अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वीजा नियमों में बदलाव से भारत की आई.टी कंपनियों के साथ ही उच्च शिक्षित युवाओं में चिंता व्याप्त है। कर्ज लेकर अमेरिका पढ़ने गए उन विद्यार्थियों के सामने भी संकट आ गया जिन्होंने वहीं काम करने या बसने का सपना देखा था। हालांकि जो भारतीय पहले से H-1B वीजा धारक हैं उनके लिए नियम पूर्ववत रहेंगे किंतु 21 सितंबर के बाद से जो नये आवेदन आयेंगे उन्हें 1 लाख डॉलर ( भारतीय 88 लाख रु.) का भुगतान करना होगा। अभी यह वीजा तीन साल के लिए मिलता है जिसे छह वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। लेकिन नये आवेदनों के लिए उक्त वीजा नवीनीकरण के समय दोबारा भुगतान नहीं करना होगा। इस फैसले से भारत ही नहीं अमेरिका में भी हड़कंप है क्योंकि उसकी आई. टी कंपनियों में भारतीय पेशेवरों की भरमार है। सिलिकान वैली नामक आई. टी के गढ़ में तो लघु भारत प्रतीत होता है। यही वजह है कि ट्रम्प को 24 घंटों में ही यह स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि पुराने H-1B वीजा धारकों को नये शुल्क से मुक्त रखा जाएगा और वे पहले की तरह अमेरिका से बाहर जाकर बेरोकटोक वापस लौट सकते हैं। इस नये नियम के लागू होने से अमेरिका की आई. टी कंपनियां ही नहीं बल्कि नासा जैसा अंतरिक्ष संस्थान भी परेशानी महसूस करने लगा जिसमें भारतीय इंजीनियर और वैज्ञानिक महत्वपूर्ण पदों पर हैं। अमेरिका के वित्तीय संस्थानों में भी भारतीय विशेषज्ञ सेवाएं दे रहे हैं। नये वीजा नियमों का परिणाम ये होगा कि अमेरिका में कुशल और मेधावी युवाओं का प्रवेश तेजी से घटेगा जिसका खामियाजा एक - दो वर्षों बाद नजर आने लगेगा। हालांकि ट्रम्प के इस कदम का उद्देश्य अमेरिकी युवाओं की बेरोजगारी दूर करने के अलावा भारतीय कंपनियों द्वारा भेजे गए इंजीनियरों एवं अन्य कर्मियों को अमेरिकी मानकों से कम वेतन देने से पैदा विसंगति दूर करना भी है। आज खबर आ रही है कि ट्रम्प बाहर से आने वाले नये डॉक्टरों के लिए वीजा शुल्क में कमी करते हुए उसे आधा करने जा रहे हैं क्योंकि 88 लाख रु. का भारी - भरकम शुल्क देकर अमेरिका में नौकरी करने की हिम्मत कम ही दिखा सकेंगे। सही बात ये है कि अमेरिका की स्वास्थ्य सेवाओं में भारतीय चिकित्सकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यदि उनमें से आधे वहाँ से लौट आएं तो स्थिति पूरी तरह बिगड़ जाएगी। वैसे ट्रम्प के हालिया सभी निर्णयों के पीछे अमेरिका के नागरिकों के हितों का संरक्षण करना है। लेकिन ऐसा करते हुए वे उन जमीनी सच्चाइयों को नजरंदाज करते जा रहे हैं जो अमेरिका के साथ अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। उनके सनकीपन की प्रतिक्रिया स्वरूप चीन सहित अनेक देशों ने अपने वीजा नियमों में ढील देते हुए भारत के प्रतिभाशाली युवाओं के लिए अपने द्वार खोलने के संकेत दे दिये हैं। लेकिन ट्रम्प के फैसलों के परिप्रेक्ष्य में भारत से प्रतिभा पलायन को लेकर होने वाला विमर्श एक बार फिर प्रासंगिक हो चला है। सरकार और समाज दोनों को इस बारे में खुलकर सोचना चाहिए कि वे कौन से कारण हैं जिनके कारण भारत के मेधावी युवा अमेरिका या अन्य किसी विकसित देश में जाकर काम करने और फिर वहीं बस जाने के लिए लालायित रहते हैं। हालांकि बीते कुछ समय से इस प्रवृत्ति में कतिपय बदलाव देखने मिले हैं। हजारों युवा पेशेवरों ने विदेशों से नौकरी छोड़कर भारत में काम जमाया और सफलता पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। इस सोच का विकास जरूरी है जिसमें सरकार और समाज को एक साथ प्रयास करने होंगे। अभिभावकों को भी अपने बच्चों को इस बात के लिए प्रेरित करना चाहिए कि वे अपनी प्रतिभा का उपयोग अपने देश के लिए करें। इस बारे में तरह - तरह की शिकायतें सुनने मिल जाएंगी लेकिन प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना भी तो हमारा ही दायित्व है। यदि मदारियों और सपेरों का देश होने के कलंक को धोकर भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बन सकता है तब अपने मेधावी युवाओं के कौशल और प्रतिभा का समुचित उपयोग करने का रास्ता भी तैयार करना समय की मांग है। भारतीय आज वैश्विक समुदाय बन चुके हैं । दुनिया के हर कोने में उनकी उपस्थिति दिखाई देती है। लेकिन हमारी प्रतिभाएं अन्य देशों के विकास में योगदान दें क्योंकि उन्हें स्वदेश में काम करने लायक परिस्थितियाँ और अवसर नहीं मिलते तो ये गंभीर चिंता का विषय है। केन्द्र सरकार को चाहिए वह प्रतिभा पलायन रोकने के लिए ठोस और दूरगामी प्रभाव वाली योजना शुरू करे जिसमें विदेश से लौटकर आने वालों को प्रोत्साहित किया जावे। ट्रम्प के वीजा संबंधी फैसले को भी आपदा में अवसर मानकर देश में ही वैसा माहौल और कार्य संस्कृति विकसित करनी होगी जिसके आकर्षण में हमारी प्रतिभाएं विदेश चली जाती हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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