राहुल गाँधी महज कांग्रेस के नेता नहीं अपितु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं ।अनेक महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उनकी भूमिका रहती है। सरकार की खामियों के अलावा जनहित के मुद्दों पर मुखर होने की अपेक्षा उनसे की जाती है। संसद और उसके बाहर अपने आचरण से नेता प्रतिपक्ष जनमानस में अपनी छवि भावी प्रधानमंत्री के रूप में निर्मित करता है। इस बारे में सबसे आदर्श व्यक्ति के तौर पर स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लिया जाता है जिनमें देश की जनता को भविष्य का प्रधानमंत्री नजर आने लगा था। उल्लेखनीय तो ये है कि 1957 में जब वे पहली बार लोकसभा सदस्य बने तब उनके संसदीय व्यवहार से प्रभावित पं. जवाहरलाल नेहरू ने ये भविष्यवाणी कर दी कि ये नौजवान एक दिन प्रधानमंत्री बनेगा। बतौर नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी और स्व.सुषमा स्वराज ने भी अपने लिए लोगों के दिल में जगह बनाई। लेकिन अपने दो दशक के संसदीय जीवन के बावजूद राहुल यदि अपनी नेतृत्व क्षमता के प्रति देश को आश्वस्त नहीं कर पा रहे तब ये मानकर चला जा सकता है कि जनता के साथ वे अपना जुड़ाव कायम नहीं कर पा रहे। इसका कारण संभवतः ये भी है कि उन्हें बिना जमीनी संघर्ष किये ही विशेष हैसियत हासिल हो गई। उनकी माँ सोनिया गाँधी पार्टी की शीर्ष नेत्री होने के बाद भी जननेत्री नहीं बन सकीं जिसके कारण सर्वविदित हैं लेकिन राहुल के पास आयु और अवसर दोनों होने के बावजूद यदि दो दशक बाद भी वे एक गंभीर नेता के तौर पर स्थापित नहीं हो सके तो इसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। एक युवा नेता से विशेष रूप से जब वह विपक्ष में हो , आक्रामकता की अपेक्षा जनता को होती है। लेकिन जिस तरह धार रहित तलवार से किया प्रहार प्रभावशाली नहीं होता उसी तरह उसके द्वारा सत्ता पक्ष पर किये जाने वाले राजनीतिक हमलों में गहराई न हो तो वे हवा - हवाई होकर रह जाते हैं। श्री गाँधी भी इसी कमी का शिकार हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जितने हमले उन्होंने किये उतने आज तक शायद ही किसी अन्य विपक्षी नेता ने किसी प्रधानमंत्री पर किये हों। लेकिन उन्हें आत्मावलोकन करना चाहिए कि उनकी आक्रामकता से जनता प्रभावित क्यों नहीं होती ? अभी तक उन्होंने प्रधानमंत्री को घेरने के लिए जितनी भी व्यूह रचना कीं वे सब छिन्न - भिन्न हो गईं। कभी वे चौकीदार चोर का शोर मचाते फिरे किंतु जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ। फिर अडानी के बारे में आई हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री को घेरने में जुटे किंतु वह मुद्दा भी अपनी मौत मर गया। वीर सावरकर के बारे में उन्होंने जो निंदा अभियान चलाया वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे के विरोध के कारण ठंडा पड़ गया। बीते कुछ समय से उन्होंने चुनाव आयोग के विरुद्ध वोट चोरी का मुद्दा छेड़ रखा है। अपने आरोपों को वजनदारी देने के लिए उन्होंने उसे एटम बम का नाम दिया। बिहार में लंबी यात्रा भी निकाली। उसके बाद घोषणा की कि वे हाइड्रोजन बम लेकर आ रहे हैं जो मोदी सरकार को हिलाकर रख। देगा। पूरा देश उनके इस बम की प्रतीक्षा कर रहा था किंतु कल पत्रकार वार्ता में उन्होंने जो प्रमाण रखे वे हाइड्रोजन बम तो क्या बच्चों द्वारा दीपावली पर चलाये जाने वाले साधारण फटाखों से भी हल्के थे । एटम और हाइड्रोजन बम नामक दोनों पत्रकार वार्ताओं में जो बातें उन्होंने रखीं उन सबका चुनाव आयोग ने कुछ ही देर में उत्तर देते हुए उन्हें असत्य और आधारहीन निरूपित कर दिया। ये बात तो राजनीति की थोड़ी सी समझ रखने वाला भी जानता है कि चुनाव आयोग के विरुद्ध राहुल ने जो अभियान छेड़ रखा है उसके पीछे बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव हैं। वहाँ मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण से कांग्रेस और लालू यादव की पार्टी राजद परेशान है। राहुल का ये आरोप भी हास्यास्पद है कि आयोग द्वारा काटे गए मतदाता कांग्रेस समर्थक ही होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण पर रोक लगाने से इंकार किये जाने के बाद अब आयोग पूरे देश की मतदाता सूचियों की बारीकी से जाँच शुरू करने जा रहा है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि नेता प्रतिपक्ष अपनी विश्वसनीयता कायम करने में लगातार विफल हो रहे हैं। उनके हमलों में कुंठा ज्यादा नजर आती है। बेहतर तो यही होगा कि वे निजी हमले छोड़ जनता की तकलीफों को लेकर संघर्ष करें। वे आयु के जिस दौर में प्रविष्ट हो चुके हैं उसमें उन्हें अधिक परिपक्वता दिखानी चाहिए। आज के युग में किसी नेता द्वारा कही छोटी सी बात का भी विभिन्न स्तरों पर सूक्ष्म विश्लेषण होता है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष द्वारा उठाये गए किसी भी मुद्दे में यदि व्यापक जनहित न हो तो लोग उसका संज्ञान नहीं लेते। इसीलिये चुनाव आयोग के विरुद्ध उनकी मुहिम आगे पाट पीछे सपाट साबित हो रही है। ऐसा लगता है सैम पित्रोदा जैसे उनके सलाहकार भारतीय जनमानस को पढ़ने में असमर्थ हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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