जीएसटी की दरों में बदलाव करने से आम जनता के उपभोग की अधिकांश वस्तुएँ सस्ती होने का रास्ता साफ हो गया। कुछ चीजों पर जीएसटी समाप्त करने की भी जनमानस में अनुकूल प्रतिक्रिया हुई। इस फैसले की लंबे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी। वैसे इन सुधारों को 2021 में ही लागू किये जाने की योजना थी किंतु कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पर जो दबाव आया उसकी वजह से इसमें विलंब हो गया। बहरहाल जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर इस फैसले का स्वागत हो रहा है। आम जनता 22 सितंबर का बेसब्री से इंतजार कर रही है जिस दिन से नई दरें लागू होंगी। यद्यपि जीएसटी में किये गए इन सुधारों को लेकर भी आलोचनाओं का सिलसिला जारी है किंतु राजनीति से इतर हटकर देखें तो प्रधानमंत्री ने जन आकांक्षाओं की पूर्ति की दिशा में जो कदम उठाया उसकी सार्थकता और आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन राहत भरे इस फैसले के बाद अब पेट्रोल - डीजल की कीमतों में कमी का इंतजार पूरे देश को है। इस बारे में ये स्पष्ट है कि जीएसटी काउंसिल में शामिल अधिकतर राज्य पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का विरोध करते रहे क्योंकि इस पर मनमर्जी टैक्स लगाकर वे अपना खजाना भरते हैं। चूंकि भारत को अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल का आयात करना होता है इसलिए इसके दाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही तय होते हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में कीमतों में कमी के बावजूद पेट्रोल - डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ। यूक्रेन संकट के बाद भारत ने रूस से बेहद किफ़ायती दामों पर कच्चा तेल खरीदने की बुद्धिमत्ता दिखाई किंतु उसका लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने से आम जनता में रोष है। ये आरोप भी लगता है कि सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भी सस्ते रूसी तेल को पेट्रोल - डीजल में परिवर्तित कर उसका निर्यात करते हुए मोटी कमाई की। ऐसा ही आरोप रिलायंस पर लगता है। सरकारी तेल कंपनियां मौके का लाभ उठाकर कमाई करें इसमें किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन अपने पुराने घाटे का रोना वे कब तक रोएंगी ये बड़ा सवाल है। जहाँ तक बात निजी क्षेत्र की तेल कंपनियों की है तो उनकी सोच विशुद्ध व्यवसायिक होना अपेक्षित है लेकिन सरकारी क्षेत्र की कंपनियां केवल मुनाफे के पीछे भागती फिरें ये लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के सर्वथा विरुद्ध है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम घाटे में चलें ये भी व्यवहारिक नहीं होता क्योंकि उनके घाटे की भरपाई भी अंततः जनता को ही करनी पड़ती है। लेकिन तेल कंपनियों को यदि भरपूर कमाई हो रही है तो उन्हें पिछले घाटे की भरपाई के साथ - साथ जनता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के अंतर्गत लाकर उन पर राज्य दर राज्य लगने वाले करों में एकरूपता लाई जाए। एक देश एक कर का जो सिद्धांत जीएसटी लागू करते समय प्रचारित किया गया उसके लिए पेट्रोल - डीजल को राज्यों के क्षेत्राधिकार से बाहर निकालना जरूरी हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह कुलांचे भर रही है उसे देखते हुए प्रधानमंत्री को चाहिए वे इस दिशा में भी आगे बढ़ें। इस बारे में रोचक तथ्य ये है कि पेट्रोल - डीजल की सबसे बड़ी खरीददार सरकार ही है। ऐसे में यदि इन्हें जीएसटी के दायरे में भी ले आया जाए तो सरकार का खर्च भी बचेगा। परिवहन लागत कम होने से महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जीएसटी में जो ताजा सुधार किये गए वे तब तक अधूरे रहेंगे जब तक पेट्रोल - डीजल भी उसके दायरे में नहीं लाये जाते।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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