ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार ये आरोप लगाते रहे हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में आकर उन्होंने लड़ाई रोकी। असल में खुद होकर ट्रम्प ने ही ये शिगूफा छेड़ा और बीसियों बार वे इसे दोहरा भी चुके हैं। हाल ही में संरासंघ की महासभा को संबोधित करते हुए भी उन्होंने वही डींग हाँकी । हालांकि भारत सरकार अधिकृत तौर पर कह चुकी है कि उनका दावा असत्य है और युद्धविराम पाकिस्तान के अनुरोध के बाद स्वीकार किया गया। संसद में भी विदेश मंत्री जयशंकर ने इसी आशय का बयान दिया। प्रधानमंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया कि आवश्यकता पड़ने पर ऑपरेशन सिंदूर जारी रहेगा। श्री गाँधी के अलावा अन्य विपक्षी नेता भी श्री मोदी को युद्धविराम के मुद्दे पर घेरते रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा कहती आई है कि मोदी सरकार ने तो पहलगाम हमले के जवाब में पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा। लेकिन 2008 में 26 नवम्बर को मुंबई के होटल ताजमहल पर हुए आतँकवादी हमले के बाद उस समय की मनमोहन सरकार ने वैसा साहस नहीं दिखाया। कांग्रेस आज तक इस बारे में कोई समुचित स्पष्टीकरण नहीं दे सकी। लेकिन उसके लिए मुसीबत खड़ी कर दी उसके दिग्गज नेता और पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम के खुलासे ने, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि मुंबई आतंकी हमले के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार ने भारी अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई नहीं की । श्री चिदंबरम के मुताबिक वे बदला लेना चाहते थे लेकिन सरकार राजी नहीं हुई। एक चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं गृहमंत्री उस दिन बना जब आतंकवादियों को मार दिया गया । वह रविवार का दिन था, जब मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाकर कहा कि आपको वित्त से गृह गृह मंत्री बनाया जा रहा है। उस वक्त मेरे मन में आया कि बदला लेना चाहिए। मैंने प्रधानमंत्री और बाकी लोगों से इस मामले पर चर्चा की थी, लेकिन निष्कर्ष यह निकला था कि हमें सीधे प्रतिक्रिया की जगह कूटनीतिक तरीका अपनाना चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस, मेरे पद संभालने के दो-तीन दिन बाद मुझसे और प्रधानमंत्री से मिलने आई थीं और उन्होंने कहा था कि प्रतिक्रिया नहीं दें। इस खुलासे ने भाजपा को कांग्रेस और राहुल पर आक्रामक होने का अवसर दे दिया। श्री चिदंबरम कांग्रेस में प्रथम पंक्ति के नेता हैं। महत्वपूर्ण मंत्रालय उन्होंने संभाले हैं। उनके द्वारा उस आतँकवादी घटना के बाद मनमोहन सरकार द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध सख्त कारवाई नहीं करने के पीछे अमेरिका की विदेश मंत्री का दबाव बताये जाने से कांग्रेस के सामने शर्म से नजरें झुकाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। अपने ही वरिष्ट नेता द्वारा मनमोहन सरकार की पोल खोलना जिसमें वे खुद ही गृह मंत्री रहे, निश्चित रूप से बड़ी बात है। प्रधानमंत्री पर ट्रम्प के दबाव में युद्धविराम करने का आरोप राहुल अब किस मुँह से लगाएंगे ये बड़ा सवाल है। श्री चिदंबरम के खुलासे ने भाजपा को ऐसा हथियार दे दिया जिसका सामना करने में कांग्रेस को पसीने आ जाएंगे। उसकी अपनी सरकार में गृह मंत्री रहे व्यक्ति के सार्वजनिक बयान को गलत बताना उसके लिए असंभव होगा। राजनीति से इतर देखें तो मनमोहन सरकार का अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान पर सैन्य कारवाई नहीं करना देश के साथ धोख़ा ही कहा जाएगा। कूटनीतिक विकल्प अपनाए जाने की जो सलाह अमेरिकी विदेश मंत्री ने डॉ. मनमोहन सिंह को दी वैसी ही माउंटबेटन ने 1948 में नेहरू जी को कश्मीर के मामले में दी थी जिसे मानकर वे कबायली हमले का जवाब देकर पूरे कश्मीर पर कब्जा करने के बजाय राष्ट्र संघ चले गए जिससे मसला आज तक उलझा हुआ है। मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्रीय ज्ञान निश्चित तौर पर प्रशंसनीय था किंतु उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी। उसका कारण गाँधी परिवार का दबाव ही माना जाता है। वे तो इस दुनिया में नहीं रहे किंतु उनके गृह मंत्री द्वारा जो बातें मुंबई में हुए आतँकवादी हमले के सम्बन्ध में उजागर की गईं उनके बाद कांग्रेस ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाने लायक नहीं बची।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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