Monday, 8 September 2025

ट्रम्प की समझ में आने लगे भारत से पंगा लेने के नुकसान




अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने का अब तक किसी भी महत्वपूर्ण देश ने समर्थन नहीं। किया। ट्रम्प ने रूस से कच्चे तेल की खरीदी बंद करने का जो  दबाव बनाया उसके जवाब में उन्हें साफ शब्दों में बता दिया गया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए  रूस सहित किसी भी देश से कच्चे तेल के सौदे करता रहेगा। ट्रम्प  को इसकी उम्मीद नहीं थी। लिहाजा उन्होंने ये राग अलापना शुरू कर दिया कि भारत की तेल खरीदी के कारण ही रूस यूक्रेन युद्ध को लम्बा खींच रहा है। वे यहाँ तक बोल गए कि यह लड़ाई नरेंद्र मोदी ही लड़ रहे हैं। चीन में हुए एस.सी.ओ सम्मेलन में जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ को अनुचित बताया तो ट्रम्प को अपने विरुद्ध दुनिया के तीन बड़े देशों के साथ आने से चिंता हुई। हालांकि पहले तो उन्होंने कहा कि  श्री मोदी को पुतिन और जिनपिंग के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए किंतु अगले ही दिन वे उनको महान नेता और पुराना दोस्त बताते हुए सम्बन्धों को सुधारने की उम्मीद जताने लगे। अमेरिकी विदेश मंत्री ने भी ऐसा ही बयान जारी किया। इधर श्री मोदी ने भी ट्रम्प के बयान का उसी सौजन्यता से उत्तर दे दिया। इन बयानों से लगा कि रिश्ते सुधरने का रास्ता खुल गया है। लेकिन ट्रम्प के बयानों में कड़वाहट की जगह मिठास की वजह हृदय परिवर्तन न होकर अंतर्राष्ट्रीय दबाव है। उल्लेखनीय है चीन के पहले श्री मोदी  जापान गए थे। जिसके बाद जापान ने ट्रम्प के दबाव को ठुकराते हुए अमेरिकी चावल खरीदने से इंकार कर दिया। इससे उन्हें लगा कि भारत के कारण अमेरिका के निकट सहयोगी भी दूर जाने लगे। इसीलिये ट्रम्प ने जापान पर टैरिफ को 25 से घटाकर 15 फीसदी कर दिया। उनको लगता था कि  भारत भी उनसे ऐसा ही करने का आग्रह करेगा। सं.रा.संघ की वार्षिक आमसभा में श्री मोदी की संभावित न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान उनसे मुलाकात की उम्मीद भी  उन्होंने लगा रखी थी। लेकिन भारत ने  विदेश मंत्री जयशंकर को सं.रा.संघ  महासभा में भेजने का ऐलान कर दिया। स्मरणीय है कैनेडा में हुए जी 7 देशों के सम्मेलन के दौरान भी ट्रम्प ने फोन पर श्री मोदी को अमेरिका आने का  निमंत्रण दिया। लेकिन प्रधानमंत्री ने मना कर दिया क्योंकि उसी समय पाकिस्तान के सेना प्रमुख  मुनीर भी वाॅशिंगटन में थे। ट्रम्प दोनों को साथ बिठाकर शांतिदूत बनना चाहते थे। उनकी चाल भांपकर श्री मोदी  ने वह आमंत्रण ठुकरा दिया। इसके बाद खबर आई कि ट्रम्प ने चार बार फोन लगाया किंतु उन्होंने उठाया ही नहीं जिससे उनकी नाराजगी और बढ़ गई। फिर भी जब भारत नहीं झुका और रूस तथा चीन उसके साथ खड़े हो गए  तब ट्रम्प के कान खड़े हुए। इधर जर्मनी ने भी भारत से व्यापार बढ़ाने की घोषणा कर अमेरिका को बड़ा झटका दे दिया। ट्रम्प को बड़ा धक्का तब लगा जब उनके दोस्त  फिनलैंड के राष्ट्रपति ने भारत के साथ असहयोग से होने वाले नुकसान के प्रति अमेरिका को  आगाह किया। इस प्रकार भारत के प्रति बढ़ते वैश्विक समर्थन ने तो उनकी चिंता बढ़ाई ही उनके पूर्व सुरक्षा सलाहकार ने भी आरोप लगा दिया कि ट्रम्प ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए बीते 25 वर्षों में किये गए प्रयासों पर पानी फेर दिया। उसी के बाद चीन के हाथ भारत को खो देने जैसी टिप्पणी कर चुके ट्रम्प  श्री मोदी के साथ बेहतर तालमेल होने की कहने लगे। सही बात ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर 50 टैरिफ थोपकर अपने पाँव में ही कुल्हाड़ी मार ली। और गलती का एहसास होते ही उन्होंने श्री मोदी को महान प्रधानमंत्री बताते हुए हमेशा उनसे दोस्ती का राग अलापना शुरू कर दिया। टैरिफ विवाद में कूटनीतिक मोर्चे पर भारत ने जो दृढ़ता दिखाई उसके कारण ट्रम्प के गुब्बारे की हवा निकल चुकी है। हालांकि उनका अस्थिर दिमाग कब क्या कर बैठे ये कहना कठिन है किंतु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि वे श्री मोदी की तारीफ करने के बहाने रिश्तों में आई दरार पाटने की कोशिश करने लगे हैं।  उन्हें लगता था कि वे भारत को घुटना टेक करवा लेंगे किंतु उनका दबाव कारगर साबित नहीं हुआ ।  ट्रम्प की चिंता तब और बढ़ी जब  अनेक बड़े  देश भारत के पक्ष में खुलकर सामने आ गए। ये देखते हुए आगामी कुछ दिन काफी महत्वपूर्ण साबित होंगे क्योंकि भारत ने तो अमेरिका को किनारे करते हुए नये विकल्प तलाशने शुरू कर दिये हैं जबकि अमेरिका के पास भारत का कोई विकल्प नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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