं का अमेरिका से जुड़ाव सामने आया है। लेकिन ओली सरकार के पतन के बाद सड़कों पर खुशी मना रहे अनेक युवाओं द्वारा नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री होने की बात कही जो नेपाल को बदहाली से निकाल सके। वैसे भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में खटास तो महाराजा के समय ही आ चुकी थी किंतु जबसे माओवादी सत्ता पर काबिज हुए तबसे तो नौबत सीमा विवाद को लेकर सैन्य टकराव तक आ गई। लेकिन जिस हिंसा के सहारे माओवादियों ने राजशाही को उखाड़ फेंका उसी शैली में उनको बेदखल किये जाने से साम्यवादी शासन व्यवस्था की विफलता भी सामने आ चुकी है। चीन जैसा शातिर देश तक नेपाल में सत्ता विरोधी ज्वार का अनुमान नहीं लगा सका। ऐसे में वहाँ के भावी राजनीतिक स्वरूप का अंदाजा लगाना फिलहाल मुश्किल है। अंतरिम सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार है। जिन युवाओं ने हिंसा के जरिये सत्ता पलट दी , वे अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए नये चुनाव तक शांत रहेंगे ये बड़ा सवाल है। माओवादियों के विकल्प के तौर पर किसी नये राजनीतिक समीकरण की संभावना भी अधर में है। यदि सेनाध्यक्ष पुराने राजपरिवार को आगे लाकर नेपाल को दोबारा हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में मददगार बनते हैं तब अलग स्थिति बनेगी। भारत के लिहाज से देखें तो इस पड़ोसी देश में उत्पन्न अस्थिरता हमारे लिए अनेक समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं। रोजगार की तलाश में भारत आने वाले युवाओं की संख्या बढ़ने के साथ ही जेलों से फरार अपराधियों के भी आने का खतरा बढ़ा है। इसीलिए नेपाल से सटी सीमा वाले राज्यों में सतर्कता बढ़ाई गई है। सेना भी स्थिति पर निगाह रख रही है। आज की स्थिति में नेपाल में जो भी सरकार बने वह माओवादियों की विरोधी ही होगी। जाहिर है उसे भारत से सहयोग लेना पड़ेगा क्योंकि इस देश को होने वाली आपूर्ति भारत के रास्ते से ही होती है। ऐसे में भारत को नई सरकार के साथ बजाय भावनात्मक बातें करने के स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए कि यदि सहयोग और संरक्षण चाहिए तो भारत विरोध की मानसिकता से निकलना होगा। श्रीलंका और मालदीव भी चीन के दबाव से निकलकर भारत के महत्व को स्वीकार करने लगे हैं। अफ़ग़ानिस्तान की तालिबानी सत्ता भी पाकिस्तान को छोड़ भारत से रिश्ते बना रही है। नेपाल की जनता द्वारा माओवादी कुशासन के विरुद्ध विद्रोह किये जाने से वहाँ चीन का प्रभाव घटा है। भारत को इस स्थिति का लाभ उठाना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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