Monday, 1 September 2025

मोदी, पुतिन और जिनपिंग तय करेंगे विश्व राजनीति की नई दिशा


चीन में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन (एस. सी.ओ) के सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा  रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर सबसे ज्यादा निगाहें टिकी हुई हैं। चीन तो चूंकि मेजबान है इसलिए  शी जिनपिंग तो केंद्र बिंदु हैं ही। एससीओ  दस देशों का एक यूरेशियाई राजनीतिक , आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संगठन है। इसकी स्थापना 2001 में चीन, रूस , कजाकिस्तान , किर्गिस्तान , ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान द्वारा की गई थी। जून 2017 में भारत और पाकिस्तान के साथ इसका विस्तार आठ देशों तक हो गया।बाद में ईरान और बेलारूस भी शामिल हो गये।  इन सबकी आबादी , जमीन और आर्थिक संसाधनों को मिलाने पर दुनिया की बड़ी शक्ति बन जाती है। मौजूदा वैश्विक हालात में इसका महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिन तीन प्रमुख देशों को अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लिया उनके राष्ट्रप्रमुख सर्वश्री नरेंद्र मोदी, व्लाडीमीर पुतिन और शी जिनपिंग इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। यद्यपि एससीओ का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत  करना है। लेकिन ट्रम्प के सनकीपन से जो परिस्थितियाँ पैदा हो गईं उनकी वजह से रूस, चीन और भारत के नेताओं की उपस्थिति के कारण सम्मेलन में  विषय सूची से हटकर भी बहुत कुछ ऐसा होगा जो अमेरिका के लिए परेशानी का कारण बनेगा। हालांकि श्री मोदी की कल जिनपिंग से जो आपसी बातचीत हुई उसे दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के निपटारे के अलावा व्यापार एवं आवागमन को सुलभ बनाने से जुड़ा प्रचारित किया गया किंतु ट्रम्प के टैरिफ हमले के शिकार दोनों बड़े देशों के शीर्ष नेताओं की अंतरंग वार्ता में टैरिफ संकट पर विमर्श न हुआ हो ये मानना नादानी होगी। इसी तरह आज पुतिन के साथ मोदी जी की बातचीत में यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को रोकने तक सीमित न रहकर अमेरिका द्वारा रूस के साथ ही भारत पर बनाये जा रहे दबाव पर भी विचारों का आदान - प्रदान हुआ  होगा। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले अमेरिका ने भारत और चीन पर रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाया। लेकिन दोनों ने उसे अनसुना कर दिया तब दूसरी बार जीतकर आये डोनॉल्ड ट्रम्प ने दोनों पर टैरिफ रूपी मिसाइलें दाग दीं। ट्रम्प का खुल्लमखुल्ला कहना है कि रूस को भारत और चीन को बेचे गए  कच्चे तेल से जो राशि मिलती है उसी के बल पर वह लंबी लड़ाई लड़ने का साहस जुटा सका। इस प्रकार रूस से व्यापारिक रिश्ते रखने के कारण भारत और चीन पर अमेरिकी टैरिफ का भार आया। ऐसे में तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की एससीओ सम्मेलन में उपस्थिति को महज कूटनीतिक औपचरिकताओं और फोटो सेशन में बांधना उचित नहीं है। वैसे भी कूटनीति में जो दिखाया जाता है उससे अधिक छिपा लिया जाता है। और फिर मोदी, पुतिन तथा जिनपिंग तीनों बेहद अनुभवी और दिग्गज राजनेता हैं जिनकी विश्व राजनीति पर गहरी पकड़ है। हालांकि चीन और भारत के बीच अविश्वास की मौजूदगी से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन वर्तमान हालात में दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त वाला सिद्धांत दोनों को नजदीक आने मजबूर कर रहा है। पुतिन की मौजूदगी में तीनों देशों की जुगलबन्दी किसी नये वैश्विक गठजोड़ को जन्म दे सकता है। स्मरणीय है चीन आने से पूर्व श्री मोदी ने जापान का दौरा किया जो अमेरिका के बेहद करीब होने के बावजूद ट्रम्प के टैरिफ हमले से त्रस्त होकर दूरी बनाने की हिम्मत जुटा सका। जिसकी बानगी के तौर पर उसने अमेरिकी चावल खरीदने के ट्रम्प के दबाव को ठुकराने का साहस दिखा दिया । यद्यपि एससीओ सम्मेलन से भारत - चीन के बीच का सीमा विवाद सुलझ जायेगा और जिनपिंग पाकिस्तान की पीठ से हाथ उठा लेंगे ये सोचना बेमानी है किंतु सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री मोदी की पहले जिनपिंग और आज पुतिन से जो बातचीत हुई उससे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जरूर चिंतित होंगे क्योंकि जिस वैश्विक वातावरण में रूस, चीन और भारत के राष्ट्रप्रमुख एक ही जगह  जमा हैं  वहाँ कोई न कोई बड़ी  रणनीति अमेरिका की दादागिरी खत्म करने  जरूर तैयार होगी। इस बारे में गौरतलब है कि मोदी  , पुतिन और जिनपिंग तीनों अपनी दृढ़ता के लिए जाने जाते हैं। इसलिए ट्रम्प के हरसंभव प्रयास के बाद भी अभी तक तीनों ने झुकने से मना कर दिया है। इसे देखते हुए एससीओ का यह सम्मेलन विश्व राजनीति को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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