इस वर्ष मानसून की वर्षा ने पहाड़ों पर ही तबाही नहीं मचाई बल्कि मैदानी इलाकों को भी जल प्रलय का एहसास करवा दिया। पंजाब का समूचा ग्रामीण क्षेत्र डूबा हुआ है। हिमाचल प्रदेश , जम्मू - कश्मीर और उत्तराखंड में बादल फटने से आई बाढ़ और पहाड़ों के धसकने की घटनाएं जिस बड़े पैमाने पर हुईं उससे हुए नुकसान को केवल आर्थिक पैमाने पर नहीं बल्कि प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से देखना बुद्धिमत्ता होगी। अनेक स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं भी पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते शहरीकरण का दुष्परिणाम है। हालांकि इन प्राकृतिक आपदाओं के मूलभूत कारणों से लोग परिचित हैं किंतु उन्हें दूर करने के बारे में जो उदासीनता है वह अब आपराधिक लापरवाही का रूप ले चुकी है। इस साल वर्षा के कारण मैदानी इलाकों में भी जिस प्रकार का जल तांडव देखने मिल रहा है वह भविष्य में उत्पन्न होने वाले खतरे का पूर्वाभास है। देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई और सूचना तकनीक के केंद्र बेंगुलूरु में कुछ घंटों की बरसात में ही जल प्लावन का नजारा दिख जाता है। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली भी बीते कुछ दिनों से बाढ़ की विभीषिका झेल रही है। बढ़ती आबादी के कारण दिल्ली के समीप बसे गाजियाबाद, नोएडा, गुडगाँव , फरीदाबाद सहित उ.प्र, हरियाणा और राजस्थान के अनेक शहरों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन. सी. आर ) में शामिल कर लिया गया और इनका विकास भी दिल्ली की तर्ज पर महानगरीय शैली में होने लगा। जमीनें महंगी होने से कृषि भूमि शहरीकरण के शिकंजे में आ गई। खेतों में अट्टालिकाएं तान दी गईं और शॉपिंग माल बनने लगे। नतीजा वही हुआ जिसकी आशंका थी। पानी निकासी के रास्ते या तो रोक दिये गए या संकरे कर दिये गए। इसीलिए जो गलती पहाड़ों में जलप्लावन के लिए जिम्मेदार है वही मैदानी इलाकों में जल प्रलय का कारण बनती जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बीते कुछ दिनों से जो हालात बने हुए हैं उसका कारण यमुना में आई बाढ़ को बताया जा रहा है। लेकिन यमुना तो सदियों से बह रही है। सही बात ये है कि यमुना की बाढ़ का पानी जिन खाली क्षेत्रों में भरता रहा उनमें कांक्रीट के जंगल खड़े हो गए। हिमाचल प्रदेश में नदियों के किनारों पर बनाये गये होटल और रिसार्ट इस वर्ष जल प्रलय में अपना अस्तित्व गँवा बैठे। दिल्ली और उसके समीपवर्ती इलाकों को भी यही गलती दंडित कर रही है। बढ़ती आबादी को बसाने के लिए शहरी सीमाओं को बढ़ाने की सोच ऐसी समस्या बन गई जिसका इलाज किसी के पास नहीं है। समुद्र के किनारे बसे मुंबई में जल भरता है क्योंकि जब सागर की लहरें उफान मारती हैं तो उसका पानी उछाल मारकर जिन खाली क्षेत्रों में भरा करता था उन सभी में इमारतें बन गईं। दिल्ली में देश की सरकार बैठी है किंतु उसके बावजूद भी आपदा प्रबंधन के तमाम संसाधन अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। इस बारे में राजनीति से ऊपर उठकर सोचना जरूरी है। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में घूमकर दिल्ली सरकार पर राहत कार्यों में विफलता का जो आरोप लगाया वह गलत नहीं है । लेकिन अपने दस वर्षीय शासनकाल में आम आदमी पार्टी की सरकार भी मुफ्त बिजली और पानी बाँटकर ही आत्ममुग्ध होती रही। लेकिन दिल्ली में जल प्लावन की समस्या से निपटने के लिए समुचित इंतजाम करने के बजाय आग लगने पर कुआ खोदने की मानसिकता ही कार्यशैली पर हावी बनी रही। ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि शासन - प्रशासन में बैठे लोग चाहे किसी भी विचारधारा से जुड़े हों किंतु आज में जीने की प्रवृत्ति के चलते दूरदृष्टि का अभाव नजर आता है। चुनाव जीतने के लिए तात्कालिक लाभ देने वाले उपायों को ही सब कुछ मान लिया गया है। जल प्लावन पहाड़ों से उतरकर जिस प्रकार अब मैदानी क्षेत्रों में भी तांडव कर रहा है उसे भविष्य के बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। बुद्धिमत्ता इसी में है कि इसके बचाव के प्रति अभी से कार्ययोजना बनाकर समुचित व्यवस्था की जाए। एक दूसरे को कोसने के बजाय सभी को मिलकर प्रयास करना होंगे क्योंकि प्राकृतिक विपदाएं राजनीति नहीं जानतीं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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