Monday, 22 September 2025

आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए स्वदेशी की भावना जरूरी


शारदेय नवरात्रि के शुभारंभ पर जीएसटी की नई दरें लागू होने का सुखद संयोग भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। दैनिक उपयोग की वस्तुओं के अलावा खाने - पीने की चीजें तो सस्ती हो ही रही हैं , साथ ही इलेक्ट्रानिक उपकरण तथा दोपहिया और चार पहिया वाहन के दाम भी घट गए हैं। आयकर छूट की सीमा 12 लाख होने के कारण मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं  की क्रय शक्ति में पहले से ही वृद्धि हो चुकी थी। जीएसटी दरों में कमी से अब  घरेलू खर्च में भी काफी कमी आयेगी। वैश्विक अर्थव्यवस्था में चल रही उथल-  पुथल के बीच भारत में आम जनता को महंगाई से राहत दिलवाने का जो जोखिम मोदी सरकार ने उठाया उसने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती से पूरी दुनिया को तो अवगत कराया ही , अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा बनाये जा रहे दबाव के सामने डटे रहने का हौसला भी प्रदर्शित किया। प्रधानमंत्री लगातार स्वदेशी सामान खरीदने का जो आह्वान कर रहे हैं वह केवल भावनात्मक नारा नहीं अपितु दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। भारत का विशाल बाजार पूरी दुनिया को आकर्षित कर रहा है। ट्रम्प की नाराजगी का बड़ा कारण भारत द्वारा अमेरिका के कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए भारतीय बाजार उपलब्ध करवाने से इंकार करना है। इसके अलावा सैन्य सामग्री की खरीदी अमेरिका की बजाय रूस और फ्रांस से किये जाने से भी ट्रम्प खुन्नस खाये हुए हैं। इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया कि चिप से लेकर शिप तक भारत में बनाये जाने की जरूरत है। आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वदेशी की भावना को अपना स्वभाव बनाना होगा। इस बारे में जापान का उदाहरण सामने है जहाँ की जनता महंगी होने के बावजूद भी अपने देश में बनी चीजें खरीदने को प्राथमिकता देती है ताकि जापान के उद्योग और श्रमिक को लाभ मिले। स्वाधीनता संग्राम के दौरान महात्मा गाँधी ने जब स्वदेशी का आंदोलन शुरू किया तब उसका उद्देश्य सीधे - सीधे भारतीय उद्योगों और कारीगरों को ब्रिटिश उद्योगों के मुकाबले मजबूती से खड़ा करना था। राजनीतिक टीका - टिप्पणियों से अलग हटकर देखें तो ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि आजादी के बाद के कई दशकों तक आत्मनिर्भरता की बात तो खूब हुई किंतु उस पर अपेक्षित जोर नहीं दिया गया। नतीजा ये हुआ कि आम भारतीय के मन में विदेशी सामानों का आकर्षण बढ़ता गया। खिलौने से लेकर हवाई जहाज तक के लिए हम विदेशों के मोहताज होकर रह गए। वहीं  लाइसेंस राज ने कुछ उद्योगपतियों का एकाधिकार कायम कर दिया। छोटी - छोटी वस्तुओं का आयात होने से घरेलू उद्योग पनप ही नहीं सके। लेकिन अब परिदृश्य बदला है। स्टार्ट अप के तौर पर नये उद्यमों की बाढ़ आ गई है। सरकार से मिली छूट एवं अन्य प्रोत्साहनों के कारण युवा उद्यमी आगे आ  रहे हैं। कोविड काल में देश ने अपने पैरों पर खड़े होने का जो सबक सीखा उसका सुफल सामने आ रहा है। हालांकि इस सबका पूरा लाभ मिलने में कई बरस लग जाएंगे लेकिन ये कहना गलत न होगा कि देश आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार और उद्योगों की भूमिका इस मामले में निश्चित ही निर्णायक है किंतु उपभोक्ता का समर्थन नहीं मिला तो पूरी कवायद बेअसर साबित होगी। इसीलिए श्री मोदी लगातार  स्वदेशी अपनाने पर जोर दे रहे हैं। विदेशी दबाव का सामना करने के लिए भारतीय उद्योगों की क्षमता बढ़ना जरूरी है किंतु उसके लिए उपभोक्ताओं का सहयोग भी जरूरी है। स्वदेशी की भावना को जमीनी स्तर पर  ले जाये बिना आत्मनिर्भर भारत बनाना संभव नहीं होगा। इस बारे में इलेक्ट्रिक कारों को ही लें तो विदेशी टेस्ला की बजाय भारत में बन रहे इलेक्ट्रिक वाहन खरीदकर स्वदेशी उद्योगों को सहारा दिया जा सकता है। नवरात्रि से भारत में उपभोक्ता बाजारों में खरीदी बढ़कर  दीपावली तक  उच्चतम स्तर पर पहुँच जाती है। ऐसे में इस वर्ष भारत पर जिस प्रकार का दबाव अमेरिका ने बना रखा है उसका माकूल जवाब हम दीपावली पर्व पर  केवल स्वदेश में निर्मित वस्तुओं को खरीदकर दे सकते हैं। आत्मनिर्भर भारत के निर्माण लिए भी यह जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment