Tuesday, 16 September 2025

सर्वोच्च न्यायालय ने वक़्फ़ संशोधन के विरोधियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया

 जब वक्फ संशोधन पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया तब शुरुआत में कथित सेकुलर जमात ने जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया। लेकिन फैसले को पूरा पढ़ने के बाद उनकी खुशी पर पानी फिर गया। मुख्य न्यायाधीश बी.आर .गवई और न्यायमूर्ति ए.जी मसीह की पीठ ने कहा कि पूरे कानून पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता, लेकिन कुछ धाराओं को संरक्षण दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने साफ किया कि संशोधित वक्फ कानून की वैधता पर यह फैसला नहीं है। वक्फ संशोधन के विरोधियों को निराश करते हुए  फैसले में कहा गया कि  बेहद दुर्लभ मामलों में ही पूरे कानून पर रोक लगाई जा सकती है। उल्लेखनीय है  वक्फ संशोधन के विरुद्ध  याचिकाकर्ताओं ने पूरे कानून को ही रद्द करने की मांग की थी परंतु सर्वोच्च न्यायालय  उनके तर्कों से  सहमत नहीं हुआ। इसीलिये कहा जा रहा है कि  इस फैसले से पुराने वक्फ का अंत हो गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागर हाथ मलने को बाध्य हो गए हैं। फैसले में कहा गया गया है  कि वक्फ संशोधन कानून में यह प्रावधान सुरक्षित रहेगा जो सरकार की ओर से नियुक्त अधिकारी को यह निर्धारित करने का अधिकार देता है कि क्या वक्फ संपत्ति ने सरकारी संपत्ति में अतिक्रमण किया है। रोचक बात ये रही कि न्यायालय  ने वक्फ बोर्ड में गैरमुस्लिम को सीईओ नियुक्त करने संबंधी संशोधन पर रोक लगाने से मना कर दिया हालांकि ये समझाईश दी कि जहां तक संभव हो वक्फ बोर्ड का सीईओ मुस्लिम होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश श्री गवई  का ये कहना महत्वपूर्ण है कि याचिका में पंजीकरण सम्बन्धी आपत्ति उचित नहीं है क्योंकि यह प्रावधान 1995 से 2013 तक अस्तित्व में रहा और अब फिर से है और पंजीकरण कोई नया प्रावधान नहीं है। यद्यपि श्री गवई ने माना कि कि कलेक्टर को व्यक्तिगत नागरिकों के अधिकारों का निर्णय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। इसलिए जब तक  ट्रिब्यूनल का निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी पक्ष के विरुद्ध किसी तीसरे पक्ष का अधिकार निर्मित नहीं किया जा सकता।  अदालत ने  यह भी माना  कि वक्फ बोर्ड में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं हो सकते और कुल मिलाकर 4 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होंगे। इस प्रकार ये फैसला मुस्लिम समाज के कट्टरपंथियों के लिए बड़ा धक्का है लेकिन इससे गरीब और बेसहारा मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी जिनके कल्याण के लिए  वक़्फ़ नामक व्यवस्था बनाई गई । वक़्फ़ की अंतर्निहित भावना बहुत ही पवित्र है। समाज में दानशीलता का संस्कार मानवीय संवेदनाओं का परिचायक है। भारत में मुस्लिम समुदाय अशिक्षा के कारण सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से मुख्य धारा से दूर रह गया। इसका लाभ उठाकर इस्लामिक धर्मगुरुओं ने  भावनात्मक शोषण करते हुए उन्हें कट्टरता में बांधकर रखा । वक़्फ़ में निहित संपत्तियों में भारी भ्रष्टाचार हुआ। बेशकीमती  संपत्ति  को समाज के प्रभावशाली लोगों ने मिट्टी के मोल हथिया लिया या मामूली किराया देकर कब्जा लिया। यही कारण है कि मुस्लिम समाज के निचले वर्ग में दुष्प्रचार किया गया कि वक़्फ़ संशोधन लागू होते ही मस्जिद जैसे धार्मिक स्थल भी हाथ से निकल जाएंगे किंतु ओवैसी सहित मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बड़बोले सदस्यों के उकसाने के बाद भी आम मुसलमान शांत बना हुआ है क्योंकि उसे वक़्फ़ की अब तक प्रचलित व्यवस्था से उम्मीद के मुताबिक  सहायता नहीं मिली ।  तलाकशुदा हजारों मुस्लिम महिलाएं अपने बच्चों के साथ बदहाली में जी रही हैं। लेकिन वक़्फ़ बोर्ड ने उनके पुनर्वास और राहत पर समुचित  ध्यान नहीं दिया। अशिक्षित युवाओं की शिक्षा और कौशल विकास की दिशा में भी वक़्फ़ बोर्ड ऐसा कुछ विशेष नहीं कर सके । 2013 तक वक़्फ़ की जो व्यवस्था थी उसे तत्कालीन  मनमोहन सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने बदल दिया। अब जाकर उसमें जो सुधार हुआ उसके कारण अब किसी भी संपत्ति को वक्फ की बताकर जबरिया कब्जा करने के षडयंत्रों पर जो लगाम लगेगी उसी से मुल्ला - मौलवी और तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों के पेट में मरोड़ हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जिन प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई उन पर बहस के बाद हो सकता है वे भी मान्य हो जाएं। लेकिन गत दिवस उसने जो फैसला दिया उसमें वक्फ संशोधन के आधार को मंजूरी देकर नये कानून को किसी भी कीमत पर मंजूर न करने की डींग हांकने वालों के मुँह बन्द कर दिये।


- रवीन्द्र वाजपेयी


No comments:

Post a Comment